Thursday, 26 June 2025

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य में अस्त्मिता मूलक विमर्श

 

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य में अस्त्मिता मूलक विमर्श

1- स्वातंत्र्योत्तर भारतीय साहित्य पर आधुनिकतावाद, हिंदुत्ववाद, गांधीवाद, मार्क्सवाद और आम्बेडकरवाद का प्रभाव हैं।

2-  विशेषकर आम्बेडकरवाद ने भारतीय साहित्य का भूगोल बदल दिया और यह साहित्य लोककेन्द्री बन रहा है । 

3- स्वातंत्र्योत्तर भारतीय साहित्य का स्वर बहुस्वरान्वेषी है।

4-अस्मिता-अहंभाव, अपनी सत्ता का भाव, अहंकार, अभिमान। 

5- राष्ट्रीय अस्मिता का अर्थ है उन लक्षणों और विशेषताओं का पहचान, जिनसे राष्ट्र का अपना एक स्वरुप बनता है, विश्व में उसकी अपनी अलग पहचान बनती है, वह एक स्वतंत्र, प्रभुत्व संपन्न राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होता है। इस पहचान से ही हमारे मन में राष्ट्र के प्रति अपनत्व, प्रेम, निष्ठा और समर्पण की भावना पैदा होती है।

6- भारत और राष्ट्रीय अस्मिता - में राष्ट्रवाद, देशप्रेम, उदारवाद, लोकतन्त्र और मानवतावाद जैसे ऐतिहासिक और समकालीन विषयों के विस्तृत विश्लेषण के साथ आरम्भ होती है। 

7- इसी परिप्रेक्ष्य में गाँधी, नेहरू, टैगोर, अम्बेडकर, पटेल, आज़ाद आदि जैसे भारत के अग्रणी नेताओं के सजग विचारों की व्याख्या सामने आती है

8- किन्तु दुर्भाग्यवश आज इन महान विचारों की मुठभेड़ हिन्दुत्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले सिद्धान्तकारों और टुकड़े टुकड़े गैंग से है।

9- वर्तमान सत्ता शीर्ष पर आसीन (मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार) और 'जाति, सम्प्रदाय, घुसपैठियों से पोषित दलों के  बीच संघर्ष है।

10- आज का संघर्ष भारत के इन दो परस्पर विरोधी विचारों के बीच का द्वन्द्व है जिसे धार्मिक -सांस्कृतिक राष्ट्रीयता वनाम जातीय , क्षेत्रीय परिवार वादी राष्ट्रवाद के द्वन्द्व के नाम से व्याख्यायित करना अधिक उपयुक्त होगा।

 11- आज का यह विमर्श इसलिए भी और भी प्रासंगिक है की भारत की आत्मा की लड़ाई पहले की तुलना में  अधिक कठिन  हो गयी है, और स्वतन्त्रता के बाद के वर्षों में भारत ने बहुलतावाद, पंथ निर्पेक्षता वाद और सर्रावसमावेशी  राष्ट्रीयता के जो विलक्षण विचार अर्जित किये थे, उन्हें स्थायी रूप से क्षति पहुँचाने के संकट निरन्तर मँडरा रहे हैं। 

12- आज एक विचार धारा निरंतर यह दुष्प्रचार कर रहा है की कुछ व्यक्ति और संताए संविधान पर आधिपत्य जमाना  चाहते हैं ।

13- प्रोपोगंडा यह कि स्वायत्तशासी संस्थाओं की स्वतन्त्रता को सायास समाप्त किया जा रहा है, मिथकीय इतिहास का निर्माण और प्रचार जारी है, विश्वविद्यालयों को शिकार बनाया जा रहा है।

14-  और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अल्पसंख्यकों के विरुद्ध प्रताड़ना और हिंसा की घटनाएँ लगातार घट रही हैं। 

15- समय व्यतीत होने के साथ-साथ भारतीय विचारों पर लगातार हमले हो रहे हैं, जिन विचारों के कारण दुनिया भर में भारत की प्रशंसा की जाती थी उस वसुधैव कुटुम्बकम को टुकड़ों में बांटा जा रहा है ।

16- स्वेच्छाचारी लेखक ,नेतागण और उनके कट्टरवादी समर्थक देश को संकीर्णता और असहिष्णुता के घटाटोप की ओर ले जा रहे हैं।  

17- अत: आवश्यक है की तर्कसम्मत और प्रांजल भाषा में लिखे गए स्वतान्त्योत्तर साहित्य को सामने लाया जाये और  अस्मिता के इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए क्या-क्या उपाय हो  सकते हैं ताकि उन सभी चीज़ों को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके जो भारत के सन्दर्भ में अतुल्य और अमूल्य हैं।  

18- भारतीयता के अर्थ को स्थापित करने के लिए जहाँ अतीत के स्वर्णिम पृष्ट को सामने रखाना होगा वही इक्कीसवीं शताब्दी में एक देशप्रेमी और राष्ट्रीय भारतीय होने के साहित्य के मायाने तलाशने होंगे ।

19- राष्ट्रीय विचार, राष्ट्रीय अस्मिता पर ही आघात करने वाले, उसके बारे में सम्भ्रम निर्माण करने वाले, इस अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को नकारने वाले तत्व शक्तियां सक्रिय हो गई थीं। इसलिए फिर राष्ट्रीय शक्तियों को राष्ट्र की पहचान को नकारने वाले, उसकी नकारात्मक प्रस्तुति, प्रतिपादन और प्रचार करने वालों के विरुद्ध युद्ध, धर्मयुद्ध छेड़ना आवश्यक हो गया। 

20- अस्मिता का अर्थ है- पहचान तथा भाषाई अस्मिता से तात्पर्य है- भाषा बोलने वालों की अपनी पहचान।

21- ‘अस्मिताशब्द के संदर्भ में डॉ. नामवर सिंह ने कहा है कि- हिंदी में अस्मिताशब्द पहले नहीं था। 1947 से पहले की किताबों में मुझे तो नहीं मिला और संस्कृत में भी अस्मिता का यह अर्थ नहीं है।अहंकारके अर्थ में आता है, जिसे दोष माना जाता है।

22-  हिंदी में आईडेंटिटीका अनुवाद अस्मिताकिया गया और हिंदी में जहाँ तक मेरी जानकारी है, पहली बार अज्ञेय ने आईडेंटिटीके लिए अनुवाद अस्मिताशब्द का प्रयोग हिंदी में कियाहै।” 

23- संसार में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी निजी विशेषताएँ होती है। भाषा उनमें से एक है। यह प्रमाणित हो चुका है कि प्रत्येक व्यक्ति की भाषा दूसरे से अलग होती है। एक ही भाषा का प्रयोग करने वाले लोगों में उच्चारण, शब्द चयन एवं शैली के स्तर पर भेद पाए जाते हैं। 

23- हिंदी में कविता के संदर्भ में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला’, तथा अज्ञेयआदि की भाषा एक-दूसरे से भिन्न दिखाई पड़ती है। 

24- इसी प्रकार किसी वर्ग विशेष, समाज विशेष एवं राष्ट्र विशेष के लोगों की भाषा भी दूसरे से भिन्न होती है। अतः कह सकते हैं कि किसी वर्ग, समाज एवं राष्ट्र आदि की अस्मिता उसकी भाषा में भी प्रतिबिंबित होती है। 

25- अस्मिता को प्रकट करने वाली भाषा को हम मनोवैज्ञानिक, भौगोलिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा जातीय आदि कई आधार पर देख सकते हैं।

26- मनोवैज्ञानिक अस्मिता का संबंध भाषा से होता है। भाषा के द्वारा व्यक्ति की मनःस्थिति का पता लगाया जा सकता है। व्यक्ति के विचारों को जानने का प्रमुख साधन भाषा ही होता है। किसी बालक, युवक तथा बुजुर्ग की भाषा में अंतर होता है। भाषा के द्वारा उनकी सोच एवं अनुभव आदि का परिचय हमें सहज रूप में मिल जाता है। 

27- भाषा के द्वारा हम यह भी जान सकते हैं कि कोई व्यक्ति अंतर्मुखी है अथवा बहिर्मुखी है। अंतर्मुखी व्यक्ति अक्सर मित्भाषी तथा बहिर्मुखी व्यक्ति वाचाल होते हैं। 

28- भौगोलिक अस्मिता का परिचय भी भाषा के माध्यम से मिलता है। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की भाषा में अंतर देखा जा सकता है। इन क्षेत्रों में प्रयुक्त शब्दावली भी अलग-अलग होती है। 

29- कृषि प्रधान देश अथवा क्षेत्र में कृषि से संबंधित शब्दों की अधिकता होती है। यदि किसी भौगोलिक क्षेत्र में कोई वस्तु अधिक पाई जाती है, तो वहाँ उस वस्तु के सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद के लिए भी अलग-अलग शब्द होते हैं। 

30-हिंदी में पानी के ठोस रूप के लिए केवल बर्फशब्द का प्रयोग होता है, वहीं अंग्रेजी में आइस’(ice) तथा स्नो’(snow) दो शब्दों का प्रयोग होता है। 

31- एस्कीमों के यहाँ बर्फ के विभिन्न प्रकार एवं स्थितियों को बताने वाले कई शब्दों का प्रचलन है। एस्किमों बर्फ पर रहते हैं। बर्फ के विभिन्न छवियों से परिचित होना उनके लिए ज़रूरी भी है। पीटर ट्रुटगिल के अनुसार – “यह एस्किमों के लिए आवश्यक है कि उनमें विभिन्न प्रकार के बर्फ के बीच निपुणतापूर्वक अंतर करने की योग्यता हो।” 

32- किसी व्यक्ति से बातचीत करके भी हमें उसके भौगोलिक क्षेत्र अर्थात् निवास स्थान का पता चल जाता है। हिंदी भाषा में ही कई बोलियाँ आती है। जब कोई व्यक्ति मानक हिंदी में बात करता है, तो उसमें उसके क्षेत्र की बोली का थोड़ा प्रभाव आ ही जाता है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर तथा आगरा क्षेत्र (जिला) में रहने वाले दो लोगों की हिंदी के बीच फर्क होता है। यह फर्क उनकी बातचीत में देखा जा सकता है। 

33- पीटर ट्रुटगिल ने यह स्थापना दी है कि-हमारे उच्चारण एवं बातचीत के द्वारा यह सामान्य रूप से पता चल जाता है कि हम किस देश से आए हैं।

34- धर्म एवं जाति के आधार पर बनी अस्मिता भी महत्वपूर्ण होती है तथा इसका भाषा से गहरा जुड़ाव होता है। भारत में रहने वाले हिंदू-मुस्लिम एवं ईसाइयों की भाषा का अध्ययन करने पर हम देख सकते हैं कि हिंदी बोलते हुए हिंदुओं का झुकाव संस्कृत के प्रति, मुसलमानों का अरबी-फारसी के प्रति तथा ईसाइयों का अंग्रेज़ी के प्रति होता है। 

35- धर्म एवं जातिगत पहचान बनाए रखने के लिए ही कनाडा में रहने वाला हिंदू परिवार विवाह के समय संस्कृत में मंत्रों का उच्चारण करवाता है। इसके बावजूद भी भाषा का धर्म से संबंध इतना सीधा और सरल नहीं है। भाषा को किसी धर्म विशेष से जोड़कर हमेशा नहीं देखा जा सकता।

36-  बंग्लादेश में इस्लाम को मानने वाले बहुसंख्यक लोगों ने अरबी-फारसी अथवा उर्दू के स्थान पर बँगला भाषा को स्वीकार कर भाषा और धर्म के गहरे संबंध के मिथ को भी एक प्रकार से तोड़ा है। 

36- आज दुनिया में कई ऐसे इस्लामिक देश हैं जो भाषा की दृष्टि से अलग-अलग हैं,जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, तुर्की आदि।

37- सामाजिक अस्मिता का भाषा से गहरा संबंध होता है। दो अलग-अलग समाज के मध्य हम भाषा के आधर पर भी अंतर देख सकते हैं। यहाँ तक की एक भाषा समाज में भी विभिन्न वर्गों की अस्मिता भाषा के द्वारा व्यक्त हो जाती है। 

38- विभिन्न वर्ग अपनी विशिष्ट भाषिक क्षमता, शब्दावली एवं भाषा-शैली के माध्यम से स्वयं की अस्मिता को उजागर कर देते हैं। उदाहरणस्वरूप समाज में निम्न एवं उच्च वर्ग की भाषा, शिक्षित एवं अशिक्षित वर्ग की भाषा, शहरी एंव ग्रामीण वर्ग की भाषा,अधिकारी एंव अधीनस्थ वर्ग की भाषा आदि को हम देख सकते हैं। 

39- यहाँ तक की स्त्री और पुरुष वर्ग की भाषा का भी इस दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है।प्रसिद्ध भाषाविद् लेकऑफ (lackoff) का यह मानना है कि स्त्रियों का शब्द चयन भी पुरुषों से भिन्न होता है। उनके अनुसार आकर्षक,मोहक,दैवीय, प्यारा,मधुर जैसे विशेषण साधारणतः केवल स्त्रियों द्वारा प्रयोग में लाई जाती है।

40-  इसके अतिरिक्त पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की भाषा अधिक विनम्र एवं मानक होती है तथा वे वर्जित एवं अश्लील शब्दों का भी कम प्रयोग करती हैं।

41- भारत के संदर्भ में सामाजिक अस्मिता का भाषा से गहरे संबंध का पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ राज्यों का गठन भाषा को आधार बनाकर किया गया है। 

42- रामविलास शर्मा तथा रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव जैसे भाषाविद् एवं आलोचक भाषा के आधार पर ही उत्तर भारत की जनता को एक सूत्र में बाँधने की वकालत करते हुए हिंदी जाति तथा हिंदी भाषाई समाज की बात करते हैं। 

43- भाषा को अस्मिता का सवाल बनाकर ही 1960 ई. में महाराष्ट्र को दो उपखण्डों महाराष्ट्र तथा गुजरात में विभक्त किया गया था। पंजाब से हरियाणा को अलग करने के पीछे भी भाषा एक प्रमुख कारण थी। आज पश्चिम बंगाल से गोरखालैंड को अलग करने के लिए जो आंदोलन चलाए जा रहे हैं, उसमें भाषा को एक प्रमुख हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। 

44- राज्यों के टूटने से समाज एवं राष्ट्र का भला होता है अथवा नहीं, यह एक अलग बहस का मुद्दा है, किंतु इस बात से हम इनकार नहीं कर सकते हैं कि राज्य के बँटवारे में भाषा एक प्रमुख कारक तत्त्व होता है। अतः देश में राज्यों के पुनर्गठन के पीछे भौगोलिक, राजनीतिक तथा आर्थिक कारणों से परे भाषा को आधार बनाकर निर्णय लेना वस्तुतः भाषा से जुड़ी अस्मिता के महत्व को ही दर्शाता है। 

45- इससे यह तथ्य भी सामने आता है कि किसी समाज विशेष के सदस्यों को जोड़कर रखने में भी भाषा की प्रमुख भूमिका होती है। ठीक इसी प्रकार एक समुदाय का दूसरे समुदाय से अलगाव का प्रमुख कारण भी भाषा ही होती है।

46-भाषाई अस्मिता के आधार पर हम राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा में भी अंतर देख सकते हैं। राजभाषा वस्तुतः प्रशासनिक प्रयोजन एवं आर्थिक विकास के लिए एक प्रकार से जनता पर थोपी गई भाषा होती है, वहीं राष्ट्रभाषा का संबंध् सामाजिक अस्मिता की भाषा से है। यह किसी देश की अपनी भाषा होती है। लोगों का अपने राष्ट्रभाषा के प्रति भावात्मक रूप से जुड़ाव होता है। यह देश की एकता को एक मजबूत आधर प्रदान करता है। किसी भी देश के लोगों की पहचान उस देश की राष्ट्रभाषा से होती है, न कि राजभाषा से। भारत में हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।

47- भारत में विभिन्न राज्यों का गठन भाषा के आधार पर हुआ है। इसके बावजूद भी यहाँ भाषाओं के आधार पर बनी अस्मिता विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक प्रयोजनों के कारण सोपानिक ढंग से स्तरीकृत है। अतः एक राज्य का व्यक्ति केवल एक भाषा का ही प्रयोग नहीं करता। स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में वह बोली, भाषा तथा अंतर्राष्ट्रीय भाषा का प्रयोग करता है। 

48- रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव के अनुसार- अगर भाषाएँ, सामाजिक अस्मिता के निर्माण के साधन और उसके बनने के सूचक के रूप में काम करती हैं, तो हमारी भाषा संबंधी सामाजिक अस्मिता भी स्तरीकृत होगी। 

49- इस संदर्भ में हम यह कह सकते हैं कि हिंदी भाषी एक स्तर पर अपनी बोलियों से जुड़ा है और दूसरे स्तर पर अपनी भाषा हिंदी से भी।

50- इसी प्रकार अहिंदी भाषी एक स्तर पर अपनी जनपदीय भाषा से और अखिल भारतीय संदर्भ में हिंदी और अंग्रेजी से जुड़ा है। एक बँगाली व्यक्ति स्थानीय स्तर पर बँगला का, राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क के लिए हिंदी का तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी का प्रयोग करता है। अतः संभव है कि यहाँ दो स्तरों पर टकराव की स्थिति पैदा हो जाए। दक्षिण भारत के लोगों द्वारा राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार न करने के पीछे का कारण दो स्तरों के बीच भाषा का तनाव ही है।

51- जातीय पुनर्गठन की प्रक्रिया सामाजिक होती है। जहाँ कोई बोली सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक कारणों से अधिक महत्त्व प्राप्त कर लेती है तथा आगे चलकर सामाजिक अस्मिता का आधर बन जाती है। आज भाषा के रूप में खड़ी बोली हिंदी विभिन्न बोलियों के मध्य संपर्क भाषा का काम कर रही है तथा अन्य जनपदीय भाषाएँ ब्रज, अवधी, भोजपुरी और मगही आदि उसकी बोलियाँ कहलाती है। अन्यथा हम जानते है की भोजपुरी और मगही अर्धमागधी अपभ्रंश से उत्पन्न है।

52-  ग्रियर्सन इसे हिंदी की बोली मानते ही नहीं है। रूपात्मक (व्याकरणिक) दृष्टि से भोजपुरी हिंदी से अलग ठहरती है। वास्तव में भोजपुरी को हिंदी की बोली स्वीकारने के पीछे समान सामाजिक चेतना और संस्कृति के आधार पर बनी जातीय अस्मिता है। इसी प्रकार हिंदी एवं उर्दू का जो सवाल है, वह वास्तव में दो भाषाओं की संरचनागत भेद या समानता का सवाल नहीं है। वह भाषाई अस्मिता का सवाल है। एक समुदाय विशेष उर्दू भाषा में अपनी पहचान पाता है। यह भाषा उसे अपने होने का एहसास दिलाती है।

53- अतः किसी व्यक्ति, वर्ग, समाज और राष्ट्र की अस्मिता उसकी भाषा से भी व्यक्त होती है। भाषाई अस्मिता किसी देश की एकता में अपनी प्रमुख भूमिका निभाती है। राष्ट्र की सर्वाधिक सशक्त पहचान उसकी भाषा होती है। भाषा से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा किसी भी राष्ट्र की ताकत होती है, जो राष्ट्र निर्माण के कार्य में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

54- उपर्युक्त विवेचन के आधर पर कहा जा सकता है कि भाषा अस्मिता से अभिन्न रूप से जुड़ी होती है। भाषा का इस दृष्टि से अध्ययन एक ओर जहाँ भाषा का समाज से संबंध एंव भाषा के व्यावहारिक महत्व को रेखांकित करता है, वही दूसरी ओर भाषा को देखने-समझने का एक नया आयाम भी प्रस्तुत करता है।

55-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढक़र है। फिर अपनी मातृभूमि से प्रेम क्यों नहीं ? अपनी मातृभूमि की अस्मिता से संबद्ध प्रतीक चिन्हों से घृणा क्यों? प्रश्न अनेक हैं परंतु उत्तर कोई नहीं। 

56- प्रश्न है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का। क्यों कुछ लोग इसका इतना विरोध करते हैं कि वे यह भी भूल जाते हैं कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, जिस राष्ट्र में निवास करते हैं, यह उसी राष्ट्र का गीत है, उस राष्ट्र की महिमा का गीत है?

57- वंदे मातरम को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होते रहे हैं परंतु इसकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती चली गई। 2००3 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार वंदे मातरम विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। इस सर्वेक्षण विश्व के लगभग सात हजार गीतों को चुना गया था। बीबीसी के अनुसार 155 देशों और द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था।

58- उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कर्नाटक विधानसभा के इतिहास में पहली बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ शुरू हुई। अधिकारियों के अनुसार कई विधानसभा सदस्यों के सुझावों के बाद यह निर्णय लिया गया था। विधानसभा अध्यक्ष कागोदू थिमप्पा ने कहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में वंदे मातरम गाया जाता है और सदस्य बसवराज रायारेड्डी ने इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव दिया था जिसे आम-सहमति से स्वीकार कर लिया गया।

59- वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है। वंदे मातरम बहुत लंबी रचना है जिसमें मां दुर्गा की शक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है। भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है। इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा देकर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है जो 52 सेकेंड है।

60- 7 सितंबर, 2००6 को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रलय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया था। इसके बाद देशभर में वंदे मातरम का विरोध प्रारंभ हो गया। परिणामस्वरूप तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को संसद में यह वक्तव्य देना पड़ा कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है। यह व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह वंदे मातरम गाये अथवा न गाये। 

61- इस तरह कुछ दिन के लिए यह मामला थमा अवश्य परंतु वंदे मातरम के गायन को लेकर उठा विवाद अब तक समाप्त नहीं हुआ है। जब भी वंदे मातरम के गायन की बात आती है, तभी इसके विरोध में स्वर सुनाई देने लगते हैं। इस गीत के पहले दो पदों में कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है। इसके बाद भी कुछ मुसलमानों का कहना है कि इस गीत में दुर्गा की वंदना की गई है जबकि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने की मनाही है।

62-  इसके अतिरिक्त यह गीत ऐसे उपन्यास से लिया गया है, जो मुस्लिम विरोधी है। गीत के पहले दो पदों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन किया गया है। इसके बाद के दो पदों में मां दुर्गा की आराधना है लेकिन इसे कोई महत्त्व नहीं दिया गया है।

63- साहित्य 'सुरसरि सम सबकर हित होई' की बात करता है और राजनीति भी जनहित की बात। जन-मन की आवाज हुए बिना साहित्य सार्थक नहीं होता, जनपक्षधरता के कारण ही साहित्य बहुधा विपक्ष बना रहता है। साहित्य का परिवर्तनकारी स्वभाव समाजवाद के सैद्घान्तिक रूप से मेल खाता है, क्योंकि भारतीय साहित्य की एक बड़ी विशेषता जनपक्षधरता भी है। सामाजिक वर्ग भेद और उसके बीच सामंजस्य भी नई बात नहीं।

 64- भारत की स्वाधीनता के 75 वर्ष की यात्रा और राष्ट्रीय विचारों की  वह यात्रा है जो अनेक प्रकार से , अनेक कोनों से अपने ही लोगो द्वारा  रोकी जाती रही है । स्वाधीनता से शुरू हुई साहित्य की यात्रा सही अर्थ में स्व-तंत्रता से सुराज तक पहुंचानी है तो उस स्वके उद्घोष का स्वर वैचारिक  रूप से प्रखर करना होगा ।

65- द्वितीय महायुद्ध 1945 में समाप्त हुआ। तब इंग्लैण्ड, जर्मनी और जापान इन देशों की बहुत हानि हो चुकी थी। उन्होंने अपने देश को फिर से खड़ा करने की शुरुआत की। 

66- 1948 में इज्राएल ने एक अर्थ में शून्य से शुरुआत की थी। भारत 1947 में स्वाधीन हुआ। इंग्लैण्ड, जर्मनी या जापान जैसी हानि भारत की नहीं हुई थी। नैसर्गिक संसाधन, प्रतिभा, जनसंख्या, प्रदीर्घ इतिहास, जीवन का परिपूर्ण चिंतन, अनुभव इन सभी दृष्टि से भारत इन चारों देशों से बहुत आगे था, समृद्ध था। 

67- फिर भी इन चारों देशों ने जीवन के अनेक क्षेत्रों में जितनी प्रगति की है, उतनी भारत नहीं कर सका है। इसका एकमात्र कारण यह है कि जब तक लोकके नाते हम कौन हैं, यह हम तय नहीं करते, तब तक राष्ट्र के नाते हमारी प्राथमिकताएं हम तय नहीं कर सकते। 

68- और उपरिल्लेखित इंग्लंड, जर्मनी, जापान और इज्राएल, इन चारों देशों के लोगों में राष्ट्रके नाते हमकौन हैं, हमारे पुरखे कौन थे, हमारा इतिहास क्या है, भूतकाल में हमारी गलतियां, उपलब्धि क्या रही है, इस के बारे में वे सब सहमत थे।

69- केवल भारत ही ऐसा एक देश है जिसके लोगों में हम कौन हैं, हमारा इतिहास क्या रहा है, हमारी उपलब्धि, विशेषताएं क्या रहीं, इस के बारे में हम सहमत नहीं हैं। 

70- इसी कारण स्वाधीनता के बाद हमारी विदेश नीति, रक्षा नीति, शिक्षा नीति और अर्थनीति अपने स्वके प्रकाश में ना रहकर दूसरे, पश्चिम के अननुभवी या कम अनुभवी विचार या देशों के आधार पर तय होती गई। और, भारत की धन, बुद्धि, संसाधन, सम्पदा का अपव्यय ही होता चला गया।

 71- अब सोमनाथ मंदिर के निर्माण की ही बात लेते हैं। जूनागढ़ रियासत के भारत में विलीनीकरण की प्रक्रिया पूर्ण कर (1948) स्वाधीन भारत के प्रथम गृह मंत्री सोमनाथ गए। 

72- प्रसिद्ध, ऐतिहासिक द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से प्रमुख, लाखों भारतीयों की आस्था का केंद्र, ऐसे सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेष देख कर उनका मन पीड़ित हुआ और उस मंदिर का जीर्णोद्धार करने का संकल्प उनके मन में जगा। 

73- भारत की दो भिन्न अवधारणाओं के बीच का अंतर। इसी कारण भारत की स्वाधीनता के पश्चात की यात्रा भारत के स्वके प्रकाश में शुरू न होकर पश्चिम के विचारों के प्रभाव में शुरू हुई।

  74- राष्ट्रीय विचार, राष्ट्रीय अस्मिता पर ही आघात करने वाले, उसके बारे में सम्भ्रम निर्माण करने वाले, इस अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को नकारने वाले तत्व शक्तियां सक्रिय हो गई थीं। राष्ट्रीय अस्मिता को नकारना, जिस भारत को दुनिया शतकों से जानती आई है, उसे नकारना, यह मानो अपने-आप को बुद्धिजीवी, प्रगतिशील और लिबरल कहलाने का फैशन चल पड़ा।

75- एक अर्थ में यह राष्ट्रीय अस्मिता का धर्मयुद्धही छिड़ गया था। इसलिए फिर राष्ट्रीय शक्तियों को राष्ट्र की पहचान को नकारने वाले, उसकी नकारात्मक प्रस्तुति, प्रतिपादन और प्रचार करने वालों के विरुद्ध युद्ध, धर्मयुद्ध छेड़ना आवश्यक हो गया।

76- धर्मयुद्ध में दुर्योधन, दु:शासन, शकुनि जैसे दुष्टों का विरोध करना आवश्यक होता है, उसी तरह धर्म की रक्षा हेतु, भीष्माचार्य, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे वंदनीय लोगों पर भी शरसंधान करना आवश्यक होता है।  

77- स्वाधीन भारत के वैचारिक जगत में धर्मयुद्ध के लिए, राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा, उसका प्रसार, प्रबोधन और अपप्रचार का प्रतिकार करने की दृष्टि से इस तरह के विमर्श आवश्यक हैं ।

78-  किन्तु एक बात स्मरण रहे की  महाभारत के धर्मयुद्ध के समय दोनों पक्ष में एक ही परिवार के लोग थे। कौरव पक्ष के जीवनमूल्य और जीवनादर्श अलग थे, पर वे थे तो अपने ही। इसी तरह साहित्य के विमर्श में राष्ट्रविरोधी विचारों का विरोध, उनके षड्यंत्रों का पर्दाफाश सफलतापूर्वक करते हुए भी वे अपने ही हैं, यह ध्यान में रखकर युद्धस्व विगतज्वर’, इसका भी सतत ध्यान रखा है। 

79- कभी-कभी विमर्श हेतु उनके विचारों को भी स्थान दिया जाना चाहिए । यही भारत की परम्परा रही है। अपने विरोधियों को समूल नष्ट करना, यह सेमेटिक मूल का सिद्धांत, जिसे ईसाईयत, इस्लाम और साम्यवादियों ने अपनाया दिखता है, पूर्णत: अभारतीय है। समन्वयात्मक और समावेशी, ऐसे भारतीय चरित्र का परिचय कराते हुए ही भारतीय अस्मिता के पक्षधर मत साहित्य के माध्यम से जो रखते रहे उनका  हार्दिक अभिनंदन करना चाहिए । 

  80- 20 वी सदी विमर्शों की सदी है। इस सदी में समाज के सभी वंचित समूहों ने अपने हक, अधिकार और अपनी अस्मितागत पहचान के लिए निर्णायक लड़ाई छेड़ रखी है। 

81- उनका मानना है कि यह लड़ाई किसी के विरूद्ध नही, बल्कि अपने पक्ष में लड़ी जा रही है। इन लड़ाइयों के पीछे एक सुविचारित दर्शन कार्य कर रहा है। 

82- हिंदी साहित्य के तीनों विमर्शों (दलित, नारी और आदिवासी) में समाज के इन वंचित वर्गों ने कहानी, कविता, उपन्यास, आत्मकथा और अन्य विधाओं के माध्यम से साहित्य जगत में मुख्य धारा का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 

82- इन तीनों विमर्शों में शोषित समाज के हक के लिए लेखन कार्य किया जा रहा है। यह तीनों विमर्श वर्तमान समय में देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी या अन्य भाषाओं के पाठ्यक्रम का हिस्सा है।  

 83- अस्मिता विमर्श की पृष्ठभूमि-1990 का दशक समूचे संसार में कुछेक बुनियादी परिवर्तनों के लिए मशहूर है। वस्‍तुत: 1989 का साल दुनिया के इतिहास में निर्णायक मोड़ वाले कुछ एक सालों में से एक था।

84-  इसने द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद बने हुए विश्‍व भूगोल को तो बदल ही दिया साथ ही शीत युद्ध से निर्मित मानसिक जगत को भी गंभीर झटका दिया। नये समय में निजीकरण और उदारीकरण ने संपत्ति के संकेन्‍द्रण को बढ़ावा देने के साथ ही मध्‍यवर्ग का भी विस्‍तार किया। 

85- इस मध्‍यवर्ग में समाज के विभिन्‍न समुदायों के लोग शामिल थे जिन्‍होंने अपने समुदायों की सामूहिक आकांक्षाओं की अभिव्‍यक्ति के लिए अस्मिताओं की दावेदारी करनी शुरू की। इस नये माहौल ने 60 के दशक में सामने आए नव सामाजिक आंदोलनों की विरासत से भी बहुत कुछ ग्रहण किया। इस मॉड्यूल में एतद्विषक प्रश्‍नों से विद्यार्थियों को परिचित कराया जायेगा।

86- अस्मिताओं की पारस्परिकता-   प्रतिद्वंद्विता पश्चिमी जगत में जिस तरह अश्‍वेत, स्‍त्री और यूरोपेतर प्रवासी समुदायों के बीच नजर आयी थी, उसी तरह हिंदी में भी दलित विमर्श और स्‍त्री विमर्श के बीच भी प्रतिद्वंद्विता दिखायी पड़ी। स्‍त्री-पुरुष की स्‍पष्‍ट कोटियों के परे भी अन्‍य लैंगिक अस्मिताओं के उभार ने साहित्‍य के लोकतंत्र को विस्‍तारित करने की चुनौती पेश की है। इस मॉड्यूल में विद्यार्थी इस वैविध्‍य से परिचित होंगे।

87- अस्मिता विमर्श और साहित्य (दलित, स्त्री, आदिवासी, विकलांग और एलजीबीटीक्यू)- अस्मिताओं ने अपनी दावेदारी की अभिव्‍यक्ति के लिए साहित्‍य को महत्‍वपूर्ण उपकरण के रूप में प्रयुक्‍त किया। इसके चलते ही दलित साहित्‍य, स्‍त्री साहित्‍य की नयी कोटियां सामने आयीं।

88-  इसके अतिरिक्‍त इन विमर्शकारों ने इतिहास पर भी अपना दावा ठोंका और हिंदी साहित्‍य की मुख्‍यधारा की एकांगिता को उजागर कर दिया।

89-  अस्मिता विमर्श के साहित्यिक हस्‍तक्षेप का बहुत ही महत्‍वपूर्ण पहलू अतीत की पुनर्व्‍याख्‍या है। यहां तक कि आत्‍मकथा को अभिव्‍यक्ति का प्रधान रूप बनाकर इन विमर्शों ने ज्ञान और अनुभव की चली आ रही पुरानी बहस में नये सिरे से हस्‍तक्षेप किया।

 90-  अस्तित्व मूलक विमर्श परंपरागतरूढ़िवादी परंपराओं और सिद्धांतों के विरुद्ध एक वैचारिक विद्रोह है जो एक पक्ष विशेष की समस्या  सत्ता की उपेक्षा को इंगित करता है।91- अस्तित्व मूलक विमर्श में अस्मिता के बोध को सतत् प्रकट होते रहनानिरंतर आविर्भावित होते रहना और अनुभूति के साथ उभरते रहना है जिससे हाशिए के समाज के जीवन संघर्ष को संवेदना के साथ विस्तृत फलक पर उकेर करके उनके प्रति मानवीय संवेदना का विकास किया जा सके और उनके प्रति मन में सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास हो। हाशिए पर धकेल दिए गए।

92-   आज अस्तित्व मूलक विमर्श में ना केवल स्त्रीदलित और आदिवासी की बात होती है बल्कि किन्नरबालकवृद्धकिसान मजदूरयुवापर्यावरण एवं समस्त चराचर जगत को अभिव्यक्ति देने का महती प्रयास परिलक्षित होता है।

93- अस्तित्व मूलक विमर्श में जहां एक और संघर्षरत लोगों के संघर्ष को उकेरा  उठाया है वहीं दूसरी ओर साहित्य के स्वरूप में भी सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य किया है।

94-  अस्तित्व से अर्थ मौजूदगीविद्यमानता एवं सत्ता का भाव अर्थात निर्णय प्रक्रिया में समान अधिकार से हैं और विमर्श से तात्पर्य विचार  विवेचन से है जो तथ्य  स्थिति पर विचार करके सुधारवादी दृष्टिकोण के साथ वास्तविकता का उद्घाटन करते हैं।

95- अतः अस्तित्व मूलक विमर्श हाशिए पर गए लोगों की मौजूदगी और उनकी निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी तथा उनके जीवन संघर्ष पर विचार विवेचन करते हुए उनकी वास्तविक स्थिति का उद्घाटन करना एवं उनके प्रति मानवीय संवेदना को उभार करके उनकी दशा में परिवर्तन लाना है।

96-  डॉ. नगेन्द्र के अनुसार अस्तित्व विमर्श उन सभी परंपरागत तर्कसंगत मान्यताओं सिद्धांतों  विचारों का विरोध करता है जिसमें किसी पक्ष या वर्ग की सत्ता/विधमानता एवं उनकी समस्याओं की उपेक्षा हुई है जिससे वह दोयम दर्जे में रहने को मजबूर हुआ।

 97- सामान्यतः अस्तित्व विमर्श सिद्धांत  विचार की अपेक्षा व्यक्ति को महत्व देता है जो विचारों एवं सिद्धांतों की चकाचौंध में अंधेरे में ढकेल दिया गया है यह उन सभी विचारोंसंस्थाओंमान्यताओं का विरोध करता है जो मानवीय एवं मानवेतर पक्षों को गौण बनाते या करते हैं तथा उनकी समस्या एवं अधिकारों की उपेक्षा करते हैं। 

98-गुप्तजी ने अस्तित्व वादी विमर्श को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक और व्यक्ति को गौण बनाने के कारण विज्ञान  सामाजिकता का घोर विरोधी माना है इन्होंने अस्तित्व के मूल में मानवतावादी दृष्टिकोण को स्थान दिया है।

 99- अस्तित्व मुल्क विमर्श यह बतलाता है कि किसी एक पक्ष से जुड़े विचारोंबाह्य  आंतरिक परिस्थितियोंमान्यताओं को दूसरे पक्ष पर थोपा नहीं जाना चाहिए उसे अपने जीवन की प्रवाहमयता का चुनाव स्वयं करने देना चाहिए।

100- अस्तित्वमूलक विमर्श के मूल में अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष रहा है और इस संघर्ष की शुरुआत दो पक्षों में किसी एक पक्ष को महत्व  देनाकिसी एक पक्ष पर ( जबरन विचारमान्यताओंपरम्पराओं के नाम पर) दबाव बनाकर अधीनस्थ  अधिकारों से वंचित रखने की प्रवृति तथा किसी एक पक्ष को अक्षम मानकर उसके प्रति हीनता जन्य  पक्षीय विचार रहे है जिससे पीड़ितवंचितशोषितदमित पक्ष स्वयं की स्वतंत्रता का  अस्तित्व को लेकर सोचने पर विवश होता है।

101- हिन्दी साहित्य में अस्तित्व मूलक विमर्श बीसवीं शताब्दी के उत्तार्द्ध में प्रारम्भ होकर शीघ्र ही विस्तृत फलकस्वरूप  आयामों में अपने आपको व्याप्त कर लिया।

102- आज अस्तित्व विमर्श को मानवीय और मानवेतर दो स्वरूपों में देखते है। मानवीय स्वरूप में स्त्री विमर्शदलित विमर्शकिन्नर विमर्शआदिवासी विमर्शबाल विमर्शवृद्ध विमर्शकिसानमजदूर विमर्शयुवा विमर्शअल्पसंख्यक विमर्श इत्यादि रूपों के परिलक्षित होते हैं।

103- तथा मानवीय इतर स्वरूप में पर्यावरण विमर्शपशु पक्षियों का विमर्शसांस्कृतिक विमर्शभाषाई विमर्श इत्यादि देखने को मिलते हैं।

104- साहित्य में अस्मितामूलक विमर्श दो दृष्टिकोण से प्रचलित हुआ। इसमें प्रथम सहानुभूति परक लेखन था। इसके अंतर्गत लेखक स्वयं उस पक्ष से संबंधित नहीं होता है जिस पक्ष का विमर्श वह साहित्य में कर रहा है।

105-  इस प्रकार के लेखन को परकाया प्रवेश मूलक लेखन भी कहा जा सकता है जिसमें लेखक हाशिए में धकेले गए पक्ष के जीवन संघर्षों को देखता हैविचारता हैजो उसके अतंर्तम में चेतना की एक किरण जगा देता है जिसके आलोक में वह अपने आपको हाशिए के पक्षों के साथ देखता है और उनके जीवन संघर्षों को साहित्य में उकेरते हुए विचार  विवेचन करता है तथा मानवीय संवेदना को जाग्रत करने का प्रयास करता है। जैसेप्रेमचंद की रचना ‘ठाकुर का कुआं’  ‘सद्गति’ में इस प्रकार का सहानुभूति परक अस्मिता मूलक विमर्श का रूप दृष्टिगोचर होता है।

106- दूसरा दृष्टिकोण स्वानुभूति परक लेखन का रहा है जिसमें लेखक स्वयं हाशिए पर धकेल दिए गए पक्ष का होता है और वह अपनी वेदनाव्यथाविद्रूपता तथा समाज के दूसरे पक्ष द्वारा स्वयं एवं समानधर्मा पक्ष पर किए जा रहे अन्यायअत्याचारशोषण की आत्मसात् पीड़ा को अभिव्यक्त करता है जैसेओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठनमें इसी प्रकार का स्वानुभूतिपरक अस्मितामूलक विमर्श देखने को मिलता है।

107- स्त्री अस्मितामूलक विमर्श में स्त्री के प्रति मानवीय जीवन मूल्यों की दोयम दर्जे की संवेदना से विकसित मानसिकता रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

108- दलित अस्मिता मूलक विमर्श में समाज के शोषित पीड़ित वंचित दमित पक्ष की पीड़ाएवं दूसरे पक्ष द्वारा इनके प्रति किए गए अमानवीय व्यवहारकृत्य को पूर्ण सजगता के साथ उभारा है, जो समाज के अन्य वर्गों की इनके प्रति विकृत  वैमनस्य परक मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है।

109- किन्नर अस्मिता मूलक विमर्श में इनकी सामाजिक उपेक्षालिंगभेद को अभिव्यक्त किया है जो इंसानियत के संकट के रूप में उभर कर सामने आता है और यही संकट किन्नर की वेदना पीड़ा हताशा कुंठा के स्वरूप में साहित्य में अभिव्यक्त हुआ है।

110- बाल अस्मिता मूलक विमर्श में घोर शिक्षा केंद्रित परिवेश में बालकों के ऊपर बढ़ते शिक्षक दबाव एवं बाल मनोविज्ञान तथा बालको के बालपन के हनन के रूप में देखा जा सकता है जिसमें बालकों की नैसर्गिक प्रतिभा एवं विचारों को दबानेगला घोंटने का काम किया जा रहा है।

111- आदिवासी अस्मिता मूलक विमर्श में सभ्यताऔद्योगिकीकरण एवं विकास के नाम पर जलजंगलजमीन के विदोहन के विभिन्न रूपोंआदिवासियों की आदिवासियत के विस्थापन को इंगित किया गया है।

112- वृद्ध विमर्श में वृद्धों की पारिवारिक उपेक्षाउनके एकांकीपन एवं उनकी आशा और आकांक्षाओं को रेखांकित किया जा रहा है जिसे राजी सेठ के कहानी संग्रह 'यह कहानी नहींमें भलीभांति देखा  समझा जा सकता है।

113- इसी प्रकार किसानमजदूरयुवाअल्पसंख्यक  प्रवासी वर्ग की अस्मिता मूलक विमर्श में इन वर्गों की वेदनाअभाव युक्त जीवनउपेक्षा को निरूपित करने का प्रयास रहा है।

 114-मानवीय इतर पक्षों के विमर्श में पर्यावरणीय अस्मिता मूलक विमर्श आधुनिक साहित्य में प्रमुखता के साथ अभिव्यक्त हुआ है जिसमें पर्यावरणीय चिंताओं समस्याओं एवं मानव जाति पर पड़ने वाले प्रभाव को अभिव्यक्त किया है। रणेंद्र के उपन्यास 'ग्लोबल गांव के देवतामें पर्यावरणीय चिंताओं को भली-भांति देखा जा सकता है। स्त्री विमर्श बीसवीं शताब्दी के उत्तार्द्ध में प्रचलन में आयाप्रारम्भ में पुरुष वर्ग ने ही इस पर लेखनी चलाई जो एक तरह से सहानुभूति परक लेखन था।

115- प्रेमचंद जी के उपन्यास ‘निर्मला’  ‘सेवासदन’ और नागार्जुन के उपन्यास ‘कुंभीपाक’  ‘रतिनाथ की चाची’ में स्त्री अस्मितामूलक विमर्श देखने को मिलता है।

116- बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशक में महिला लेखिकाओं ने भी अपने मुद्दों पर जागरूक होकर लिखना प्रारंभ किया जिनमें प्रभा खेतानमन्नू भंडारीरमणिका गुप्तामैत्रेयी पुष्पा इत्यादि का नाम उल्लेखनीय है। सभ्यता के प्रारंभ से ही स्त्री-पुरुष भिन्न-भिन्न होते हुए भी एक-दूसरे के पूरक रहे है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवताकी उक्ति में स्त्री के प्रति आदर  सम्मान की देवीतुल्य स्वीकारोक्ति आदिकाल से चली  रही थी।

117- प्राचीन काल में मातृप्रधान समाज (वैदिक काल  सिंधु घाटी सभ्यता) स्त्री के अस्तित्व को स्वीकार किया गया था और अर्धनारीश्वर स्वरूप में पुरुष के बराबर माना गया था किन्तु धीरे धीरे समाज का मातृप्रधान से पितृप्रधान की ओर बढ़ते हुए स्थिरता को प्राप्त कर लेने से नारी की भूमिका का ह्रास होते हुए गौण होना जिस के फलस्वरूप उनके अधिकारों की सीमितता और कर्तव्य की बहुलता ने एक अन्तर्विरोध को जन्म दिया और इस विषमता ने नारी को हाशिए पर धकेलने का कार्य किया जिसके कारण आबादी के आधे हिस्से को अभिव्यक्ति  निर्णय के अधिकार एवं अवसर से बेदखल होना पड़ा।

 118- सबला से अबला की विद्रूपताओ एवं विसंगतियों से भरी इस अधोगामी यात्रा ने नारी के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाने का कार्य किया।

119-यह सही है कि हमारी सभ्यता और संस्कृति कई चरणों की विकास यात्रा के पश्चात आज की स्थिति में पहुंची हैं परंतु इस विकास यात्रा में नारी धीरे-धीरे परिधि की ओर अग्रसर रही और अंत में परिधि पर आकर बैठ गई जिससे हमारी व्यवस्था में नारी की भूमिका नगण्य होती गई।120- यह स्थिति रामायण में सीता के स्वयंवर से आरंभ होकर अंत में सीता के सतीत्व की परीक्षा में आकर हुए बदलाव के रूप में देख सकते हैं।

121- प्रारंभ में मातृसत्तात्मक परिवारों में स्त्री की भूमिका श्रेष्ठ रही किंतु जैसे-जैसे पितृसत्तात्मक परिवार का विकास हुआ वैसे वैसे स्त्री की स्थिति समाज में दोयम दर्जे की होती गई। उसे ना जाने किन-किन उपमानों से अभिहित किया जाने लगा तथा शिकंजे में कसा जाने लगा जिसके कारण वह परतंत्रता की दहलीज पर आकर गिर गई और इसी अवस्था से मुक्ति के प्रयास के रूप में विचार जगत में स्त्री मुक्ति आंदोलन जो साहित्य में स्त्री विमर्श के नाम से जाना जाता हैका जन्म हुआ। 

123-अंग्रेजी के फेमिनिज्म का हिंदी रूपांतरण नारीवाद हैं जिसकी उत्पत्ति लैटिन शब्द फेमिना से मानी जाती हैं जिसका अर्थ स्त्री से हैं। स्त्रीवाद का सर्वप्रथम प्रयोग 1890 के आसपास लैंगिक समानता और स्त्रियों के अधिकारों के अर्थ में किया गया।

124- स्त्री विमर्श स्त्रियों के दमन के विविध रूपों का अध्ययन करता है और दमन से मुक्त कराने की दिशा में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ वैचारिक स्तर पर पहल भी करता है।125- स्त्री की स्थिति के संबंध में महादेवी वर्मा का कथन है कि “चाहे हिंदू नारी की गौरव गाथा से आकाश गूंज रहा होचाहे उसके पतन से पाताल कांप रहा होपरंतु उसके लिए 'ना सावन सूखा ना भादो हराकी कहावत ही चरितार्थ रही हैउसे हिमालय को लज्जा देने वाले उत्कर्ष तथा समुद्र तल की गहराई से इस स्पर्धा करने वाले आकर्षण दोनों का इतिहास आंसुओं से लिखना पड़ा है”।

126- नारी ने सभी क्षेत्रों में यहां तक की स्वतन्त्रता आंदोलन में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है जिससे स्पष्ट है कि नारी शारीरिकमानसिक और भावनात्मक दृष्टि से किसी भी तरह पुरुष से कम नहीं है।

127- पुरातन सामाजिक व्यवस्था में अपने को शोषित महसूस करने के बाद नारी में नई चेतना और नया व्यक्तित्व उभर रहा है तथा नारी के व्यक्तित्व की अवधारणा में परिवर्तन  रहा है फलतस्त्रीपुरुष के परस्पर संबंधों के मूल्य भी बदल रहे है। 

128-आज नारी की पुरुष के प्रति अपेक्षाओं में परिवर्तन आया है जो नारी को तनाव  घुटन की स्थिति में ले आया है। जैसे मोहन राकेश के नाट्य 'आधे अधूरे’ में सावित्री की पुरुष से रखी अपेक्षाएं उसे एक विचित्र स्थिति में ले आती है। जहां वह अपने आप को एकाकीपन के घोर अंधकार में पाती है।

129- कामकाजी अविवाहिता स्त्री (सुषमा) के माध्यम से स्वतंत्रता के बाद बदलते सामाजिक सन्दर्भो को उषा प्रियंवदा ने 'पचपन खंभे लाल दीवारेंमें रेखांकित किया है।

130- ममता कालिया ने पति-पत्नी के शारीरिक संबंधो को केंद्र में रखकर 'बेघरमें आधुनिक समाज में पुरुष की संस्कार बद्ध जड़ता और संदेह वृति को उघाड़ा है।

131- इस तरह आधुनिक साहित्य में सदियों से रूढ़ियों के नीचे कसमसाता नारी मन वर्जनाओं को नकारता हुआ अपने सहज स्वाभाविक रूप में आधुनिक नारी में चित्रित हुआ है। 132-स्त्री विमर्श के सम्बन्ध में कुछ भ्रांतिया और अंतर्विरोध आलोचकों ने खड़े किए है जिसमें उन्होंने बताया है कि स्त्री विमर्श प्रतिशोध पीड़ित हैस्त्री विमर्श की समर्थक स्त्रियां पुरुष बनना चाहती हैस्त्री संबंधी पूर्वाग्रह के लिए दोषी पुरुष हैस्त्री विमर्श केवल कुछ शिक्षितसाहित्यिक  धनी महिलाओं का कोरा वाग्विलास और न्यूज़ में बने रहने की उनकी साजिश मात्र है।

133-  कुछ गिनेचुने प्रतिनिधि महिला चरित्रों के विकास का हवाला देकर यह जताने की कोशिश कि स्त्रियां अब हाशिए पर नहीं है। वास्तविक रूप से देखा जाए तो स्त्री आंदोलन प्रतिशोध पीड़ित ना होकर अपनी अस्तित्व  अस्मिता के बोध का आंदोलन है क्योंकि वह यह जानती है कि अन्याय का प्रतिकार अन्याय नहीं है। 

134-स्त्रियां पुरुष नहीं बनना चाहती वह तो चाहती है कि जो दोहरे मापदंड उन पर थोपे गए हैं उन पर पुनर्विचार होना चाहिए ताकि विकास के अवसर सबको समान मिल सके। 135-स्त्री संबंधी पूर्वाग्रह के लिए दोषी पुरुष नहीं जबकि वह व्यवस्था है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक पुरुषों को लगातार एक ही पाठ पढ़ाती है कि स्त्री उनसे हीनतर है एवं उनके भोग का साधन मात्र है।

136- इसके अतिरिक्त स्त्री विमर्श केवल कुछ शिक्षित साहित्यिक  धनी महिलाओं को वाग्विलास और न्यूज़ में बने रहने की साजिश ना होकर उनकी स्वानुभूति परक नारी मन के अंतस चेतना का प्रकटीकरण है।

137- मृणाल पांडे के निबंध 'संकलन परिधि पर स्त्रीमें भंवरी देवी के संघर्षआंध्र प्रदेश के एक जिले की लक्षमा की जागरूकता के माध्यम से नारीवादी सोच को आक्रामक तेवर के साथ प्रस्तुत किया है तथा यह बताया है कि स्त्री किस प्रकार समाज की परिधि पर दोयम दर्जे का जीवन जीने को विवश है।

138- इसमें नारी के सौंदर्य को परंपरागत प्रतिमान से मुक्त कर उसके श्रम सौंदर्य को उजागर किया गया है।

139-  तस्लीमा नसरीन ने अपने द्वारा अनूदित 'औरत के हक मेंमें अपने दैनिक जीवन के छोटेछोटे तल्ख अनुभवों के माध्यम से नारी अस्मिता से जुड़े सवालों को नए सिरे से उठाया है। वह बतलाती है कि केवल जननी बनकर खंडित चूर्ण विचूर्ण होना उसका भाग्य नहीं है। स्त्रियों को धर्म शास्त्रोंसामाजिक रूढ़ियोंपुरुष की निरंकुशता और नीचता को ध्वस्त कर अपनी शक्ति खुद पहचाननी चाहिए।

140- 'स्त्री होने की सजामें अरविंद जैन स्त्री को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों की सच्चाई की पोल खोलकर पुरुष के अनुकंपा भाव की धज्जियां उड़ाते हैं। वे विवाहसंपत्तितलाकनिकाहबलात्कार आदि विभिन्न मुद्दों के माध्यम से कानून की कमियों और उसके एकांगीपन को उजागर करते हैं तथा स्त्री के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की वास्तविक हकीकत को सामने लाकर सत्ता पक्ष को आईना दिखाने का भी काम करते हैं। 

141-मृदुला गर्ग के उपन्यास 'कठ गुलाबके सभी पात्र एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में रहते हैं जो कहीं नहीं है। उपन्यास के सभी नर नारी शाप ग्रस्त प्रतीत होते हैं। स्त्रियां सुरक्षा और संपत्ति का अधिकार चाहती है और पुरुष प्रेम आनंद  स्त्री देह के बाद सिर्फ एक उत्तराधिकारी।

142- 'दिलो दानिशमें कृष्णा सोबती ने रखैल और दूसरी पत्नी की स्थिति एवं भूमिका को रेखांकित किया है जिसमें यह सदैव घृणा की पात्र  कानूनी अधिकारों से वंचित रहती है।

143- स्त्री विमर्श  लेखन का महत्वपूर्ण उद्देश्य स्त्री की विभिन्न भूमिकाओं के बारे में मानव समाज को परिचय देना है। जीवन के उन अंधेरे कोनों पर भी प्रकाश डालना है जिस की पीड़ा स्त्रियों ने सदियों से झेली है। 

144-जरूरत है कि स्त्री अपनी मानवीय गरिमा और अधिकार को समझ कर संरचनात्मकसांस्कृतिक तथा मानवीय दृष्टिकोण के मूल तत्व का विश्लेषण करें तथा देशसमाजघरपरिवार की मिश्रित भूमिका का संतुलन स्थापित करने का प्रयास दोनों पक्ष करें। 145-स्त्री अस्मितामूलक विमर्श की कुछ सीमाएं भी है जिसके प्रति लेखक एवं पाठक वर्ग को सदैव सजग रहने की आवश्यकता है। स्त्री स्वतंत्रता के साथ कर्तव्यहीनता की स्थिति जिससे सामाजिक ढांचे के प्रति विद्रोह की भावना की गुंजाइश सदैव बनी रहती हैं तथा स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर अतिवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलने की आशंकाएक पक्ष पर अधिक बल देने से दूसरे पक्ष को गौण करके उसे हतोत्साहित करनापक्षीय प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा जो नकारात्मक स्वरूप लेकर वर्गीय हिंसा में रूपायित भी हो सकती हैआर्थिक तथा वित्तीय दृष्टिकोण से नारी के रूप सौंदर्य एवं अंग का अतिवादी प्रदर्शन इत्यादि।

146- स्त्री विमर्श में अधिकार और कर्तव्य के मध्य सामंजस्य स्थापित करने की महती आवश्यकता रहती है तथा साहित्यकारों को पूर्ण सजगता के साथ लेखन की आवश्यकता सदैव बनी रहती है जिससे कि निर्माण हो सके नाश नहींसाहित्यकार सृजन एवं ध्वंस के मध्य के अंतर को सदैव स्मरण में रखते हुए ही स्त्री विमर्श को साहित्य में स्थान दे तो आधी आबादी के साथ यथोचित न्याय संभव हो सकेगा। 

 

 

शिक्षा में भारतीय ज्ञान परम्परा क्यों?

मध्यप्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग ने भारतीय ज्ञान परम्परा को समझने के लिए कुछ पुस्तकों को महाविद्यालयों में खरीदने का आदेश दिया। इस पर कुछ तथाकथित गैर शिक्षाविदों, लीक पीटने वाले नेताओं का विरोध आया। 
विरोध है कि पुस्तकें आर एस एस के लेखकों की हैं। तो समझें इसकी आवश्यकता क्यों?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020 मध्यप्रदेश में लागू हुए तीन वर्ष पूरे हो गए हैं। नीति को लागू करने में अग्रणी राज्य होने के कारण इसके अच्छे परिणाम लाने में भी इसकी महती भूमिका अपेक्षित है । 

इन तीन वर्षों में अनुभव को साझा करने 
देश, राज्य और काल की स्थिति' को ध्यान में रखते हुए निरंतर मंथन चल रहा है। उसके परिणाम स्वरूप अध्ययन मंडलों की सलाह पर संदर्भ ग्रंथ के रूप में पुस्तकों को महाविद्यालयों में खरीदने का आग्रह किया गया है। जो विशुद्ध रूप से भारतीय वांग्मय पर आधारित हैं। 

इन पुस्तकों का हेतु मात्र इतना ही है कि भारतीय ज्ञान परम्परा को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में समाहित कैसे करें कि वह शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए व्यवहारगत शिक्षा के रूप में सामने आ सके। 

 समझना होगा कि जब चीजें धुंधली रहती हैं तो चिन्तन और विमर्श की आवश्यकता पड़ती है।  जहाँ  चेतना है, वहाँ यथास्थिति नहीं रहती और यथास्थिति नहीं रहती है तो सम -विषम परिणाम भी सामने आते हैं।

आज उच्च शिक्षा में वाद की जगह दुराग्रह पूर्ण जल्प 'डिबेट कॉम्पटीशन चल रहा है। परिणाम शिक्षा नीति "वादे वादे जायते तत्व बोध": की जगह "वादे वादे कंठशोष:" आ रहा है।

इतना भी होता तो कुछ गुंजाइश निकलती किंतु यह उससे भी आगे सेक्युलरिस्ट और कम्युनिज्म का वितंडा वाद है, जो स्वतंत्रता के बाद से आज तक कुछ सार्थक तो दे नहीं पाये, बस वितंडा कर भारत, हिंदू, धर्म, सनातन, संस्कृति, परम्परा के सार्थक दृष्टि कोण का खंडन ही करते रहे। यह एक तरह का राष्ट्र के साथ छल है।

अतः कुछ सार्थक चाहिए तो 'वाद' के आधार पर तथ्यों के साथ चीजों को समझना होगा ।

 किसी भी देश की ज्ञान परम्परा उस देश का दर्पण हुआ करती है । ज्ञान परम्परा के माध्यम से उस देश की अतीत से वर्तमान तक की यात्रा से आज की पीढ़ी अवगत होती है। ज्ञान परम्परा के माध्यम से ही देश का तत्त्वचिंतन, संस्कृति, सभ्यता अभिव्यक्त होती हैं।

भारत और उसकी पहचान तथ्यों के आधार पर मार्कट्वेन के शब्दों में -"भारत उपासना पंथों की भूमि, मानव जाति का पालना, भाषा की जन्मभूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दादी तथा परम्परा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सृजनशील सामग्री है , उसका भंडार अकेले भारत में है।

 किन्तु कुचक्रों , जल्पों और वितंडा वाद के आधार पर ( मैक्समूलर अपनी पत्नी को साफ-साफ) लिखता है कि "वेद का मेरा यह अनुवाद उत्तर काल में भारत के भाग्य पर दूर तक प्रभाव डालेगा। यह उनके धर्म का मूल है और विगत तीन हजार वर्षों से उत्पन्न आस्थाओं को जड़मूल से उखाड़ने का उपाय है ।"

 श्री एन. के. मजूमदार को मृत्यु से एक वर्ष पूर्व लिखे पत्र में, प्रो. मैक्समूलर लिखता है " मैं हिन्दू धर्म को शुद्ध बनाकर ईसाइयत के पास लाने का प्रयास कर रहा हूँ । आप या केशवचन्द्र सरीखे लोग प्रकट तौर पर ईसाइयत को स्वीकार क्यों नहीं करते ?... नदी पर पुल तैयार है। केवल तुम लोगों को चलकर आना बाकी है। पुल के उस पार लोग स्वागत के लिए आपकी राह देख रहे हैं ।" विचार करें यूरो सेंट्रिक शिक्षा कैसे हमारे घरों में ' कान्वेंट ' के रास्ते आ रही है?

एनी बेसेण्ट का भारत की राष्ट्रीयता और उसकी ज्ञान परम्परा पर कालजयी दृष्टांत भी समझना होगा-  "विश्व के विभिन्न महान धर्मों एवं पंथों के अपने चालीस वर्षों से अधिक के अध्ययन के आधार पर मैं कह सकती हूँ कि मुझे हिन्दू धर्म जितना सम्पूर्ण, विज्ञानसम्मत, दार्शनिक और आध्यात्मिक दिखा उतना कोई दूसरा धर्म नहीं दिखा। जितना अधिक आप इसे जानते हैं उतना ही अधिक आप इससे प्यार करने लगते हैं और जितना अधिक आप इसे समझते हैं उतनी ही गहराई से आप इसका महत्त्व समझने लगते हैं।"

 उन्होंने आगे कहा- "इस विषय में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि बिना हिन्दुत्व के भारत का कोई भविष्य ही नहीं है। जिसमें भारत की जड़ें गहरी जमी हुई हैं और यदि उस भूमि से उसे उखाड़ा गया तो भारत वैसे ही सूख जायेगा जैसे कोई वृक्ष भूमि से उखड़ने पर सुख जाता है। समय के साथ हर कोई वैसे ही चला जायेगा जैसे यह आया था किन्तु एक बार हिन्दुत्व को हटा दीजिए तो उसके बाद भारत का क्या बचता है ? भारत का इतिहास, उसका साहित्य, उसकी कला, उसके स्मारक सब में हिन्दुत्व आद्योपांत भरा पड़ा है। ... "यदि हिन्दू ही हिन्दु को नहीं बनाये रखेंगे तो इसको कौन बचायेगा ?" 

