Tuesday, 16 September 2025

हिंदी को हिंदी की हिन्दी में शुभकामनाएं

हिंदी को हिन्दी की हिंदी में शुभकामनाएं 

हिन्दी को लेकर शुभकामनाएं आ रही हैं। आना भी चाहिए। हिंदी भाषियों के लिए तो गौरव की बात है।

  देश-विदेश के उन सभी हिंदी प्रेमियों का जिनका हिन्दी भाषा और उसके बोलियों से सम्बन्ध है, इनको भी शुभकामनाएं ,जो इसके गौरव को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।

 सृष्टि के रचयिता ने प्रत्येक राष्ट्र को अपनी भावना व्यक्त करने को भाषा दी है। किसी भी राष्ट्र के सृजन, अभ्युदय, पतन, पुनरूत्थान और उसके जीवनोद्देश्य की अभिव्यक्ति भाषा से ही होती है।

 आज सविधान सभा के उन माननीय सदस्यों के स्मरण का भी दिन है, जिन्होंने सहमति-असहमति के बीच हिंदी को राजभाषा का स्थान दिलाया।

 गौरव बोध और सम्मान उन महनीयों के लिए भी जिन्होंने हिंदी को हिंदुई, हिंदुस्तानी, उर्दू के गंगा जमुनी संस्कृति से , भागीरथ प्रयत्न कर ( संस्कृत, क्षेत्रीय बोलियों और भाषा की भारतीय परंपरा से परिष्कृत कर) हिन्दी को त्रिवेणी बनाकर हमें दिया। 

 त्रिवेणी इसलिए कि इस हिन्दी में हमारा स्वर्णिम अतीत, हमारा उद्वेलित वर्तमान और विश्व के कल्याण की हमारी कामना को सजोये भविष्य है, जो संसृति को अवगाह्न करने का आमंत्रण देता है।

 अतीत का स्मरण इसलिए भी की उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम तक से विश्व के सभी निवासियों को, भारत के सभी भाषा- भाषियों को राम, कृष्ण और शिव के जीवन का कालजयी उज्जवल चरित हमारे सामने आईने की तरह रखता है, जिसमें हमें अपना चेहरा देखने का बार-बार अवसर मिलता है । 

   किसी भी राष्ट्र की भाषा केवल विचार अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती। वह केवल वर्ण-वर्तनी, छंद और व्याकरण नहीं होती । वह राष्ट्र में निवास करने वालों का वर्तमान-अस्तित्व बोध भी होती है । 

भाषा और उसके वर्ण मिलकर विद्या के सभी अंगों (व्याकरण ,कल्प, ज्योतिष,निरुक्त, छंद और शिक्षा) की
 अवधारणा को स्पष्ट करते हैं। 

राष्ट्र और उसकी संस्कृति को स्वर देते हैं। भाषा राष्ट्र की विश्व में पहचान स्थापित कराती है। भाषा राष्ट्र की निजता, उसका गुणधर्म, उसकी पहचान, उसकी आकृति, उसके अस्मिता और उसके भूगोल का परिचय कराती है । 

भाषा किसी भी राष्ट्र का एक जीवन्त, जाग्रत भविष्य का स्वर होती है। 

 यदि भारत की बात करें तो भाषा राष्ट्र की तरह स्वयंभू है। भारतवर्ष के सम्बन्ध में यजुर्वेद में ‘हम राष्ट्र के पुरोहित हैं’ कौन कहता है ? भाषा। 

केनोपनिषद में ‘तेनत्यक्तेन भुन्झिता’ के आचरण की बात कौन करती है? भाषा।

 ‘विश्व के सभी प्राणी सुखी हों’, भारत राष्ट्र की कामना को कौन अभिव्यक्ति देती है? भाषा।   

 भारतीय संस्कृति के समस्त संस्कारों, परम्पराओं, सभ्यताओं के विभिन्न तत्त्वों, लौकिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताओं में वैश्विक शुभकामनाएं कौन समाविष्ट करती है? भाषा । 

‘सा प्रथमा संस्कृति विश्वधारा’ भाषा ही तो बताती है! 

‘मनुर्भवः’, अर्थात् मनुष्य बनो। किसका आह्वान है? भाषा का ही न !  

  संस्कृत हमें वेदों के कर्मकाण्ड, मीमांसा और उपनिषद की परम्परा से लेकर ब्रह्मसूत्र तक ले जाती है। हिमालय के कल्हण (राज तरंगिणी) से लेकर कालड़ी के शंकर तक का स्मरण कराती है।

 भारतवर्ष की भाषाएँ चाहे वह संस्कृत हो, तमिल हो, बंगाली हो, गुजराती हो या हिंदी हो सभी अपने अंदर भारतीय संस्कृति और सभ्यता को समाहित किये हुए हैं। 

 यदि हिंदी पर विचार करे तो वह उर्दू, फ़ारसी, अरबी का हिन्दुस्तानी रूप नहीं है। वह संस्कृत की धरोहर को लिए निर्मल गंगधारा है।

 इस धारा में लगभग सभी भारतीय भाषाओं के तात्विक शब्द समाहित हैं। इसी के साथ अरबी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, फ्रेच आदि के शब्द भी इसकी गोद में आनंद के साथ खेलते हैं। हिंदी ने इन अभारतीय भाषाओं को लिंग, वर्ण, शब्द और अर्थ की पहचान भी दी है। 

अपनी उदारता के कारण हिंदी वैश्विक संस्कृति और सभ्यताओं के लोक कल्याणकारी तत्वों को भी ग्राह्य किये हुए है। उसकी लिपि जितनी सरल है, उतना ही उसका अनुवाद भी। उसमें तमाम आंचलिक शब्दों की धरोहर है, तो भारत की राष्ट्रीयता और संस्कृति के सम्बर्धन और संरक्षण की क्षमता है। 

हिंदी अपने जन्म काल से ही भारत के हजारों वर्ष पूर्व की धरोहर को समेट कर चल रही है।   

 हिंदी भाषा ने अपने साहित्य के माध्यम से ही राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता में अन्यतम योगदान दिया है। 

भारतीय परम्परा का ज्ञान हिंदी ने अपने विपुल साहित्य से दुनिया को करवाया। बाल्मीक और वेदव्यास के सन्देश को विश्व में पहुँचाने का कार्य हिंदी भाषा और उसका साहित्य ही कर रहा है ।

 अभय और अमरता के संदेश तथा ज्ञान, इच्छा और क्रिया के समन्वय को हमारे संतों, कवियों ने हिंदी भाषा और उसकी बोलियों के माध्यम से विश्व को समझाया। 
 
 भारत की तमाम भाषाओं के स्वरों से ध्वनियों को ग्राह्य कर हिंदी ने वेद, उपनिषद, स्मृति, पुराण, रामायण, महाभारत, आयुर्वेद इत्यादि के तत्वों एवं स्वत्वों को समेट कर दुनिया को पहुँचाने का कार्य कर रही है।

 कालिदास,भवभूति, माघ और अश्वघोष के साहित्य को लोकप्रिय बनाने में हिंदी ने अप्रतिम योगदान दिया है । 

काश्मीर की राजतरंगिणी हो या प्रत्यभिज्ञा दर्शन इनके ज्ञान प्रकाश को हिंदी ने ही अपने पाठकों तक पहुंचाया है । 

 यदि हिंदी और उसकी क्षेत्रीय बोलियां न होती तो क्या हम इस राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के संतों, कवियों, महात्माओं को जान या समझ पाते। 

आइये समझें हिंदी हमारा परिचय किनसे कराती है?* क्यों उसे भारतीय संस्कृति की संवाहक, समन्वय और संपर्क की भाषा कहा जाता है ? 

हिंदी विज्ञान -प्रोद्योगिकी की भाषा है, कम्प्यूटर की, सोशल मीडिया की, पत्रकारिता की, धारावाहिक की, फिल्म की, रोजगार की, पंडिताई की, पुरोहितों की, सेना की, वोट की, नोट की,रोटी -बेटी की भाषा है।

हिन्दी योग, नियोग, छप्पन व्यंजनों की भाषा है। वह आरत की पुकार, अर्थार्थी की कामना, जिज्ञासु की समाधान और ज्ञानी के विज्ञान की भाषा है। हिंदी पुरुषार्थ चतुष्टय की भाषा है।

हिंदी मां,मामा- मामी, ताऊ, ताई, चाचा, चाची, काका,काकी,नाना, नानी, मौसी, मौसा, भतीजा , भतीजी, नाती , नातिन, परदादा, ताऊ के पृथक-पृथक सम्बन्धों के पहचान की भाषा है।

 देश में समन्वय की, विदेश में प्रवासी-अप्रवासियों के पहचान और अस्तित्व बचाने की भाषा है।

  तात्पर्य यह कि हिंदी भाषा ही नहीं भारत के धरोहर की वाहिका है। हिंदी विभिन्न प्रान्तों की भाषाओं से संवाद कराती है। हिंदी जनों से संपर्क करती है। साहित्य के माध्यम से उत्सवों, पर्वों का समन्वय कराती है। 

वह कुछ की मातृभाषा है, तो कुछ की क्षेत्रीय भाषा है, तो कई राज्यों की राज्य भाषा है, देश के लोक-जन की संपर्क भाषा है, तो संविधान की राजभाषा है। देवता, मनुष्य, राक्षस और यक्षों की राष्ट्र भाषा है।

भारत के भाल की बिंदी! हे भारती! हे वाग्देवी!
भारतीयों को वैश्विक कल्याण के लिए सदैव तत्पर रखें।
🕉️🙏

...........…...............

* उत्तरप्रदेश, पंचनद, हरियाणा के संत और भक्त: महात्मा बुद्ध, स्वामी रामानन्द, संत कबीर, बल्लभाचार्य, भक्त कुंभनदास, भक्त सूरदास, संत तुलसीदास, मलूकदास, मधुसूदन सरस्वती, संत आपा साहब, संत शिवनारायण। संत नामदेव, संत बेनी, साईं झूलेलाल, संत शादाराम साहेब,श्री गुरु नानकदेव श्री गुरु अर्जुनदेव, श्री गुरु हरि गोविन्द जी, श्री गुरु तेग बहादुर जी, श्री गुरु गोविन्द सिंह जी, संत रोहल, स्वामी श्रद्धानन्द जी। संत गरीबदास, भक्त जैतराम जी, संत चरणदास, संत घीसादास, राधास्वामी, स्वामी नितानंद, संत परमानन्द, संत मंगतराय को बिना हिंदी को जान पाते?

 राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र के संत: संत पीपा जी महाराज, बाबा रामदेव, संत धन्ना, संत जम्भनाथ, संत हरिदास, मीराबाई, संत सोढीनाथी, सहजोबाई, संत दबाबाई, संत फूलीबाई, संत दादूदयाल, संत सुन्दरदास, संत दरिया साहब, संत हरिराय दास, संत रायदास, महर्षि नवल महाराज। भक्तिन लीरलबाई, भगत नरसी मेहता, संत पद्म नाथ, संत माण्डण, संत अखा, कच्छी संत मेकरण दास, स्वामी सहजानंद, स्वामी मुक्ता नंद, संतमूलदास, महर्षि दयानन्द सरस्वती। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, भक्त सावलामाली, भक्त गोरा कुंभार, संत मुक्ताबाई, संत जनाबाई, संत त्रिलोचन, संत चोखा मेला, संत एकनाथ, भक्तिन कान्होपात्रा, संत तुकाराम, समर्थ रामदास, संत तुकडो जी महाराज।
 मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और झारखंड के संत: संत सींगाजी, संत सेन, स्वामी प्राणनाथ, संत घासीदास, गहिरागुरु। 
 बंगभूमि, प्राग्ज्योतिष क्षेत्र, उड़ीसा के संत: महावीर स्वामी, संत धरनी दास, संत दरिया साहब, महर्षि मेहदी दास परमहंस , चैतन्य महाप्रभु, बाउल संत जगबंधु सुन्दर दास, श्रीराम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी प्रणवानन्द ।माधव कंदली, श्रीमंत शंकरदेव, श्री माधव देव, रानी रापुईलियानी, रानी माँ गाइडिल्यू, श्री तालीम रुकबो, संत जयदेव, भक्त दासिया बाहरी शुद्रमुलि, सरलादास, भक्त बलरामदास, अच्युतानन्ददास, जगनाथ दास, यशोवन्त दास, भक्त शिश आनन्ददास, संत भीमा भाई के दर्शन कर पाते ?
 आन्ध्र , तमिल , कर्नाटक, केरल, पाण्डुचेरी के संत: साधु रामानुजाचार्य, कवियित्री मोला, भक्त श्री अन्नमाचार्यलु, संत बेमना, पोतुलुरी बीर ब्रह्मेन्द्र स्वामी, श्री कोंडयाचार्य स्वामी, काव्यकंठ वसिष्ठ गणपति मुनि, सद्गुरु श्री मलयाल स्वामी, अल्लूरी सीताराम राजू , कुन्दकुरु वीरेशलिंगम पन्तुल। नायम्मार संत, भक्त तिरुमूलर, भक्त कारिकाल अम्मैयार, भक्त कण्णपर, संत नन्दनार, भक्त तिरुज्ञानसंबन्धर, भक्त अप्पर, भक्त पन्नकिरिवार, भक्त पोयगौ अलावार, भक्त भूतल आलवार, भक्त पेयालवार, भक्त तिरुमलिसाई आलवार, भक्त नम्मालवार, भक्त मधुरकवि, भक्त कुल शेखरालवार, भक्त पेरियालवार, भक्तिन आण्डाल, भक्त तिरुप्पाण आलवार, भक्त तिरुमंगै आलवार, भक्तिन ओवैयार, भक्त तिरुवल्लुवर, संत कम्बन, भक्तिन अव्वैयार, संत त्यागराज, संत रामलिंगस्वामीगल, महर्षि रमण। श्री अल्लुम प्रभु, भक्ति भण्डरी बसवेश्वर, वैराग्य निधि अक्क महादेवी, श्री मध्वाचार्य, श्री विद्यारण्य स्वामी, दासकूट, संत पुरन्दरदास, संत कनक दास, श्रीमद् शंकराचार्य, निरणम् कवि, चेरुशेरी नंबूतिरि, आचार्य तुंजतु, रामानुजम, एजुतच्छन, कवि कुंचन नंव्यार, श्री नारायण गुरु, श्री चट्टाम्बि स्वमीगल, महात्मा अय्यन्कालि, महाकवि करुप्पन,श्री अरविन्द घोष, श्री माँ को देश कैसे पहचानता? यदि हिन्दी न होती।

Sunday, 7 September 2025

अंशु/अंशुमान शब्द का अर्थ/परिचय

* अंश-अंग्रमान आदित्य का नामांतर है।
२. (सो. बहु.) विष्णु के मत में यह पुरुहोत्र का पुत्र है।

३.तृषित नामक देवगणों में से एक है।
..........

1. अंशु-अश्विनों ने इसकी रक्षा की थी (ऋगवेद. ८.५. २६)।

२. कृष्ण तथा बलराम का गोकुल का सला (भा. १०. २२. ३१)।

३. मार्गशीर्ष (अगहन) माह के सूर्य का नाम (मा. १२. ११.४१)।
...........

अंशुमत्- एक आदित्य। इसे किया नाम की स्त्री थी। यह आषाढ़ में प्रकाशित होता है। इसकी १५०० किरणें हैं (भवि. ब्राह्म. १६८)।
 अंशु (२.) तथा यह एक ही हैं।

* असमंजस का पुत्र। पितरों की मानस- कन्या यशोदा इसकी स्त्री है।
 सगर का अश्वमेधीय अश्व ढूंढ लाने के लिये असमंजस ने इसे भेजा।

 मार्ग में इसे इसके पितृव्य कपिलाश्रम के पास मृत पडे हुए दिखे।

 वहीं वह अश्व भी दिखा। 

तब इसने कपिल की स्तुति की। परंतु कपिल ध्यानस्थ था। अतएव उसने इसकी स्तुति न सुनी।

 इतने में उसका मामा गरुड़ वहां आया। भागीरथी के जल के स्पर्श से काम होगा, ऐसा बता कर वह चला गया।

 कपिल जागृत होने के बाद उसने अंशुमान को स्तुति करते हुए देखा।

 उसकी सतुति से संतुष्ट हो कर उसने इसे भागीरथी की स्तुति करने को कहा। 

बाद में यह अश्व ले गया तथा पहले अश्वमेध यज्ञ पूरा करवावा। 

सगर ने तुरंत ही इसे राज्य दिया तथा यह वन में गया। 

इसने भी अपने पुत्र दिलीप को राजसिंहासन पर बिठाया तथा उसे प्रधान के हाथ में सौंप कर भागीरथी के प्राप्त्यर्थ संपूर्ण जीवन तप में बिताने के लिये यह वन में गया। 

परंतु सिद्धि के पूर्व ही इसकी मृत्यु हो गई (म. ब. १०६; वा. रा. बा. ४१-४२)। 

यह शिवभक्त था।

 इसने ३०८०० साल राज किया (भवि. प्रति. १.३१) ।

४. एक अन्य अंशु जो द्रौपदी के स्वयंवर के लिये गया हुआ राजा (म. आ. १७७.१०)। इसे महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य ने मारा (म. क. ४०६७)।

Sunday, 31 August 2025

जैविक खेती की भारतीय अवधारणा

जैविक खेती की अवधारणा और भारतीय संदर्भ (पढ़ते-पढ़ते)

 कृषि में भारतीय संदर्भ की समग्र अभिव्यक्ति के लिए, इसे वैदिक जैविक कृषि कहना उचित होगा । 

जैविक में ‘वैदिक’ शब्द वेद - ज्ञान (समग्र ज्ञान ) को इंगित करता है ।

 ‘वैदिक’ शब्द जोड़ने का अर्थ है, समग्र ज्ञान की संगठन शक्ति को कृषि के क्षेत्र में लागू करना ।

 ‘वैदिक जैविक’ का अर्थ है प्रकृति के पोषक तत्वों से समृद्ध जैविक कृषि।
 
 प्राकृतिक ध्वनियों के पोषण से संरक्षित वे तत्व जो ‘आदित्य’ के ‘पूषा’ स्वरुप से पोषित हैं । 

