दरअसल आरक्षण सुरसा का मुंह है।
यह यक्ष और राक्षस की दुरभिसंधि से उपजी ऐसी व्याधि है,जो मंत्र -तंत्र भी करता है,यज्ञ हवन भी।
वह कुवेर का धन भी चहता है। और दसमुखी पराक्रम भी।
पुष्पक विमान भी, और त्रिदेवों का आश्वासन और आशीर्वाद भी।
सत्ता लोक भी, सुरक्षित अमरत्व का कवच भी।
बस इस बात को अपने अहंकार में भूल जाता है कि दोनों सहोदर हैं।
संतोष, सात्विकता की चादर ओढ़ना और बात है। संतुष्ट होकर सात्विकता के साथ प्राप्त को अंगीकार करना दूसरी बात है।
खेलता इंद्र है। मौन सरस्वती मतिभ्रम पैदा करने को बाध्य है।
इंद्र घातक है।उसकी प्रवृत्ति श्वान की है। उसकी चेष्टा काग की और निष्ठा स्वार्थ की।
यही मूल है।
मूक हैं तो महाकाल! हस्त बद्ध हैं तो ब्रह्मा और शेषशैय्या पर चिरपरिचित मुस्कान के साथ भविष्य को देखते विष्णु।
आरक्षण कभी आर्थिक आधार लेकर सामने आता है,तो कभी सामाजिक समता और सामाजिक सम्मान को लेकर।
परम्परा कहती है, आर्थिक आधार जाति पर सीमित नहीं है। समानता गुण धर्म की बराबरी पर होती है। सम्मान मांगा और खरीदा नहीं जा सकता। अर्जित किया जाता है।
ताली सम्मान की हो या सामाजिक बराबरी की एक हाथ से नहीं बजती। हृदय धन,बल,मान से नहीं मिलता, उसके लिए दोनों तरफ से प्रेम का रस बरसना चाहिए।
छल,बल, सत्ता दिलाती है। गरीब का जातीय अहंकार स्कालरशिप या पांच किलो चावल और गेहूं, शक्कर से तुष्ट नहीं होता। उसके स्वाभिमान की रक्षा करनी होगी, वह कृपा से नहीं, निर्हेतुक सेवा भाव से ही बोध हो सकती है।
उसे प्रतिशत में बांटकर या जितनी जिसकी जाति बड़ी,उतनी उसकी हिस्सेदारी देकर संतुष्ट नहीं किया जा सकता।
अमीर अपनी जातीय श्रेष्ठता पीढ़ी- दर- पीढ़ी स्थापित किए रहना चाहता है।
नव धनाढ्य दोनों को रौंद कर अपने केतु के लिए दुराग्रही होता जाता है।
ऐसे में प्याज के समान सुन्दर समाज कट-फट कर छिलका दर छिलका राजनीति की बलि चढ़ता जा रहा है।
इधर राजनीतिक और मतांतरण के उद्योग में लगा मुल्ला उस प्याज को कुछ ज्यादा चटखारे के साथ खाने पर तुला है।
समाजिक सरोकार, समरसता, समानता के शिल्पकारों की छेनी -हथौड़ी जब तक एक स्वरूप गढ़ती है, आरक्षण की सुरसा अपना रूप और आकार बदल चुकी होती है।
बचता है केले का सनातनी विलाप करता कंद। जिसके तने को काट कर उसको उधेड़ दिया गया है।
फिर भी समझिए वही तोरण बन आगत के स्वागत के लिए खड़ा है। छली इद्र की पूजा के लिए। 🙏
तुष्टिकरण समस्या है, स्वबोध का जागरण समाधान ।
दीपावली की शुभकामनाएं
14/10/2025
बिल्कुल सही, अतिप्रासंगिक एवं विचारणीय
ReplyDeleteइसका समाधान एक दिन में हो सकता है । सादर
ReplyDeleteभारतीय ज्ञान परंपरा की ढपली बजाने वालों को पता होना चाहिए कि उस समय शिक्षा में आरक्षण नहीं था तथा अयोध्या के राजकुमारों के साथ निषाद के पुत्र को भी गुरुकुल में अध्ययन हेतु प्रवेश दिया गया था; जो कि आरक्षण और छात्रवृत्ति के आधार पर नहीं था और न ही कोई जगह ही आरक्षित थी❓
ReplyDeleteइसी प्रकार से अयोग्यता के लिए प्रशासनिक व्यवस्था में स्थान नहीं था तथा योग्यता प्राप्त जीन्स के वंशजों के द्वारा प्रशासन किया जाता था; जो कि सर्वोत्तम था⁉️
इसके पश्चात् प्रकृति के अधीन गुणों के आधार पर व्यवस्था में विकृति को यथास्थिति सुधार किया गया है तथा इसके लिए भी परिवारों में युद्ध भी हुए एवं कालान्तर में योग्यता को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक व्यवस्था में स्थान प्राप्त हुआ था तथा कई-कई वर्षों तक योग्यता के द्वारा शासन किया गया; यद्यपि कालांतर में ऐसे परिवार मुख्य धारा से पिछड़ गये। वर्तमान की परिभाषाओं में उन्हें विभिन्न संज्ञाओं से पुकारा गया❗जबकि वे विशुद्ध क्षत्रिय हैं तथा राज्यसत्ता से बिमुख होने पर विभिन्न व्यवसायिक परिवारों के सानिध्य में जीवनयापन करने लगे⁉️
वर्तमान में अयोग्यता को सुविधाओं से युक्त नकारा बनाने के लिए भिन्न-भिन्न प्रयोग किए गए हैं; जो कि उचित नहीं है बल्कि क्षत्रिय के हाथ से ही इनके उद्धार के अवसर आ रहे हैं⁉️⁉️ सादर