Friday, 12 December 2025

शिक्षा के प्रयोग में एक कदम और

शिक्षा के प्रयोग में एक कदम और 

मध्यप्रदेश में -

* दरअसल राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के मध्यप्रदेश में दो वर्ष पूरे हो गये हैं। 

* फिर भी प्रदेश में अभी एन ई पी , न्यू शिक्षा नीति!! के बाहर नहीं आ पाई। 

*  यह अलग बात है कि इसको गले उतारने में दो वर्ष में छोटे-बड़े हजारों सेमीनार, वेबीनार हो चुके हैं।

* ख़र्च की बात 'गूंगे का गुड़' जाने। 

* बता दें प्रदेश में अभी बहुत बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शिक्षक,  दोनों इसे राष्ट्रीय नहीं,न्यू ही बोलते हैं। 

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भारत सरकार का अगला कदम -

* तब भारत सरकार ने बहु प्रतीक्षित 'शिक्षा का (शायद एकल नियामक) सिंगल रेगुलेटर' बिल कैबिनेट में पास कर दिया।

* 'विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण '

* यूजीसी, एआईसीटीई,और एनसीटीई जैसे बड़े नदों के साथ अनेक नालों का अधीक्षण!

* पहले यह 'हायर एजूकेशनल कमीशन आफ इंडिया ' प्रस्तावित था।
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* यह बदला नाम पंच परिवर्तन के 'स्व' भाषा का प्रत्यक्ष परिणाम है।

* इंडिया की जगह 'भारत' का स्वत्व बोध है।

# विश्वास है प्रदेश सरकार 'इंडिया' और अंग्रेजी के भाषाई प्रभाव को संतुलित कर मातृभाषा को बढ़ावा देगा।

* शायद पीएम,सीएम राइज और एक्सीलेंस से मुक्ति मिले!
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* चिकित्सा शिक्षा और विधि शिक्षा इसके बाहर होंगे।
* तर्क साफ है, 'विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण' को विधि -निषेध और बीमारी की अवस्था यदि प्राप्त होती है तो चिकित्सा की आवश्यकता होगी।

* विधि लाल और हरी बत्ती दिखायेगा तो चिकित्सा रोग का निदान करेगा। 

** और यह काम बाहर रहकर अनासक्त भाव से ही किया जा सकता है!!

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# देखना यह होगा कि मध्यप्रदेश में यह किस प्रकार सामने आयेगा, क्योंकि यहां चिकित्सा और विधि को उनके पृथक केन्द्रीय (विधि) और राज्य (चिकित्सा) विश्वविद्यालय होने के वावजूद दोनों को परम्परा विश्वविद्यालय में भी चलाने की योजना चल रही है।

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* इसके तीन काम बताये गये हैं -नियमन, मान्यता और पेशेवर मानकों का निर्धारण।

* शायद प्रदेश के विनियामक आयोग और फीस नियामक आयोग भी इससे प्रभावित हों? मध्यप्रदेश में भी यह आयोग किसी नये स्वरूप में आये।

* शिक्षा में 'पेशेवर मानक' शिक्षा को उद्योग मानकर चला रहे प्रतिष्ठानों को फिर से पेशे में फलने -फूलने का अवसर देगा या पेशा बंद कर शिक्षा को पुनर्जीवित करने का ....।

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* 2034 से 47 तक इंतजार करना होगा। शायद आज का अठारह साल का मस्तिष्क (युवा -युवती) तब तक 'याचि देही,याचि डोला' की सिद्धि प्राप्त कर सकें।

* मराठी के 'देही' शब्द का संस्कृत में 'आत्मा' भी अर्थ होता है। इसलिए हम जैसों को भी पुनर्जन्म में विश्वास रख कर इस 'डोला' में न सही उस 'डोला' से देखने का अवसर मिलेगा ही।
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 करणीय -

* दो वर्ष के ज़मीनी अनुभवों के आधार पर शिक्षण व्यवस्था में सुधार हो।

* निजी महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में सरकार का नियंत्रण हो। ताकि शिक्षा व्यवसाय बनने से बच सके।

* प्रदेश में निजी विश्वविद्यालय खोलने पर रोक लगे और खुले हुए महाविद्यालयों/ विश्वविद्यालयों के गुणवत्ता के लिए - शिक्षक नियुक्ति, परीक्षा परिणाम और डिग्री पर अंकुश लगे।

* शोध क्षेत्र पर घिसी- पिटी शोध व्यवस्था में बदलाव हो। शोधग्रंथ आनलाइन होने के बाद ही उपाधि दी जाये।

* टास्क फ़ोर्स सक्रिय हो और रूसा विश्वबैंक की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण और प्रभावी परिणाम के लिए निर्धारित स्वीकृति पदों पर अपेक्षित अधिकारियों की पदस्थापना हो।

@ नोट -
 * यद्यपि मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा मुख्यमंत्री जी के रुचि का विषय है और देश के अन्य राज्यों की तुलना में राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 को लेकर आगे भी बढ़ रहा है, तथापि देखना चाहिए कि परिणाम भी अपेक्षित मिले।

* शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत  - अभाविप, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, शिक्षण मंडल जैसे आधा दर्जन संगठन भी शिक्षा में गुणवत्ता आये इस दिशा में प्रयत्नशील हैं। 

* सरकार उनके सुझावों को समय पर मान कर काम करे तो राजीव गांधी विश्वविद्यालय, ह्वीआईटी जैसे अन्य संस्थानों की दुर्गति न हो और आये दिन कुलगुरु न तो स्तीफा दें और न ही हेतराम की बखरी में जायें। 

 कृपया इसे आलोचना समझें, निन्दा नहीं।
सादर

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