जैविक कृषि में जोड़ा गया 'वैदिक' तत्व बुद्धिमत्ता की एक परिघटना है।

 समष्टि की चेतना की एक परिघटना है।
 
 प्रकृति की वह रचनात्मक बुद्धिमत्ता की एक परिघटना जो पौधे और उसके भीतर के पोषक तत्वों के विकास के विभिन्न चरणों को संरक्षित और वर्धित कराती है ।

  पारंपरिक कृषि और जैविक कृषि के बीच का अंतर ही वैदिक कृषि है ।

 इससे हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन में संपूर्ण पौष्टिक मूल्य और संपूर्ण पौष्टिक शक्ति का लाभ मिलता है।

 इसलिए वैदिक जैविक कृषि भोजन की सबसे पौष्टिक गुणवत्ता युक्त तत्वों को प्रदान करती है।

 महर्षि महेश योगी का मानना है, “ पौधे के बीज से अंकुरित होकर पत्तियों, फूलों और फलों में विकसित होने की पूरी प्रक्रिया को सुखदायक संगीत और धुनों से पोषण मिलता पाया गया है; सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों और तारों के बढ़े हुए मौसमी प्रभावों से, और पर्यावरण में सद्भाव और सुखदता के बढ़ते गुणों से। यह अब विश्वव्यापी वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से काफी अच्छी तरह से स्थापित हो चुका है। इस प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए हमारे पास भारत के वैदिक विशेषज्ञ होंगे जिनकी पारंपरिक धुनें और वैदिक पाठ सबसे प्रभावी हैं।”

 इस वैदिक कृषि की मूल अवधारणा को और स्पष्ट समझने के लिए भोजन करने के पूर्व बोले जाने वाले कुछ मन्त्रों को समझना चाहिए- 
 (i) ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।’ 
मंत्र की अभिव्यक्ति में हम ध्यान करते हैं कि भोजन स्वयं ब्रह्म है, जिसे अग्नि में आहूत किया गया है, और इसका सेवन करने वाले का भी लक्ष्य ब्रह्म में लीन होना है। यह भोजन को एक पवित्र कर्म के रूप में देखता है।

 (ii) ‘ॐ सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्‌विषावहै ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥’ 
 भाव यह कि हम सब साथ में रक्षा करें, साथ में भोजन करें, साथ में बलशाली बनें, हमारे अध्ययन तेज हों, और हम एक-दूसरे से द्वेष न करें।

 (iii) ‘अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे। ज्ञान वैराग्य सिद्धार्थं भिक्षां देहि च पार्वति।।’
 यह देवी अन्नपूर्णा से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रार्थना है जिसमें अन्न्मय कोष से आनंद मय कोष की सम्पूर्ण अवधारणा निहित है।

 इसमें स्पष्ट है कि भोजन का अंतिम लक्ष्य भूख मिटाना नहीं है। 
अत: यहाँ अन्नपूर्णा भगवती से ज्ञान व वैराग्य के लिए भिक्षा प्रदान करने की प्रार्थना है ।

यही भारतीय वैदिक जैविकी है।

Saturday, 30 August 2025

मूल्यवान यह दौर है

मूल्यवान यह दौर है रखें स्वयं को स्वस्थ्य।आदर्श अखंड दैदीप्यमान बने रहें ध्यानस्थ।।
भोग प्रबल माया सबल करते मन को खंड। योगाभ्यासी भारतवर्ष रहे अखंड - प्रचंड।।

Thursday, 14 August 2025

अखंड भारत संकल्प दिवस

रक्षाबंधन एवं अखंड भारत संकल्प दिवस

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और रक्षाबंधन  

सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए डॉ हेडगेवार जी द्वारा १९२५ में नागपुर के मोहिते के बाड़े में पहलीवार शाखा प्रारम्भ की गई।
 किसी भी संगठन को सतत चलाने और जीवंत बनाये रखने के लिए कुछ नित्य और कुछ नैमीत्तिक व्यवहार रखने पड़ते हैं ।
 संघ ने प्रारम्भ में दो प्रकार के कार्यक्रम तय किये । एक स्थाई व्यवस्था नियमित एक घंटे की शाखा । फिर समाज को जोड़ने, अतीत के वैभव को स्मरण करने, सामाजिक समरसता बनाये रखने के निमित्त वर्ष में छह कार्यक्रम तय हुए । उनमें से एक कार्यक्रम है रक्षाबंधन ।
 
 सामाजिक समरसता का कार्यक्रम : यह सामाजिक समरसता का कार्यक्रम है । हम सब जानते हैं की यह उत्सव हिन्दू समाज के सभी वर्गों, घटकों में मनाया जाता है । इस कार्यक्रम से समाज में समबन्धों की नीव तैयार होती है । बंधुता का भाव बढ़ता है । हम सब सहोदर है, यह भावना विकसित होती है । एक दूसरे के दुःख सुख में सरीक होने का भाव जागृत होता है । हिन्दव: सोदर सर्वे न हिन्दू पतितो भवेत् का बोध होता है । 
फिर हमारे जीवन व्यवहार में धीरे-धीरे परिवर्तन आता है । सामान्य रूप से इसे वर्षों से भाई बहन के रिश्तों को लेकर माना जाता था । इसके पौराणिक उदहारण भी हैं तो मुग़ल काल के भी हैं । उन्हें हम सब जानते हैं । 
 यह समाज में भारत के लिए माता-पुत्र की सुरक्षा के लिए भारत माता की प्रतीक स्वरुप रक्षा बंधन करते हैं । यह राष्ट्र के लिए आश्वाशन बना । भगवा ध्वज को गुरु मानकर रक्षा सूत्र बंधाते है । मंदिरों में जाकर आराध्य देव को रक्षा सूत्र बंधाते हैं । राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ ने इसे व्यक्तिगत और पारिवारिक आयोजन से आगे लाकर सामजिक और राष्ट्रीय स्वरूप दिया ।
 
