Sunday, 30 June 2024

ब्रह्मसूत्र परिचय

 

ब्रह्मसूत्र

              ब्रह्मसूत्र वेदान्त दर्शन का आधारभूत ग्रन्थ है । इसके रचयिता महर्षि बादरायण हैं  । इसे वेदान्त सूत्र, उत्तर मीमांसा सूत्र, शारीरिक सूत्र और भिक्षु सूत्र आदि नामों से जाना जाता है । इस पर अनेक आचार्यों ने भाष्य भी लिखे हैं  । ब्रह्मसूत्र में उपनिषदों के दार्शनिक और अध्यात्मिक विचारों को सार रूप में  एकीकृत किया गया है  ।

 वेदान्त को तर्क पूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने के कारण इसे  न्याय प्रस्थान भी कहा जाता है  । इसमें माना गया है कि ब्रह्म एक लाक्षणिक सत्य है  । ब्रह्म को किसी मूर्त रूप में हम नहीं देख सकते हैं  । ब्रह्म को बोध कराने के लिए सूत्रकार द्वारा जिस सूत्र का निरूपण किया गया है वह ही ब्रह्मसूत्र है  । 

यहीं यह समझ लेना ठीक होगा की ‘सूत्र’ क्या है ? “थोड़े शब्दों  में असंदिग्ध बात को  जिसके अन्दर पुनुरुक्ति न हो और कोई दोष न हो ।” जब ऐसे सूत्र और वाक्यों को प्रयोग किया जाता है तो उन्हें सूत्र कहते हैं  ।

     ब्रह्मसूत्र, वेदान्त या उपनिषद को समझने के लिए हमारे पास कुछ आधार भूत स्पष्टता होनी चाहिए ।  वेद एक प्रमाण है  । उपनिषद भी एक प्रमाण है  । ऐसे प्रमाण की एक निरदृष्टि वस्तु होती है , जैसे आँख एक प्रमाण है । कान एक प्रमाण है । आँख का काम देखना है और कान का काम सुनना है  । अत: आँख का काम कान नहीं कर सकता और कान का काम आँख नहीं कर सकती ।   

श्रुति एक प्रमाण है जिसको समझने के लिए इन्द्रियां सामर्थ्य नहीं हैं  । इसमें  थोड़े से शब्दों में  परब्रह्म के स्वरुप का सांगोपांग निरूपण किया गया है, इसलिए इसका नाम ब्रह्मसूत्र है ।

 उत्तर भाग की श्रुतियों में उपासना एवं ज्ञानकाण्ड है ; इन दोनों  की मीमांसा करने वाले वेदान्त -दर्शन या ब्रह्म सूत्र को ‘उत्तर मीमांसा ‘ भी कहते हैं  । 

दर्शनों में इनका स्थान सबसे ऊँचा है ; क्योंकि इसमें जीव के परम प्राप्य एवं चरम पुरुषार्थ का प्रतिपादन किया गया  है  । प्रायः सभी सम्प्रदायों के आचार्यों नें ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे हैं  ।

ब्रह्म सूत्र में चार अध्याय हैं जिनके नाम क्रमश: समन्वय, अविरोध, साधन और फलाध्याय बताया गया है । 

प्रत्येक अध्याय के चार पाद हैं  । कुल मिलाकर इसमें 555 सूत्र हैं  । 

ब्रह्मसूत्र में शोक निवृति के लिए इन चारों अध्यायों में एकत्व की बात कही गई है । व्यास जी कहते है की सारा संसार ब्रह्ममय होने  के कारण उपनिषद में  जो विषय आए हैं, वह भी ब्रह्ममय हैं  । 

ब्रह्मसूत्र में इस बात का प्रतिपादन किया गया है की निर्गुण निराकार ब्रह्म को बिना सगुन साकार स्वरुप की कल्पना के समझा नहीं जा सकता है  ।

     

पहला समन्वय अध्याय

पहला पाद - प्रथम पाद में ब्रह्म का प्रमाणों द्वारा प्रतिपादन किया गया है । इस पाद में बताया गया है की आनंद , विज्ञान ,आकाश, प्राण ,ज्योति  तथा गायत्री नाम आदि जैसे शब्दों से श्रुति में परम ब्रह्म का ही वर्णन है । 

दूसरा पाद - इस पाद में वेदान्त वाक्यों में परम ब्रह्म का निरूपण किया गया है । 

तीसरा पाद-  तीसरे पाद में जहाँ ब्रह्म को अक्षर और ॐ से प्रतिपादित क्या गया है, वहीं ज्योति और आकाश को भी ब्रह्म का वाचक बताया गया है । 

चौथा  पाद - इस पाद में अव्यक्त शब्द पर विचार किया गया है  ।

 दूसरा अविरोध अध्याय

पहलापाद-  प्रथम पाद में ब्रह्म कारणवाद के विरुद्ध उठाई हुई शंका का समाधान किया जाता है । साथ ही जीव और उनके कर्मों की अनादि सत्ता का प्रतिपादन किया बताया गया है ।

दूसरा पाद - इस पाद में सांख्य मत प्रधान कारणवाद का खंडन किया गया है । साथ ही पंचरात्री की चर्चा भी है । 

तीसरा पाद- इस पाद में ब्रह्म और जीव की चर्चा है । 

चौथा  पाद - चौथे पाद में इन्द्रियों की उत्पत्ति पञ्चभूत से नहीं परमात्मा से होती है का प्रतिपादन किया गया है । इसी तरह प्राण की उत्पत्ति भी ब्रह्म से ही होती है बताया गया है ।

तीसरा साधन अध्याय

पहलापाद- इस पाद में जीव और आत्मा का वर्णन है

दूसरा पाद - इस पाद में स्वप्न को  माया मात्र और शुभ -अशुभ का सूचक बताया गया है  । कर्मों का फल परमात्मा ही देता है, कर्म नहीं ।

तीसरा पाद - इस पाद में  वेदान्त वर्णित समस्त ब्रह्म विद्याओं  के एकता की चर्चा है ।

चौथा  पाद - इस पाद में बताया गया है की ज्ञान से ही परम पुरुषार्थ की सिद्धि होती है ।

चौथा फलाध्याय

पहलापाद- इस पाद में ब्रह्म विद्या में निरंतर अभ्यास की आवश्यकता बताई गई है । प्रारब्ध का भोग नाश होने पर ज्ञानी को ब्रह्म की प्राप्ति होती है । 

 दूसरा पाद - इस पाद में उत्क्रमण काल में वाणी की अन्य इन्द्रियों के साथ- मन की प्राण में और प्राण की जीवात्मा में स्थिति का कथन है ।

तीसरा पाद - इस पाद में विभिन्न लोकों का प्रतिपादन है । 

चौथा  पाद  -  इस पाद में ब्रह्म लोक में पहुँचने वाले उपासकों की तीन गतियों का वर्णन है ।

ब्रह्म सूत्र जिसे वेदान्त दर्शन भी कहते हैं, इसके पहले अध्याय का पहला पाद ‘अथतो ब्रह्म जिज्ञासा’ से प्रारम्भ होता है । यह सम्पूर्ण ग्रन्थ सूत्र रूप में बद्ध है । इसके अंतिम अध्याय के अंतिम पाद का समापन ‘ अनावृति: शब्दादनावृत्ति:शब्दात’ से होती है ।

 

 

 

Wednesday, 26 June 2024

ऊर्ध्वमूलमधः

 

मूल श्लोकः

श्री भगवानुवाच


ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।

।।15.1।।यहाँ पहले वैराग्य के लिये वृक्षस्वरूप की कल्पना करके संसार के स्वरूप का वर्णन करते हैं क्योंकि संसार से विरक्त हुए पुरुष को ही भगवान का तत्त्व जानने का अधिकार है, अन्य को नहीं। अतः श्रीभगवान् बोले --, ( यह संसाररूप वृक्ष ) ऊर्ध्वमूलवाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म ? सबका कारण ? नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्तमायाशक्तियुक्त ब्रह्म सबसे ऊँचा कहा जाता है? वही इसका मूल है? इसलिये यह संसारवृक्ष ऊपर की ओर मूलवाला है। ऊपर मूल और नीचे शाखावाला इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है। पुराणमें भी कहा है -- अव्यक्तरूप मूल से उत्पन्न हुआ उसी के अनुग्रह से बढ़ा हुआ? बुद्धिरूप प्रधान शाखा से युक्त? बीच-बीच में इन्द्रियरूप कोटरोंवाला? महाभूतरूप शाखाप्रतिशाखाओंवाला? विषयरूप पत्तोंवाला? धर्म और अधर्मरूप सुन्दर पुष्पोंवाला तथा जिसमें सुख दुःखरूप फल लगे हुए हैं ऐसा यह सब भूतोंका आजीव्य सनातन ब्रह्मवृक्ष है। यही ब्रह्मवन है? इसी में ब्रह्म सदा रहता है।

            ऐसे इसी ब्रह्मवृक्ष का ज्ञानरूप श्रेष्ठ खड्ग द्वारा छेदन-भेदन करके और आत्मा में प्रीतिलाभ करके फिर वहाँ से नहीं लौटता इत्यादि। ऐसे ऊपर मूल और नीचे शाखावाले इस मायामय संसारवृक्ष को अर्थात् महत्तत्त्व? अहंकार? तन्मात्रादि? शाखाकी भाँति जिसके नीचे हैं? ऐसे इस नीचे की ओर शाखावाले और कल तक भी न रहनेवाले इस क्षणभङ्गुर अश्वत्थ वृक्षको अव्यय कहते हैं। यह मायामय संसार? अनादि कालसे चला आ रहा है? इसी से यह संसारवृक्ष अव्यय माना जाता है तथा यह आदि-अन्त से रहित शरीर आदि की परम्परा का आश्रय सुप्रसिद्ध है? अतः इसको अव्यय कहते हैं।

