Thursday, 18 April 2024

क्या महात्मा गांधी के मातृभाषा के विचार को इस देश ने भुला दिया है।

यह शरीर जिन पाँच तत्वों ‘ क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।’ की बात की भारतीय समाज परावैदिक काल से उन तत्वों की पूजा करता आ रहा है। उनमें भूमि को हमने साक्षात माता माना और कहा, ‘माता भूमि: पुत्रोऽहम पृथिव्या:’। और इस माता तथा उन पांच तत्वों का आभार आराधना हमारे ऋषियों ने जिस माध्यम से की उसे हमने भाषा कहा।

और चूकि वह हमारे जीवन की सम्पूर्णता को अभिव्यक्त करने का आधार है इसलिए उसे माता का सिंहासन देते हुए मातृभाषा कहा। और इनमें जिन तीन तत्वों का आधार मिला उन्हें ब्रह्म की संज्ञा दी ] जैसे - नाद ब्रह्म, अक्षर ब्रह्म और शब्द ब्रह्म । इसलिए जब हम मातृभाषा की आराधना अर्थात् अपने व्यवहार में लाते हैं तो अपरोक्ष रूप से उक्त तीनों ब्रह्मों की उपासना करते हैं।

परावैदिक काल से लेकर आज तक इस राष्ट्र के निवासियों ने संस्कृत, पालि, प्राकृत की यात्रा करते हुए भारत की हजारों बोलियों और भाषाओं को अपने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और विश्व के श्रेष्ठ चिंतन परम्परा में अग्रणी बने रहे।

इन्हीं भारतीय भाषाओं में भारतीय विरासत, संस्कृति, परम्परा, लोक और कला समृद्ध हुए हैं। ऋषियों ने संस्कृत का सहारा लिया तो जैन और बुद्ध ने प्राकृत और पालि का। तो पूर्वांचल के संत- महावीर स्वामी, धनीदास, संत दरिया साहब, महर्षि मेहदीदास, चैतन्यप्रभु, बाउल संत, रामकृष्ण परमहंस, माधव कंदली, शंकर देव, भीमा भाई ने, दक्षिण में - रामानुजाचार्य, कवियित्री मोला, संत वेमना, श्री कोंडयाचार्य, मलयाल स्वामी, कुन्दुकुरु वीरेशलिंगम पन्तुलु, नायम्बर संत, तिरुमूलर, मधुरकवि, तिरुवल्लुबर, संत त्यागराज, संत रामलिंगमस्वामीगल, महर्षि रमण, इसी तरह महाराष्ट्र के  रामदास, संत नामदेव, कर्नाटक के- श्री अल्लुम प्रभु, अक्कमहादेवी, श्री विद्यारण्य स्वामी, संत पुरन्दरदास, केरल से- श्रीमद् शंकराचार्य, निरणम कवि, आचार्य तुंजतु, श्री नारायण गुरु, महाकवि करुप्पन, उत्तर में -कबीर, सूर, तुलसी, जायसी एक लम्बी मातृभाषा में अभिव्यक्ति की परम्परा है।

  समझने की बात यह है कि आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व चीन के महान दार्शनिक कनफ्यूशियस ने भाषा को लेकर क्या कहा था, ‘‘ समाज की गलतियों या खराबियों को सिर्फ समाज की भाषा को ठीक करके ही खत्म किया जा सकता है क्योंकि भाषा अगर गलत हो जाए तो गलत बोला जाएगा, गलत बोला जाए तो गलत सुना जाएगा, और गलत कहकर जो गलत सुनाया गया है, उस पर जो अमल किया जाएगा वह गलत ही होगा और गलत अमल का परिणाम हमेशा गलत ही हुआ करता है। इसलिए गलत समाज की गलत बुनियाद हमेशा गलत भाषा ही डालती है।’

         लंदन में पढ़ाई से लेकर दक्षिण अफ्रिका (१८९३ से १९१४ तक) के रंगभेद आन्दोलन तक गांधी को समझ आ गया था कि बिना स्वभाषा के साम्राज्यवादी ताकतों से नहीं लड़ा जा सकता। राष्ट्र अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, साहित्य और संस्कृति को उन्नति कर संरक्षित रख सकती है। गांधी की मान्यता भी कनफ्यूशियस के समान थी कि किसी भी कौम को पराई भाषा में काम करना घातक है। इसका प्रमाण उनकी जनवरी,१९१० में छपी ‘हिन्द स्वराज’ तथा उनके ‘इंडियन ओपिनियन’ में छपे लेखों से मिलता है।

गांधी के मातृभाषा सम्बन्धी चिन्तन पर विचार करते हुए दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए- पहला कि वे स्थानीय या प्रान्तीय स्तर पर शिक्षा के माध्यम के रूप में सम्बद्ध प्रांत की भाषा के समर्थक थे। दूसरा यह कि समय निष्पादन के लिए आपसी सम्पर्क एवं राजनीतिक तथा प्रशासनिक कार्यों के निष्पादन के माध्यम के रूप में एक राष्ट्रभाषा (हिन्दी) के वे प्रबल समर्थक रहे। गांधी का मत था कि जो मातृभाषा से सच्चा प्रेम करता है वह राष्ट्रभाषा के प्रति भी वैसा ही भाव रखता है।

गांधी जी हिन्द स्वराज में औपनिवेशिक मंशा का खुलाशा करते हुए लिखते हैं, ‘‘करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह सचमुच गुलामी की नींव थी। उसने इसी इरादे से वह योजना बनायी, यह मैं नहीं कहना चाहता। किन्तु इस कार्य का परिणाम यही हुआ है। हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं, यह कैसी बड़ी दरिद्रता है।.. यह भी जानने लायक है कि जिस पद्धति को अंग्रेजों ने उतार फेंका है, वही हमारा शृंगार बनी हुई है। वहाँ शिक्षा की पद्धतियाँ बदलती रही हैं। जिसे उन्होंने भुला दिया है, उसे हम मूर्खतावश चिपटये रहते हैं। वे अपनी भाषा की उन्नति करने का प्रयत्न कर रहे हैं। वेल्स इंग्लैण्ड का एक छोटा-सा परगना है। उसकी भाषा धूल के समान नगण्य है। अब उसका जीर्णोद्धार किया जा रहा है।

.. अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षण से दम्भ, द्वेष, अत्याचार आदि बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी। भारत को गुलाम बनाने वाले तो इस अंग्रेजी को जानने वाले लोग ही है। जनता की हाय अंग्रेजों को नहीं हमको लगेगी।’’

दूसरी बात कि ‘‘जब वेल्स जैसी उपेक्षित भाषा के उद्धार के लिए वहां के लोग प्रयत्न कर सकते हैं, तब भारतवासी भी क्यों नहीं अपनी भाषाओं के विकास के लिए प्रयत्नशील हों। अंग्रेजी शिक्षण को स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है।’’

वे हिन्द स्वराज में लिखते हैं, ‘‘हमें अपनी सभी भाषाओं को चमकाना चाहिए।.. 

२८/५/१९१० को ‘इंडियन ओपिनियन’ में शिक्षा में मातृभाषा का स्थान विषय पर कहते हैं, ‘‘भारतीय युवक संस्कार सम्पन्न भारतीय की भांति अपनी मातृभाषा पढ़ या बोल नहीं सकता तो उसे शर्म आनी चाहिए। भारतीय बच्चों और उनके माता-पिताओं में अपनी भाषाएँ पढऩे के बारे में जो लापरवाही देखी जाती है, वह अक्षम्य है। इससे तो उनके मन में अपने राष्ट्र के प्रति रत्ती-भर भी अभिमान नहीं रहेगा।’’

१९/८/१९११ को ‘इंडियन ओपिनियन’ में क्या लिखते हैं, ‘‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृत्ति पायी जाती है। मानो उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता अर्थात् परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। .. इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति-चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो-इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धांत को भूल जाने के खतरा मोल ले रहे हैं।’’

  ४ फरवरी, १९१६ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का उद्घाटन समारोह वक्तव्य (जहाँ गांधी जी को छोडक़र शेष लोगों ने अंग्रेजी में भाषण दिया था), ‘‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। .. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबन्ध किया जाएगा। .. आगे कहते हैं,  यदि हमें पिछले पचास वर्षों में देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गयी होती, तो आज हम किस स्थिति में होते। हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’’

   गांधी जी के जीवन का एक पक्ष ही भाषा पर आधारित है। लंदन में रहकर अपनी मातृभाषा गुजराती पर अध्ययन करनेवाला विद्यार्थी वहाँ आवश्यकता के लिए फ्रेंच और लेटिन  भी सीखते हैं किन्तु सोते और जागते ही नहीं तो मरते भी ‘हे राम’ में ही हैं। 