संघ में रक्षाबंधन उत्सव सामूहिक जागरण के लिए होता है । इस दिन को वंचित, दलित, पिछड़ी, उपेक्षित वस्तिओं में जाकर उन्हें रक्षा सूत्र बंधार उनके सुरक्षा, समृद्धि और स्वास्थ्य का आश्वाशन देते हैं ।
उनको समाज और राष्ट्र की सेवा, संस्कृति के संरक्षण के लिए जागृत करते हैं ।
 इसके परिणाम हम संघ की इस सौ वर्ष की यात्रा में जगह जगह पड़ाव के रूप में देख सकते हैं । 
मीनाक्षी पुरम की सामूहिक धर्मान्तरित बंधुओं की घर वापसी । विवेकानद केंद्र के निर्माण के समय ईसाई मछुआरों द्वारा उत्पात मचाने पर इन्हीं सेवा वस्ती में रहने वाले नाविकों ने संघर्ष किया और केनीमेरी और क्रास को शिला से हटाया । 
 मोरबी की दुर्घटना हो या आपातकाल सब में समरस समाज के बंधुओं ने इन्हीं उत्सवों से प्रेरणा लेकर अपना योगदान दिया ।
   धागा एक रक्षा सूत्र: यह प्रेम का धागा है तो रक्षा का अश्वाशन भी । तात्पर्य यह की यह मात्र सूत्र नहीं रक्षा सूत्र है । कठिन समय में व्यक्ति का व्यक्ति के प्रति, भाई का बहन के प्रति, माता का पुत्र के प्रति और पुत्र का माता के प्रति, परिवार का समाज के प्रति, समाज का राष्ट्र और संस्कृति के प्रति धर्माधारित यह आश्वाशन है, संकल्प है । 
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय । टूटे से फिर जुड़े नहीं जुड़े गांठ पद जाय ।।    
आइये इस गाँठ के उलझाते और सुलझाते स्वरुप को समझें -
अखंड भारत संकल्प दिवस
अखण्ड भारत का क्षेत्र:
 ‘उत्तरंयत् समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणम्।’ उत्तर पूर्व पश्चिम में हिमालय की सभी शाखाओं से लेकर दक्षिण में समुद्र तक। नदियों की सीमा देखें तो - कूमा (काबुल नदी ), क्रुमू (कुरम नदी),गोमल (गोमती नदी),स्कात (सुकस्नू), अक्षु-वक्षु (Oxus), सिंधु, शतद्रु (सतलुज), ब्रह्मपुत्र (तीनों तिब्बत में), ऐरावत (वर्मा में), सरलवीन, मीकांग ( गंगा) के जल-ग्रहण क्षेत्र ये सब अखण्ड भारत के अंग रहे हैं।
 इस में बलोचिस्तान, अफगानिस्तान (उप-गणस्थान), सीमाप्रांत (राजधानी: पेशावर अर्थात् पुरुषपुर), सिंध, पश्चिमी पंजाब, बंगलादेश, ब्रह्मदेश, श्याम, इण्डो-चाईना, कंबोज (कंबोडिया), वरुण (बोर्नियो), सुमात्रा तथा तिब्बत के क्षेत्र आते हैं।

आज अंग्रेज तारीख १४ अगस्त है । अगस्त १९४७ से २०२५ की यात्रा का दिन ।
 अखंड भारत क्या है ? इसे कैसे देखेना चाहिए ? १८७६ के पूर्व का भारत : जिसमें अफगानिस्तान (1876), नेपाल (1904),, तिब्बत(1914 ), ब्रह्मदेश (1937 ), और पाकिस्तान (1947), थे।  
वर्तमान विभाजन त्रासदी क्यों ?
* १४ अगस्त बारह बजे की रात्रि । १४ अगस्त भारत माता का अंग भंग और पकिस्तान का विखंडित हिस्सा बनाना ।  
* 14 अगस्त ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ उन सभी की याद में जिन्होंने विभाजन के कारण अपनी जान गंवाई। 
* विभाजन के कारण: विभाजन के पीछे कई कारण थे, जिनमें धार्मिक मतभेद, मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग, और
* ब्रिटिश सरकार की नीति शामिल थी । क्रांतिकारियों के असंख्य बलिदान, संघर्ष और जीवन गाथाएँ केवल इतिहास की जानकारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए चरित्र, साहस और राष्ट्रनिष्ठा की प्रेरणा-स्रोत हैं।
*  इसलिए इस विरासत को शिक्षण में जीवंत, भावनात्मक और प्रेरक रूप में प्रस्तुत करना राष्ट्रीय चेतना के लिए अनिवार्य है।
*  सामाजिक जीवन मूल्यों, समरसता, प्रेरक जीवन जीने के लिये अति आवश्यक है। 
* अन्यथा समाज भ्रम, अज्ञान और स्वार्थ के दावानल के भँवर में अटल जायेगा।
* अल्प नेतृत्व और कमजोर समाज के माहौल, ब्रिटिश चालाकी, सांप्रदायिक दंगे, रणनीतिक चूक, और सैद्धांतिक अहिंसा—ये सभी मिलकर विभाजन की दिशा में काम करने वाले प्रमुख तत्व थे।
* मुस्लिम लीग की सामूहिक रणनीति को लोहिया खासतौर पर दोषी मानते हैं।
* हिंदू अहंकार और जनता की जागरूकता की कमी। ये दो ऐसे अंदरूनी कारक हैं।
* इनकी विवेचना अक्सर कम होती है, लेकिन लोहिया इसे अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं।
* कम्युनिस्ट या दक्षिणपंथ की भूमिका को लोहिया प्रभावहीन बताते हैं,उनकी नीतियाँ विभाजन में निर्णायक नहीं थीं।
क्यों कर रहें है स्मरण :
• स्वतंत्रता: 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली ।
• भारतीय इतिहास में 14 अगस्त मात्र एक तारीख नहीं, एक त्रासदी है।देश के विभाजन और उसकी त्रासदी के शिकार लोगों के दर्द को याद कर संवेदना व्यक्त करने का दिन है।
• इस दिन कांग्रेस ने देश को टुकड़ों में बाँटकर माँ भारती के स्वाभिमान को चोट पहुँचाई।विभाजन के कारण हिंसा, शोषण और अत्याचार हुए, और करोड़ों लोगों ने विस्थापन झेला।
• उन सभी लोगों के प्रति मन की गहराई से श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए ।
• देश विभाजन के इस इतिहास और दर्द को आनेवाली पीढ़ी को स्मरण दिलाने के लिए ।
• भारत विभाजन की अमानवीय वेदना वह पीड़ा हमारी स्मृति है और हमारी सीख भी है।