            उस संसारवृक्ष का ही यह अन्य विशेषण ( कहा जाता ) है। ऋक्, यजु और सामरूप वेद जिस संसारवृक्षके पत्तों की भाँति रक्षा करनेवाले होने से पत्ते हैं। जैसे पत्ते वृक्ष की रक्षा करनेवाले होते हैं? वैसे ही वेद धर्म-अधर्म, उनके कारण और फल को प्रकाशित करनेवाले होने से संसाररूप वृक्षकी रक्षा करनेवाले हैं। ऐसा जो यह विस्तारपूर्वक बतलाया हुआ संसारवृक्ष है, इसको जो मूल के सहित जानता है, वह वेद को जाननेवाला अर्थात् वेद के अर्थ को जाननेवाला है। क्योंकि इस मूलसहित संसारवृक्ष के अतिरिक्त अन्य जानने योग्य वस्तु अणुमात्र भी नहीं है। अर्थात जो इस प्रकार वेदार्थ को जाननेवाला है वह सर्वज्ञ है। इस प्रकार मूलसहित संसारवृक्ष के ज्ञान की स्तुति करते हैं। उसी संसारवृक्ष के अन्य अङ्गों की कल्पना कही जाती है।

             ऊर्ध्वमूलमिति। अधश्चेति। अनेन शास्त्रान्तरेषु यदुच्यते अश्वत्थः सर्वं, स एवोपासनीयः इत्यादि, तस्य भगवद्ब्रह्मोपासा तात्पर्यमित्युच्यते। मूलं प्रशान्तरूपम् (प्रशान्तं रूपम्)। तत् ऊर्ध्वं, सर्वतो हि निवृत्तस्य तदाप्तिः। छन्दांसि पर्णानि इति -- यथा वृक्षस्य मानत्वफलवत्त्वसरसतादयः (फलत्व--) पर्णैः सूच्यन्ते, एवं ब्रह्मतत्त्वस्य वेदोपलक्षितशास्त्रद्वारिका प्रतीतिरित्याख्यायते। गुणैः, सत्त्वादिभिः प्रवृद्धाः, देवादिस्थावरान्ततया। तस्य च शुभाशुभात्मकानि कर्माणि अधस्तनमूलानि ( मूलानि यस्य)।

             श्रीभगवान् बोले - ऊपर की ओर मूलवाले तथा नीचे की ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्ष को अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्ष को जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है।

             श्री भगवान् ने कहा --(ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है।।

            ऊर्ध्वमूलं कालतः सूक्ष्मत्वात् कारणत्वात् नित्यत्वात् महत्त्वात् ऊर्ध्वम् उच्यते ब्रह्म अव्यक्तं मायाशक्तिमत्? तत् मूलं अस्येति सोऽयं संसारवृक्षः ऊर्ध्वमूलः। श्रुतेश्च -ऊर्ध्वमूलोऽर्वाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः (क..261)इति। पुराणे च- अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोच्छ्रितः। बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः।।महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा। धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः।।आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः। एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्माचरति नित्यशः।।एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना। ततश्चात्मरतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः।। इत्यादि। तम् ऊर्ध्वमूलं संसारं मायामयं वृक्षम् अधःशाखं महदहंकारतन्मात्रादयः शाखा इव अस्य अधः भवन्तीति सोऽयं अधःशाखः? तम् अधःशाखम्। न श्वोऽपि स्थाता इति अश्वत्थः तं क्षणप्रध्वंसिनम् अश्वत्थं प्राहुः कथयन्ति अव्ययं संसारमायायाः अनादिकालप्रवृत्तत्वात् सोऽयं संसारवृक्षः अव्ययः? अनाद्यन्तदेहादिसंतानाश्रयः हि सुप्रसिद्धः? तम् अव्ययम्। तस्यैव संसारवृक्षस्य इदम् अन्यत् विशेषणम् -- छन्दांसि यस्य पर्णानि? छन्दांसि च्छादनात् ऋग्यजुःसामलक्षणानि यस्य संसारवृक्षस्य पर्णानीव पर्णानि। यथा वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि पर्णानि? तथा वेदाः संसारवृक्षपरिरक्षणार्थाः? धर्माधर्मतद्धेतुफलप्रदर्शनार्थत्वात्। यथाव्याख्यातं संसारवृक्षं समूलं यः तं वेद सः वेदवित्?  वेदार्थवित् इत्यर्थः। न हि समूलात् संसारवृक्षात् अस्मात् ज्ञेयः अन्यः अणुमात्रोऽपि अवशिष्टः अस्ति इत्यतः सर्वज्ञः सर्ववेदार्थविदिति समूलसंसारवृक्षज्ञानं स्तौति।।तस्य एतस्य संसारवृक्षस्य अपरा अवयवकल्पना उच्यते --,

महर्षि पतंजलि का योग सूत्र

 

योग सूत्र: योग सूत्र महर्षि पतंजलि द्वारा रचित है । यह ग्रंथ सूत्रों के रूप में लिखा गया है । सूत्र-शैली भारत की प्राचीन दुर्लभ शैली है, जिसमें विषय को बहुत संक्षिप्त शब्दों में प्रस्तुत किया जाता है । यह चार पदों में- समाधि ,साधन, विभूति और कैवल्य में विभक्त है । इस ग्रंथ में महर्षि पतंजलि ने यथार्थ रूप में योग के आवश्यक आदर्शों और सिद्धांतों को प्रस्तुत किया है । समाधि पाद में 51, साधन पाद में 55, विभूति पद में 55 और कैवल्य पाद में 34 सूत्र हैं । कुल मिलाकर सम्पूर्ण योग सूत्र 195 सूत्रों में उपलब्ध होता है ।विषय की दृष्टि से चारों अध्यायों की विषय वस्तु को संक्षिप्त रूप से कुछ इस प्रकार समझ सकते हैं-

              (1) समाधि पाद- समाधि पाद के अन्तर्गत, समाधि से सम्बन्धित मुख्य-मुख्य विषयों को लिया गया है । इस अध्याय में सर्वप्रथम योग की परिभाषा बताई गयी है, जो कि चित्त की वृत्तियों का सभी प्रकार से निरुद्ध होने की स्थिति का नाम है । यहां पर भाष्यों के अन्तर्गत यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि यह योग समाधि है । समाधि के आगे दो भेद- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात बताए गए हैं । दोनों ही प्रकार की समाधियों के अन्तर भेदों को भी विस्तार से बताया गया है । समाधि की स्थिति को प्राप्त करने के साधनों के विषय में भी विस्तार से चर्चा की गयी है । समाधिपाद- में यह बतलाया गया है कि योग के उद्देश्य और लक्षण क्या हैं और उसका साधन किस प्रकार होता है। (2) साधनपाद- साधनपाद में क्लेश, कर्मविपाक और कर्मफल आदि का विवेचन है। (3) विभूतिपाद-विभूतिपाद में यह बतलाया गया है कि योग के अंग क्या हैं, उसका परिणाम क्या होता है और उसके द्वारा अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियों की किस प्रकार प्राप्ति होती है। (4)  कैवल्यपाद- कैवल्यपाद में कैवल्य या मोक्ष का विवेचन किया गया है

सांख्य योग दर्शन का मत यह है कि मनुष्य को अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच प्रकार के क्लेश होते हैं, और उसे कर्म के फलों के अनुसार जन्म लेकर आयु व्यतीत करनी पड़ती है तथा भोग भोगना पड़ता है। 

       पतंजलि ने इन सबसे बचने और मोक्ष प्राप्त करने का उपाय योग बतलाया है और कहा है कि क्रमशः योग के अंगों का साधन करते हुए मनुष्य सिद्ध हो जाता है और अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ईश्वर के संबंध में पतंजलि का मत है कि वह नित्यमुक्त, एक, अद्वितीय और तीनों कालों से अतीत है और देवताओं तथा ऋषियों आदि को उसी से ज्ञान प्राप्त होता है। योगदर्शन में संसार को दुःखमय और हेय माना गया है । पुरुष या जीवात्मा के मोक्ष के लिये वे योग को ही एकमात्र उपाय मानते हैं । पतंजलि ने चित्त की क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, निरुद्ध और एकाग्र ये पाँच प्रकार की वृत्तियाँ मानी है, जिनका नाम उन्होंने 'चित्तभूमि' रखा है। उन्होंने कहा है कि आरंभ की तीन चित्तभूमियों में योग नहीं हो सकता, केवल अंतिम दो में हो सकता है। इन दो भूमियों में संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात ये दो प्रकार के योग हो सकते हैं । जिस अवस्था में ध्येय का रूप प्रत्यक्ष रहता हो, उसे संप्रज्ञात कहते हैं । यह योग पाँच प्रकार के क्लेशों का नाश करने वाला है। असंप्रज्ञात उस अवस्था को कहते हैं, जिसमें किसी प्रकार की वृत्ति का उदय नहीं होता अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं रह जाता, संस्कार मात्र बचा रहता है । यही योग की चरम भूमि मानी जाती है और इसकी सिद्धि हो जाने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

             योगसाधन के उपाय में यह बतलाया गया है कि पहले किसी स्थूल विषय का आधार लेकर, उसके उपरांत किसी सूक्ष्म वस्तु को लेकर और अंत में सब विषयों का परित्याग करके चलना चाहिए और अपना चित्त स्थिर करना चाहिए । चित्त की वृत्तियों को रोकने के जो उपाय बतलाए गए हैं, वह इस प्रकार हैं- अभ्यास और वैराग्य, ईश्वर का प्रणिधान, प्राणायाम और समाधि विषयों से विरक्ति आदि । यह भी कहा गया है कि जो लोग योग का अभ्यास करते हैं, उनमें अनेक प्रकार की विलक्षण शक्तियाँ आ जाती है, जिन्हें 'विभूति' या सिद्धि कहते हैं।  यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये आठों योग के अंग कहे गए हैं, और योगसिद्धि  के लिये इन आठों अंगों का साधन आवश्यक और अनिवार्य कहा गया है । इनमें से प्रत्येक के अंतर्गत कई बातें हैं । कहा गया है जो व्यक्ति योग के ये आठो अंग सिद्ध कर लेता है, वह सब प्रकार के क्लेशों से छूट जाता है, अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है और अंत में कैवल्य (मुक्ति) का भागी बनता है । सृष्टितत्व आदि के संबंध में योग का भी प्रायः वही मत है जो सांख्य का है, इससे सांख्य को 'ज्ञानयोग' और योग को 'कर्मयोग' भी कहते हैं ।

सद्साहित्य - स्मरणीय

  

  सद्साहित्य - स्मरणीय

ॐ सच्चिदानन्दरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने
       ज्योतिर्मयस्वरूपाय विश्वमाङ्गल्यमूर्तये || ||

प्रकृतिः पञ्चभूतानि ग्रहा लोकाः स्वरास्तथा
   दिशः कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मङ्गलम्।। २।।

रत्नाकराधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम्
      ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम् || 3 ||

महेन्द्रो मलयः सह्यो देवतात्मा हिमालयः
        ध्येयो रैवतको विन्ध्यो गिरिश्चारावलिस्तथा || ||


गङ्गा सरस्वती सिन्धुर्ब्रह्मपुत्रश्च गण्डकी
       कावेरी यमुना रेवा कृष्णा गोदा महानदी || ||

अयोध्या मथुरा माया काशीकाञ्ची अवन्तिका
  वैशाली द्वारिका ध्येया पुरी तक्षशिला गया || ||

प्रयागः पाटलीपुत्रं विजयानगरं महत्
        इन्द्रप्रस्थं सोमनाथः तथाSमृतसरः प्रियम् || ||

चतुर्वेदाः पुराणानि सर्वोपनिषदस्तथा
     रामायणं भारतं च गीता सद्दर्शनानि च ॥८॥

जैनागमास्त्रिपिटकाः गुरुग्रन्थः सतां गिरः
    एषः ज्ञाननिधिः श्रेष्ठः श्रद्धेयो हृदि सर्वदा ॥९॥

अरुन्धत्यनसूया च सावित्री जानकी सती
     द्रौपदी कण्णगी गार्गी मीरा दुर्गावती तथा ॥१०॥

लक्ष्मीरहल्या चन्नम्मा रुद्रमाम्बा सुविक्रमा
   निवेदिता सारदा च प्रणम्या मातृदेवताः ॥११॥

श्रीरामो भरतः कृष्णो भीष्मो धर्मस्तथार्जुनः
     मार्कण्डेयो हरिश्चन्द्र: प्रह्लादो नारदो ध्रुवः ॥१२॥

 हनुमान्‌ जनको व्यासो वसिष्ठश्च शुको बलिः
        दधीचिविश्वकर्माणौ पृथुवाल्मीकिभार्गवाः ॥१३॥

भगीरथश्चैकलव्यो मनुर्धन्वन्तरिस्तथा
       शिविश्च रन्तिदेवश्च पुराणोद्गीतकीर्तय: ॥१४॥

बुद्धा जिनेन्द्रा गोरक्षः पाणिनिश्च पतञ्जलिः
        शङ्करो मध्वनिंबार्कौ श्रीरामानुजवल्लभौ ॥१५॥

झूलेलालोSथ चैतन्यः तिरुवल्लुवरस्तथा
      नायन्मारालवाराश्च कंबश्च बसवेश्वरः ॥१६॥

देवलो रविदासश्च कबीरो गुरुनानकः
         नरसिस्तुलसीदासो दशमेशो दृढव्रतः ॥१७॥

श्रीमत् शङ्करदेवश्च बन्धू सायणमाधवौ
     ज्ञानेश्वरस्तुकारामो रामदासः पुरन्दरः ॥१८॥

बिरसा सहजानन्दो रामानन्दस्तथा महान्‌
वितरन्तु सदैवैते दैवीं सद्गुणसंपदम्‌ ॥१९॥

भरतर्षिः कालिदासः श्रीभोजो जकणस्तथा
       सूरदासस्त्यागराजो रसखानश्च सत्कविः ॥२०॥

रविवर्मा भातखण्डे भाग्यचन्द्रः स भूपतिः
       कलावंतश्च विख्याताः स्मरणीया निरन्तरम्‌॥२१॥

अगस्त्यः कंबुकौण्डिन्यौ राजेन्द्रश्चोलवंशजः
      अशोकः पुश्यमित्रश्च खारवेलः सुनीतिमान्‌ ॥२२॥

चाणक्यचन्द्रगुप्तौ च विक्रमः शालिवाहनः
    समुद्रगुप्तः श्रीहर्षः शैलेन्द्रो बप्परावलः ॥२३॥

लाचिद्भास्करवर्मा च यशोधर्मा च हूणजित्‌
  श्रीकृष्णदेवरायश्च ललितादित्य उद्बलः ॥२४॥

मुसुनूरिनायकौ तौ प्रतापः शिवभूपतिः
          रणजित सिंह इत्येते वीरा विख्यातविक्रमाः ॥२५॥

वैज्ञानिकाश्च कपिलः कणादः सुश्रुतस्तथा
       चरको भास्कराचार्यो वराहमिहिरः सुधीः ॥२६॥

नागार्जुनो भरद्वाजः आर्यभट्टो वसुर्बुधः
       ध्येयो वेंकटरामश्च विज्ञा रामानुजादयः ॥२७॥

रामकृष्णो दयानन्दो रवीन्द्रो राममोहनः
        रामतीर्थोऽरविंदश्च विवेकानन्द उद्यशाः ॥२८॥

दादाभाई गोपबन्धुः तिलको गान्धिरादृताः
   रमणो मालवीयश्च श्रीसुब्रह्मण्यभारती ॥२९॥

सुभाषः प्रणवानन्दः क्रान्तिवीरो विनायकः
     ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः जे ॥३०॥

Saturday, 22 June 2024

योग दिवस

आपका यह पक्ष भी सत्य है, क्योंकि आयुर्वेद के मतानुसार योग निरोगी काया को रोगमुक्त रखने का उपाय है। किंतु इसके कारण रोगी निरोगी नहीं होता उसे अपेक्षित औषधि लेनी ही होगी। सुषेण योगी थे किंतु अपेक्षित चिकित्सा करते थे। लक्ष्मण हों या मेघनाथ उपचार से ही ठीक होते हैं।

लेकिन योग आत्मा अर्थात चेतन तत्व को परमात्मा अर्थात पराचेतन तत्व से जोड़ने की प्रक्रिया है। अष्टांग योग शरीर,मन बुद्धि,चित, अहंकार को सात्विक बनाता है। योग यम, नियम के उपांगों के पालन से प्रारंभ होत है और समाधि में समाप्त होता है ।

इसमें पंच कोशों की अद्भुत भूमिका होती है। अन्नमय कोष में जीने वाला पंच प्राणों और उनके पांच उप प्राणों के माध्यम से मनोमय कोष तक की यात्रा करता है। 

यहां तक अष्टांग योग के बहिरंग यम,नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार की भूमिका रहती है। अंतरंग धारणा, ध्यान और समाधि साधक को आध्यात्मिक क्षेत्र में अर्थात आनंद मय कोष में प्रवेश कराती है।

और तब यही से 'युज' की यात्रा प्रारम्भ होती है। जो नितांत आध्यात्मिक यात्रा है। यह यात्रा अष्ट सिद्धियों और नो निधियों के द्वार को पार कर दसवें द्वार अर्थात् ब्रह्मरंध से प्रकाश को प्रकाश में एकात्म करती है।

योग जो आज बताया जा रहा है वह उसका बहिरंग है। फिर भी जो हो रहा है उसे नकारना आवश्यक नहीं है।
सादर 

Friday, 21 June 2024

गंगा अवतरण

गंगा अवतरण पर मेरा प्रणाम 

त्वदीय पद पंकजम नमामि देवी जान्हवी

गंगा भारत की लोक नदी है। वह अपने अन्दर लाखों वर्ष की परम्परा को लेकर चलती है। वह भारत की तीन संस्कृतियों  / जीवन दृष्टियों को एक साथ लेकर बहती है। गंगा-प्राचीन आध्यात्मिक विरासत। ब्रह्म कमण्डल से उद्भूत है। वह शिव की जटाओं से प्रवाहित है। “शंभु जटा हिमवान सम की, गंगा लट में बहती।”
वह भूः के रूप में धरती पर,भुवः के रूप में आकाश में और स्वः के रूप में देवलोक की प्रवासी है। वह इन तीनों लोकों से होकर, अपनी पूर्णता के साथ महः के रूप में  देव माता है।

 जगत कल्याणी है। शाप हारणी है। पाप तारिणी है। ताप को शीतल करती है। मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। अर्थात वह अपने आकाश, पाताल और मृत्यु लोक के रूप से मह लोक आध्यात्मिक लोक और उसके आगे का मार्ग प्रशस्त करती है।

 गंगा राम की आराध्या है। राम गंगा के ऋणी है। वह उनके पूर्वजों को तारती है। उनके इष्ट भगवान शिव की आशीर्वाद है। वह केदार क्षेत्र की समस्त धाराओं की धात्री है।

गंगा अरण्य संस्कृति की धरोहर है। वनवासी, गिरिवासी की दुलारी माँ है। ग्रामवासी हर -हर गंगें करता उसमें डुबकी लगा न जाने कितने जन्मों के स्वकर्मो को स्वधर्मों में बदलता है।

 वनवासी उसे प्रणाम करता, उसकी परिक्रमा करता, उसके तलपटों पर जीवन जीना सीखाता है।

 तो अरण्यवासी उसके गहन गह्यवरों में समाधिस्थ होकर उसके नित के कौतूहल को देखता है। वह निष्कपट भाव से उस यात्री को प्रणाम करता है। वह उसे केर और बेर दो विधर्मियों की प्रकृति को एक साथ प्रकृतस्थ कर उसे समर्पित करता है। उसका आतिथ्य करता है। 

ग्रामवासी अद्भुत सत्कार और आत्मीयता से उसे विष्फरित नेत्रों से देखता है। उसकी क्रीड़ा करती उच्छाल तरंगों को देख धन्यभाग्य होते हैं । सदा गंगा मइया की गोद में खेलते हैं। उसका जल ग्रहण करते हैं। जिनमें इतनी एकात्मता है कि पूज्य और पूजक भाव एकाकार हो जाता है। पृथक बोध नहीं रहता।

यहाँ ग्रामवासी अपनी अनन्य श्रद्धा, गिरिवासी अपनी सहजता, अपनत्व से गंगा के प्रति उदारभाव से कृतज्ञ हैं।

 गिरिवासी गंगा को अपना मानता है, किन्तु केवल अपने के भाव से कोसों दूर है। उसका निर्बोध अरण्य मन दिन को गंगा का हर-हर सुनता है तो रात को उसके लोरी को उद्घाटित कराता, सुबह फिर मिलने की प्रत्याशा में किनारे घास-फूस की झोपड़ में सो जाता है। यह हमारा लोक है।

वह गंगा में पूर्णमासी के मिलन को  देखता है।  ऐसा प्रतीत होता है, मानो आकाश गंगा पूर्णिमा की रष्मियों के रूप में उतर कर धरती के तापों को हरती गंगा के साथ एक रात पूरी तरह मायके के सुख-दुःख, आपसी संवेदनाओं का बँटवारा करती हैं।

 वे ब्रह्मा के विछोह से लेकर शिव की कल्याणी भाव को याद कर सागर की पूरी कथा आपस में बाँटती हैं। हर अमावस को देव नदी अपनी स्वरूपा से काफी दूर चले जाने का अनुभव करती है।

ग्राम सहचरी गंगा गंगोत्री (अरण्य) से निकलकर कर्त्तव्य पर डट जाती है। ग्रामवासियों ने उसके स्वागत में जगह-जगह घाट बनाये। उसकी पूजा प्रारंभ की। आरती के विविध रूप धारण किये। अपने-पापों की गठरी को गंगा के आँचल में खोला। इतना ही नहीं भावावेष में वे निरन्तर भूलते गये कि जिन घाटों को उन्होंने गंगा के स्वागत के लिए, पूजन-अर्चन के लिए बनाये, उन्हीं के द्वारा वे उस गंगा के स्वरूप को संसार की गंदगी से अनजाने ही भरना प्रारंभ कर दिये।

 मानस को पवित्र करती गंगा, अमानुषिक ताप से जलने लगी। जब तक ग्रामीण उसके क्रोध के समन का उपाय करते, गंगा का प्रचण्ड प्रवाह कई बार-उन्हें दण्डित करता।

 रूठने-पूजने-आशीर्वाद देने और लेने का यह क्रम हजारों-हजारों वर्षों से चला आ रहा है। धरा सा मन लिए, धैर्य हिमगिर का धारण किये, सैकड़ों भूचालों को अपने अन्दर समाहित कर गंगा ग्राम से नगरों में प्रवेश करती है।

गंगा दुःखी है। उस का विराट आँचल सिसकियों और तनहाइयों से भर जाता है। वह मलय-मारुत का आह्वान कर सड़कों से निकलते दुःर्गंध से भरे नाले, फैक्ट्रियों-मिलों के जहरीले अवशेषों को बचाने का उपक्रम करती है। 

वह यमुना को पुकारती है। कैसे साधा था तुमने कालिया नाग के जहर को। यहाँ तो पग-पग पर जहर उगला जा रहा है। किंतु यमुना स्वयं में व्यथित और मौन है।

दोनों को याद आता है अपना अरण्य। उसके जन, उनकी आत्मीयता। उनका अपना पन। उनके ढोलों की थाप। वन-नारियों के नृत्य। बच्चों के किल्लोल। भला वह कैसे उन्हें विस्मरण करती, वहीं से तो किल्लोल, नृत्य और थाप गंगा -यमुना के जीवन में उद्भूत हुए थे।

उसे स्मरण आता है ग्राम बहुरियों का पूज्यभाव। अहिबात की प्रार्थना। अपना आशीर्वाद। ग्राम की प्रौढ़ों की वह प्रार्थना जिसमें वे अपने अचल सुहाग की कामना गंगा माँ के अस्तित्व तक रहने का संकल्प दोहराती हैं। प्रकारान्तर से अनजाने गंगा के चिरायु, दीर्घजीवी होने की कामना करती है।