  बापू ने १५/१०/१९१७ को बिहार के भागलपुर शहर में छात्रों के एक सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा, ‘‘मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर के बराबर है। जो मातृभाषा का अपमान करता है, वह स्वेदश भक्त कहलाने लायक नहीं है। बहुत से लोग ऐसा कहते सुने जाते हैं कि ‘हमारी भाषा में ऐसे शब्द नहीं, जिनमें हमारे ऊँचे विचार प्रकट नहीं किये जा सकते।’

 यदि भाषा में तकनीकी शब्दों की कमी मान भी लें तो गांधी जी उससे असमत होते हए समाधान में कहते हैं, ‘‘जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाये जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं हो सकेगा।

 गांधी जी की इस बात में बड़ा दम है कि ,

१. सारी जनता को नये ज्ञान की जरूरत है।,

२. सारी जनता कभी अंग्रेजी नहीं समझ सकती।,

३. यदि अंग्रेजी पढऩे वाला ही नया ज्ञान प्राप्त कर सकता है, तो सारी जनता को नया ज्ञान मिलना असम्भव है।’’

अत: यदि हिन्दुस्तान एक राष्ट्र है तो उसके जन की एक राष्ट्रभाषा भी होनी चाहिए। मातृभाषा और शिक्षा पर गांधी जी के क्या विचार थे, उनके भागलपुर के भाषण से समझें- ‘‘ मुझे अंग्रेजी भाषा से बैर नहीं है। इस भाषा का भंडार अटूट है। यह राजभाषा है और ज्ञान की निधि से भरी-पूरी है। फिर भी मेरी राय है कि हिन्दुस्तान के सब लोगों को इसे सीखने की जरूरत नहीं है। किन्तु इस बारे में मैं ज्यादा नहीं कहना चाहता। जो विद्यार्थी अंग्रेजी पढ़ रहे हैं और जब तक दूसरी योजना प्रचलित नहीं होती और राज्य की शालाओं में परिवर्तन नहीं होता, तब तक विद्यार्थियों के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं। इसलिए मैं मातृभाषा के इस बड़े विषय को यही समाप्त कर देता हूँ। मैं केवल इतना ही प्रार्थना करूँगा कि आपस के व्यवहार में और जहाँ जहाँ हो सके वहाँ सब लोग मातृभाषा का ही उपयोग करें। और विद्यार्थियों के सिवा जो महाशय यहाँ आये हैं, वे मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने का भगीरथ प्रयत्न करें।’’ 

 २०/१०/१९१७ द्वितीय गुजरात शिक्षा सम्मेलन (भड़ौच) में ‘मातृभाषा शिक्षा का माध्यम हो’ को लेकर दिया गया वक्तव्य, ‘‘यह बात सबको अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि इस दिशा में हमारा पहला काम है विचारपूर्वक शिक्षा का माध्यम निश्चित करना। इसके बिना और सब कोशिशें लगभग बेकर साबित हो सकती हैं। .. ..वैसे तो यह प्रश्र सारे भारत का है, किन्तु हर एक क्षेत्र अथवा प्रांत इस पर अपनी हद तक स्वतंत्र रूप से विचार कर सकता है। फिर भी ऐसा नहीं है कि जब तक भारत को सारे भाग एकमत न हो जाएं तब तक अकेला गुजरात आगे क दम बढ़ा ही नहीं सकता।’’

उनका मानना था कि ‘‘विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा पाने में दिमाग पर जो बोझ पड़ता है वह असह्य है। वह बोझ हमारे बच्चे उठा तो सकते हैं, लेकिन उसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ती है। वे दूसरा बोझ उठाने के लायक नहीं रह जाते। इससे हमारे स्नातक अधिकतर निकम्मे, कमजोर, निरुत्साही, रोगी और कोरे नकलची बन जाते हैं। उनमें खोज करने की शक्ति, साहस, धीरज, वीरता, निर्भयता और अन्य गुण बहुत क्षीण हो जाते हैं। 

वे आगे कहते हैं, ‘‘माँ के दूध के साथ जो संस्कार और मीठे शब्द मिलते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिए, वह विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने में टूट जाता है। हम ऐसी शिक्षा के वशीभूत होकर मातृद्रोह करते हैं। इसके अतिरिक्त विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा देने से अन्य हानियाँ भी होती हैं। शिक्षित वर्ग और सामान्य जनता के बीच में अन्तर पड़ गया है। हम जनसाधारण को नहीं पहचानते। जनसाधारण हमें नहीं जानता। वे हमें साहब समझते हैं और हमसे डरते हैं। वे हम पर भरोसा नहीं करते। यदि यही स्थिति अधिक समय तक कायम रही तो एक दिन लार्ड कर्जन (जो १८९९-१९०५ तक भारत के वायसराय थे) का यह आरोप सही हो जाऐगा कि शिक्षित वर्ग जनसाधारण का प्रतिनिधि नहीं है।’’

२१/०४/१९२० को ‘यंग इण्डिया’ में गाँधी जी भाषा के पक्ष में ‘देशी भाषाओं का हित’ लेख में विदेशी विद्वान को उद्धृत करते हुए, ‘‘सेंट पॉल्स कैथिड्रल कॉलेज, कलकत्ता के प्रिंसिपल रेवनेंड डब्ल्यू.ई.एस.हालैंड अपनी गवाही में लिखते हैं कि ‘जापान ने अपनी भाषा के प्रयोग से एक ऐसी शिक्षा प्रणाली खड़ी कर दी है जिसका पाश्चात्य जगत सम्मान करता है।’’

महर्षि अरविन्द ने अपनी पूरी शिक्षा फ्रेंच में पूरी करने के बाद अपनी मातृभाषा बंगाली को सीखा। देश के पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी मातृभाषा हिन्दी में यूएनओ में भाषण दे कर एक अमिट लीक बना दी। पूर्व राष्ट्रपति और विश्व के जाने माने वैज्ञानिक अपनी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में पूरी कर श्रेष्ठ और अनुकरणीय जीवन का उदाहरण सामने रखा।

मित्रों, सारांश यह कि यदि एक वार मातृभाषा में व्यक्ति की नींव पड़ गई तो जीवन के सुन्दर महल को फिर दुनिया की अनेक भाषाओं से उसे सजाया जा सकता है।

यह एक सुखद संयोग है कि भारत सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 हमारे इन पूर्वजों की आकाक्षाओं को साथ लेकर हमारे सामने आई है। जो अपनी अवधारणा में हर विद्यार्थी को अपने मूल स्वत्वों से जोडक़र न केवल विश्व मानव बनाने की अपेक्षा रखती है बल्कि ‘स्वं स्वं चरित्रण शिक्षेरण पृथिव्या: सर्वमानव:’ के अवधारणा के साथ वसुधैव कुटुम्बकम् को साकार रूप देने संकल्प बद्ध है।

इसी विश्वास के साथ कि जिन विद्यार्थियों को गढऩे का कुशल कारीगर होने का अवसर हमें प्राप्त हुआ है, हम अपने मातृभाषा रूपी छेनी को इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति को ध्यान में रखकर पूर्वजों के सपनों के अनुरूप एक विश्वमानव गढ़ने का प्रयत्न करेंगे।


 


Wednesday, 17 April 2024

हिन्दव: सोदरा: सर्वे

हिन्दव: सोदरा: सर्वे
1969 में कर्नाटक के उडुपी में संपन्न विश्व हिंदू परिषद का सम्मेलन हिंदू समाज के पुनर्जीवन के लिए एक ऐतिहासिक प्रसंग सिद्ध हुआ। मंच पर हिंदू धर्म के जैन , बौद्ध,सिख वीरशैवा आदि सभी पंथ संप्रदायों के धर्माचार्य और शंकराचार्य पीठाधीश ( हरिजनों के पीठाधीश्वर सहित ) विराजमान थे । वहां पर कर्नाटक भर से आए हुए 15000 प्रतिनिधियों के सामने इन सभी धर्माचार्यों के संयुक्त आदेश के अनुसार " हिंदू धर्म में अस्पृश्यता के लिए स्थान नहीं है" ऐसे आशय का प्रदीर्घ प्रस्ताव पारित हो गया । इस संदेश को सूत्र रूप में पेजावर के पूज्य मठाधीश श्री विश्वेश तीर्थ स्वामी जी ने एक नया मंत्र दिया "हिंदव:सोदरा: सर्वे।
हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिंदू पतितो भवेत् । 
मम दीक्षा धर्म रक्षा, मम मंत्र समानता।। 

सब हिंदू भारत माँ की संतान होने से सहोदर हैं, भाई हैं, इसलिए कोई हिंदू पतित नहीं हो सकता है । हमने "समानता" का मंत्र लेकर "धर्म रक्षा" की दीक्षा ली है।

अध्यात्म क्या है (भाषा संस्कृति स्नातक तृतीय वर्ष के लिए )

 
(पढ़ें, ठीक लगे तो शेयर करें ताकि विद्यार्थियों को, शिक्षकों को लाभ हो)

