Sunday, 21 September 2025

पितृपक्ष! मोक्ष पक्ष!! कर्तव्य पक्ष!!!

गौ भक्त रोटी खिलाएं , पर गोबर भी उठाएं। तभी बरक्कत होगी। कम से कम अपने घर के सामने तो उठा  ही सकते हैं।

कैसी विडम्बना है,घर के दरवाजे तक झाड़ू,पोछा, रंगोली। घर के गेट के बाहर रखरखाव समिति जाने!!! नगरपालिका जाने। सरकार जाने!!

क्या यह गैरजिम्मेदारों की, मान्य जिम्मेदारों पर , निट्ठल्ले पन की टोकरी फेंकना नहीं है।
या तबियत से पत्थर उछालना है,कि आकाश में छेद होगा?

आपातकाल  की ग़ज़ल के पत्थर ने काम किया भी था, तो टोकरी फेंकना भी चालू हुआ। परिणाम सरकार पर सरकार अंत में आपातकाल की कर्ताधर्ता की सरकार पुनः आ ही गई ।

पत्थर उछलता रहा,  कभी इसके सर, कभी उसके सर , अंत में उछालने वाले का सर फोड़कर शांत शिव लिंग बन पूजित हो गया। 

 आज भी उस पंक्ति को शुभंकर माला -मंत्र बनाकर सभा, गोष्ठी, आंदोलनों में कहते, जपते, सुनते रहते हैं। है न ?

पत्थर और टोकरी फेंकने की कला केवल साहित्यकार ही नहीं, राजनीति ही नहीं तो साधारण जन भी सीख चुके हैं।
है न नागरिक कर्तव्य बोध?

गांधी मर गये, हम सब भी यह ठाट बाट एक दिन छोड़कर जाने वाले हैं।

तो क्या अपने घर के सामने झाड़ू नहीं लगा सकते? क्या यूरोसेंन्ट्रिक मानसिकता पर पत्थर नहीं चला सकते?

हो सकता है,जब अपनी यात्रा निकले तो लोग कहें कि जहां यह चर्म गठ्ठर रख रहे हो, थोड़ी सफाई कर दो,वह आदमी जाने तक अपने घर के बाहर भी साफ सुथरा रखता था। मन से भी ठीक ठाक ही था।
है न सही!!

स्वच्छता का निरोगी काया और मानसिकता से भी सम्बन्ध है।

हमारे पूर्वज, ऋषि, मुनि संत अपने आश्रम की सफाई रोज करते थे, इसलिए नहीं की वे सफाई रोगी थे, बल्कि उन्हें अपने प्रभु के आने की प्रतीक्षा रहती थी। पर्यावरण प्रदूषित न हो इसकी चिंता थी। 

हम भी परमपिता और अपने पूर्वजों को बताने लायक रहें कि, हे महान आत्माओं! हम केवल पितृपक्ष में तुम्हारी श्राद्ध ही नहीं करते। तीन समय संध्या ही नहीं करते, तुम्हारे आचरण का अनुशरण भी करते हैं।
 और भावी पीढ़ी के लिए मार्ग भी बनाते हैं।

परिवार की चिंता के साथ वृहत्तर परिवार की भी हमें चिंता है। पहली रोटी गौ को और अंतिम रोटी कुत्ते को देते हैं, किंतु क्या उन्हें आवारा पशु के सम्बोधन से बचाते भी हैं? 

परिवार को नागरिक कर्तव्य का बोध ही परिवार प्रवोधन है। यही मातृ ऋण,पितृ ऋण और राष्ट्र ऋण का बोध है।

आज बिदा होते पूर्वजों को, उनके माध्यम से पृथ्वी,अंतरिक्ष,वायु, अग्नि,जल को, ऋषियों को, अपनी परम्परा को यह आश्वासन भी देते हैं कि संस्कृति और परम्परा, राष्ट्र के गौरव को हम अपने आचरण से बढ़ायेंगे।

समरस जीवन जड़ -जीव से लेकर वृक्ष,लता,पशु पक्षी तक की सामाजिक समरसता है। जिन मालिकों, किरायेदारों ने कुत्ते पाल रखे हैं, वे दोपहर, सुबह-शाम कभी भी भोंकना शुरू हो जाते हैं, उन्हें भी पड़ोसी धर्म निभाने की सलाह देनी चाहिए। 
गौ सेवा के नाम पर केवल रोटी खिला कर वैतरणी पार करने का टिकट नहीं मिल सकता। उसको चौराहों में आत्महत्या के लिए खड़े रहने देना भी कितना सही है, विचारणीय है।

अपने सहित सभी से अपेक्षा होनी चाहिए, उन्हें इस बात का बोध होना चाहिए कि सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए अपने स्तर से टोका-टाकी करते रहना चाहिए। यह सरकार का नहीं जागृत समाज का दायित्व है। 

 हम दो हमारे दो, हम दो हमारे एक,हम और हम (रिलेशनशिप) से आगे हम और हमारे तीन की अपेक्षा। क्यों ?

 एक और एक से वंश सुरक्षित रहेगा। हम दो हमारे दो से नाना,नानी,मामा मामी,मौसा मौसी, बहन बहनोई का संबंध सुरक्षित रहेगा। हम और हमारे तीन से परिवार, कुटुम्ब और तीसरे से राष्ट्र सुरक्षित रहेगा। सीमा सुरक्षित रहेगी, धर्म सुरक्षित रहेगा। फिर सम्पूर्ण परिवार सुरक्षित रहेगा। 

कुटुम्ब सुरक्षित रहेगा तो समाज की समरसता मजबूत होगी। आबादी का असंतुलन दूर होगा। आर्थिक आधार मजबूत होगा। अस्पृश्यता दूर होगी। राष्ट्र बलवती होगा।

 यह सब होगा 'स्व' के जागरण से, कर्तव्य के प्रति, पर्यावरण के प्रति, कुटुम्ब के प्रति, समाज के प्रति गौरव बोध से।

यह कार्य अपने भजन,भोजन, भाषा, भूषा, भेषज के स्वाभिमान से सम्पूर्णता को प्राप्त करेगा।

यह व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज में होता हुआ राष्ट्रव्यापी होगा। 

यही पितृ ऋण, मातृ ऋण, ऋषि ऋण, राष्ट्र ऋण और गौ ऋणि के प्रति आज की अपेक्षा है।

2 comments: