Sunday, 14 January 2024

लोक के राम

 

                                                                       लोक के राम :   श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद में कहा गया है कि जब ॐश्रीहरि दशरथ जी के यहाँ अवतीर्ण हुए, उस समय उनका नाम ‘राम’ हुआ। विद्वानों ने लोक में ‘राम’ शब्द के अर्थ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-‘ जो महीतलपर स्थित होकर भक्तजनों का सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करते और राजा के रूप में सुशोभित होते हैं, ओ राम हैं।’ (राति राजते वा महीस्थित: सन इतिराम:) इस विग्रह के अनुसार ‘राति’ या ‘राजते’ का प्रथम अक्षर ‘रा’ और ‘महीस्थित:’ का आदि अक्षर ‘म’ लेकर ‘राम’ बनाता है।  

              इसी तरह ‘राम’ नाम को लेकर लोक में अनेक सन्दर्भ हैं । राम भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे अभिराम होने से राम हैं। राक्षस जिनके द्वारा मरण को प्राप्त होते है, वे राम हैं । जैसे राहू मनसिज (चन्द्रमा ) को हतप्रभ कर देता है, उसी प्रकार जो राक्षसों को मनुष्य रूप में रहकर प्रभाहीन (निष्प्रभ) कर देते है, वे राम हैं । अथवा जो महीपालों को अपने आदर्श चरित्र के द्वारा धर्ममार्ग का उपदेश देते हैं वे राम हैं ।  जो नामोच्चारण करने पर ज्ञानमार्ग की प्राप्ति कराते हैं, ध्यान करने पर वैराग्य देते हैं और अपने विग्रह की पूजा करने पर ऐश्र्वर्य देते है, इसलिए वे लोक में (भूतल पर) राम हैं । इन सब विशेषताओं/ गुणों को समाटे जो लोक में ही नहीं ज्ञानी और विज्ञानियों के लिए भी अनंत, नित्यानन्दस्वरुप, चिन्मय ब्रह्म हैं और योगीजन जिनमें रमण करते हैं, वे परब्रह्म परमात्मा ही ‘राम’ हैं ।

              शास्त्रीय व्याख्या में रम्धातु में घञ्प्रत्यय के योग से ‘रामशब्द निष्पन्न होता है। रम्धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से संबद्ध है। वे प्राणिमात्र के हृदय में रमण’ (निवास) करते हैं, इसलिए रामहैं, तथा भक्तजन उनमें रमणकरते (ध्यान निष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे रामहैं - रमते कणे कणे इतिराम:। आद्य शंकराचार्य ने पद्मपुराणका उदाहरण देते हुए कहा है कि नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे रामहैं। राम को राष्ट्र का प्रतीक मानते हुए संतों की परंपरा में राअर्थात् राष्ट्र और अर्थात् मंगल। यानी राम राष्ट्र के मंगल (कल्याण) के प्रतीक हैं।

               श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में चैत्रेनावमिकेतिथौ।। नक्षत्रेऽदिति दैवत्येस्वोच्चसंस्थेषुपञ्चसु। ग्रहेषु कर्कटेलग्नेवाहस्पता विन्दुनासह।।अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र में, पांच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर रामजी का जन्म देवी कौशल्या के गर्भ से अयोध्या में हुआ था। श्रीराम जी चारों भाइयों में सबसे बड़े थे। हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम जयंती या रामनवमी का पर्व मनाया जाता है।

              भारत में श्रीराम भारतीय संस्कृति के शिखर पुरुष और आदर्श हैं। विश्व के अनेक देशों जैसे-थाईलैंड, इंडोनेसिया, मॉरीशस आदि में भी श्रीराम पूर्वज रूप में मान्य हैं। इन्हें पुरुषोत्तम शब्द से भी अलंकृत किया जाता है। श्रीराम ने मर्यादा-पालन और लोक कल्याण के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, कुटुम्ब का भी परित्याग किया। राम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परंपरा रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाई पर बचन न जाई।की थी। राम के पिता दशरथ ने राम की सौतेली माता कैकेयी को दो वचन (वरदान) दिये थे। कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज सिंहासन और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा। पिता के वचन की रक्षा के लिए राम ने खुशी से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। पत्नी सीता ने आदर्श पत्नी का उदाहरण देते हुए, पति के साथ वन जाना उचित समझा। लक्ष्मण ने भी आदर्श भ्राता के रूप में राम के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए। भरत ने न्याय के लिए माता का आदेश ठुकराया और बड़े भाई राम के पास वन जाकर उनकी चरण पादुकाएँ ले आए, जिन्हें ही राज गद्दी पर रखकर राजकाज किया। वनवासी अवधि में ही पत्नी सीता को रावण हरण करले गया। जंगल में राम को सुग्रीव जैसा मित्र और भक्त मिला, जिसने राम के सारे कार्य पूरे कराये। राम  की विशेषता रही है कि उनके संपर्क में आनेवाले छोटे से छोटे व्यक्ति का सहयोग लिया। भारतीय वैज्ञानिकता का उपयोग करते हुए राम समुद्र में पुल बना कर लंका पहुँचे, और रावण का बध कर सीता जी को वापस ले कर अयोध्या आये। राम के अयोध्या लौटने पर भरत ने आदर्श का पालन करते हुए राज्य राम को ही सौंप दिया। राम न्याय प्रिय थे। उन्होंने शासन का एक ऐसा आदर्श सुराज स्थपित किया जिसे लोग आज भी रामराज्यकी उपमा देते हैं। भारतीय परंपरा के कई त्योहार, जैसे-दशहरा, रामनवमी  और दीपावली राम की वन-कथा से जुड़े हुए हैं तथा जीवन संघर्ष हेतु प्रेरणा देते हैं। राम शब्द का मनन (निश्चय) और त्रारण(रक्षा) करने के कारण वह मन्त्र बन गया है।

               लोक में राम का एक दरवार है जो इस प्रकार मिलता है- कौसल्यानन्दन श्रीराम अपनी प्रकृति-ह्लादिनीशक्ति श्रीसीताजी के साथ विराजमान हैं । उनका वर्ण श्याम है। वे पीताम्बर धारण किये हुए हैं। उनके सिरपर जटाभार सुशोभित है। उनके दो भुजाएँ हैं। कानों में कुण्डल शोभा पा रहे हैं। गले में रत्नों की माला चमक रही है। वे स्वभावतः धीर (निर्भय एवं गम्भीर) हैं। धनुष धारण किये हुए हैं। उनके मुखपर सदा प्रसन्नता छायी रहती है। वे संग्राम में सदा ही विजयी होते हैं। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्यशक्तियाँ उनकी शोभा बढ़ाती हैं। इस जगत की कारणभूता मूल प्रकृतिरूपा परमेश्वरी सीता उनके वाम अंग को विभूषित कर रही हैं। सीताजी के श्रीअंगों की कान्ति सुवर्ण के सदृश गौर है। उनके भी दो भुजाएँ हैं। वे समस्त दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं तथा हाथ में कमल धारण किये हुए हैं। उन चिदानन्दमयी सीता से सटकर बैठे हुए भगवान् श्रीराम बड़े हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं । दक्षिण भाग में श्रीरघुनाथ जी के छोटे भाई सुवर्ण-गौर कान्तिवाले श्रीलक्ष्मण जी हाथ में धनुष-बाण लिये खड़े हैं।  



Saturday, 13 January 2024

राम की व्याप्ति और विस्तार

राम की व्याप्ति और विस्तार: राम के परिचय का आधार ‘रामकथा’ हमारी स्मृति का अनिवार्य हिस्सा है। भारतीय संस्कृति और जन-मन की आन्तरिक संरचना के ताने-बाने को रचने में ‘रामकथा’ की भूमिका सर्वाधिक है। मानवीय चेतना के उदात्त-मूल्यों का सृजन ‘रामकथा’ के मूल में है।