 अध्यात्म

    अध्यात्म शब्द की उत्पति : अध्यात्म का अर्थ है अपने मूल स्वभाव को, अपने आप को, आत्मा को जानने का प्रयत्न करना, ईश्वर एवं जगत से अपने संबंधों को समझना एवं जीवन के अर्थ एवं उद्देश्य से परिचित होना । यह अंतर्मुखी चितंन-मनन की प्रक्रिया है । अध्यात्म की  इस ऊर्ध्वंमुखी  विकास यात्रा  में अनेक अतीन्द्रिय  शक्तियां जैसे - दूरदर्शन , दूरश्रवन व दिव्यदर्शन आदि प्राप्ति होती हैं । इसके केंद्र में आत्मा है, ईश्वर, जगत, अन्य प्राणी इसकी परिधि पर स्थित हैं । अधि + आत्मन = अध्यात्म । संधि के नियम अनुसार इ + अ = य । ‘अध्यात्म’ अर्थात ‘आत्मनः सम्बद्धम्-आत्मानम्। आत्मा से संबंध रखने वाला ।

 अध्यात्म विद्या आत्मा या परमात्मा संबंधी ज्ञान अर्थात् ब्रह्म एवं आत्म-विषयक जानकारी, जो परमात्म चिन्तन में सुख का अनुभव करे । गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अध्यात्म के सम्बन्ध में उसे विद्या की संज्ञा देते हुए कहते हैं-

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।।(10.32।।)

      हे अर्जुन ! सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। विद्याओं में अध्यात्मविद्या और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालों का (तत्त्व-निर्णय के लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ। ‘

 एक दिव्य भाव है । परम ब्रह्म अक्षर है । उसके स्वभाव को अध्यात्म कहते है । उसका भूतभाव उद्भवकारी सृजन कर्म विसर्ग है । ‘अक्षर ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूत भवोद्भव करो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।’( गीता 8,3) 

    गीता में ईश्वर के चार भाव है- (1) परम भाव अक्षर जो ब्रह्म है ।  (2) अध्यात्म भाव, जो आत्मा है । (3) भूत- भाव, जो रचनात्मिका कारण है । तथा (4) विसर्गभाव, जो सृष्टिरूप कार्य है ।

 परम को अक्षर इसलिए कहा गया है क्योंकि बाद के दो भाव एक-दूसरे से सम्बन्धित है, जबकि प्रथम नहीं है । परम ब्रह्म का अनभिव्यक्त अव्यक्त रूप है जबकि दूसरे और तीसरे ईश्वर की अभिव्यक्ति के व्यक्तिनिष्ठ एवं वस्तुनिष्ठ स्वरूप है । 

व्यक्तिनिष्ठ अध्यात्म भाव ईश्वर के समान ही प्रकाशित होता है तथा स्थिर है । वस्तुनिष्ठ भूतभाव रचना करता है तथा प्रपंच है ।

 उदाहरण के लिए गहरे ध्यान अथवा भावावस्था में एक व्यक्ति अपनी तथा अपने आसपास के वातावरण की सम्पूर्ण चेतना खो देता है । उसे यह पता नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है ? लेकिन जब वह कोई कार्य कर रहा होता है, तब यह अपने अस्तित्व के प्रति सचेत रहता है तथा उसे उस कार्य की भी प्रतीति रहती है, जिसे वह कर रहा होता है । भावावस्था में उसकी चेतना उसकी परम सत्ता में विलीन हो जाती है, किन्तु कार्य के समय उसकी व्यक्तिनिष्ठ चेतना तथा कार्य की वस्तुनिष्ठ अनुभूति एक साथ कार्य करती है । भावावस्था में चेतना परमसत्ता में लौट जाती है तथा कार्य के समय अध्यात्म पुरुष तथा कारण भूतभाव वस्तु में अभिव्यक्त हो उठाता है ।

    वैदिक तथा परवर्ती साहित्य में सत् एवं असत् क्रमश: अध्यात्म तथा भूतभाव के लिए प्रयुक्त हुए है । ‘परम’ इन दोनों से परे है । सत् अस्तित्व का धनात्मक पक्ष है तथा असत ऋणात्मक घनीभूत रचना है, क्योंकि अध्यात्म जो परम है, प्रकाशित होता है, अतः सत् है ।

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।

     अध्यात्मभाव अनन्त व पूर्ण है तथा विसर्गभाव सृष्टि भी अनन्त एवं पूर्ण है । अध्यात्मभाव से भूतभाव उत्पन्न होता है जो स्वतः पूर्ण है, किन्तु इससे नियामक पूर्ण का पूर्णत्व अप्रभावित ही रहता है । सृष्टि अनन्त व पूर्ण होती है और इस तरह भूतभाव का संसर्ग रूप भी पूर्ण है । पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने के बाद भी सृष्टि-विकास में पूर्ण ही बचता है । इस तरह अवशेष भी पूर्ण ही है, अनन्त शेष को ‘उच्छिष्ठ’ कहा है    

 आत्मा को साधारणतया मन और बुद्धि के पूर्व जीवन के रूप में तथा अध्यात्म को जीवन-रहित जीवन- तत्व अथवा मन और शरीर में अभिव्यक्त प्रकाश के रूप में परिभाषित किया जाता है । इस तरह ‘स्व’ और ‘अध्यात्म’  मानसिक शक्तियों के विकास के अर्थ में मनोमय और विज्ञानमय कोष के अभ्युत्थान के ही परिचायक हैं । 

     अध्यात्म का क्या अर्थ : आत्मा को जानना और उसकी ओर चलना ही ‘अध्यात्म’ है । बुराई को छोड़कर अच्छाई की ओर आना ‘धर्म’ कहलाता है, जबकि आत्मा को जानना ‘अध्यात्म’ कहलाता है । जब कोई व्यक्ति अस्थायी चीजों की लालसा से बाहर आता है और शाश्वत आत्मा का एहसास करता है, तो यह आध्यात्मिकता की शुरुआत का प्रतीक है । बुरे से अच्छे की ओर बढ़ना ही धार्मिक चेतना है । तथा बुरे और अच्छे से पवित्रता की ओर बढ़ना ही ‘अध्यात्म’ या परम चेतना है ।

आध्यात्मिकता हमें स्थाई ख़ुशी देती है । यह उस चीज़ का ज्ञान प्रदान करता है जो शुद्ध है, वह आत्मा (वास्तविक ‘स्व’) है । खाना, पीना, काम पर जाना, पैसा कमाना इत्यादि सभी सांसारिक गतिविधियाँ हैं । जबकि भ्रष्टाचार और डकैती में लिप्त होना, लूटपाट करना, लोगों को चोट पहुँचाना और लोगों को परेशान करना अधार्मिक कार्य हैं । पूजा करना, जप करना, उपवास करना और भोजन तथा धन का दान करना आदि सभी धार्मिक कार्य हैं । जहां धर्म हमें बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है, वहीं आध्यात्मिकता हमें पवित्रता की ओर ले जाती है । 

अध्यात्म हमें अच्छे-बुरे के द्वंद्व से परे जाकर शुद्ध आत्मा का अनुभव करना, सिखाकर सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त कराता है । एक बार जब हम यह समझ लें कि आत्मा एक शाश्वत तत्व है और वह हमारी अपनी आत्मा है, और अगर (आत्मा और पदार्थ के तत्वों को अलग करने पर) हमें उस शाश्वत तत्व का एहसास हो जाता है, तो हमारी सांसारिक समस्याएं और पहेलियाँ आसानी से हल हो सकती हैं । भौतिक  विज्ञान बिल्कुल अलग चीज़ है जबकि आध्यात्मिक विज्ञान बिलकुल अलग है, क्योंकि यह शाश्वत तत्व आत्मा पर आधारित है ।

 भारतवर्ष के ऋषि गणों, महावीरबुद्ध, कृष्ण और राम सभी का जीवन आध्यात्मिक विज्ञान आधारित था । इन अध्यात्मिक वैज्ञानिकों ने अनादि तत्व को जाना, उसी का अनुभव किया और उसी का ज्ञान अपने शिष्यों को दिया 

अध्यात्म क्या है इसकी खोज में हमें दो मूलभूत बातों का ज्ञान होता है: मैं कौन हूँ ?  इस संसार नियंता कौन है? एक बार जब हम वास्तव में यह जान लेते हैं तो अज्ञान के कारण जो भी दुख आया है, वह स्वतः ही दूर हो सकता है ।

 सांसारिक जीवन क्रिया पर आधारित है और आध्यात्मिक जीवन साक्षात्कार पर आधारित है। सांसारिक गतिविधि करता है जबकि दूसरा तटस्थ भाव से देखता रहता है । ‘कर्ता’ और ‘ज्ञाता’ कभी एक नहीं हो सकते; वे हमेशा अलग होते हैं वे अलग थे; वे अलग हैं और अलग रहेंगे ।

    अध्यात्म की आवश्यकता :  जीवन उतार-चढ़ाव, अच्छे और बुरे समय से भरा हो सकता है । बहुत से लोग आध्यात्म को अपने जीवन में आराम और शांति पाने का एक तरीका मानते हैं । इसका अभ्यास अक्सर योग जैसी चीज़ों के साथ किया जा सकता है, जो अंततः तनाव से राहत और भावनाओं की रिहाई पर ध्यान केंद्रित करते हैं । 

हमारा अधिकतर ज्ञान भौतिक है और उसी से हम परम आनंद की प्राप्ति की आकांक्षा करते हैं जो कि पूरी तरह व्यर्थ है । आज के वातावरण में मनुष्य भौतिकवाद के अनुसरण में व्यस्त है । भौतिकवाद केवल बाहरी आवरण को समृद्ध बना सकता है । इससे हम अपने भौतिक शरीर की जरूरतों को ही पूर्ण कर सकते हैं ।

 भौतिकवाद हमारे बाहरी शरीर को सुंदर बना सकता है, पर इससे आंतरिक आनंद और उल्लास की अपेक्षा करना हमारी अज्ञानता है । भौतिकवाद और विज्ञान हमें संपूर्ण विश्व की बाहरी यात्रा करवा सकता है, पर आंतरिक यात्रा तो केवल अध्यात्म के मार्ग पर चलकर ही हो सकती है । 

आध्यात्मिक जीवन एक ऐसी नाव है जो ईश्वरीय ज्ञान और आनंद से भरी हुई है । यह नाव जीवन के उत्थान और पतन रूपी झंझावातों में भी चलती रहती है । अध्यात्म मनुष्य को आंतरिक रूप से सशक्त बनाता है । लाभ-हानि, मान-अपमान, सुख-दुख, उत्थान-पतन सभी परिस्थितियों में आध्यात्मिक मार्ग का पथिक अविचल रूप से गतिमान रहता है । सांसारिक रुकावटें उसकी इस गति को बाधित ही नहीं कर सकतीं । सभी प्राणियों में उसी परम सत्ता के अंश को अनुभव करने की प्रेरणा अध्यात्म ही प्रदान करता है । 

अध्यात्म विश्व बंधुत्व का मार्ग है जहां मनुष्य की ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, आपसी भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं । प्रत्येक प्राणी में उसी दिव्य तत्व की अनुभूति होने लगती है   

     अध्यात्म की इसी समदर्शी और समत्व की भावना को योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया है कि जो मनुष्य सभी प्राणियों में स्थित आत्मा को अपने जैसा देखता है, ऐसा समदर्शी आध्यात्मिक मनुष्य सांसारिक वातावरण से अलग होकर सभी प्राणियों को ईश्वरमय समझने लगता है । ऐसी अवस्था में वह किसी का अहित करने का विचार अपने मन में नहीं ला सकता । संपूर्ण विश्व के प्राणी उसके लिए बंधु बन जाते हैं । अध्यात्म मनुष्य को इसी समत्व की भावना की ओर ले जाता है । 

हमारी सारी दौड़, सारे प्रयास बाहर के भौतिक जीवन तक ही सीमित हैं । लेकिन अध्यात्म अपने भीतर जाने का मार्ग खोलता है ।  यह धर्म से भिन्न है, और यदि आप धार्मिक नहीं हैं तो भी आप इसका अभ्यास कर सकते हैं । विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिकता के बारे में और उन कारणों के बारे में और जानें कि क्यों कुछ लोग आध्यात्मिक जीवन जीने का निर्णय लेते हैं । 

हमारा अधिकतर समय दूसरों के स्वभाव, व्यवहार, व्यक्तिगत जीवन को जानने में व्यतीत हो जाता है । मानव जीवन को हम व्यर्थ की दौड़ धूप में, आपसी मनमुटाव और दूसरों की कमियों को जानने में व्यतीत कर देते हैं । अध्यात्म हमें सचेत करते हुए कहता है कि सबसे पहले स्वयं को जानो । सर्वप्रथम अपने व्यवहार, अपने भीतर का अवलोकन करो । बाहरी संसार के व्यक्तियों की आलोचनाएं, प्रशंसा से हमें कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला । अपने भीतर के अवलोकन से ही हम शाश्वत आनंद और शांति के भंडार को प्राप्त कर सकते हैं । इसलिए आध्यात्मिक तत्वों को अपने जीवन में आत्मसात करके ही आनंद और शांति की अनुभूति की जा सकती है   

     आध्यात्म बोध के विभिन्न चरण: आध्यात्म में अक्सर अर्थ, उद्देश्य और ब्रह्मांड, अन्य लोगों या उच्च शक्ति के साथ अंतर्संबंध की भावना की तलाश शामिल होती है ।

 अध्यात्म को ध्यान और प्रार्थना जैसी विभिन्न प्रथाओं में व्यक्त किया जा सकता है । कुछ सामान्य आध्यात्मिक अभ्यास हैं: सचेतनता या जागृत भाव, ध्यान, योग, नृत्य, कला या संगीत के साथ प्रकृति की गोद में होने की अनुभूति । इसके साथ ही दीक्षा, प्रसुप्त कुण्डलिनी का जागरण, सृजनशक्ति का संचय, सच्ची साधना की प्रक्रिया, विकास, इच्छाशक्ति की सबलता तथा जिज्ञासु वृति आवश्यक है । 

अध्यात्म में प्राचीन भारतीय अध्यात्म शास्त्र के साथ-साथ साधकों को प्रत्यक्ष रहस्यानुभूतियों की भी जानकारी होनी चाहिए । साथ ही आधुनिक मानव मन का विज्ञानोन्मुख दार्शनिक पक्ष भी स्पष्ट होना चाहिए है । अध्यात्म समझने के लिए पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक अन्वेषणों के समन्वय की आवश्यकता होती है । 

उच्च विद्या के लिए ज्ञान के अनेक ग्रंथ हैं, यथा चारों वेद, वेदांग, वेदान्त सूत्र, तर्क ग्रंथ, धर्मग्रंथ, पुराण, श्रीमदभगवतगीता , रामायण आदि । इस प्रकार इस क्षेत्र में अनेक ग्रंथ हैं । इनके साथ ही भारतीय परम्परा के अतिरिक्त विश्व भर के ऐसे संतों के जीवन का अध्ययन आवश्यक है । 

भारतवर्ष अपने पूर्व गौरव विश्वगुरु के सिंहासन पर तब तक पुन:प्रतिष्ठित नहीं हो सकता, जब तक कि हम सनातन संस्कृति, जो कि यथार्थ स्वरूप से आध्यात्मिक है, को पुनर्जीवित नहीं कर लेते । 

    अध्यात्म और कर्म : हम भारतवासी कर्म के लिये जी रहे हैं और दुनिया भोग के लिये जी रही है । हमारे सामाने हैं- दधीचि  जो मानवता के कल्याण हेतु हड्डियाँ अर्पित करते हैं,  शिवि एक पक्षी के रक्षण हेतु अपना अंग काटकर अर्पित हैं, चालीस दिन के भूखे रंतिदेव ब्राह्मण, चाण्डाल व स्वान की सेवा में निज थाली का अन्न भी अर्पित करते हैं।

 तो दूसरी ओर अपना पेट पालने के लिये निरपराधों व निरीहों का हवन करने में भी नहीं चूकते अथवा अपनी अर्थनीतिक दुश्चक के लिए अनाज को इंजनों में जला देते हैं, परन्तु किसी भूखे के पेट में नहीं जाने देते।  उस समय दुनिया के ये लोग कीट-पतंग से अधिक कैसे लग सकते हैं ? 

 दुनिया तेजी से भौतिक प्रगति करती दिख रही है । परन्तु हमारी अन्तः प्रकृति इस भोगवादी पाश्विकता के स्वागत के लिये तैयार नहीं है । प्रत्येक भारतवासी को अच्छी तरह ज्ञात है कि यह भौतिक शक्ति नहीं है, जिसने हमें आज तक जीवित रखा है, यह हमारी आध्यात्मिक शक्ति ही है जिसने हमें अजरता-अमरता प्रदान की है । 

 कभी-कभी किन्ही - किन्ही महानुभावों को लग सकता है कि अपनी अत्यधिक आध्यात्मिक प्रवृत्ति के कारण हम भोले-भाले भारतवासी अनेक बार भौतिक क्षेत्र में पिछड़ गये हैं । लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिये कि जिस आध्यात्मिक प्रवृत्ति के कारण हम अनेक बार पिछड़े हुए लगते हैं, उसी की परम कृपा के कारण आज तक हम जीवित भी बने हुए है ।

  जूलियस सीजर का साम्राज्य बहुत बड़ा था, किंतु दुनिया के मानचित्र में आज कहाँ है ? दुनिया को हिलाने वाले सिकन्दर के मुल्क का क्या हाल है ? लेकिन हम आज श्रीमस्तक ऊँचा करके गौरव के साथ खड़े हुए हैं, आखिर क्यों और कैसे ? 

 समझना होगा हमारी प्राण शक्ति का स्रोत कहाँ है ? हमें प्रेरणा कहाँ से प्राप्त होती है ? वेद, गीता, उपनिषद के यह अमर भाव हमारे प्रेरणा के स्त्रोत हैं, जो हमें बताते हैं -“ हम कभी मरते नहीं।  हमारी आत्मा अमर है । शास्त्र उसे छेद नहीं सकते । आग उसे जला नहीं सकती । पानी उसे गला नहीं सकता । हवा उसे सुखा नहीं सकती।” 

 यह दुनिया का सबसे ऊँचा और गहरा विचार है । दुनिया के समस्त विचार इस एक विचार में आकर समाहित हो जाते हैं । इसी का परिणाम है कि दुनिया की अनेक संस्कृतियां इस देश में आईं और अपने अस्तित्व को खोकर चली गई या  भारतीय संस्कृति की भागीरथी में विलीन हो गईं ।

      वेद, उपनिषद, गीता के अमर सन्देश के सुदृढ़ आधार पर खड़े होकर हमने ज्ञान की कौन-सी ऊँचाई प्राप्त की, इसका अनुमान हम इसी बात से लगा सकते हैं कि, वर्तमान युग के श्रेष्ठतम वैज्ञानिक- दार्शनिक आइंस्टीन की समझ में भी नहीं आ सका कि आज से सदियों पूर्व आचार्य शंकर की समझ में अद्वैत का सिद्धान्त कैसे आया ?   

  हमें यह स्वीकार करते हुए गरिमा का अनुभव होता है कि हमारे महापुरुषों के भक्त हृदयों ने निराकार ब्रह्म को साकार परमात्मा बनाकर दिखा दिया और फिर साकार परमात्मा को निराकार में विलीन करने वाले ज्ञान देते महर्षि भी इस देश को सुशोभित कर उठे । 

ज्ञान के क्षेत्र में हमें किसी प्रकार की सीमा स्वीकार नहीं है । इसीलिये तो हमारे यहाँ इतने मत मतान्तर, देवी-देवता, वेद-वेदांग दिखाई देते हैं । यही कारण है कि साकार -निराकार, द्वैत-अद्वैत, कर्म-ज्ञान-उपासना से संबंधित वादों में कभी टकराहट नहीं हुई और जिसने जो मार्ग चुना वहीं से उसने इस अध्यात्म को बोध किया ।

     अध्यात्म और धर्म : अध्यात्म और धर्म पृथक हैं । भारत के किसी भी प्रांत के पंडित, अपंडित, दार्शनिक, प्रवचनकर्ता, पुजारी, पुरोहित, आचार्य, अध्यापक, लेखक, निदेशक आदि सब एक ही उच्चारण करते पाए जाते हैं - ‘ धर्म एव हतो हन्ति, धर्मों रक्षति रक्षति: । इसी तरह ‘यतो धर्मस्ततो जय: । ‘सत्यम वाद धर्मं चर’। जब अद्वैत की चर्चा हुई, तब भी धर्म की पताका ऊँची फहराई । जब द्वैत की चर्चा हुई तब भी धर्म की पताका ऊँची फहराई । जब ओऽम् का उद्घोष हुआ तब भी धर्म का जय-जय निनाद था । कोई भी काल हो, कोई भी परिस्थिति ‘धर्म की जय’, ‘सत्य की जय।’ ही रही है । इस प्रकार के सैकड़ों उदाहरण और भी हैं जिसका तात्पर्य इतना ही है कि भारत में धर्म का महत्व सब लोग मानते हैं । 

           जहाँ से धर्म की यात्रा पूर्णता प्राप्त करती है, वहीं से अध्यात्म की यात्रा प्रारम्भ होता है । आध्यात्मिकता का यह भाव व्यक्ति से बोध होकर वैश्विक बनाता है । धार्मिक होना आपको स्वचालित रूप से आध्यात्मिक नहीं बनाता है । आध्यात्मिक जागृति अपने से बड़ी किसी चीज़, जैसे ब्रह्मांड या किसी उच्च शक्ति, से गहरा संबंध महसूस करा सकती है ।

 आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए धार्मिक वृति आवश्यक भी है और नहीं भी । धर्म आचरण की शुद्धता की ओर ले जाता है तो आध्यात्मिकता जीवन की जटिलताओं को सुलझाने में सहायक होता है । आत्मा और परमात्मा से संबंधित शाश्वत ज्ञान का अनुगमन करना ही अध्यात्म विद्या है । 

अध्यात्म का अर्थ है भौतिक जीवन के साथ जीवन के स्वत्व को समझना है । ईश्वरीय आनंद की अनुभूति करने का मार्ग ही अध्यात्म है । अध्यात्मिकता का संबंध आंतरिक जीवन से है।

      हमारे महापुरुष व शास्त्र पुकार-पुकार कर कहते हैं सत्य व धर्म की चर्चा में रहो, असत्य व अधर्म की चिन्ता में समय व्यतित मत करो । सत्य की चर्चा ही हमारे जीवन का लक्ष्य बन जाना चाहिये । सत्य के प्रति हमारा अनुराग आज नहीं तो कल सभी को हमारी ओर आकर्षित कर लेगा । मृदु शब्दों में लसी हुई सत्य चर्चा लोक विजय का सबसे बड़ा साधन है । हम प्रेम व सत्य के साक्षात् अवतार बन जाएँ ।  

    एक महात्मा ने किसी साधक को बताया- “ध्यान करो लेकिन ख्याल रहे कि ध्यान करते समय बन्दर की आकृति सामने न आए।” मानव प्रकृति की विचित्रता देखिये कि साधक जब भी ध्यान करने बैठता उसके सामने बन्दर की ही आकृति आकर खड़ी हो जाती । इसीलिये मैं कहता हूँ, जो नहीं चाहिये उसकी चर्चा ही बन्द कर दें । केवल उसी की चर्चा करें जो हमें चाहिये । 

स्वामी रामतीर्थ ने एक स्थान पर कहा “वासना के विरुद्ध अधिक गर्जन - तर्जन का परिणाम होता है, उस वस्तु का निर्माण कर देना जिससे मानव प्रकृति मुक्त है । हम अपनी शक्ति को उच्च लक्ष्य की ओर प्रेरित कर दें ।  फिर हमारे पास ऐसी चीजों के बारे में विचार करने के लिये समय ही नहीं रहेगा, जिसमें वासना की गंध आती हो ! ”

     राम कृष्ण परमहंस कहते हैं, ‘एक हाथ से संसार का कार्य करो और दूसरे हाथ से ईश्वर को पकड़े रखों, जैसे ही कार्य पूरा हो दोनों हाथ से ईश्वर को पकड़ लो । पहला धर्म है तो दूसरा अध्यात्म । इसलिए अध्यात्म अर्थात ‘स्व’ का साक्षात्कार । अर्थात ‘आत्मा’ के बोध और परमात्मा की दिव्यता-बोध में धर्म-दर्शन अर्थात् सांसारिक व्यवहार की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं । व्यवहार और उच्च चेतना के विचार में समन्वय करके जीना ही अध्यात्म और धर्म का आंतरिक सम्बन्ध है ।

 

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Saturday, 6 April 2024

व्यक्तित्व विकास एवं चरित्र निर्माण स्नातक भाग तीन के प्रश्नोत्तर (vyaktitw vikaas evm charitr nirmaan )

 

व्यक्तित्व विकास एवं चरित निर्माण  स्नातक अन्तिम वर्ष के प्रश्न

इकाई (एक)

              प्रश्न (1)  “ॐ शं नो मित्रः शं वरुण: । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विश्नुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते          वायो । त्वमेव प्रत्यक्षम ब्रह्मास्मि । त्वामेव प्रत्यक्ष्मं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यम वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्त्रारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐशांतिः शांतिः शांतिः”- यह प्रार्थना किस उपनिषद से ली गई है ?

               उत्तर - कृष्ण यजुर्वेदीय तैतरीय शाखा ,तैत्तिरीयोपनिषद ।  

              प्रश्न (2)  “दुष्ट: शब्द: स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानम हिनस्ति यथेन्द्रशत्रु: स्वरतोSपराधादिति ।।” किसका कथन है ?

              उत्तर -  महर्षि पतंजलि का  ( महाभाष्य पस्पशाह्निक में )

              प्रश्न (3) स्वर भेद कितने प्रकार के होते हैं ?

               उत्तर- हस्व, दीर्घ और प्लुत

              प्रश्न (4) मात्रा भेद को  समझ कर उच्चारण न करने से क्या हानि होती है ?

              उत्तर -  हस्व के स्थान पर दीर्घ और दीर्घ के स्थान पर हस्व का उच्चारण करने से अर्थ बदल जाते हैं, जैसे सीता और सिता ।        कृष्ण और कृष्णा । 

              प्रश्न (5) ‘बल’ का अर्थ क्या है ?