 गंगा अरण्य की आत्मीयता और ग्राम्य के पूज्य भाव से ग्रामीणों के अबोध कृत्यों को विस्मरण कर देती हैं। क्षमा कर देती है। आशीर्वाद देती है। 

साथ ही व्यथित गंगा जमुना से मिलकर उन छोटी-बड़ी नद-नालों की व्यथा-कथा को बाँटती है जो ग्राम की पीड़ा को शहरों के दुराचार के सामने भूल जाते हैं। 

फूल की घाटियां, स्वर्णकेशी अप्सराओं के नृत्य, घहराती घटाओं का आह्वान इस सृष्टि-स्रोता नदी की नगरीय व्यथा (शहरी प्रदूषण की व्यथा) को दूर नहीं कर पाती।

अलकनन्दा के रूप में जिस गंगा ने पर्वतों की कठोरता को काट दिया, भागीरथी के रूप में जो पतित पावन बनी, जान्हवी के रूप में जिसने अपना सुखद शैषव बिताया। यक्ष, किंनर, नाग, देवता ही नहीं तो अबोध मनुष्यों के लिए जो पूर्ण अनुदार बनी रहीं, वही गंगा इस भोगवादी, शोषित शहरी मानसिकता से व्यथित है। दुःखी है।

आज पकडंडी रूपी वन एवं ग्राम्य संस्कृति सड़क रूपी शहरी भोगवादी जीवन दृष्टि को ललकार रही है। जरा ठहरो! अपने अतीत को स्मरण करो। तुमने अपनी गतिशीलता में अपने शस्य-श्यामला, हरित दूर्वा परम्परा को खो दिया है।

वस्तुतः गंगा तो वही है, जो जीवन के तीनों रूपों को (वन्य, ग्राम और नगर) सम भाव से देखना चाहती है, किन्तु शहरी मन ने अपने हाथों से सारे फूल बिखेर दिये हैं। अब वह ठगा-सा अपने को अपने चिरन्तन दर्पण में अनजाना-सा पा रहा है। 

आज गंगा के इस प्रश्न का समाधान नगर से ग्राम की ओर चलते हुए अरण्य की पूर्णवृति की यात्रा करनी है। वैसे भी भूमण्डलाकार देवता-माँ की प्रार्थना तब तक पूरी नहीं होती जब तक परिवृत्त के साथ हम उसकी आराधना नहीं करते।

गंगा की हितकारिणी वृत्ति का उद्घाटन करते हुए तुलसीदास कहते हैं, यदि किसी राष्ट्र को अपनी कीर्ति, साहित्य और ऐश्वर्य सुरक्षित रखना है तो उसमें गंगा-सी उदारता चाहिए। “कीरति भणिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कर हित होई।।”

सबका हित साधन करने वाली माँ को हमने संसाधन बना कर जल संसाधन विभाग के खाते में डाल दिया है।

 आईये भूल सुधारें। गंगा रूपी भारतीय संस्कृति, (विश्व संस्कृति- विश्वम्भरा) को अपने पवित्र कर्मों से ‘तेन-त्यक्तेन-मुंजिथा, के आधार पर नमन करें। जीवन को सार्थक करें।

 
मो.7389814071
ई-मेल: umeshksingh58@gmail.com

Saturday, 8 June 2024

साधु

साधु  
शत्रु-सैनिकों की 
कर रहे हो सेवा \
शत्रुदल !
मैं तो भगवान की सेवा कर रहा हूं
मैं तो प्राणियों की सेवा कर रहा हूं
मैं तो मानव धर्म की सेवा कर रहा हूं

असंतुष्ट था सिंकन्दर
तभी
फूस का सूखा
मरी चींटी टुकड़ा 
पकड़ा दिया सिकन्दर को
इसे हरा कर सकते हो
इसे जिन्दा कर दो

सूखी चीज हरी हो सकती है \
साधु] तुम पागल हो

सूखे को जीवन नहीं दे सकते
चीटी को जीवन नहीं दे सकते

तो 
फिर जीवित को मारने का अधिकार \

नत सिर सिकंदर 
सचमुच
भारत महान  
मेरा मन तो सैतान।

2-
 
तीर्थ है
रास्ता- घाट- जलाशय
साधना और मंत्रणा

तीर्थ है 
पवित्र] पावन
मोक्ष प्रदाता
हरता तन मन की यंत्रणा

तीर्थ है
स्थल परिक्रमा का
उपचार का
सधना का

तीर्थ है 
संज्ञा
व्यक्ति-वस्तु
स्थान और भाव रूप में
विराजित श्रद्धा लिए

तीर्थ है
विचारों का विस्तार
दण्डकों का उपचार
राम कृष्ण जहां
लेते हैं अवतार

तीर्थ है
नदी-जलाशय
मंदिर और गुरुद्वारे
जहां पीते हैं पानी
पंक्षी और पंथी प्यारे

तीर्थ है 
गुरु और उसकी वाणियां
स्नान करें उसमें 
काटे संसार बन्धन की वेणियां।