 बाज़ारवादी और उपभोक्तावादी अमानवीय मूल्यों के वर्तमान दौर में शाश्वत मानवीय मूल्यों की भारतीय छवि को इस कथा ने निरूपित किया है। इसी रूप में इस कथा की कालजयता भी सिद्ध होती है। ‘रामकथा’ में निबद्ध संवेदना ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ के समानान्तर भारतीयता के मूल स्वत्वों का विस्तार करती है। समय के बदलावों में इस कथा की शक्ति कभी क्षीण नहीं हुई। ‘राम’ की कथा-संस्कृति की यह व्यापकता ही है कि इतिहास के परिवर्तन के साथ इस कथा का विस्तार होता चला गया। ‘राम’ ने अपने जीवन से लोक की संवेदना को समृद्ध किया तो लोक ने ‘रामकथा’ को युगानुरूप विकसित भी किया। राम से अधिक राम के नाम की महिमा है। तुलसीदास कहते हैं, ‘राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।’

 राम को जानने का मूल आधार वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ संस्कृत भाषा की अनुपम कृति है। यह राम का परिचय कराने वाली आदि रचना है। आदि कवि वाल्मिकि के ‘रामायण’ के बाद ही साहित्य और समाज में राम का परिचय आया। संस्कृत के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में इस रामायण को स्रोत रूप में ग्रहण किया गया। काव्य, नाटक, कथा और अन्य साहित्यिक विधाओं में ‘रामायण’ को आधार बनाकर विपुल साहित्य का सृजन हुआ।

 राम के जीवन पर शोध करने वाले कामिल बुल्के अपने शोध ग्रन्थ ‘रामकथा’ में लिखते हैं, ‘रामकथा अनेक रूपधारण करते हुए शनै:-शनै: संपूर्ण भारतीय-संस्कृति में व्याप्त हो गयी है। उसकी अद्वितीय लोक प्रियता निरन्तर अक्षुण्ण ही नहीं वरन् शतादियों तक झलक मिलती है। इन कृतियों में ‘भुशुण्डिरामायण’, ‘योगवसिष्ठ’, ‘अध्यात्मरामायण’, ‘अद्भुत्रामायण’, ‘आनन्द -रामायण’, प्रमुख हैं।’

 वेदोत्तर काल में रामायण, उपनिषद् और बौद्ध, जैन साहित्य में भी रामकथा व्याप्त है। भारतीय दृष्टि से बौद्ध परम्परा में श्रीराम से संबंधित दशरथजातक, अनामकजातक तथा दशरथकथानक नामक तीन जातक कथाएँ उपलब्ध हैं। जैनसाहित्य में रामकथा सम्बन्धी कई ग्रंथ लिखे गये, जिनमें मुख्य हैं- विमलसूरिकृत ‘पउमचरियं’ (प्राकृत), आचार्य रविशेणकृत ‘पद्मपुराण’ (संस्कृत), स्वयंभू कृत ‘पउमचरिउ’ (अपभ्रंश), रामचंद्र चरित्रपुराण तथा गुणभद्र कृत उत्तरपुराण (संस्कृत)। परमार भोज ने भी ‘चंपुरामायण’ की रचना की थी।
 कालान्तर में पुराणों में राम के जीवन वृत्त में अवतारवाद को विशेष महत्त्व मिला। पुराणों में राम को विष्णु का अवतार माना गया। ‘राम’ का जीवन हमारे संवेगों को अधिक प्रभावित करता हैं। कुबेरनाथराय ‘रामायणमहातीर्थम्’ नामक पुस्तक में लिखते हैं, ‘श्रीराम भारतीय परंपरा में सर्वाधिक व्यापक और संकल्प-संवेग-संपन्न नायक हैं। भारतीय परंपरा पूरे एक समाज के सामने आती है और वह समाज भारत के आज के मानचित्र से ज्यादा व्यापक  है। वे लिखते हैं - “वह वंक्षुधारा से लेकर पूर्वीद्वीप समूह तक के संपूर्ण मनोमय भारत से है। यानी ‘सेरेहिन्दी’, ‘लघुहिन्दी’, ‘हिन्दखास’ एवं ‘हिन्देशिया’ के साथ-साथ महाचीन-तिब्बत तक। इस समूचे विशाल भूखण्ड में कुरतन (खोतान) से ले कर कम्पूचिया तक राम कथा के भिन्न-भिन्न संस्करण पाये जाते हैं। 


इस प्रकार इस बहुरूपी विस्तार से इसकी आन्तरिक ऋद्धि तो समृद्धतर हुई ही है, यह तथ्य इस बात का भी संकेत देता है कि राम का वास्तविक इतिहास है।’’

 तात्पर्य यह कि भारतीय भाषाओं में राम का विचार करते ही सबसे पहले ध्यान में आता है कि राम के चरित के विभिन्न आयामों का कवियों ने जिस आधार पर वर्णन किया, उसे रामायण या रामोपाख्यान कहा गया। आज की स्थिति में रामाकथा पर आधारित ग्रंथ तीन सौ से लेकर तीन हजार तक की संख्या में विविध रूपों में मिलते हैं। श्रीराम का चरित वाल्मीकीय रामायण के बाद व्यास रचित महाभारत में भी ‘रामोपाख्यान’ के रूप में आरण्यक पर्व (वनपर्व) में प्राप्त होता है। इसकेअतिरिक्त ‘द्रोणपर्व’तथा‘शांतिपर्व’ में भी राम के सन्दर्भ उपलब्ध हैं।

 राम के वृत्त ग्रंथ संस्कृत और हिन्दीतर भारतीय भाषाओं में जैसे- मराठी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु तथा उडिय़ा, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, असमिया, उर्दू, आदि में मिलते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ में न केवल उत्तर भारत में विशेष स्थान पाया है, बल्कि इस ग्रंथ ने विश्व के कोने-कोने में श्रीराम के चरित को पहुँचाया है। भगवान भोलनाथ आदिदेव महादेव से प्रारंभ होकर यह राम का चरित, महर्षि नारद, लोमश, यज्ञवल्क्य, कागभुशुण्डि, महाकवि कालिदास, भट्ट, प्रवरसेन, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, समर्थ रामदास, संत तुकड़ोजी महाराज, केशवदास, सूरदास, स्वामी करपात्री, मैथिलीशरण गुप्त, आदि ऋषियों-मुनियों, संतों, आचार्यों और कवियों ने अलग-अलग भाषाओं में राम को जन-जन तक पहुँचाया है। अकबर की अनुमति से अब्दुल रहीम खानखाना के लिए रामायण की एक प्रति तैयार की गई। शाहजहाँ के पुत्र दारा शिकोह ने भी रामायण का फारसी में स्वयं अनुवाद किया था।

 विदेशों में भी तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तान की खोतानी रामायण, इंडोनेशिया की कबिन रामायण, जावा का सेरतराम,सैरीराम,पातानी रामकथा, इण्डो चायना की रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैर रामायण, बर्मा (म्यांम्मार) की यूतोकी रामयान, थाईलैंड की रामकियेन आदि रामचरित्र का व्यापक बखान करती है। इसके अलावा विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति डायोनीशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता है। विश्व साहित्य में इतने विशाल एवं विस्तृत रूप से विभिन्न देशों में विभिन्न कवियों / लेखकों द्वारा राम के अतिरिक्त किसी और चरित्र का इतनी श्रद्धा से वर्णन नही किया गया। तात्पर्य यह कि श्रीराम का प्रभाव भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में व्याप्त है।(क्रमशः)

Saturday, 6 January 2024

KUNDALINI JAGARAN

  

''विद्यया देवलो•ा: अर्थात विद्या से देवलो•  मिलता है।- बृउ.1.5.16

''विद्यया तदारोहन्तिÓ अर्थात विद्या ऊपर उठाती है। बृउ.1.5.

'•र्मणा पितृलो•ाÓ अर्थात •र्म से पितृलो• मिलता है।- ईष.9


•ुण्डलनी जागरण यानी तेजोऽस्मि

श्वेताश्वतरोपानिषद •हता है- ''यदाऽऽत्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दोपोपमेनेह युक्त: प्रपष्यते।

अजं धु्रवं सर्वतत्वैविशुद्वं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाषै:।।

ईश्वर •ैसे मिलेगा- ''नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेनÓÓ (मुण्ड•ो.)