              उत्तर-‘बल’ का अर्थ  ‘प्रयत्न’ है । वर्णों के उच्चारण में उनके ध्वनि को व्यक्त करने में जो प्रयास करना पड़ता है, वही               ‘प्रयत्न’ कहलाता है ।

              प्रश्न (6) ‘प्रयत्न’ कितने प्रकार के होते हैं ? ‘प्रयत्न’ दो प्रकार के होते हैं - ‘आभ्यांतर और बाह्य’ ।

               प्रश्न (7) ‘आभ्यांतर’ के कितने भेद (प्रयत्न) होते हैं ?

              उत्तर-  स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, विवृत, ईषद-विवृत, संवृति - ये पांच आभ्यांतर के भेद हैं ।

              प्रश्न (8)  ‘बाह्य’ के कितने भेद (प्रयत्न) हैं ? ‘बाह्य’ के विवार, संवार, श्वांस, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उद्दात्त,    अनुदात्त और स्वरित-ये बाह्य प्रयत्न के ग्यारह भेद होते हैं ।

              प्रश्न (9)   ‘क’ से लेकर ‘म’ तक के अक्षरों के आभ्यान्तर प्रयत्न को क्या कहते हैं ? उत्तर-‘स्पृष्ट’ है क्योंकि कंठ आदि    स्थानों में प्राणवायु के स्पर्श से इनका उच्चारण होता है ।

              प्रश्न (10)  ‘क’ के बाह्य प्रयत्न कौन से हैं ?

              उत्तर- बाह्य प्रयत्न विवर, श्वांस, अघोष तथा अल्पप्राण है ।

              प्रश्न (11)  ‘साम’ किसे कहते हैं ?

              उत्तर- वर्णों का संवृति से उच्चारण या साम-गान की रीति  ‘साम’ है ।

              प्रश्न (12)  ‘संतान’ का अर्थ क्या है ?

              उत्तर- ‘संहिता’- संधि ।

              प्रश्न (13)  ‘संधि’ किसे कहते हैं ?

              उत्तर- स्वर, व्यंज्जन, विसर्ग अथवा अनुस्वार आदि अपने परवर्ती वर्णों के संयोग से कहीं-कहीं नूतन रूप धारण कर लेते हैं ।    इस प्रकार वर्णों का यह  संयोग जनित विकृति भाव ‘संधि’ कहलाती है ।

              प्रश्न (14)  प्राकृति भाव क्या है ?

              उत्तर-  किसी स्थान विशेष स्थल में जहां ‘संधि’ बाधित होती है, वहां वर्ण में विकार नहीं आता, अत: उसे ‘प्रकृति भाव’           कहते हैं ।   

              प्रश्न (15)  ‘संहिता’ किसे कहते हैं ?

              उत्तर- वर्णों में जो संधि होती है, उसे ‘संहिता’ कहते हैं ।

              प्रश्न (15) ‘महा संहिता’ किसे कहते हैं ?  

              उत्तर- संहिता दृष्टि जब व्यापक रूप धारण करके लोक आदि को अपना विषय बनाती है, तब उसे ‘महा संहिता’ कहते हैं ।

              प्रश्न (16) महासंहिता या महासंधि के कितने आश्रय होते हैं ?

              उत्तर- लोक, ज्योति, विद्या, प्रज्ञा और आत्मा (शरीर) पांच आश्रय होते हैं ।

              प्रश्न (17) प्रत्येक संधि के कितने भाग होते हैं ?

             उत्तर-चार भाग होते हैं- पूर्व रूप , उत्तर रूप, संधि और संधान ।

              प्रश्न (18) ‘नियम’ क्या है ? उत्तर - पूर्व रूप और उत्तर रूप के मेल से होने वाला रूप तथा दोनों का संयोजक ‘नियम’             कहलाता है  

              प्रश्न (19) ‘लोक’ को संधि के इन चार प्रकारों से समझाइए?

              उत्तर- पृथ्वी यह लोक ही ‘पूर्व रूप’ है, स्वर्ग ही संहिता का ‘उत्तर रूप’ (पर वर्ण) हैं । आकाश या अन्तरिक्ष ही इन दोनों की        ‘संधि’ है और वायु इनका ‘संधान’ (संयोजक) है । यहाँ वायु का अर्थ ‘प्राण’ है।

              प्रश्न (20)  अग्नि’ को संधि के इन चार प्रकारों से समझाइए?

              उत्तर-  अग्नि इस भूतल पर सुलभ है, अत: उसे संहिता का ‘पूर्व वर्ण’ माना है और सूर्य द्युलोक में प्रकाशित होता है;               अत: उसे ‘उत्तर रूप’ कहते हैं । इन दोनों से उत्पन्न होने के कारण ‘मेघ’ ही संधि है तथा ‘विद्युत् शक्ति’ ही इस संधि की            हेतु (संधान) बतायी गयी है । इन ज्योतियों के सम्बन्ध से उत्पन्न होने वाले भोग्य पदार्थों को ‘जल’ का नाम दिया गया है।

              प्रश्न (21)  वेद या विद्या को संधि के इन चार प्रकारों से समझाइए?  

              उत्तर- आचार्य को ‘पूर्व रूप’ पहला वर्ण माना गया है । अन्तेवासी शिष्य ‘उत्तररूप’ वर्ण है ।  दोनों के मिलन (संधि) से         उत्पन होने वाली ‘विद्या’ है, तथा गुरु के प्रवचन को श्रद्धापूर्वक सुनकर उस विद्या को धारण करना ‘संधान’ है ।

              प्रश्न (22) संतान उत्पति को संधि के इन चार प्रकारों से समझाइए?  

              उत्तर- माता को ‘पूर्वरूप’, पिता को ‘उत्तररूप’, संतान उत्पान हेतु उद्देश्य ‘संधान’ तथा संतान का उत्पन्न होना ‘संधि’ है ।

              प्रश्न (23) मुख (संहिता) को संधि के इन चार प्रकारों से समझाइए?

              उत्तर-  नीचे के जबड़े को ‘पूर्वरूप’, ऊपर के जबड़े को ‘परवर्ण’, दोनों के मिलन को ‘संधि’ तथा जिह्वा (वर्ण के उत्पन्न होने       से ) ‘संधान’ है ।  

क्रमशः

Sunday, 10 March 2024

अक्षर अर्थ

 

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि ।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥

अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली सरस्वती और गणेश की मैं वंदना करता हूँ ॥

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥

श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप पार्वती और शंकर की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम् ।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥

ज्ञानमय, नित्य, शंकर रूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥

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स्मरणीय बातें –  जय जवान ,जय किसान ,जय विज्ञान,जय अनुसंधान । 

पञ्च प्रण:

+भारत को विकसित देश बनाना है

+जीवन से गुलामी का अंश मिटाना है । 

+हमें विरासत पर गर्व हो

+एकता और एकजुटता पर जोर । 

 +नागरिक के कर्तव्य पर जोर

….............

भारतीय ज्ञान परम्परा में ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की बात कही गई है । शिक्षा और विद्या के अंतर को जीवन का लौकिक और पर लौकिक विकास समझना चाहिए । जीवन के पुरुषार्थ को विद्या के माध्यम से साधा जा सकता है और उसका प्रवेश द्वार है,‘शिक्षा’ ।

भारत में गुरुकुल परंपरा प्राचीन काल से भारत के सत्य को जानने को प्रयत्नशील है । भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक पुरुषार्थ में, सनातन धर्म की साधना में, कोमलता में, ऋजुता में, विवेक में, धर्म और श्रेष्ठ कार्य में,  ईश्वरीय उपासना के माध्यम से बौद्धिक चेतना के जागरण का राजसूय यज्ञ कराती है । बौद्धिक आलस्य को छोड़कर हमें पुरुषार्थ करना होगा, इतिहास को समझना होगा,  इसके  लिए कठोर बौद्धिक परिश्रम करने की आवश्यकता है । हमारी गुरु परंपरा इसके लिए हमें प्रेरणा देती है ।

बोध वाक्य:जब तक समाज में आजकल की प्रचलित सभी कुरीतियों के विरुद्ध जबरदस्त आंदोलन न होगा, कुरीतियों पर जबरदस्त कुठाराघात न होगा, तब तक न तो समाज में समानता का भाव आएगा और न उसका कल्याण होगा।”-शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी

 प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहता है- ‘विज्ञान की अपनी अन्तिम खोज करते समय हमे ईश्वर का अस्तित्व समझ में आया।’

बोध वाक्य: “पंथ, संप्रदाय, मजहब अनेक हो सकते हैं, परंतु धर्म तो एक ही होता है । यदि पंथ- संप्रदाय उस ईश्वर की उपासना के लिए प्रेरणा देते हैं तो ठीक अन्यथा महाशक्ति का बाना पहनकर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना न ईश्वर भक्ति है न  धर्म।”-शहीद रामप्रसाद बिस्मिल