 विचारें  ये प्रश्न जितने उस समय प्रासंगिक थे उससे कहीं अधिक उनकी प्रासंगिकता आज के समय में भी है।(अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश हमारे सामने हैं)

 इस परिस्थिति के पीछे का कुचक्र - 
प्रख्यात जर्मन विद्वान् शोपन हॉवर ने लिखा -" उपनिषद् सर्वोच्च मानव बुद्धि की उपज हैं। यह मेरे जीवन के लिए शान्ति का आश्वासन रहा है और जो मेरी मृत्यु के बाद तक बना रहेगा।"
हमबोल्ट गीता को संसार की गम्भीरतम और उच्चतम वस्तु मानते थे। 

 विद्वानों के यह कथन स्वाभाविक थे, परन्तु जैसे-जैसे भारत, भारतीयता और हिन्दू धर्म का अधिक प्रचार होने लगा वैसे-वैसे ईसाई धर्म प्रचारकों और पादरियों के कान खड़े हो गये। उन्हें लगने लगा कि यदि संस्कृत वाङ्मय का इसी प्रकार प्रचार चला तो सृष्टि का निर्माण 4004 ईसा पूर्व हुआ तथा बाइबिल में व्यक्त विचार ही सर्वश्रेष्ठ विचार हैं,' ये धारणाएँ ध्वस्त हो जायेंगी। 

अतः उन्होंने अनेक लोग तैयार किये जो भारतीय ज्ञान परम्परा उसकी प्राचीनता, श्रेष्ठता और गहनता को अप्रमाणिक और अवास्तविक बताएं। 

इन लोगों के मन में भारतीय साहित्य का भय कितना था इसका परिचय फ्रेडरिक वॉडमेर ने इन शब्दों में दिया था, “बाइबिल के रक्षक इतने भयभीत हो गये हैं कि उन्हें ऐसा लगने लगा है कि संस्कृत का वर्चस्व बाबेल की मीनार गिरा देगा (दि लूम ऑफ लैंग्वेज न्यूयार्क १६४४ - पृ० १७४) ।

दूसरी ओर हजार वर्षों से सेमेटिक मजहबों का, आर्थिक, राजनैतिक विचारधाराओं का, जो सतत आक्रमण चला उन आक्रमणों के परिणामस्वरूप यहाँ के समाज को यहाँ की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक रचनाओं को तोड़ने- मरोड़ने और अपने अनुकूल ढालने का  प्रयत्न दीर्घकाल में हुआ।

वर्ष 1921 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने भाषण में कहा था- "ऐसा नहीं है, अंग्रेजों का यह एक सर्वकष आक्रमण है, जो हमारे समाज को, उसके मानस को, उसकी 'आत्मा को मूल से परिवर्तित कर देगा और इसका मुकाबला करने के लिए अगर आप तीर कमान लेकर उसके पीछे छोड़ेंगे तो यह रूप बदलता जाएगा।" 

समाधान के रुप में पूर्वजों का मत है - " भारत अपनी आत्मा का साक्षात्कार करे । उस आत्मा की अभिव्यक्ति 'Philosphical label' नहीं, रचनाओं, जीवन मूल्यों, दैनंदिन जीवन की अभिव्यक्ति के अंदर अभिव्यक्त हो।

अत: भारतीय ज्ञान परम्परा को आज के पाठ्यक्रम में लाना कितना आवश्यक है, हम समझ सकते हैं । आज भी शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में एक बड़ा तंत्र भारत में इसी दिशा में काम कर रहा है। 

 सार यह कि शिक्षा, संस्कृति के ऊपर की धूल हटे और भारत भारत केन्द्रित ज्ञान परम्परा को  भारतीय वांग्मय के आधार पर समझे। 
13/8/24

राष्ट्रवाद नहीं राष्ट्रीय

एक सभा में बोलते हुए जब मैंने राष्ट्रवाद शब्द पर आपत्ति की तो कई राष्ट्र पंथियों को भी अटपटा लगा।

मेरे वक्तव्य के बाद लोहिया जी के अनुयाई श्री रघु ठाकुर जी ने तो ऐसा लगा जैसे जानबूझ कर इस शब्द की वकालत करते हुए तीन चार बार प्रयोग किया। यद्यपि उन्होंने मेरे आपत्ति को ख़ारिज नहीं किया तथापि प्रकारांतर से राष्ट्रवाद का समर्थन ही किया।

 सम्पूर्ण भारतीय वांग्मय जो विश्व का प्राचीनतम और तत्वबोध कराने वाला वांग्मय  है, राष्ट्र और राष्ट्रीयता की ही बात करता है। 

राष्ट्र शब्द वेद से आता है। जहां वह ज्ञान का भी प्रकाशक है। वेद के इस शब्द की व्याख्या दर्शन में मिलती है। जहां वादे-वादे जायते तत्व बोध: की बात होती है। 

संवाद इसके प्रकटीकरण का माध्यम बनता है। विचार और चिंतन प्रणालियां दर्शन और वेदांग से पुष्ट होती है जिनमें आंतरिक एकात्मकता रहती है।

जबकि पश्चिमी अवधारणा में एक को काट कर दूसरे को स्थापित करने की चेष्टा होने से वह न केवल भौगोलिक रूप से सीमित होती है बल्कि किसी विशेष व्यक्ति की सोच की काल के साथ वाहक बन जाती है।

राष्ट्रवादी शब्द पश्चिमी अवधारणा का परिणाम।
राष्ट्र का अनुवाद जब नेशन नहीं है तो उसमें इज्म जोड़ कर संकर शब्द नहीं बना सकते।

नेशनलिज्म का उपयोग नेशन-स्टेट के साथ राज के लिए कर सकते हैं। 

राज के अन्दर किसी मत -पंथ-व्यक्ति  को लेकर वाद  हो सकता है। 

राष्ट्र सांस्कृतिक ईकाई होने से कल्चर-स्टेट की अवधारणा से भिन्न है।

जैसे संस्कृति कल्चर से भिन्न है , वैसे ही राष्ट्र नेशन से भिन्न है।

राज और राज्य सरकारों की चेतना राष्ट्रीय होनी चाहिए।

जो राजकीय सत्ता या राजनीतिक दलों से जुड़कर अपने को वाम या दक्षिण पंथी कहते हैं उन्हें अपने को राष्ट्रपंथी कहना चाहिए। राष्ट्रवादी नहीं। क्यो कि जब भारत जैसे सनातन राष्ट्र का कोई वाद ही नहीं तो राष्ट्र वाद क्यों?

ध्यान रखना होगा संसार में नेशन अनेक हैं किंतु राष्ट्र एक ही है। इसी के नाभि से दुनिया के सभी दर्शन जन्में जो प्रकारांन्तर से सरलीकृत होते हुए संसार में फैले और व्यक्ति की चिंतन धारा से श्रेय और प्रेय के रूप में आज सामने हैं।

हिन्द स्वराज्य की भूमिका से (भाग-दो)

हिन्द स्वराज की भूमिका से: भाग -दो
प्रो.उमेश कुमार सिंह

(क्रमशः आगे) गांधी जी ने ' हिन्द स्वराज के बारे में' शीर्षक से यह अभिमत  किल डोनन कैसल में 22 नवंबर, 1909 में  लिखी थी।
 जनवरी 1929 में ' यंग इंडिया ' के गुजराती अंक में 'हिंद स्वराज' के बारे में अपना विचार रखते हुए फिर लिखते हैं-" मेरी छोटी सी किताब  विशाल जनसंख्या का ध्यान खींच  रही  है, यह सचमुच ही मेरा सौभाग्य है।  यह मूल तो गुजराती में लिखी गई है। इसका जीवन- क्रम अजीब है। यह पहले- पहल दक्षिण अफ्रीका में  छपने वाले साप्ताहिक' इंडियन ओपिनियन' में  प्रकट हुई थी।
 1909 लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज पर हिंदुस्तानियों के हिंसावादी पंथ को और उसी  विचारधारा वाले दक्षिण अफ्रीका के एक वर्ग को जवाब के रूप में  लिखी गई थी। लंदन में रहने वाले हर एक नामी अराजकतावादी हिंदुस्तानी के संपर्क में मैं आया था। उनकी शूरवीरता का असर मेरे मन पर पड़ा था,लेकिन मुझे लगा कि उनके जोश ने उल्टी राह पकड़ ली है।
 मुझे लगा कि हिंसा हिंदुस्तान के दुखों का इलाज नहीं है, और उसकी संस्कृत को देखते हुए उसे आत्मरक्षा के लिए कोई अलग और प्रकार का शस्त्र काम में लाना चाहिए।

दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह उस वक्त मुश्किल से 2 साल का बच्चा था। लेकिन उसका विकास इतना हो चुका था कि उसके बारे में कुछ हद तक आत्मविश्वास से लिखने की मैंने हिम्मत की थी। मेरी वह लेख- माला पाठक वर्ग को इतनी पसंद आई कि वह किताब के रूप में प्रकाशित की गई।

यहां गांधी जी एक मजे की बात  लिखते हैं " हिंदुस्तान में उसकी ओर लोगों का कुछ ध्यान गया ।मुंबई सरकार ने उसके प्रचार की मनाही कर दी। उसका जवाब मैने किताब का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित  करके दिया। मुझे लगा कि अपने अंग्रेज मित्रों को इस किताब के विचारों से वाकिफ कराना उनके प्रति मेरा फर्ज है"।

समझना होगा गांधीजी एक ओर अंग्रेजों की मानसिकता का संकेत दे रहे हैं तो दूसरी ओर भारत के अंग्रेजी दा लोगों की मानसिकता को भी जाहिर कर रहे हैं, जिन्हें कोई भी बात तब प्रमाणित लगती है, जब वह अंग्रेजी में कही या लिखी जखती है।

