Saturday, 4 October 2025

परिवर्तन नहीं परावर्तन की शताब्दी

* 'परावर्तन' को विज्ञान घटना कहता है। जिसमें प्रकाश की किरणें किसी सतह से टकरा कर उसी माध्यम से वापस लौट जाती हैं।

* 'परावर्तन' सामाजिक सरोकार की एक ऐसी दृष्टि है, जो मूल से निकले दिशा बदल चुके, पंथों को दुलराती, सहलाती और आत्मीयता से आच्छादित कर 'स्वत्व' का बोध कराती है।

* 'परावर्तन' एक राष्ट्रीय संकल्पना है, जिसमें पंथ, वर्ग, जाति, लिंग, भाषा, भूषा और क्षेत्र का सप्तरंगी इंद्रधनुष बनता है, जो अ-राष्ट्रीय तत्वों, विभेदक नीतियों और विध्वंसकारी संभावनाओं का समूलाग्र उच्चाटन करती है।

* परावर्तन वह व्याप्ति है, जो वैश्विक क्षितिज को स्पर्श करती , उषा की भगवा आभा बिखेरते हुए, प्रचंड भास्कर का सर्वकष मार्ग प्रशस्त कर आहत, अतृप्त, आकांक्षी मनुष्यता को संध्या और रात्रि की गहनतम होती  संम्भावनाओं से निकाल कर,  अर्काय स्वरूप को प्रदीप्त करने,  राकापति के मधु की वर्षा के साथ औषधीय विरेचन का कार्य करती है।

* 'परावर्तन' वह आध्यात्मिक अंत: सलिला है, जो अन्नमय कोष (भु:भुव स्व की यात्रा को) प्राण मय कोष के वाहन में प्रतिस्थापित कर मन और उसकी सारथी इंद्रियों का शिथिलीकरण कर वि-ज्ञान की किरणों से उन्हें उर्ध्वमुखी बना , चेतना की  प्रार्थनाओं और आहुतियों की समिधा 'चिति' में स्वाहा करती आनन्द मय कोष, रसो वै स: का बोध कराती है। 

* यह द्वय का परावर्तन है। परिवर्तन के कारण मूल से बिखरी और विखंडित होती आकांक्षाओं का शीतलीकरण है।

* परावर्तन नैसर्गिक है,  परिवर्तन सुनियोजित /आकस्मिक योजना /घटना है।  

* परिवर्तन में संम्भावनाओं का द्वंद्व है , तो परावर्तन में विकृतिकरण की संम्भावनाओं की इति है।

समझना होगा -

* 'संघ' शताब्दी परिवर्तन और सम्भावनाओं की नहीं, परावर्तन और समाधानों की है।

*शताब्दी लौकिक व्यवहार के परिमार्जन और एकात्मकता के आह्वान की है।

* शताब्दी सनातन की आभा में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व की चेतना को भारतीय चिति में व्याप्तीकरण (अध्या त्मीकरण) की प्रक्रिया है।

* यह उनकी नहीं हमारी शताब्दी है। यह कैलेंडर की नहीं, कर्म पथ की शताब्दी है।

* यह शस्र और शास्त्र की शताब्दी है। अर्थ और काम के धर्म में विसर्जन (धर्माधारित अर्थ का अर्जन और काम का संयोजन) की शताब्दी है।

* यह नौनिहालों के आगत-स्वागत युवाओं के कर्तव्य बोध तथा वृद्धों के आभार और अभिनंदन की शताब्दी है।

* यह वनवासी, गिरि कंदरा निवासी, ग्राम और नगरवासियों की परम्पराओं के स्मरण की शताब्दी है।

* देव, मनुष्य,यक्ष, राक्षसों के लिए 'द' के बोध की शताब्दी है। 

* यह दधीचि, शिवि, राम और कृष्ण के दान, दया, त्याग और पुरुषार्थ की शताब्दी है।

* यह बुद्ध के करुणा, चाणक्य के बुद्धि तथा चंद्र गुप्त के शौर्य की शताब्दी है।

* यह केवल सिंदूर की नहीं, तो हल्दी, दूर्वा, कुमकुम से सजी वह अभिमंत्रित थाली है, जो वसुंधरा के भाल पर तिलक करने उद्यत है।

* सन्नद्ध है, मंगलकारी सुप्रभात के उषा -भगवा - प्रणाम को। 

आइए,जन गण मन की 'संघ शताब्दी' के सरोकारों का अवगाह्न कर जीवन के पुरुषार्थ को चरितार्थ करें।

विजयादशमी 
2025

9 comments:

  1. विजयादशमी पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 💐💐

    ReplyDelete
  2. आदरणीय नमस्कार। विजयदशमी और दीपोत्सव की हार्दिक बधाई🎉🎊 और शुभकामनाएं
    पूरा विचार पढा़। अच्छा है। दायरे और सीमाओं से बाहर निकल कर बात करेंगे तो बात दूर तक जायगी और उलझाव से भी बच जायेंगे। निश्चित दायरे में रह कर आप बद्ध हो जाते हैं। खुलापन समाप्त हो जाता है। खुलेपन में आप बात वही करते हैं जो करना चाहते हैं, पर निस्सीम हो जाते हैं। बधाई और शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  3. ‘परावर्तन’ आध्यात्मिक अर्थवत्ता और चेतना का प्रकाश समेटे हुए दर्पण में लौटती प्रति छाया नहीं, बल्कि आत्मा में झंकृत वह कंपन है जो परिवर्तन से परे जाकर अस्तित्व के सत्य का स्पर्श करती है। आदरणीय सर आपने आलेख में ‘परिवर्तन’ और ‘परावर्तन’ के सूक्ष्म अंतर को दार्शनिक, वैदिक तथा चेतनात्मक स्तर पर अत्यंत गहराई से प्रस्तुत किया है। आपने अन्नमय से आनन्दमय कोष तक की आंतरिक यात्रा को प्रतीकों, उपमानों और अध्यात्म-रस से संपृक्त कर एक नवीन बौद्धिक अनुभव को प्रस्तुत किया है। यह रचना केवल पढ़ने के लिए नहीं, अपितु मनन आत्मानुभूति और अपने अन्दर संजोने के लिए है।।

    ReplyDelete
  4. सादर प्रणाम सर
    उत्तम विचार

    ReplyDelete
  5. Article is excellent and heart touching. How the reflection is defined. It draws our attraction that Science is blind without Religion and Religion is lame without Science.

    ReplyDelete