फिर से कोई मुस्लिम लीग न बने -
*  मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया, यह विस्थापन कोई सामान्य नहीं था। 
*  हजारों-हजार लोगों का जनसंहार हुआ, महिलाओं के साथ जघन्यतम अपराध हुए- उस दौर में भारतीय उपमहाद्वीप में मानवता त्राहिमाम कर उठी।
*  लेकिन अंग्रेजों की शातिराना कोशिशों तथा मुस्लिम ‌लीग के सांप्रदायिक एजेंडे ने आधुनिक काल में मनुष्यता पर विभाजन द्वारा बड़ा संकट खड़ा किया।
*  सन् 1905 में बंगाल के धर्म आधारित विभाजन के बाद से ही विभाजन की कुत्सित रूपरेखा बनना शुरू हो गई थी, विभिन्न इतिहासकारों ने अंग्रेजों के इस कदम को भारत विभाजन के बीज के रूप में देखा है। 
*  वहीं विभाजन के जिम्मेदारों पर बात करते हुए समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने अपनी किताब 'गिल्टी मेन ऑफ़ पार्टिशन' में लिखा है कि कई बड़े कांग्रेसी नेता जिनमें नेहरू भी शामिल थे वे सत्ता के भूखे थे जिनकी वजह से बँटवारा हुआ।
* वर्तमान भारत सरकार 14 अगस्त के दिन को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की। 
* नरेन्द्र मोदी जी ने कहा “देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। * नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों और भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी।
*  राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ जब शताब्दी वर्ष मना रहा है तो यह स्वाभाविक है की वह अपने अखंड भारत के संकल्प को दुहरायेगा ।
*  नए “पाकिस्तान” में अल्पसंख्यकों, जिनमें बौद्ध, सिख और हिंदू शामिल थे, को देश छोड़ने के लिए कहा गया।
*  कई जिहादियों ने कई मौकों पर महिलाओं के साथ बलात्कार किया। उन्होंने पुरुषों और बच्चों को मार डाला।
 * दिल्ली पहुंचने पर लाशों से लदी ट्रेनों पर बलात्कार की शिकार महिलाओं के शवों पर।“आज़ादी का तोहफ़ा” लिखा हुआ था। 
* मृतकों की संख्या इतनी ज़्यादा थी कि दिल्ली की स्थानीय सरकार कई लोगों के अंतिम संस्कार की योजना नहीं बना पाई। 
* जब उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचा, तो उन्होंने मृतकों को एक समतल जगह पर इकट्ठा किया, उन पर मिट्टी का तेल छिड़का और आग लगा दी। उस समय, दोनों तरफ़ तबाही मची थी।
*  यह दिन हमें भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के जहर को ख़त्म करने के लिए न केवल प्रेरित करेगा, बल्कि इससे एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाएं भी मज़बूत होंगी।"
*  तत्कालीन अविभाजित भारत के विभिन्न हिस्सों में 1946 तथा 1947 के दौरान हुई हिंसा तथा दंगों की व्यापकता और क्रूरता ने मानवता पर जो प्रश्नचिन्ह लगाया है, उसका उत्तर आजतक नहीं मिला।
* विभाजन के दौरान हिंसा की सनक न केवल किसी का जीवन ले लेने की थी बल्कि दूसरे धर्म की सांस्कृतिक और भौतिक उपस्थिति को मिटा देने तक की भी थी। 
* विभाजन के बाद जो हिंदू, सिख भारत आए उन्हें अनेक विषमताओं का सामना करना पड़ा।
*  लेकिन भाषाई, भौगौलिक तथा सामाजिक विषमताओं की सीमा को लांघ अपनी मेहनत के बलबूते ये नागरिक भारत के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
* एक आधुनिक लोकतंत्र के नागरिक के रूप में व्यवहारिकजीवन में अन्यों  के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़े।
*   पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में जो अल्पसंख्यक रह गए थे, उनके साथ बाद के वर्षों में हुई ज्यादतियां किसी से छिपी नहीं हैं। 
*  इतिहास पर सरसरी नजर डालने पर ऐसा लगेगा कि भारत का विभाजन जल्दबाजी में लिया गया निर्णय था।
* लेकिन करीब से देखने पर पता चलेगा कि इसकी योजना लंबे समय से बनाई जा रही थी।
* भारत को समझने के लिए इस देश की ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक एकता को समझना आवश्यक है।
*  दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक भारत की सभ्यता है।
*  मुगल आक्रमणों के बाद अखंड भारत का सपना अतीत की बात हो गया।
* क्योंकि कई भारतीय रियासतों ने लंबे संघर्ष के बाद अपना अधिकार खो दिया। 
* इसी दौरान ब्रिटिश व्यापारी भारत में आए और इतिहास की दिशा को स्थायी रूप से बदल दिया। 
* अंग्रेजों ने भारत की अखंडता पर विनाशकारी प्रहार किया।
*  भारत को दो देशों में विभाजित करने के अलावा शेष राज्यों की अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं थीं। 
करना क्या है- 
• अखंड भारत का संकल्प लेना है।
• देश के इस विभाजन की विभीषिका को भावी पीढ़ी को स्मरण दिलाना है ।  
• राष्ट्र सर्वोपरि को जीवन में उतारना है।  
• टैरिफ बम का तोड़ने के लिए स्वदेशी को अपनाना है । 
• 1947 में धर्म के आधार पर हुआ देश का विभाजन भारतीय इतिहास का एक अमानवीय और काला अध्याय है ।   
• यह देश में दुबारा न दुहराया जाए । संकल्प लें।
• अखंड भारत के स्वप्न को साकार करें । 
• विभाजन सिर्फ भूगोल का नहीं, मानवता का बंटवारा था।

 विभाजन का उत्तर है- 
*  स्मरण रखना होगा राजनीतिक सीमाएं कभी स्थिर नहीं।
* आलसेस लारेन जर्मनी तथा फ्रांस के बीच का प्रांत है। पहले नेपोलियन ने इसे फ्रांस में मिलाया, फिर प्रशिया जर्मनी
 ने। यह प्रांत 1944 में पुन: फ्रांस में मिल गया। 
* 1918 तक पोलैण्ड का कोई अस्तित्व नहीं था। 
* इस्राइल सैकड़ों वर्ष बाद स्वतंत्र यहूदी देश बना। 
* चीन के पास 1650 से पहले केवल 31 लाख वर्ग मील भूमि थी अब 54 लाख वर्ग मील है।
* रूस (Russia) आज 87 लाख वर्ग मील भूमि का स्वामी है, पहले कुल 21 लाख थी। 
* दोनों जर्मनी मिल चुके हैं। 
*  पाकिस्तान का पहले पूर्वी बंगाल पर भी अधिकार था। अब कट चुका है।
*   भारत की सीमाएं भी बदलेंगी। 
*  भारत विभाजन एक समझौते था , जो स्थाई नहीं है।इस बात को श्री अरबिंदो, श्री गुरूजी,राम मनोहर लोहिया आदि ने बार बार कहा है।


