Saturday, 27 September 2025

सांस्कृतिक भारतवर्ष यक्ष प्रश्न?

राष्ट्र देवो भव
 “भद्रमिच्छन्त ऋषय: स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे। ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उप सं नमन्तु।।”(अथर्व. १९/४१/१) प्राचीन काल में लोकमंगल की कामना से ऋषियों ने तपस्या की। तपस्या लोक कल्याण के लिए थी, अत: मनसा, वाचा और कर्मणा थी। अर्थात् मन से काल और परिवेश का चिंतन किया, परा तथा पश्यन्ति से वचन को साधा और लोक के समक्ष वैखरी के द्वारा न केवल सैद्धांतिक पक्ष रखा, बल्कि उसे कर्म से, व्यवहार से उदाहरण के साथ दिखाया। उनके सतत, गंभीर प्रयत्न और पुरुषार्थ से सनातन राष्ट्र की उत्पति और उसका क्रमिक विकास हुआ।

 ऋषियों की लोकमंगल की उस सद-इच्छा को पुराणकारों ने व्याख्या कर उसके निहितार्थ को प्रकट करते हुए कहा, ‘सर्वेषां मंगलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भागभवेत्।।’ (ग.पु.अ.35.51)। यहीं से देव, मनुष्य, यक्ष, राक्षस एवं विबुध इस भारतवर्ष को ‘राष्ट्र देवो भवः’ के भाव से नम्र होकर इसकी सेवा- आराधन करें, ऐसी अपेक्षा और आकांक्षा व्यक्त की गई ।  

   इस मंगलकारी राष्ट्र भारतवर्ष के सनातन स्वरुप को समझें। बृहस्पति आगम कहता है, ‘हिमालयं समारभ्य यावदिंदु सरोवरम् तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्ष्यते।’ विष्णु पुराण कहता है, ‘उत्तरंयत् समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।’ इसी मातृभूमि की हम रोज वन्दना करते हैं, ‘रत्नाकरधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम्। ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्याम वन्देभारतमातम्॥’

 उत्तर,पूर्व, पश्चिम में हिमालय की सभी खंडों , अंचलों से लेकर दक्षिण-पूर्व-पश्चिम में समुद्र पार तक विस्तार पाती है, यह धरा। कूमा (काबुल नदी), क्रुमू (कुरम नदी), गोमल (गोमती नदी), स्कात (सुकस्नू), अक्षु-वक्षु (Oxus), सिंधु, शतद्रु (सतलुज), ब्रह्मपुत्र (तीनों तिब्बत में), ऐरावत (वर्मा में), सरलवीन, मीकांग ( गंगा) के जल-ग्रहण क्षेत्र ये सब अखण्ड भारत के अंग रहे हैं। 

बलोचिस्तान, अफगानिस्तान (उप-गणस्थान), सीमाप्रांत (राजधानी: पेशावर अर्थात् पुरुषपुर),सिंध, पश्चिमी पंजाब, बंगलादेश, ब्रह्मदेश, श्याम, इण्डो-चाईना, कंबोज (कंबोडिया), वरुण (बोर्नियो), सुमात्रा तथा तिब्बत आदि इस भरत-भूमि से ऊर्जा प्राप्त करते रहे हैं। यह सभी क्षेत्र अखंड भारतवर्ष के अंग थे?

 फिर क्या हुआ कि वैदिक ऋषिओं की तपस्थली, महाभारत का राष्ट्र, मौर्यकालीन भारतवर्ष कब और कहाँ-कहाँ बिखरता गया? 

1876-अफगानिस्तान, 1904-नेपाल, 1914-तिब्बत, 1937- ब्रह्मदेश और 1947-पाकिस्तान। क्या हमारे अखंड भारत की संकल्पना में आज भी यह सब देश आते हैं ? 

 इसको दो प्रकार से समझ सकते हैं। एक वर्तमान स्वरुप जो हमें १५ अगस्त, १९४७ को प्राप्त हुआ। दूसरा वह जो १८७६ के पूर्व था। आर्यावर्त, भारतवर्ष, भारत, हिन्दुस्थान फिर अब भारत और इंडिया समनांतर चल रहे हैं ! 

१८७६ पूर्व के भारतवर्ष में वर्ष है, जो वर्ष अर्थात् स्थान और वर्ष अर्थात् काल का बोधक है।

 तो क्या ये कोरे शब्द थे? भारत में जो वर्ष जुड़ा है उसका अर्थ ‘भू-भाग’, काल के साथ अखंड भू-भाग से अलग होता गया। नाम बदलता गया - आर्यावर्त-भारतवर्ष से भारत, हिन्दुस्थान से हिन्दुस्तान और भारत से इंडिया बन गया।

 दरअसल जबसे हमने अपने वर्ष अर्थात् काल की गणना परार्ध, कल्प, मन्वन्तर और चतुर्युगों की संकल्पना का विस्मरण करते गए, हमारी भौगोलिक सीमा-भूमि-जम्बूद्वीपे, भारतवर्षे, भरतखण्डे, स्थान भी छोटा होता गया।

 यह संकल्प मन्त्र ‘स्व’ का बोध था, बोध मिटा और मान-चित्र (मानचित्र) बदल गया ।
 फिर भी भारतवर्ष हमारे अतीत का गौरव और सांस्कृतिक धरोहर का स्मरण है। पौराणिक दृष्टान्तों का साक्ष्य है। देवी सती के जहाँ-जहाँ अंग गिरे उन शक्तिपीठों का पुण्यमयी स्वरूप हैं। रामायण और महाभारत के काल का साक्ष्य है। 

भूखंड पृथक होने के बाद भी हमारी सांस्कृतिक चेतना अभी भी वहां से जुड़ीं हैं। इसलिए इस स्वरूप को सांस्कृतिक भारतवर्ष मानते हैं। 