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नौमी भौम बार मधुमासा । 

अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । 

तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं ॥

              चैत्र मास की नवमी तिथि मंगलवार को अयोध्या में यह चरित्र प्रकाशित हुआ । जिस दिन श्री रामजी का जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ चले आते हैं ॥

रचि महेस निज मानस राखा । 

पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥
तातें रामचरितमानस बर । 

धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥

              महादेव जी ने इस कथा को अपने मानस में रच रखा था और समय आने पर उसको  पार्वती जी को सुनाया, इसीलिए इस ग्रन्थ का नाम रामचरितमानस रखा है ॥

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा ।

 गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा  ॥
अगुन अरूप अलख अज जोई ।

 भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥

              मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं कि सगुण और निर्गुण में कोई भेद नहीं है जो अलख और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है ॥

नेति नेति जेहि बेद निरूपा । 

निजानंद निरुपाधि अनूपा ॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। 

उपजहिं जासु अंस तें नाना ॥

ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई ।

 भगत हेतु लीलातनु गहई ॥

             जिन्हें वेद यह नहीं, यह भी नहीं निरूपित करते हैं, जो आनन्द स्वरुप हैं, जिनके अंश से शिव, ब्रहमा और विष्णु उत्पन्न होते हैं, ऐसे प्रभु सेवक और भगत के लिए शरीर धारण करते हैं ॥

नौमी तिथि मधु मास पुनीता । 

सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा ।

 पावन काल लोक बिश्रामा ॥

              पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि, शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित् मुहूर्त था । दोपहर का समय न बहुत सर्दी, न धूप थी वह समय सब लोक को शांति देने वाला था ॥

बोध वाक्य-मैं एक ऐसे धर्म में विश्वास करता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का प्रचार करता है।- चंद्रशेखर आजाद

एषाम् न विद्या न तपो न दानम् ज्ञानम् न शीलम् न गुणो न धर्म: ।

ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

 

                  जो व्यक्ति शिक्षित नहीं है, जो परिश्रम करने के लिए तैयार नहीं है, जो अपने पास जो कुछ भी दान नहीं करता है, जिसके पास ज्ञान नहीं है, जिसके पास अच्छे चरित्र, अच्छे गुण नहीं हैं और जो धर्म का पालन नहीं करता है, ऐसा व्यक्ति इस धरती पर सिर्फ एक बेकार व्यक्ति है, वह किसी भी अन्य जानवर की तरह अच्छा है।

बोध वाक्य: “भारत माता के रंगमंच का अपना पार्ट हम अदा कर चुके हैं । हमने गलत  सही जो कुछ किया,वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया । हमारे इस काम की कोई प्रशंसा करेंगे और कोई निंदा । किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ेगी।”-शहीदअशफाक उल्ला खां

भारति, जय, विजयकरे !
कनक-शस्य-कमलधरे !
लंका पदतल शतदल
गर्जितोर्मि सागर-जल,
धोता-शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे ।

या  निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

       सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है॥

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं -समुद्रमापः  प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।

तद्वत्कामा  यं   प्रविशन्ति  सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

       जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं॥

बोध वाक्य   “ वन की अग्नि चंदन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकता है। – चाणक्य

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
 

सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका   जीवन  हरियाली  पर,   मंगल  कुंकुम  सारा।।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।

यज्ञाद्भवति  पर्जन्यो  यज्ञः  कर्मसमुद्भवः ॥

              सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा की उत्पत्ति यज्ञ सम्पन्न करने से होती है और यज्ञ की उत्पत्ति नियत-कर्म (वेद की आज्ञानुसार कर्म) के करने से होती है ।

यद्यदाचरति  श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

              महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य मनुष्य भी उसी का ही अनुसरण करते हैं, वह श्रेष्ठ-पुरुष जो कुछ आदर्श प्रस्तुत कर देता है, समस्त संसार भी उसी का अनुसरण करने लगता है ।

बोध वाक्य– “ मैने अनुभव किया है कि आंतरिक संतोष-सहानुभूति और करुणा से प्राप्त होता  है । हम दूसरों की जितनी मदद करेंगे उतनी अधिक खुशी महसूस करेंगे । मन में दूसरों के लिए अच्छी भावनाएं आएंगी तो मन शांत होगा । भीतर का भय और असुरक्षा बहुत कम होगा । भीतरी ताकत बढ़ेगी। यही सफलता का मूल मंत्र है ।”-संत दलाई लामा

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट !
मेरे  भारत  के  दिव्य भाल ! मेरे नगपति ! मेरे विशाल !
-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त, युग-युग गर्वोन्नत, नित महान,
निस्सीम  व्योम  में तान  रहायुग  से किस महिमा का वितान?
कैसी अखंड यह चिरसमाधि! यतिवर  कैसा यह अमर ध्यान?
तू  महाशून्य  में  खोज रहा किस  जटिल समस्या का निदान ?
उलझन  का  कैसा  विषम  जाल  ? मेरे  नगपति मेरे विशाल !   
तू पूछ, अवध से, राम कहाँ? वृन्दा ! बोलो, घनश्याम कहाँ?
ओ मगध ! कहाँ  मेरे अशोक ? वह चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ ?
री  कपिलवस्तु !  कह,बुध्ददेव के वे मंगल - उपदेश कहाँ ?
तिब्बत,  इरान,  जापान,चीन  तक  गये  हुए  सन्देश  कहाँ?
प्राची के प्रांगण-बीच देख, जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल,
तू  सिंहनाद  कर  जाग  तपी ! मेरे  नगपति !  मेरे  विशाल !
कह  दे  शंकर  से, आज  करें वे प्रलय-नृत्य  फिर  एक बार।
सारे  भारत   में  गूँज उठे ,'हर-हर-बम'  का  फि र महोच्चार।
ले  अंगडाई  हिल  उठे  धराकर निज विराट स्वर में निनाद
तू   शैली   विराट हुँकार  भरे  फट  जाए कुहा, भागे प्रमाद
तू  मौन  त्याग,कर सिंह नाद रे तपी आज तप का न काल

नवयुग- शंखध्वनि   जगा  रही तू जाग, जाग, मेरे  विशाल!

बोध वाक्य –“अध्यापक का कार्य केवल तात्कालिक शिक्षण या परीक्षा में अच्छे अंक अर्जित करने के लिए प्रेरित करना ही नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसे मूल्य सिखाना भी है, जो उनका चरित्र निर्माण कर सकें, जो स्थाई हो और विद्यार्थी को जीवन में सफल बनने में मदद करें ।”-  डॉ अब्दुल कलाम

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।

 सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति । ।

              जिस प्रकार आकाशसे गिरा जल विविध नदियों के माध्यम से अंतिमत: सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओंके लिए किया हुआ नमन एक ही परमेश्वरको प्राप्त होता है ||

चिरविजय की कामना ले , कर्म पथ पर चल  तरूण मन।

संगठन  की  साधना  में ,प्राण  अर्पित  और   तन- मन ।।

 

पतित   पावन   राम  ने   थे , गिरी   अरण्य महान   घूमे ।

छोड़कर    माया   अवध   की , ऋषिजनों  के  पांव  चूमे ।

दीं   दुखियों   पर   दया    के , अश्रु  कण छलके वरुण वन ।

चिर विजय …………

 

 

भक्ति   का   धुव   भाव  लेकर , बढ़ चलो तुम ध्येय पथ पर ।

पवन   सूत   की  शक्ति   लेकर , बढ़  चलो  तुम गेय बनकर।

फिर  उदित  इठला  रहा  है , आज  राघव  के   नयन   बन  ।

चिर विजय …………

 

टूट    विद्युत  के   पड़ो   तुम ,राक्षस  की   वृत्तियों  पर ।

गिर   पड़ो  तुम  आज  फिर से , वज्र  बन  आपत्तियों पर ।

पाश   नागों   के  चले  है , काट   डालो   तुम  गरुड़  बन ।

चिर विजय …………..