 बिना रक्तपात परस्पर सद्भाव से अखण्ड भारत संभव है-
‘पंद्रह अगस्त का दिन कहता आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी है,रावी की शपथ न पूरी है॥
लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।
पख्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन गुलामी का साया॥
बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥
थोड़े दिन की मजबूरी है॥
दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी पर्व मनाएँगे॥
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥
दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे,
गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी पर्व मनाएँगे।’
14/8/25

Tuesday, 12 August 2025

*जय स्वदेश -जय स्वदेशी

'स्व' आत्मबोध है। 'स्वदेशी' उसी का प्रकटीकरण है।
अतः 
* स्वदेशी व्यक्ति के जीवन में हिस्सा बने।
* परिवार के सदस्य स्वदेशी को प्राथमिकता दें।
* कार्यालय, व्यापारिक केन्द्रों में स्वदेशी वस्तुओं की उपलब्धता रहे।
* स्वदेशी वस्तुओं की गुणवत्ता उत्तम कोटि की हो।
* ऐसे कम्पनियों को सरकारी मदद न मिले जिसमें विज्ञापन ज़्यादा और वस्तु की गुणवत्ता कम हो।
* विद्यालयों में भारतीयता पर जोर हो।
* राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता आचार, व्यवहार में आदर्श सादगी वर्तें।

लाभ - 
* आर्थिक संकट से जूझ रहे सामान्य मध्यम वर्गीय परिवारों को राहत मिलेगी।
* आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त समूहों को सादगी पूर्ण जीवन जीने के लिए अभ्यास का अवसर मिलेगा।
* राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी जनता के व्यवहार के अनुरूप अपना आचरण बनाना होगा।
* उपदेशक, प्रवचन कर्ताओं को समाज के सादे जीवन से सीख मिलेगी।
* गरीब, वंचित भी सर उठा कर समानता का भाव बोध कर सकेगा।

राष्ट्रीय पक्ष 

* राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी।
* लघु कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।
* स्वदेश में निर्मित वस्तुएं बेरोज़गारी दूर करेंगी।
* स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
* अमेरिका जैसे देश बार-बार मूर्खता नहीं करेंगे।
* पड़ोसी चीन भी अपने व्यवहार में बदलाव लायेगा।
* भारत विश्व को सादगी, सुचिता और आत्मनिर्भरता का संदेश दे सकेगा।

कैसे होग -
* व्यक्तिगत उपयोग में धीरे-धीरे स्वदेशी चीजों का उपयोग।
* घर के छोटे बड़े सदस्यों के बीच करणीय बातों की सहज समयानुकूल चर्चा।
* घर के भोजन को विज्ञापन आधारित रेसिपी से यथासंभव दूरी बनाते हुए वातावरण को अनुकूलित करना।
* तेल, साबुन,सोड़ा आदि घरेलू चीजों में स्वदेशी का उपयोग।
* धीरे -धीरे नवीन बड़ी और मंहगी चीजों को खरीदते समय स्वदेश निर्मित चीजों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

*जय स्वदेश -जय स्वदेशी।

अंत में परिणाम में धैर्य-

* धीरे -धीरे रे मना धीरे से सब होय।
माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय।।
…................

✅ यहाँ भारत में स्वदेशी सामान क्रय करने हेतु कुछ लघु और प्रभावशाली श्लोगन दिए जा रहे हैं:-

1. "स्वदेशी अपनाओ, देश आत्मनिर्भर बनाओ!"
2. देश भक्ति रखो दम खम, स्वदेशी वस्त्र पहला कदम।
3. हर खरीदी हो भारत हितैषी, करो टेरिफ की ऐसी तेसी।
4. "विदेशी छोड़ो, स्वदेशी जोड़ो!"
5. "राष्ट्रहित में उठे हर हाथ– स्वदेशी की ही हो हर बात!
6. आत्मबल से बढ़ेगा भारत, स्वदेशी से सजेगा भारत।
7. स्वदेशी की भक्ति, स्वदेश की शक्ति।
8. अपना देश स्वदेशी माल, राष्ट्र रक्षा देखभाल।
9. स्थानीय बने सामान लाओ, भारत को भव्य बनाओ।
10. खरीदी स्वदेश की , सोच अपने देश की।
...............
रक्षा बंधन की शुभकामनाएं 🙏

स्व से स्वदेशी की अनवरत यात्रा

  

                  स्व से स्वदेशी की अनवरत यात्रा

          (ऋषि परम्परा -कूका राम सिंह -वीर सावरकर और गांधी )

भारतीय परम्परा में दृष्टि श्रेय और प्रेय की है।  

श्रेय के हकदार ऋषि हैं तो प्रेय में क्रमशः कूका राम सिंहवीर सावरकर और गांधी तक के सभी वे जिन्होंने यह यात्रा आगे बढ़ाई।

…………………………………

भारत की मानवता के कल्याण की दृष्टि -

भारत के प्रथम परमाणु वैज्ञानिक महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में कहा है, ‘दृष्टनां दृष्ट प्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय’ । अर्थात् प्रत्यक्ष देखे हुए और अन्यों को दिखाने के उद्देश्य से अथवा स्वयं और अधिक गहराई से ज्ञान प्राप्त करने हेतु किये गये प्रयोगों से अभ्युदय’ का मार्ग प्रशस्त होता है ।

 * कण से लेकर ब्रह्मांड तक के प्रयोजनों को जानने के लिए महर्षि गौतम ने न्याय दर्शन में सोलह चरण की प्रक्रिया बताई हैं । और बताया कि इस प्रक्रिया से पृथ्वीजलतेजवायुआकाशदिक्कालमन और आत्मा को जानना चाहिए । 