इनके खंड-खंड अस्तित्व होने की कहानी शोध का विषय बनना चाहिए। निष्कर्ष आज की पीढ़ी के सामने आना चाहिए।

 पीढ़ियों को समझना होगा, वर्ष (स्थान) अपने अंदर भूमि, जन का इतिहास, उसके जीवनमूल्य, संस्कृति,परम्परा, काल (समय) के आध्यात्मिक कलेवर को निरन्तरता बनाए चलता है। 

दूसरा, १४, अगस्त १९४७ की भौगोलिक अस्थाई सीमा हमारे सामने है।   

 स्पष्ट है, ऋषियों ने जिसे ‘राष्ट्र देवो भवः’ कहा है, वह १९४७ के बाद का स्वरुप नहीं है। इसलिए जहाँ से भी अतीत की स्मृतियाँ जुड़ी हैं, उसके सांस्कृतिक स्वरुप को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थान्तरित करना होगा। 

स्मरण रखना होगा- यह राष्ट्र जीवंत है, चेतन्य है । ‘राष्ट्र देवो भव’ एक संकल्पित घोषणा है। यह राष्ट्र देवतुल्य है। पवित्र है। ब्रह्मस्वरूप है। ऋषियों के अभिमंत्रित मन्त्रों से ब्रह्माण्डीय सत्ता के प्राण तत्व की जागृत स्वरुप ‘चिति’ है । 

यही ‘चिति’ विश्व के लिए अध्यात्मिक प्रकाश की अधिष्ठात्री है।

 इसके नाभि में अमृत तत्व भरा है। ऋषियों ने इसे ‘अजनाभवर्ष’ कहा है। इसलिए यह राष्ट्र ही भौतिक स्वरूप में ‘मातृदेवो भवः’, और सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिक स्वरूप में ‘पितृदेवो भवः’ है। 

यह चराचर के लिए पूज्य है, चेतन है, प्रकाशमान है। इस देवतुल्य राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना दुनिया के पीड़ित, दुखी मानवता को ‘अतिथिदेवो भवः’ के रूप में स्वीकार करती है। 

यह ज्ञान-विज्ञान प्रदाता है। राष्ट्र और हमारा अन्गांगी भाव का सम्बन्ध है ।’ राष्ट्र केवल शासन प्रणाली या भू-भाग नहीं, वह जीवंत, चेतन सत्ता है।,

 जिसकी रक्षा, सेवा और साधना करना प्रत्येक नागरिक का धर्म है। इसके जीवन मूल्यों से प्रेरित दुनिया आदि काल से इसे धर्मस्वरुप मान कर पूजती आई है।

  यह देवनिर्मित भूमि है। हिमालय में मानसरोवर जैसे क्षेत्र ब्रह्म रन्ध हैं। यह शिव-पार्वती का क्रीड़ा-स्थल और शिव के परिवार का निवास है। यहां भारतवर्ष पीपल, वट, पाकर, रसाल के वृक्षों से आच्छादित साधना का क्षेत्र है। 

जहाँ पीपल के नीचे परमपिता परमेश्वर का ध्यान करते हुए ,उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। पाकर के नीचे यज्ञ-कर्म करतें हैं । आम्र वृक्ष के नीचे संसार के प्राणियों के मंगल कामना का चिंतन किया जाता है।वट के नीचे बैठ कर संसार के जिज्ञासुओं के लिए समाधान दिया जाता है। 

 भारतवर्ष निश्चरहीन करने की राम की संकल्पना है। अधर्म के नाश की कृष्ण की घोषणा है। गांधार संकल्पों की भूमि है।

इसमें नचिकेता की ‘मृत्यु विजय’ है, शिवि, दधीचि, नारद, प्रहलाद, ध्रुव का ‘तप’ है, राम का ‘त्याग’ है, हरिश्चन्द्र का ‘वचन’ है, परशुराम का ‘समर्पण’ है, युधिष्ठिर का ‘सत्य’ है, कर्ण का ‘दान’ है, व्यास, भीष्म और कृष्ण का ‘भविष्य का चिंतन’ है ।

यहां शवरी की ‘भक्ति’ है, सावित्री की ‘सेवा’ है, सीता की 'अग्नि परीक्षा' है, अनुसुइया का ‘आशीर्वाद’ है । 

इसके लिए भारतीय चैतन्य सत्ता को समझना होगा । इसलिए स्मरण रखना होगा, भारत बिना 'वर्ष' के अधूरा है। 

 राम ने अपने युग में जन सहयोग से आर्यावर्त को निश्चरहीन किया । कृष्ण ने महाभारत में धर्म की स्थापना की। तब आज का करनीय क्या है? 

राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाना है ! विश्व गुरु का अस्तित्व बोध कराना!! अतीत का वैभाव पुनर्जीवित करना है!!! 

 उत्तर सीधा है, अपने से, परिवार से,समाज के साथ मिलकर पञ्च परिवर्तन लाना है,  वन्देमातरम् गाना। यही बोध सम्पूर्ण समाज के अंदर ऋषियों की दैवी आकाँक्षाओं की पूर्ति के हेतु हैं।

क्या यह यक्ष प्रश्न हैं? युधिष्ठिर की भूमिका में खड़े होकर देखना होगा ।🙏

12/12/25
प्रो उमेश कुमार सिंह  
 

2 comments:

  1. वंदे मातरम् 🙏🏻

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  2. बहुत ही सुन्दर तरीके से पूर्व पीठिका के साथ जानकारी दी l पूर्वजों की विशिष्टता बताते हुए सांस्कृतिक राष्ट्र की महत्ता प्रभावी लगीं l🙏🏻

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