‘परित्राणाय साधूनां विनाशय च दुष्कृताम ।’
और भ्रमित अर्जुन से गीता के अठारवें अध्याय के बहत्तरहवें श्लोक में केवल एक ही प्रश्न क्यों पूछते हैं, -
‘कच्चिदेतच्छुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय।।’
अर्थात् हे पार्थ ! क्या इस गीताशास्त्र को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया ? और हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञान जनित मोह नष्ट हो गया ?
आज शिक्षा जगत में आवश्यकता है उस अर्जुन कि जो शिक्षा / उपाधि ग्रहण करने के पश्चात पूरे विश्वास के साथ कह सके-
‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धात्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव ।।’
वह स्मृति बोध अर्जुन को आ सकता है, वह स्मृति बोध स्वयं क्षणिक शिष्यमोह से क्षुभित व्यास को आ सकता है, तो फिर वह वैदिक, पुरातन, सनातन स्वत्व-स्वबोध भला हमें क्यों नहीं हो सकता ?
(दृष्टि पथ से )
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