गीता के 7वें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं कि ब्रह्म के समग्र रूप को जानने के लिए ज्ञान-विज्ञान दोनों को जानना चाहिएक्योंकि इन्हें जानने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रहता ।

भृगु संहिता में भारतीय शिल्प शास्त्र में पूरे विज्ञान सम्पदा और उसकी भारतीय खोजों- विद्युत शास्त्रयंत्र विज्ञानधातु शास्त्रविमान विद्यानौका शास्त्रवस्त्रु शास्त्रगणित शास्त्रकाल गणनाखगोल सिद्धांतस्थापत्य शास्त्ररसायनशास्त्रवनस्पतिशास्त्रकृषि विज्ञानप्राणि विज्ञानस्वास्थ्य विज्ञानघ्वनि विज्ञानलिपि विज्ञानसनातन राष्ट्र की उपलब्धियों का परिचय है ।

 * इसलिए यह बोध होना आवश्यक है की विज्ञान की श्रेष्ठ परम्परा उस समय से हैं जब पश्चिम ठीक से अस्तित्व में भी नहीं आया था । यह भारत की स्वदेशी विरासत है।

…………………………………………………….

राम सिंह कूका से गाँधी तक :.

१८५७ का स्वातंत्र्य समर स्वदेशी स्व’ शब्द से आया । १८५७ में पंजाब के कूका राम सिंह ने स्वदेशी की बात की और अंग्रेजों की डाक व्यवस्था का विरोध कर स्वदेशी कूका व्यवस्था लागू की ।

वीर सावरकर ने १२ वर्ष की उम्र में हितेच्छु’ में स्वदेशी की फटकार’ लेख लिखा । २२ वर्ष की उम्र में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई । 

वर्ष १९०५ के बंग-भंग विरोधी जनजागरण से स्वदेशी आन्दोलन को बल मिला । अरविन्द घोषरवीन्द्रनाथ ठाकुरविनायक दामोदर सावरकरलोकमान्य बाल गंगाधर तिलकऔर लाला लाजपत राय स्वदेशी आन्दोलन के मुख्य उद्घोषक थे । बंगभंग आन्दोलन में बंदेमातरम्’ ने धूम मचा दी । समझना होगा तब तक गांधी यहां अनुपस्थिति हैं।

 * पूर्वजों की विरासत गांधी में छाया बन कर दिखी। परिणामत: कांग्रेस को १९३० में रावी के तट पर पूर्ण स्वराज’ का प्रस्ताव पारित करना पड़ा । 

रा.स्व. संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने इसके लिए कांग्रेस को धन्यवाद पत्र भी भेजा था । तात्पर्य संघ का स्वदेशी प्रकटीकरण।

यही स्वदेशी आन्दोलन स्वतन्त्रता आन्दोलन का केन्द्र-बिन्दु बना । जिसे गाँधी ने स्वराज की आत्मा’ कहा।

…..............

विदेशियों की नज़र में भारत -

 * स्वदेशी से समृद्ध भारत का संकेत प्रसिद्ध स्विस लेखक बजोरन लेण्डस्ट्राम अपनी पुस्तक भारत एक खोज’ में देता है- ‘‘ मार्ग और साधन कई थेपरन्तु उद्देश्य सदा एक ही रहा- प्रसिद्ध भारत भूमि पर पहुँचने काजो देश सोना चाँदीकीमती मणियों और रत्नोंमोहक खाद्योंमसालोंकपड़ों से लबालब भरा पड़ा है।’’

 * सार यह कि आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में भारत के पास ये क्षमताएँ उस समय से थींजब पश्चिम के कई देशों का जन्म भी नहीं हुआ था ।  

................

परिधान में भारतीय दृष्टि -

भारतवर्ष में उत्तर से लेकर दक्षिण तक परिधानों/वस्त्रों के प्रयोग में जलवायु भिन्नता के कारण विविधता दिखाती है । किन्तु वे सब भारतीय भेषभूषा ही हैं ।

भारतीय परिधान का अर्थ है भारत की पारंपरिक वेशभूषा । कपड़ों का पहनना अपनी स्व’ की पहचान हैं । यह सिर्फ कपड़े पहनने का तरीका नहीं है । यह भारत की संस्कृतिपरम्परा और क्षेत्रीय पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है ।

यह विभिन्न क्षेत्रोंमत-पंथों और सामाजिक- सांस्कृतिक समूहों के बीच विविधतासामाजिक स्थिति को दर्शाता है ।

कूका राम सिंह से लेकर गांधी तक का खादी का आग्रह स्वदेशी और स्वाभिमान का आग्रह तो था हीस्वरोजगारकुटीर उद्योगों के अस्तित्व के लिए भी था । 

 * गांधी का चरखा स्वदेशी यंत्रों के उपयोग का प्रतीक था ।  

....................

 स्वदेशी वर्तमान में प्रासंगिक क्यों -

 (१) भारत की सुरक्षा एवं एकता को सुनिश्चित करना। (२) आर्थिक और सामरिक रूप से आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण । (३) भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को बढावा देना । (४) प्राकृतिक संपदा का संरक्षण। (५) सभी क्षेत्रों एवं सभी समाजों का संतुलित विकास । 

…...............

 स्व का व्यवहारिक सूत्र स्वदेशी  -

स्वदेशी की सफलता उसके क्रियात्मक स्वरुप पर निर्भर करता है । स्व’ सिद्धांत है तो स्वदेशी उसका व्यावहारिक स्वरूप ।

..............

 ‘स्व’ का जागरण और स्वदेशी प्रकटीकरण के क्षेत्र -

* (१) भाषा, (२) भूषा, (३) भजन, (४) भोजन, (५) भेषज । 

        ...............

 शाश्वत और परिवर्तनशील : युगानुकुल प्रयोग:

तीन स्तर पर करना अपेक्षित है -

 (१) व्यक्तिगत जीवन में आचरण करना । 

(२) परिवार में स्वबोध और स्वदेशी का उपयोग । 

 (३) अपने कार्यक्षेत्र में स्वाबलंबी बनाने की प्रकिया में स्व’ और स्वदेशी का चिंतन,अनुशंधान तथा युगानुकूल प्रयोग। 

13/8/25