अपाने  जुह्वति  प्राणं  प्राणेऽपानं  तथापरे ।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥

अपरे  नियताहाराः  प्राणान्प्राणेषु  जुह्वति ।

सर्वेऽप्येते  यज्ञविदो  यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥

              दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ॥

श्रद्धावाँल्लभते  ज्ञानं  तत्परः  संयतेन्द्रियः ।

ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

              जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ॥

बोध वाक्य : “जिसके हृदय में हरि का निवास नहीं है, वह तो सूने घर के समान है। ईश्वर की शक्ति से ही समस्त जगत प्राणमय है । उसकी गति विचित्र है, वह किसी से भी किसी समय अलग नहीं है। ईश्वर का नाम ही भवसागर से पार उतारने में समर्थ है।”- संत रज्जब

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥

यह मेरा है, वह उसका है जैसे विचार केवल संकुचित मस्तिष्क वाले लोग ही सोचते हैं ।


यम-‘अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:’

(2) नियम- ‘‘शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा:’’।

बोध वाक्य : “ अपार संपत्ति एकत्र करना अथवा योगी बनकर शरीर में भस्म लगाना, पांच प्रकार की अग्नि को सहना  या समुद्र के आर पार के राज्य को जीत लेना, अनेक प्रकार के तप और संयम करना, हजारों तीर्थों की यात्रा करना आदि व्यर्थ है, यदि नंदकुमार श्री कृष्ण से प्रेम ना किया और उनका दर्शन ना किया ।”- रसखान

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।

 

 


Wednesday, 28 February 2024

भारतीय ज्ञान परम्परा को कैसे प्राप्त करें

उच्च शिक्षा विभाग की छोटी -छोटी समस्याएं -दस हजार एजीपी, पदोन्नति सक्षम प्राचार्य, कुलपति, रजिस्ट्रार नियुक्त हों, चापलूसी और अवसर वादिता खत्म हो, सलाहकारों की करनी कथनी एक हो तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ज्ञान परम्परा स्वत: लागू होती जायेगी ।

विभाग विद्वानों की (तथाकथित विद्वानों की नहीं अर्थात पदेन कुलपतियों, आयातित-प्रदेश के बाहर के विद्वान नहीं जो प्रदेश को पहचानते ही न हों,जिनकी पहचान उनके आकाओं से होती हो) एक समिति बनाये, उनकी नियमित बैठकें हों, पाठ्यक्रम, परीक्षा मूल्यांकन, विश्वविद्यालय/महाविद्यालयों का परिसर, परिवेश प्राचीन ज्ञान (अध्यात्मिक वातावरण ) आधारित हो तो भारतीय ज्ञान परम्परा के परिणाम दिखेंगे।

बोनसाई को पर्दे पर आदम कद रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, वह तत्वज्ञानी भी दिख सकता है किन्तु वास्तविक धरातल पर परिवर्तन नहीं कर सकता। भारतीय ज्ञान परम्परा आचरण से समझ में आती है न कि उपदेश या प्रवक्ताओं के पी पी टी से।

Sunday, 25 February 2024

भारतीय ज्ञान परम्परा (ख) लोक के राम bhaarteey gyaan parmpaar (look men raam )

भारतीय ज्ञान परम्परा 

(ख)   लोक के राम

 लोक के राम : राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इन्हें श्रीराम, श्रीरामचन्द्र, रघुनन्दन, राजाराम जैसे सहस्त्रों नामों से जाना जाता है। रामायण में वर्णन के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजा, चक्रवर्ती सम्राट दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ (पुत्र प्राप्ति यज्ञ) कराया, जिसके फलस्वरूप चार पुत्रों का जन्म हुआ। श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में ‘चैत्रेनावमिकेतिथौ।। नक्षत्रेऽदिति दैवत्येस्वोच्चसंस्थेषुपञ्चसु। ग्रहेषु ककर्टेलग्नेवाहस्पताविन्दुनासह।।’

 अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र में, पांच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर राम का जन्म देवी कौशल्या के गर्भ से अयोध्या में हुआ था। श्रीराम जी चारों भाइयों में सबसे बड़े थे। हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम जयंती या रामनवमी का पर्व मनाया जाता है।

   श्रीराम ने मर्यादा-पालन और लोक कल्याण के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, कुटुम्ब का भी परित्याग किया। राम रघुकुल में जन्में थे, जिसकी परंपरा ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाई पर बचन न जाई।‘ की थी।  माता-पिता के वचन की रक्षा के लिए राम ने खुशी से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। पत्नी सीता ने आदर्श पत्नी का उदाहरण देते हुए, पति के साथ वन जाना उचित समझा। लक्ष्मण ने भी आदर्श भ्राता के रूप में राम के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए। भरत ने न्याय के लिए माता का आदेश ठुकराया और बड़े भाई राम के पास वन जाकर उनकी चरण पादुकाएँ ले आए, जिन्हें ही राज गद्दी पर रखकर राजकाज किया। 

वनवासी अवधि में ही पत्नी सीता को रावण हरण कर ले गया। जंगल में राम को सुग्रीव जैसा मित्र और भक्त मिला, जिसने राम के सारे कार्य पूरे कराये। राम  की विशेषता रही है कि उनके सम्पर्क में आनेवाले छोटे से छोटे व्यक्ति का सहयोग लिया। भारतीय वैज्ञानिकता का उपयोग करते हुए राम समुद्र में पुल बना कर लंका पहुँचे और रावण का बध कर सीता को वापस ले कर अयोध्या आये। 

राम के अयोध्या लौटने पर भरत ने आदर्श का पालन करते हुए राज्य राम को सौंप दिया। राम न्याय प्रिय थे। उन्होंने शासन का एक ऐसा आदर्श सुराज स्थपित किया जिसे लोग आज भी ‘रामराज्य’ की उपमा देते हैं।

 भारतीय परंपरा के कई त्योहार, जैसे-दशहरा, रामनवमी और दीपावली राम कीवन-कथा से जुड़े हुए हैं तथा जीवन संघर्ष हेतु प्रेरणा देते हैं।


 राम की व्याप्ति  (क) में आई टिप्पणियों में एक टिप्पणी थी की कबीर के राम अलग थे ! इस सम्बन्ध में मेरा कहना है की राम की व्यापकता से संसार का कोई भक्त , संत, मुनि, ऋषि , साधक , आस्तिक , नास्तिक अछूता नहीं था तो कबीर राम की व्यापकता से कैसे दूर रह सकते हैं।

 मेरा यह भी मानना है की पहले तो राम को धाराओं में बांटा गया फिर उसमे कुछ भक्त कवियों को बिठाया गया जो आज भी चल रहा है ! 

इसे ठीक से समझना होगा । विद्यार्थिओं को समझाने के लिए रामचंद्र शुक्ल जी कुछ सूत्र रूप में विषय तैयार करते थे और उसी सूत्र की देन हैं, कबीर निर्गुनिया संत हो गए । 

इसके पीछे के भी कारण थे कि कबीर को जुलाहा से ऊपर उठाकर संत नहीं बनाया गया,  क्योकि कबीर यदि जुलाहा है तो वे सगुन रूप को कैसे मान सकते हैं और आलोचकों ने अपने बनाए सांचे में कबीर को ढाल दिया ।

 दूसरा तर्क है कि कबीर कहते हैं -दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना,राम नाम का मरम है आना। 

अब इसके शब्दार्थ  में नहीं सन्दर्भ में जाइये । राम नाम का मर्म क्या है ? कबीर के इस कथन को कभी उजागर नहीं किया गया क्यों ? 


वस्तुतः कबीर अपने को जीव और राम को ब्रह्मस्वरूप बता रहे हैं क्यों ?


 क्योंकि उनका मानना है कि अहंकार और भगवत प्रेम दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते। कबीर के इस कथन को भी याद करलें -‘हरि मेरा पिव मैं हरि की बहुरिया।’ 

और इतना ही नहीं गुरु नानक भी कहते हैं- ‘एक राम दशरथ का बेटा-एक राम घट घट में बैठा’ और रैदास कहते हैं-‘मन्दिर मस्जिद एक है, इन मंह अंतर नाहिं।'

 रैदास को समझें - 'राम रहमान का, झगड़ऊ कोऊ नाहिं।’ 

तात्पर्य यह कि भारतीय संतों ने कभी भी राम को निर्गुण सगुन के घेरे में नहीं बांधा ।  रविदास से इसकों समझा जा सकता है ।

दूसरी टिप्पणी थी की राम बाल्मीक के पहले भी थे तो यह क्यों लिखा गया की बाल्मीक से राम कथा या राम का आदि काव्य बाल्मीकी है ?

 प्रश्न अनुचित नहीं है किन्तु यह विचार करिए क्या वेदव्यास के पहले वेद (ज्ञान) नहीं थे । अनेक ऋषियों की अनुभूतियों को संग्रहीत कर चार वेद और मनचाहे वेद की शाखाएं बनी हैं ।

 इसे तुलसी से भी समझना होगा कि -

 ‘रचि महेस निज मानस राखा।पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥

 तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥’ 

फिर यदि आप बाल्मीक नारद संवाद पढ़े तो शायद यह भ्रम दूर हो जाएगा ? 

तुलसी को फिर बड़े अर्थ में समझें -

हरि अनंत हरि कथा अनंता।

 कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥

रामचंद्र के चरित सुहाए । 

कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥

तर्क ,कुतर्क आलोचक नुमा कुछ विशिष्ट जनों का काम हैं । अपने राम तो चराचर जीवों के राम हैं, इतना ही नहीं तो पत्थर के अन्दर बसे राम को राम ने उजागर कर संसार के सामने हृदयहीन मस्तिष्क को प्रेरणा दी है।

 अंत में - 

‘राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। 

मत हमार अस सुनहि सयानी॥

तदपि संत मुनि बेद पुराना। 

जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥

(क्रमशः)