अथ योगानुशासनम् -परम्परागत योगविषय• शास्त्र •ी चर्चा •रते हैं।

योगश्चित्तिवृत्तिनिरोध:- चित्त •ी वृत्तियों •ा निरोध योग है। अर्थात चित्त •ी वृत्तियों •ा सर्वथा रु• जाना योग है। यह स्थिति •ब आती है ? ''तदा द्रष्टु:स्वरूपेऽवस्थानम।ÓÓ जब चित्त •ी वृत्तियों •ा पूर्ण निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है; अर्थात •ेवल्य अवस्था •ो प्राप्त हो जाता है। चित्त वृत्तियाँ-

वैसे तो चित्त वृत्तियाँ असंख्य हैं •िन्तु मोटे तोर पर उन्हें पाँच प्र•ार से बाँटा जा स•ता है। 

चित्त वृत्तियाँ पाँच हैं- 

''प्रमाणविपर्ययवि•ल्पनिद्रास्मृतय:ÓÓ (1) प्रमाण (2) विपर्यय (3) वि•ल्प, (4)निद्रा- स्वप्न (5) स्मृति। यह सभी वृत्तियाँ दो प्र•ार •ी होती हैं- ''वृत्तय:पंचतय: क्लिष्टाक्लिष्टा ÓÓ। क्लिष्ट अर्थात अविद्या आदि क्लेषों •ो पुष्ट •रने वाली और योगसाधना में विघ्नरूप होती हैं। अक्लिष्ट-क्लेशों •ो क्षय •रने वाली और योगसाधन में सहाय• होती हैं। 

विपर्यय-'विपर्ययोंमिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठमÓ।। 

'तत:क्लेष•र्मनिवृतिÓ। 

वि•ल्प- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो वि•ल्पÓ। अर्थात जैसे •ोई मनुष्य भगवान •े  रूप •ा ध्यान •रता है पर जिस रूप •ा ध्यान •रता है उसे न तो उसने देखा है, न वेद-शास्त्र सम्मत है, और न ही वह भगवान •ा वास्तवि• स्वरुप है •ेवल •ल्पना मात्र है वि•ल्प है। 

 निद्रा- 'अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्राÓ- ज्ञान •े अभाव •ा ज्ञान जिस चित्तवृति •े आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है।ÓÓ निद्रा भी चित्त •ी वृत्तिविशेष है। •ई दर्शन•ार निद्रा •ो वृत्ति नही मानते, इसे सुषुप्ति अन्तर्गत मानते हैं। गीता में आया है- 

युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य •र्मसु। 

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।


स्मृति- अनुभूतिविषयासम्प्रमोष: स्मृति:- 

चितवृत्तियों •ा निरोध- योगी •हता है 'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:Ó। 

गीता •हती है- 'अभ्यासेन तु •ौन्तेय वैराग्येण च गृहयतेÓ (6.35)। चित्तवृत्तियों •े निरोध •े दो प्र•ार हैं-अभ्यास और वैराग्य। 

अभ्यास क्या है-'तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासÓ अर्थात जो स्वभाव से चंचल है 

गीता •हती है- 'स निश्चयेन  योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसाÓ। योग •ा अभ्यास बिना उ•ताये बिना समय सीमा •े निश्चित •िये निष्ठापूर्व• •रते रहना है।  

वैराग्य क्या है-

'दृष्टानुश्रवि•विषयवितृष्णस्य वशी•ारसंज्ञा वैराग्यमÓ। यहाँ दो शब्द हैं, दृष्टा और अनुश्रवि• । विषयों में सर्वथा तृष्णारहित चित •ी जो वशी•ार नाम• अवस्था है, वह वैराग्य (तत्परमं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम) है।  

 (यदाहिनेन्द्रियार्थेषु न •र्मस्वनुषज्जते, सर्वसं•ल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते) 

 

 सिद्धि क्या है -  ''श्रद्वावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्व•:Ó। श्रद्वा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्व•, (•्रम) से सिद्धि प्राप्त होती है।Ó

'श्रद्वावान लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिभचिरेणधिगच्छतिÓ।। (4/39,गीता)

सिद्धि प्राप्त •रने हेतु योगी •ो अभ्यास और वैराग्य में तीव्रता लानी होती है।  

ईश्वर •ौन है -

'क्लेश•र्मविपा•ाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:Ó। क्लेश, •र्म, विपा• और आशय से जो (अपरामृष्ठ) है, असम्बद्व है, वह ईश्वर है। ईश्वर ज्ञान वैर यश, ऐश्वर्य •ी परा•ाष्ठा है। क्या ईश्वर इस •ारण से मिलता है ? 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।Ó(मुण्ड.) ईश्वर स्वयं अनादि है क्यों•ि वह सब •े आदि है (योग,10-2-3) वह •ालातीत है। उस•ा वाच• 'प्रणवÓ है। 'तस्य वाच•: प्रणव:Ó (प्रणव ऊँ•ार है) (प्रश्नोपनिषद में पाँचवे प्रश्नोत्तर में और माण्डूक्योपनिषद में ऊँ•ार •ी उपासना •ा विषय विस्तार से है) ऊँ, परमेश्वर •ा वेदोक्त नाम है (गीता-17-23, •ठो.1/2/15-17) साध• •ो ईश्वर •े नाम •ा जप और उस•े स्वरूप •ा स्मरण चिन्तन •रना चाहिए। महर्षि शाण्डिल्य ने •हा है- ''सा परानुरक्त्रिीश्वरेÓÓ। देवर्षि नारद ने भक्तिसूत्र में •हा है- 'सात्वस्मिन परमप्रेमरूपा चÓ। अर्थात उस परमेश्वर में अतिशय प्रेमरूपता ही भक्ति है। यह अमृत स्वरूपा है-'अमृतस्वरूपा चÓ। ईश्वर •ी भक्ति में आयु, रूप आदि •ा •ोई अर्थ नही होता है-

''व्याधस्याचरणं धुवस्य च वयो विद्या गजेन्दस्य •ा 

 •ा जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुप्रस्य •िं पौरषम्।

•ुव्जाया: •ामनीरूपमधि•ं •िं तत्सुदाम्नो धनं

भक्त्या तुश्यति •ेवलं न च गुणैर्भक्ति प्रियो माधव:।।

श्रीमद्भागवत में प्रहलाद ने •हा है-

'श्रवणं •ीर्तनं विष्णों: स्मरणं् पादसेवनम।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनमÓ।।(7/5/23)

 ऋतम्भरा बुद्वि •े प्र•ट होने पर साध• •ो प्र•ृति •े यथार्थ रूप •ा भान हो जाता है तब उसे वैराग्य होता है।

''तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीज: समाधि:।ÓÓ

 क्लेश क्या है- 'अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेषा: क्लेषा:ÓÓ। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश •हलाते हैं। 

अविद्या जिन•ा •ारण हैं- ''अविद्या क्षेत्रमुत्तरेशां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोद्वाराणामÓ।

 

अविद्या क्या है- ''अनित्याशुचिदु:खानात्मसु नित्यशुचि सुखात्मख्यातिरविद्याÓ। अनित्य, अपवित्र, दु:ख और अनात्मा में नित्य, पवित्र, सुख और आत्मा •ा आत्मभाव •ी अनुभूति 'अविद्याÓ है।

अस्मिता क्या है- ''दृगदर्शन शक्त्योरे•ात्मतेवास्मिताÓÓ। अविद्या •े नाश होने से 'अस्मिताÓ •ा नाश होता  है।  

राग क्या है- 'सुखानुशयी राग:Ó। सुख •ी प्रतीत •े पीछे रहने वाला क्लेष 'रागÓ है।

द्वेष क्या है- 'दु:खानुशयी द्वेषÓ। दु:ख •ी प्रतीत •े पीछे रहने वाला क्लेश 'द्वेषÓ है।

  क्लेशों •ी स्थूल वृत्तियों •ो 'ध्यानहेयास्तदृवत्तय:Ó द्वारा सूक्ष्म बना  दिया जाता है।

दु:ख •े रूप- परिणाम दु:ख, ताप दु:ख, संस्•ार दु:ख, गुणवृत्ति विरोध सब में विद्यमान रहते हैं।

  अष्टांग योग

'यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।Ó

इनमें पाँच वहिरंग हैं जो इस प्र•ार हैं-

(1)  यम 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:Ó

(•) अहिंसा -   अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:।  

(ख) सत्य- सत्यप्रतिष्ठायां •्रियाफलाश्रयत्वमÓ।  

(ग) अस्तेय- 'अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानमÓÓ।  

(घ) ब्रह््मचर्य- 'ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यालाभ:Ó।  

मन, वाणी और शरीर से होनवाले सब प्र•ार •े मैथुनों •ी सब अवस्थाओं में सदा त्याग •र•े सब प्र•ार से वीर्य •ी रक्षा •रना 'ब्रह्मचर्यÓ हैं ।     ''•र्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा।

          सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षतेÓÓ।। (गरुण.पूर्व.आचार 238.6) 

 

(ड) अपरिग्रह- अपरिग्रहस्थैर्ये जन्म•थन्तासंबोध:।  

(2) नियम- ''शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा:ÓÓ।

  'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।Ó (मुण्ड.)

भारतीय दर्शन में परम ब्रह्म अक्षर है - अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभवोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भव•रो विसर्ग: •र्मसंज्ञित:। (8,3) 

 गीता •हती है- 

सहस्त्रयुगपर्यन्तमहृर्यद ब्रह्मणो बिन्दु:। 

रात्रिं युगसहस्त्रन्तां तेऽहोरात्रविदो जना:।

अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा प्रभवन्त्यहरागमे।

रान्न्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञ•े।।

भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रान्न्यागमेऽवश: पार्थ  प्रभवन्त्यहरागमे।।

परस्तस्मातु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:। 

य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।

अव्यक्तोऽक्षर  इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्वाम परमं मम।।

(अर्थात)

 

ऊँॅ विष्णुर्विष्णुविष्णु:। ऊँ नम: परमात्मने श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य  श्रीब्रह््मणों द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेतवाराह•ल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमें •लियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते आर्यावर्तान्तर्गत  ब्रह्मावर्तै•देशे बौद्धावतारे अमु•नाम संवत्सरे  अमु•ायने (उत्तरायणे/दक्षिणायने) महामांगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमें  अमु• मासे अमु•पक्षे (शुक्लपक्षे/•ृष्णपक्षे) अमु• तिथौ अमु• वासरान्वितायां अमु• नक्षत्रै अमु• राषिस्थिते सूर्ये  अमु•राषिस्थिते चन्द्रे अमु•राषिस्थिते  भौमें अमु•राषिस्थिते बुधे अमु•राषिस्थिते गुरौ अमु•राषिस्थिते शु•्रे अमु•राषिस्थिते शनौ सत्सु शुुभे योगे शुभ•रणे एवं गुणविशेष विशिष्टायां शुुभ पुण्यतिथौ स•लशास्त्रश्रुतिस्मृतपुराणोक्त फलप्राप्ति•ाम: अमुे•ोऽहं ममात्मन: सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रह•ृतिराज•ृतसर्वाविधपीड़ानिवृतिपूर्व•ं नैरुज्यदीर्घायु: पुष्टिधनधान्यसृद्व्यर्थं सर्वापन्निवृति सर्वाभीष्टफलावाप्ति धर्मार्थ•ाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थ द्वारा अमु• (राष्ट्र) देवताप्रीत्यर्थं पूजनपूर्व•ं सं•ल्पं (अमु• •र्मं) •रिष्ये।

 परमसत्ता •ी अवधारणा वेद •े साथ चलती हैं। नासदीय सूक्त में अध्याय दस में श्लो• आता है -

नासदासीन्नोसदासीतदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत।

•िमावरीव: •ुह •स्य शर्मन्नम्भ: •िमासीद  गहनं गभीरम।।

 यथा-

•ो, अद्वा वेद • इह प्रवोचत् •ुत आजाता •ुत इयं विसृष्टि:।

अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेनाथ •ो वेद यत आवभूव।। (1,128,6)

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।

यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद  यदि वा न वेद।। 

मुण्ड•ोपनिषद में •हा है- 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेनÓ अर्थात आत्मज्ञान •ेवल तीव्र इच्छा शक्ति से ही प्राप्त •िया जा स•ता है।   यथा-

'मंत्र मूलं गुरुर्वाक्यं, पूजा मूलं गुरु:पदम्। ध्यान मूलं गुरु:मूर्ति, मोक्ष मूलं गुरु: •ृपा।।Ó

 सत चेतना हेतु पातंजलि योग दर्शन में •हा है- 

''सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं चÓÓ (3-49)

•ठोपनिषद में •हा है- 'उतिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्निवोधतÓ। क्षुरस्य धारा निशिता  दुरत्या। दुर्गं पंथस्य•वयो वदन्ति।

  गीता में श्री•ृष्ण •हते हैं- 'सर्वधर्म परितज्यान मामे•म शरणं ब्रजÓ। अहं त्वाम सर्वपापेभ्यो मा शुच:। मैत्रेयोपनिषद में •हा गया है •ि साध• छ: माह में आत्मसाक्षात•ार •र स•ता है। 

 ऐतरेयोपनिषद में •हा है- 'स येतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दम।।

इस•े अनुसार गर्भस्थ रूप में जीवात्मा सातवें महीने •पाल •े बीच तालु से प्रवेश •रती है, पहले यह •ोमल होता है बाद में •ठोर हो जाता है।  

सुबालोपनिषद में •हा गया है- 'स्थानानि, स्थानिभ्यों यच्छति नाड़ी तेषां निबन्धनमÓÓ ।

 उसे यह बोध हो जाता है •ि- 'मैं यह शरीर नही, बल्•ि यह शरीर मेरा हैÓ गीता में •हा गया है- 'देहोस्मिनाहं मम् देह इति स्मरÓ। 

भगवान •ृष्ण •हते हैं- ''•ायेन मनसा बुद्धया •ेवलैरिन्द्रियैरति। योगिन: •र्म •ुर्वन्ति संगंत्यक्त्वात्मशुुद्वये। अर्थात आत्मज्ञानी •भी अपने •र्मों •ा निर्वाह •म नही •रता।  


Wednesday, 15 November 2023

केनोपनिषद

 

 केनोपनिषद 

इसमें 'केन' (किसके द्वारा) का विवेचन होने से इसे 'केनोपनिषद' कहा गया है । इसके चार खण्ड हैं। प्रथम और द्वितीय खण्ड में गुरु-शिष्य की संवाद-परम्परा द्वारा उस (केन) प्रेरक सत्ता की विशेषताओं, उसकी गूढ़ अनुभूतियों आदि पर प्रकाश डाला गया है।  तीसरे और चौथे खण्ड में देवताओं में अभिमान तथा उसके मान-मर्दन के लिए 'यज्ञ-रूप' में ब्राह्मी-चेतना के प्रकट होने का उपाख्यान है। अन्त में उमा देवी द्वारा प्रकट होकर देवों के लिए 'ब्रह्मतत्त्व' का उल्लेख किया गया है तथा ब्रह्म की उपासना का ढंग समझाया गया है। मनुष्य को 'श्रेय' मार्ग की ओर प्रेरित करना, इस उपनिषद का लक्ष्य हैं।

 ऊँ •ेनेषितं पतति प्रेषितं मन: •ेन प्राण: प्रथम: पै्रति युक्त:।

•ेनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षु: श्रोत्रं • उ देवो युनक्ति। (•ेन./1/1)

  इसे ही उपनिषदों ने •हा है - 

                         ऊँ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

             पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।।

 तब ए• दिन मुण्ड•ोपनिषद •ा ऋषि फट•ारता हुआ •हता है-

                               परीक्ष्य लो•ान् •र्मचितान् ब्राह्मणो

                        निर्वेदमायात् नास्ति अ•ृत: •ृतेन।

                        तद्धिज्ञानार्थंं स गुरुमेवाभिगच्छेत

 इस तरह से जीवन •े सत्य •ो जानने •ी इच्छा ने शाश्वत, अविनाशी, असीम •ी खोज प्रारंभ •ी और ए• दिन उन्होंने सत्य •ो जाना-

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन

देवात्मशक्तिं स्वगुणैनिगूढ़ाम।। (श्वे.1/13)

-ध्यानयोग •ो विषय बना•र मन •ी खोज प्रारंभ •ी। अपने गुणों में निहित ब्रह्म •ो देखा। और गदगद •ंठ से पु•ार उठे-

 श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा

        आ ये धामानि दिव्यानि तस्यु:।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम

       आदित्यवर्णं तमस: परस्तात।

तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति

      नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।। (श्वेता.2/5,3/8)

-अहो विश्व •े निवासियो! अमृत पुत्रो! सुनो। दिव्य लो•ों में रहने वाले देवताओं, तुम लोग भी सुनो। मैंने सूर्य •े समान चम•ीले उस महान् पुरुष •ो जान लिया है, जो समस्त अज्ञान-अन्ध•ार से परे है। •ेवल उसी •ो जान•र मृत्यु •ी विभीषि•ा •ो पार •िया जा स•ता है। इससे भिन्न दूसरा रास्ता नहीं है।

  स्वर्ग प्राप्त •ी •ामना से यज्ञ •रना उचित नही-

      प्लवा हि एते अदृढा यज्ञरूपा

          अष्टादशेक्त्म् अवरं येशु •र्म।

     एतत् श्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढ़

           जरामृत्युं ते पुनरेवाति यन्ति।।   (मुण्ड.1/2/5)

ऋषि •हता है, 'अरे मूर्खों ! यदि तुमने यज्ञ •ो भव सागर पार •रने •ी नौ•ा माना है तो बड़ी भूल •ी है। यह यज्ञ रूपी नौ•ा तुम्हारी जीर्ण शीर्ण है। इसमें सोलह ऋत्विज और यजमान एवं एजमान •ी पत्नी ऐेसे अठारह लोग बैठे हैं, वे सब नीच •र्म •रने वाले हैं और सब•े सब मँझधार में डूबेगें। जो मूढ़ इस यज्ञ •ो •ल्याण•र मानते हैं, वे बुढ़ापा और मृत्यु •े फन्दे में बारम्बार फँसते हैं।ÓÓ

ईशावास्य उपनिषद् में इस प्र•ार •े सं•ेत मात्र दिखाई देता है, जहाँ गुरु शिष्य से सिद्धांत प्रतिपादित •रते हुए •हता है- ''ईषावास्यम् इदं सर्वं यत्•िंच जगत्यां जगत्। तेन त्येक्तेन भुञ्जिथा मा गृध: •स्य स्विद् धनम।ÓÓ 

•ुर्वन्नेवेह •र्माणि जिजीविषेच्छतँ समा:। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न •र्म लिप्यते नरे।। (ईशो-1/1-2)

  अर्जुन से सभी •ार्य •ो यज्ञ बना लेने •ो •हते हैं-

       यज्ञार्थात् •र्मणोऽन्यत्र लो•ोऽयं •र्मबंधन।

       तदर्थं •र्म •ौन्तेय मुक्तसंग: समाचर।।  (गीता-3/9)

अर्थात सारा •र्म भगवत्समर्पित बुद्धि से •र्म •रना। ए• प्रश्न •ा और समाधान भगवान •रते हैं, •हते हैं इस बहाने दुष्•र्म •ो भी भगवान •ो अर्पित •र •िया जा स•ता है क्या ? भगवान •हते हैं-

 •िं •र्म •िम•र्मेति •वयोऽप्यत्र मोहिता:।

        तŸो •र्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽषुभात।। (गीता- 4/16)

हे पार्थ! •र्म क्या है, अ•र्म क्या है इस सम्बन्ध में मनीषी जन भी भ्रमित हैं। अत: मैं •र्म •ा मर्म तुझे समझाता हँू, जिसे जान•र तू अशुभ से मुक्त हो जा।

 •र्मणो ह्यति बोद्धव्यं बोद्धव्यं च वि•र्मण:।

          अ•र्मणश्च बोद्धव्यं गहना •र्मणों गति:।।  (गीता-4/17)

अर्थात •र्म •े तीन रूप हैं- •र्म, अ•र्म और वि•र्म।  इसीलिए भगवान ने •हा-

                                              उद्धरेदात्मनात्मनं नात्मनामवसादयेत।

                                    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।  (गीता-6/5)

मनुष्य •ो चाहिए •ि वह अपना स्वयं •ा उत्थान •रे और अपने •ो गिरने न दे; क्यों•ि वह स्वयं अपना मित्र और शत्रु भी है। इस प्र•ार •र्म संस्•ार उस•ो लिप्त न •र स•ें। 

मनुष्य यह •र्म •रता हुआ सौ वर्ष त• जिये-

'पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद: शतमं श्रृणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: शरद: शतम्।Ó 

                                                                                                   (शुक्ल यजु. 36/24)

भगवान •हते हैं इस•ा प्रभाव यह होता है •ि -

 पश्यन् श्रृण्वन् स्पृर्शन् जिघ्रन अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन।

 प्रलपन् विसृजन् गृहणन उन्मिषन् निमिषन् अपि।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्। (गीता-5/8-9)

अर्थात ऐसी समत्व एवं समर्पित बुद्धि से •िया गया •ार्य जब हम •रते हैं तो हमारे यह सारे •ार्य -देखना, सुनना, स्पर्शर् •रना, गंध लेना, खाना, चलना, सोना आदि सभी यज्ञमय हो जाते हैं। आगे •हते हैं -

ब्रह्मण्याधाय •र्माणि संगत्यक्त्वा •रोति य:।

 लिप्यते न स पापेन पद्यपत्रमिवाम्भसा।। (5/10)

जो ब्रह्म •ा आश्रय और आधार मान•र, आसक्ति •ा त्याग •रते हुए, •र्तव्य •र्म •रता है, वह जल में •मलपत्रवत् पाप से अलिप्त रहता है। यही गीता •ी चरमावस्था है, यही ब्रह्मनिष्ठा और स्थितप्रज्ञता है।

गीता में योग •ो दो प्र•ार से परिभाषित •िया गया है-'योगा: •र्मसु •ौशलम्Ó और 'समत्वं योग उच्यतेÓ। वस्तुत: जब इन दोनों •ो ए• साथ जोड़ा जाय तो उसे योग •हते हैं और इस•ा परिणाम तब सामने आता है। जब हम -'ब्रह्मणि आधाय •र्माणि संगं त्यक्त्वा •रोति य:Ó।  

इसीलिए भगवान •हते हैं-

                          •र्मणिएव अधि•ारस्ते मा फलेषु •दाचन।

                            मा •र्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्व•र्मणि।।  (गीता-2/47)

दो आदमी हैं, दोनों •टहल •ाट रहे हैं। •टहल •ाटने •े बाद देखा तो ए• •े हाथ में दूध ही दूध चिप•ा है तो दूसरे •े हाथ में ए• भी बूँद दूध नही लग पाया। इसमें •र्म •ी •ुशलता •िसमें है तो स्पष्ट है जिस•े हाथ में ए• भी बँूद दूध नहीं लगा। 

इसे ही 'पद्यपत्रमिवाम्भसाÓ •हा।

  गीता ने •हा-

                           सहजं •र्म •ौन्तेय सदोशम् अपि न त्यजेत।

                          सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:।। (18/48)

                ऊँ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

     पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।।

             ऊँ शांति शांति शंति: ।।

        ऊँ ईषा वास्यमिदँ् सर्वं यत्•िंच जगत्यां जगत्।

        तेन त्येक्तेन भुंजीथा मा गृध: •स्यस्विद्धनम।। 

        •ुर्वन्नेवेह •र्माणि जिजीविषेच्छतँ् समा:।

        एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न •र्म लिप्यते नरे।।-2

   

 

 •ेन-उपनिषद



ऊँ  शांति मंत्र

ऊँ आप्यायनतु ममांगानि वा•् प्राणश्चक्षु:

श्रोत्रमयो बलम् इन्द्रियाणि च सर्वाणि।

सर्वं  ब्रह्मौपनिषदं, माहं ब्रह््म निरा•ुयां, मा मा ब्रह््म निरा•रोद्,

अनिरा•रणमस्तु, अनिरा•रणं मेंऽस्तु।

तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्तेमयि सन्तु, ते मयि संन्तु।

ऊँ शांति शांति शांति:


ऊँ •ेनेषितं पतति प्रेषितं मन:

        •ेन प्राण: प्रथम: प्रैति युक्त:।

 •ेनेषितां वाचमिमां वदन्ति

        चक्षु श्रोत्रं • उ देवो युनक्ति।। 1

 

गुरु •ा उत्तर- 

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्

   वचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राण:।

 चक्षुशष्चक्षु:  अतिमुच्य धीर:

    प्रेत्यास्माल्लो•ादमृता भवन्ति।।2

समाधान- इसमें •ोई दोष नहीं है। अन्य श्रुतियाँ भी •हती हैं- 'आत्मना एवं अयं ज्योतिषा अस्तेÓ। (बृ.उ.4/3/6)-

तब वह पुरुष आत्मा •ी ज्योति से स्थित रहता है।

'तस्य भाषा सर्वम् इदं विभातिÓ। (•.उ.2/2/15, श्वे.उ.6/1/4, मु.उ.2/2/10) -उस•े प्र•ाश से ही यह सब प्र•ाशित होता है।

'येन सूर्य: तपति तेजसा इन्द:Ó (तै.ब्रा.3/12/9/7)- जिस•े तेज से प्रदीप्त हो•र सूर्य तपता है।

'यदि आदित्यगतं तेजो जगद्धासयते अखिलमÓ (. गीता 15/12)- सूर्य •ा जो प्र•ाश सारे जगत •ो प्र•ाशित •रता है, उसे तू मेरा ही समझ।

'क्षेत्रं क्षेत्री तथा •ृत्स्नं प्र•ाशयति भारतÓ (गीता 13/33)- हे अर्जुन,उसी प्र•ार ए• ही आत्मचैतन्य संपूर्ण शरीर •ो प्र•ाशित •रता है।ÓÓ

'नित्यो अनित्यानां चेतन: चेतनानाम:Ó। (•ठो.उ.3/12/9/7)-अनित्य वस्तुओं में वह नित्य है, चेतनामय पदार्थों में वह चैतन्य (आत्मा) है।

'स उ प्राणस्य प्राण:Ó वह प्राणों •ा भी प्राण है। •ेन.

तब ऋषि •हता है -

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्-गच्छति नो मनो।

न विद्यो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात।। 3

भावार्थ- वहाँ (ब्रह्म में) नेत्र नहीं जाते, वाणी नहीं जाती और मन भी नहीं जाता। हम ब्रह्म •ा लक्षणों •ो भी नहीं जानते, अत: मन वाणी •े अतीत होने •े •ारण हमें नहीं मालूम •ि उस•ा वर्णन •ैसे •रूँ।

अन्यदेव तद्धिदितादधो अविदितादधि

इति शुश्रुम पूर्वेषां यं नस्तद्धयाचचक्षिरे।

भावार्थ- यह ब्रह्म ज्ञात वस्तुओं से भिन्न है और फिर अज्ञात वस्तुओं से भी परे है- ऐसा हमने अपने पूर्वजों से सुना है, जिन्होंने हमारे लिए इस•ी व्याख्या •ी थी।

ब्रह््म ज्ञान •े अतिरिक्त देवताओं •े विजय •े अभियान •े समान जीव •ो •र्त्तव्य, भोक्तृत्व •ा अभियान •रना व्यर्थ है।

' ब्रह््म  ह देवेम्यो विजिग्ये। तस्य ह

             ब्राह्मणों विजये देवा अमहीयन्त।। Ó 14. •ेन

उन यक्ष •ो न जाने हुए देवतागण भय •े साथ आपस में विर्मर्श •र जातवेद: अग्नि •ो जो जन्म से ज्ञानी होने से जातवेद •हलाते हैं •ो •हा •ि जाओं और पता •रों •ि यह पूज्यमूर्ति •ौन है।16

  

आगे उपनिषद •हता है- 'तास्ते प्रेत्याभिगच्दन्तिÓ, अज्ञान से आच्छादित हो•र पशु और वनस्पतियोंं •े रूप हमें प्राप्त होते हैं। 'असुरो •ा लो•ाÓ अर्थात 'तमसावृता:Ó •ो असुर लो• •हा। 'आत्महनो जनाÓ आत्मा •ो माने वाले अर्थात 'तमसावृता:Ó •ो असुर लो• •हा। यही आत्म हत्या है। तभी हमारा ऋषि •हता है  'तमसो मां ज्योर्तिगमयÓ। हम अमर हैं, यह बोध प्राप्त न होना ही आत्मघाती स्थिति है। 

आत्मा •ो •ैसे समझे ? इस•ा लक्षण क्या है? 

''स पर्यगाच्छु•्रम•ायमव्रणमस्नाविरं शुद्धम पापविद्धम।

 (न अन्यो अतो अस्ति द्रष्टा। बृउ 3/8/11 अर्थात इस आत्मा •े अतिरिक्त •ोई द्रष्ट्रा नहीं है।) परिभू: •ा दूसरा अर्थ बिना माता पिता •े जन्म लेने वाला।



Monday, 13 November 2023

वेद

मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः

सूक्त 1

1

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम् ।। (अग्निम् ईळे) में।

 दिव्यज्वालारूप अग्निदेवकी उपासना करता हूं जो (पुरः- हितम्) पुरोहित है, (यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम्) यज्ञका दिव्य ऋत्विक् है, (होतारम् ) ऐसा आवाहक है जो ( रत्नधातमम्) आनन्दैश्वर्यको अत्यधिक प्रतिष्ठित करता है।

2

अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ॥ (पूर्वेभिः ऋषिभिः)

 प्राचीन ऋषियों द्वारा (ईड्यः) उपास्य वह (अग्निः) अग्निदेव (नूतनैः उत) नवीन ऋषियों द्वारा भी (ईड्यः) उपास्य है। (सः) वह (देवान्) देवोंको (इह) यहाँ (आ वक्षति) लाता है।

3

अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे । यशसं वीरवत्तमम् ।। 

(अग्निना) अग्निदेवके द्वारा मनुष्य ( रयिम् अश्नवत्) उस ऐश्वर्यंका उपभोग करता है जो (दिवे-दिवे पोषम् एव) निश्चय ही दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है, (यशसम्) यशसे उज्ज्वल है और (वीरवत्तमम्) वीरशक्तिसे अतिशय पूर्ण है ।

अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि । स इद् देवेषु गच्छति ॥

 (अग्ने) हे अग्निदेव ! ( यम् अध्वरं यज्ञं विश्वतः) जिस यात्रा-यज्ञके चारों ओर तू (परिभू: असि) अपनी सर्वतोव्यापी सत्तासे विद्यमान होता है, वह यज्ञ सचमुच ही (देवेषु गच्छति) देवोंमें पहुंचता ।

भरत तत् सत्यमरः ॥ (अ) अग्निदेव! (दाचे) बारमदान करने ( गए भरम्) को कल्याणकारी भलाई (करिष्यमि करेगा है वह परम सत्य जो निश्चय ही राय है, उसे अपना परम सत्य ही प्राप्त करा देगा ] हे अंगिरा ।

7

उपत्याने दिवेदिवे दोषावस्तथिया वयम्। नमो भरन्त एमसि ।।

 (अग्ने) हे अग्निदेव ! (वर्ष) हम (दिवे-दिवे) दिन-प्रतिदिन (दोषा- न्तः) अंधकार और प्रकाशके समय (धिया) अपने विचारके द्वारा (नमः मन्तः) नमस्कारको वहन करते हुए (त्वा उप आ इमसि) तेरे निकट हैं।

राज्ञन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम् । वर्धमानं स्वे दमे ॥ 

(अध्वराणां राजन्तम्) यात्रारूप यज्ञोके शासक, (ऋतस्य दीदिवि नाम्) सत्यके देदीप्यमान संरक्षक, (स्वे दमे वर्धमानम्) अपने घरमें वर्ध- [त्या उपजा इमसि ] तुझ अग्निदेवके निकट हम जाते हैं।

स नः पितेव सूनवेऽन्ते सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ॥

 (सः) ऐसा तू. [ इसलिए तू ] (अग्ने) हे अग्निदेव ! (नः) हमारे लिए इनके पिता इब) पुनके लिए पिताकी तरह (सु-उपायनः भव) सुगमतासे न्त होनेवाला बन । (स्वस्तये) हमारी सुखपूर्ण स्थितिके लिए तू (नः (स्व) हमारे साथ दृढ़ता से जुड़ा रह ।
       ….....................

1. श्रीअरविन्द की कृति Hymns to the Mystic Fire (गुह्य अग्निके सूक्त ) के प्रथम मण्डलके सूक्तोंका अनुवाद । --अनुवादक
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मेधातिथिः काण्वः

सूक्त 12

अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्। (अग्नि वृणीमहे) हम अग्निका वरण करते हैं जो (होतारं) अ है, (विश्ववेदसम्) सर्वज्ञ है, (दूतं) देवोंका दूत है और (अस्य यज्ञस्य यज्ञका (सुक्रतुम् ) सिद्धिकारक संकल्प है।1

2- अग्निमग्न हवीमभि: सदा हवन्त विश्पतिम् । हव्यवाहं पुरुप्रियम् (विश्पति)।

 प्रजाओंके अधिपति, (हव्यवाहं) हमारी [ समर्पणरूप ] के वाहक, (पुरुप्रियं) बहुविध अभिव्यक्तिके प्रेमपात्र, (अग्निम् अि प्रत्येक अग्नि-ज्वालाको [ यज्ञके कर्ता ] (हवीमभिः) देवोंका आह्वान कर सूक्तोंके द्वारा (सदा हवन्त) सदा पुकारते हैं और [ पुरुप्रियं हवन्त] एकमेव भगवान को पुकारते हैं जिसमें अनेक प्रिय पदार्थ विद्यमान हैं।

3- अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तर्बाहषे । असि होता न ईड्यः ॥

 (अग्ने) हे अग्निदेव ! तू (जज्ञान:) उत्पन्न होकर (वृक्तबर्हिषे) यज्ञकर्ताके लिए जिसने पवित्र आसन बिछा रखा है (देवान् इह आ देवोंको यहाँ ला । (न: ईड्य: होता असि ) तू हमारा वरणीय आव पुरोहित है ।

4-  ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दृत्यम् । देवैरा सत्सि बर्हिषि ।।

 (अग्ने) हे अग्निदेव ! (यत्) जब तू. (दूत्यम् यासि) हमारा दूत कर जाता है तब (तान्) उन देवोंको (वि बोधय) जगा दे जो (उश हमारी भेंटोंको चाहते हैं । तू (बर्हिषि) पवित्र कुशापर (देवः) दे साथ (आ सत्सि अपना स्थान ग्रहण कर ।

5

अग्ने त्वं रक्षस्विनः ॥ घृताहवन दीदिवः प्रति हम रिषतो दह ।

(अग्ने) हे अग्निदेव ! (घृत- आहवन) मनकी निर्मलताओंकी भेंटो से पुकारे जाते हुए (दीदिवः) देदीप्यमान देव ! (त्वम्) तू (रिपतः रक्षस्विनः) सीमामें बांधनेवाले द्वेषियोंका ( प्रति दह स्म) अवश्य ही विरोध कर और उन्हें भस्मीभूत कर दे ।

afearfग्नः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥ 

(अग्निना) अग्निसे ही (अग्निः) अग्निदेव ( सम् इध्यते) पूर्णतया प्रदीप्त किया जाता है जो (कविः) द्रष्टा है, (गृहपतिः) घरका स्वामी है, (युवा) युवा है, (हव्यवाट्) भेंटको वहन करनेवाला है और (जुहु-आस्यः) जिसका मुख हवियोंको ग्रहण करता है ।

7- कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम् ।।

 तू (अग्निम् उप स्तुहि) उस दिव्य अग्निके निकट पहुंच और उसके स्तुतिगीत गा जो (कविम्) द्रष्टा है और (सत्यधर्माणम्) सत्य ही जिसका विधान है, जो (देवम्) प्रकाशस्वरूप है और (अमीव- चातनम् ) सब बुराइयों- का नाशक है।

8- यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति । तस्य स्म प्राविता भव ॥

 (देव अग्ने) हे अग्निदेव ! (हविः पतिः) हवियोंका जो स्वामी ( दूतं त्वाम् सपर्यति) तुझ दिव्य दूतकी पूजा करता है, (तस्य प्र अविता भव स्म ) उसका तू रक्षक बन ।

9- यो अग्नि देववीतये हविष्माँ आविवासति । तस्मै पावक मूळय || (यः)

 जो (देववीतये) देवोंके दिव्य जन्मके लिए (हविष्मान्) भेंटोंको लिए हुए (अग्निम् आविवासति) दिव्य शक्तिके पास पहुंचता है (पावक) हे पवित्र करनेवाले देव ! (तस्मै मृळय) उसपर दया करो ।

10- स नः पावक दीदिवोऽग्ने देव इहा वह ।

 ( दीदिव: अग्ने) हे देदीप्यमान अग्नि ! (पावक) हे पवित्र करने- वाले ! (सः) वह तू (देवान्) देवोंको (इह) यहाँ (नः हविः यज्ञं च) उप यज्ञं हविश्च नः ॥ हमारी भेंटों और हमारे यज्ञके (उप आ वह) पास ले आ।

11- स नः स्तवान आ भर गायत्रेण नवीयसा । राय वीरवतीमिषम् ।।

 (नः नवीयसा गायत्त्रेण) हमारे नवीन छन्दोंसे (स्तवानः) स्तुति किया हुआ (सः) वह तू (रयिम्) आनन्दको और (वीरवतीम् इषं) वीरके सामर्थ्य से पूर्ण प्रेरणा शक्तिको (आ भर) ले आ ।

12-  अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः । इमं स्तोमं जुषस्व नः ॥

(अग्ने) हे अग्नि ! (शुक्रेण शोचिषा) अपनी शुभ्र दीप्तियोंके साथ,
 विश्वाभिः देव-हूतिभिः) देवोंका आह्वान करनेवाली अपनी समस्त दिव्य
 _चाओंके साथ आकर (न: इमं स्तोमम्) हमारी इस दृढ़तासाधक स्तुतिको
नुषस्व ) स्वीकार कर ।

Monday, 6 November 2023

ईशोपनिषद:

 

ईशोपनिषद:  

यह उपनिषद् कलेवर  में छोटा है किन्तु विषय के कारण अन्य उपनिषदों के बीच महत्त्वपूर्ण  है। इस उपनिषद् के पहले मंत्र ‘‘ईशावास्यमिदंसर्वंयत्किंच जगत्यां-जगत…’’से लेकर अठारहवें मंत्र ‘‘अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देववयुनानि विद्वान्…’’  तक   में ईश्वर, ब्रह्मांड और सात्विक जीवन शैली को बताया गया है। इसमें ‘असुर्या’ वह लोक जहाँ सूर्य नहीं पहुँच पाता में कहा गया है कि जो लोग आत्म को, ‘स्व’ को नहीं पहचानते हैं, उन्हें मृत्यु के पश्चात् उसी असुर्या नामक लोक में जाना पड़ता है । आत्म’ में ब्रह्म को एकाकार करते हुए बताया है कि वह एक साथ, एक ही समय में भ्रमणशील है, साथ ही अभ्रमणशील भी । वह पास है और दूर भी।  वह सर्वव्यापी, अशरीरी, सर्वज्ञ, स्वजन्मा और मन का शासक है। इस उपनिषद् में विद्या एवं अविद्या दोनों की बात की गई है कि विद्या एवं अविद्या दोनों की उपासना करने वाले घने अंधकार में जाकर गिरते हैं, हाँ विद्या एवं अविद्या को एक साथ जान लेने वाला, अविद्या को समझकर विद्या द्वारा अनुष्ठानित होकर अमरत्व को समझ लेता है। इसमें ब्रह्म के मुख को सुवर्ण पात्र से ढके होने की बात साथ ही सूर्य से पोषण करने वाले से प्रार्थना की। अंतिम श्लोकों में किए गए सभी कर्मों को मन के द्वारा याद किए जाने की बात आती है और अग्नि से प्रार्थना कि पंञभौतिक शरीर के राख में परिवर्तित हो जाने पर वह उसे दिव्य पथ से चरम गंतव्य की ओर उन्मुख कर दे।

  •र्म •ा विधान •िसे ?

अज्ञानी तथा स•ाम व्यक्ति •े लिये •र्म आवश्य• है।  ''सो अ•ामयत जाया में स्यातÓÓ (वृ.उ.1/4/17)

 वही उपनिषद •हता है- ' •िं प्रजया •रिश्यमों मे षां नो अयमात्मा अयं लो•:Ó अर्थात 'हमारी आत्मा ही हमारा लो• है अत: हम संतान ले•र हम क्या •रेगे? (बृ.उ. 4/4/22)। 

अत: श्वेतोपनिषद •ा ऋषि •हता है- '' अत्याश्रमिम्य: परमं पवित्रं प्रोवच सम्य•् ऋषि संगजुष्टमÓÓ । 1/6/21.

•र्म•ाण्ड और उपासना •ा समुच्चय होना चाहिए- ''अन्ध तम: प्रविशन्ति येऽपिद्यामुपासते। विद्यायाम = देवतोपासना और अविद्यायाम= •र्म•ाण्ड।

विद्या- 'सा विद्या या विमुक्तयेÓ।

''विद्या चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय सह।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुतूÓ -ईष-11

देवताओं •ी पूजा •र•े आदमी सिद्धि •ो प्राप्त •रता है- 'ईश्वरीय गुणों •ो ऐश्वर्य •हते हैं। आठ ऐश्वर्य या सिद्धियाँ इस प्र•ार हैं-

''अणिमा महिमा तथा गरिमा लघिमा तथा।

ईषित्वं च वषित्वं च प्राप्ति: प्र•ाम्यमेव च।।

अर्थात शूक्ष्म हो जाना, विषाल हो जाना, भारी हो जाना, हल्•ा हो जाना, शास• बन जाना, वश में •र लेना, इच्छानुसार वस्तु •ी प्राप्ति और जैसा चाहे  वैसा रूप बना लेना।

''सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेभीय सह।

विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुतेÓÓ -

अर्थात जो असंम्भूत अर्थात •ारण ब्रह्म तथा विनाश अर्थात •ार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ)-दोनों •ो साथ साथ उपासना •रने योग्य जानता है, वह •ार्य-ब्रह्म •ी उपासना से मृत्यु •ो पार •र•े •ारण-ब्रह्म •ी उपसना से अमृत अर्थात् प्र•ृतिलय •ी अवस्था •ो प्राप्त •रता है। ईषा-14  अर्थात सभी जीव अपनी आत्मा ही हो जाते हैÓÓ ('आत्मा-एव-अभूद्-विजानत:Ó)

ऋषि •हता है-

''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम।

 तत्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।।

अर्थात हे जगत •े पोश•! (पूषा) सूर्यदेव स्वर्णिम पात्र (हिरण्यगर्भ) •े द्वारा सत्य (•ार्यब्रह्म) •ा जो मुँह ढ•ा हुआ है, मुझ सत्यधर्मा (उपास•) •े दर्शन हेतु वह ढक्कन हटा दीजिए। ईषा.15

''पूषान्ने•र्षे यम सूर्य प्रजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजा 

यत्ते रूपं •ल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुष: सोऽहमास्मि।। 16 ईषा

अर्थात जगत •ा पोशण •रने •े •ारण सूर्य •ो पूषा •हते है; अत: हे पूषा! (गगन में) ए•ा•ी विचरण •रने •े •ारण वे ए•र्षि •हे जाते हैं; (अत:) हे ए•र्षि, प्राणों तथा रसों •ो खीच लेने •े •ारण वे सूर्य •हलाते हैं; (अत:) हे सूर्य! प्रजापति •े पुत्र होने से वे प्राजापत्य हैं: (अत:) हे प्राजापत्य! अपनी रश्मियों •ो व्यूह अर्थात हटाइये। अपने तेज अर्थात् ताप देनेवाले प्र•ाश •ो ए•त्र •र•े खीच लीजिए।16, ईषा.

''वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम।

ऊँ •्रतो स्मर •ृतँ स्मर •्रतो स्मर •ृतँ स्मर।।

अर्थात अब मेरा प्राण सर्वव्यापी वायु में विलीन हो जाय; मेरा शरीर भस्म में परिणत हो जाय। ऊँ, हे मेरे मन! अब त• अपने द्वारा •िये हुए •र्म तथा उपासनाओं •ा स्मरण •रो, स्मरण •रो।17 ईषा.

व्याहृतियाँ- भू:, भुव: तथा स्व:- ये तीन व्याहृतियाँ हैं। (तै.उ. 1/5/1) । इनमें से 'भू:Ó अर्थात पृथ्वी •ा सिर है, 'भुव:Ó अर्थात आ•ाश उस•ी दो भुजाएं हैं और 'स्व:Ó अर्थात स्वर्ग उस•े दो चरण हैं। (बृ.उ.5/5/3)

''अग्रे नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठंते नम उक्तिं विधेम।।ÓÓ 18

अर्थात हे अग्नि! हे देव! आप हमारे समस्त •र्म फलों •े ज्ञाता हैं; हमें अपने •र्मफलों •ा भोग •राने •े लिए अच्छे मार्ग से ले चलिए। •ुटिल पापों •ो हमसे दूर •ीजिए। हम आप•ो बारम्बार नमन •रते हैं।

इस तरह से ईषोपनिषद में ऋषि सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना •रता है •ि उसे अमृत •ी ओर ले चलो।

इस तरह से ऋषि अविद्या (•र्म) •े द्वारा मृत्यु •ो पार •र•े विद्या (उपासना) •े द्वारा अमृतत्व •ो प्राप्त •र लेता हैÓÓ  वह विनाश •े (•ार्यब्रह््म) •े द्वारा मृत्यु •ो पार •र•े, सम्भूति (•ारणब्रह्म) •ी उपासना से अमृतत्व •ी प्राप्ति •र लेता है।ÓÓ 


Friday, 20 October 2023

दरकार

दरकार जिसकी वह बात पुरानी है।
नये जमाने के तेवर  परख रहा हूं।।
ख़ुश हूं कि उनके मिजाज गरम हैं
खुली आंखों सपने समझ रहा हूं।।
शीत ने दी दस्तक जिस दुपहरी से।
आशियानों तपन ले भटक रहा हूं।।

2
साधु  
शत्रु-सैनिकों की 
कर रहे हो सेवा \
शत्रुदल !
मैं तो भगवान की सेवा कर रहा हूं
मैं तो प्राणियों की सेवा कर रहा हूं
मैं तो मानव धर्म की सेवा कर रहा हूं

असंतुष्ट था सिंकन्दर
तभी
फूस का सूखा
मरी चींटी टुकड़ा 
पकड़ा दिया सिकन्दर को
इसे हरा कर सकते हो
इसे जिन्दा कर दो

सूखी चीज हरी हो सकती है \
साधु] तुम पागल हो

सूखे को जीवन नहीं दे सकते
चीटी को जीवन नहीं दे सकते

तो 
फिर जीवित को मारने का अधिकार \

नत सिर सिकंदर 
सचमुच
भारत महान  
मेरा मन तो सैतान।

2-
 
तीर्थ है
रास्ता] घाट] जलाशय
साधना और मंत्रणा

तीर्थ है 
पवित्र] पावन
मोक्ष प्रदाता
हरता तन मन की यंत्रणा

तीर्थ है
स्थल परिक्रमा का
उपचार का
सधना का

तीर्थ है 
संज्ञा
व्यक्ति] वस्तु
स्थान और भाव रूप में
विराजित श्रद्धा लिए

तीर्थ है
विचारों का विस्तार
दण्डकों का उपचार
राम कृष्ण जहां
लेते हैं अवतार

तीर्थ है
नदी]जलाशय
मंदिर और गुरुद्वारे
जहां पीते हैं पानी
पंक्षी और पंथी प्यारे

तीर्थ है 
गुरु और उसकी वाणियां
स्नान करें उसमें 
काटे संसार बन्धन की वेणियां।