 (पाठकों ने हमारे ब्लॉग के आलेख में  गांधी जी के मातृभाषा के आग्रह को यदि पढ़ा होगा तो यहां गांधी जी की भावना को समझने में कठिनाई नहीं होगी।)

किताब की विशेषता बताते समय गांधीजी लिखते हैं " मेरी राय में यह किताब ऐसी है कि वह बालक के हाथों में भी दी जा सकती है। वह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है। पशु बल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। "
 (प्रसन्नता का विषय है की गांधी जी की 150वीं  जयन्ती पर भारत सरकार ने जो प्रयास उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए किया , प्रदेश सरकारों ने भी उसमेंअपनी महती भूमिका निभाई)।

'हिन्द स्वराज' का परिचय देते हुए गांधीजी लिखते हैं " इस किताब में 'आधुनिक सभ्यता' की सख्त टीका की गई है। यह 1909 में लिखी गई थी। इसमें मेरी जो मान्यता प्रकट की गई है, वह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है।

 मुझे लगता है कि अगर हिंदुस्तान' आधुनिक सभ्यता' का त्याग करेगा, तो उससे उसे लाभ होगा।"

(मैं नहीं जानता गांधी जी की उक्त इच्छा का आज कितना पालन संभव है!)
फिर भी गांधीजी लिखते हैं, जो एक बड़ी बात है,
 " लेकिन मैं पाठकों को यह चेतावनी देना चाहता हूं, वे ऐसा न मान ले कि इस किताब में जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खड़ी की है, वह स्वराज कायम करने के लिए आज मेरी कोशिशें चल रही है। जानता हूं कि अभी हिंदुस्तान उसके लिए तैयार नहीं है।"

फिर भी वे आगे लिखते हैं " ऐसा कहने में शायद ढिठाई का भास हो, लेकिन मुझे तो पक्का विश्वास है कि इसमें जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खींची है, वैसा स्वराज पाने  की मेरी निजी कोशिश जरूर चल रही है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आज मेरी सामूहिक प्रवृत्ति का ध्येय  तो हिंदुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक पार्लियामेंट्री ढंग का स्वराज पाना है।"

गांधी जी अपने स्वराज में आधुनिकता या आधुनिक यांत्रिकता के विरोधी नहीं है ।वे कहते हैं, " रेल या अस्पताल दोनों में से किसी का भी नाश करने का ध्येय मेरे मन में नहीं है, अगरचे उनका कुदरती नाश  हो तो मैं जरूर उसका स्वागत करूंगा।"

वास्तव में गांधीजी स्वराज में स्वदेशी के हिमायती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे आधुनिक मशीनों के विरोधी है।

 उनकी शर्त इतनी है जो इस बात से स्पष्ट होती है - " दोनों में से एक भी हमारी राष्ट्र की नैतिक ऊंचाई में 1 इंच की भी बढ़ती नहीं करती। उसी तरह अदालतों के स्थाई नाश का ध्येय मन में नहीं रखता, हालांकि ऐसा नतीजा आए तो मुझे अवश्य बहुत अच्छा लगेगा। यंत्रों और मिलों के नाश के लिए तो मैं उससे कम कोशिश करता हूं। उसके लिए लोगों की आज जो तैयारी है उससे कहीं ज्यादा सादगी और त्याग की जरूरत रहती है।"

गांधी के विचारों को आज के परिपेक्ष में समझने की आवश्यकता है। ध्यान रखना चाहिए गांधीजी सेवा के नाम पर शोषण, सुविधा-संसाधन के नाम पर शोषण और अदालतों में व्याप्त विदेशी कानूनों के विरोधी थे। न्याय में वे पंच परमेश्वर के हिंदुस्तानी परंपरा के हिमायती थे। ग्राम स्वराज उनका सपना था।

गांधीजी बहुत महत्व की बात लिखते हैं," आज के आंदोलन को बदनाम करने के लिए इस  पुस्तक में से  बहुत सी बातों का हवाला दिया जाता है, मैंने देखा है। मैंने इस मतलब के लेख भी देखे हैं कि मैं कोई गहरी चाल चल रहा हूं, आज की उथल-  पुथल से लाभ उठाकर अपने अजीब ख्याल भारत के सिर देने की कोशिश कर रहा हूं और हिंदुस्तान को नुकसान पहुंचा कर अपने धार्मिक प्रयोग कर रहा हूं। इसका मेरे पास यही जवाब है कि सत्याग्रह ऐसी कोई कच्ची खोखली चीज नहीं है। उसमें कुछ भी दुराव छुपाव नहीं है। ''
(पाठकों को ध्यान रखना होगा कि उनके राष्ट्रपिता, महात्मा और बापू की टांग भी आज के राष्ट्रप्रेमी प्रधान की तरह ही खींची जाती रही है। )

 आगे कहते हैं," हिंद स्वराज' में  बताए हुए संपूर्ण जीवन सिद्धांत के एक भाग को आचरण में लाने की कोशिश हो रही है, इसमें कोई शक नहीं है। ऐसा नहीं है कि उसमें समुच्चय सिद्धांत का अमल करने में जोखिम है, लेकिन आज देश के सामने जो प्रश्न है, उसके साथ जिस हिस्सों का कोई संबंध नहीं है ऐसे ही से मेरे लेखों में से देकर लोगों को भड़काने मैं न्याय हरगिज़ नहीं है।"
अंत में हिंदू स्वराज पर दिया गया गांधी जी का संदेश यहां उल्लेख करते हुए भूमिका में आई बातों का समापन किया जा रहा है। अंग्रेजी मासिक' आर्यन पाथ' के  सितंबर, 1938 में प्रकट हुए हिंद स्वराज अंक के लिए भेजा हुआ गांधी जी का यह संदेश कुछ इस प्रकार है- " जिन सिद्धांतों के समर्थन के लिए ' हिंद स्वराज ' लिखा  गया था, सिद्धांतों की आप जाहिरात करना चाहती हैं मुझे अच्छा लगता है । मूल पुस्तक गुजराती में लिखी गई थी ; अंग्रेजी आवृत्ति गुजराती का तर्जुमा है यह पुस्तक अगर आज मुझे फिर से लिखनी हो तो कहीं- कहीं मैं उसकी भाषा बदलूंगा।  लेकिन इसे लिखने के बाद जो 30 साल मैंने अनेक आंधियों में बिताए हैं,उनमें मुझे इस पुस्तक में बताये हुए   विचारों में फेरबदल करने का कुछ भी  कारण नहीं मिला।  पाठक इतना ख्याल में रखें कि कुछ कार्यकर्ताओं के साथ जिनमें एक कट्टर  अराजकतावादी थे , मेरी जो बातें हुई थी, वे जैसी की तैसी मैंने इस पुस्तक में दे दी है । पाठक इतना भी जान ले कि  दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्तानियों में जो सड़न दाखिल होने वाली ही थी उसे इस पुस्तक ने रोका था,  इसके विरुद्ध दूसरे पल्ले  में रखने के लिए पाठक मेरे एक  स्वर्गीय मित्र की यह राय भी जान लें  की " यह एक मूर्ख आदमी की रचना है।"

देखना होगा दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों को सड़न से बचाने वाली यह पुस्तक एशिया महाद्वीप के आसन्न युद्ध को गांधी जी के 150वीं जयन्ती के माध्यम से बुद्ध में बदलने की कितनी सार्थक भूमिका निभाती है।
सादर
10/09/2019
खंडवा

आत्मनिर्भर भारत और रा शिक्षा नीति



आत्मनिर्भर भारत और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020

 

 ‘सा विद्या या विमुक्तये’। (वही वास्तविक विद्या है जो, मोक्ष दिलाने में सहायक हो।) विद्या के लिए कहा जाता है की प्राणियों के बाह्य अर्थों का प्रकाश करनेवाली तथा नाना प्रकार से उपकार करनेवाली अनेक विद्याएँ हैं। परन्तु परम पुरुषार्थ को प्रकाशित करनेवाली, परमार्थ को दिखलाने वाली तथा परम उपकारिणी विद्या उपनिषद है। जिससे तत्व जिज्ञासु पुरुषों को परम शान्ति प्राप्त होती है, वह परमार्थ कहलाता है। क्लेशग्रस्त जीवों के समस्त क्लेशों का जिससे निवारण हो, वह परम उपकार कहलाता है।

गीता में श्रीकृष्ण ने कहा ‘अध्यात्म विद्या विद्यानाम’। मैं विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ। मुण्डक उपनिषद कहता है, ‘अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।’ अर्थात ‘परा विद्या वह है, जिससे उस अविनाशी ब्रह्म का ज्ञान होता है।’ इस तरह संक्षेप में समझे की विद्या को श्रुतियों में ‘मोक्षदायिनी विद्या, अध्यात्मविद्या तथा पराविद्या आदि नामों से कहा गया है।

अब जरा आत्मनिर्भर भारत को समझें। इसके दो शब्दों पर विचार करें- एक ‘आत्म’ जो आत्मा की पहचान कराता है। पहले आत्मा के स्वरुप की बात करते हैं। शांडिल्य के तत्वज्ञान में ‘आत्मा’ का वर्णन अर्थपूर्ण एवं निश्चयात्मक शब्दों में किया गया है, एवं उसके ‘महत्तम’ एवं ‘लघुतम’ ऐसे दो स्वरुप का वर्णन आता है। इनमे से ‘महत्तम’ आत्मा अनन्त एवं सारे विश्व का व्यापन करनेवाला कहा गया है। एवं ‘लघुतम’ आत्मा अणुस्वरूपी वर्णन किया गया है। आत्मा का नकारात्मक वर्णन करनेवाले याज्ञवल्क्य के तत्वज्ञान से शांडिल्य के इस तत्वज्ञान की तुलना सर्वदा की जाती है। इन दोनों तत्वज्ञानों की ज्ञान पद्यति विभिन्न होते हुए भी, उन दोनों में प्रणीत आत्मा के संबधित तत्वज्ञान एक ही प्रतीत होता है।

शांडिल्य के अनुसार, मानवीय जीवन का अंतिम ध्येय मृत्यु के पश्चात् आत्मा में विलीन होना बताया गया है। शंकराचार्य विरचित ‘ब्रम्ह् सूत्र भाष्य’ में शांडिल्य के तत्वज्ञान का निर्देश ‘शांडिल्यविद्या’ के नाम से किया गया है।

‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ और आत्मनिर्भर भारत का क्या सम्बन्ध है ? इसके लिए स्वामी विवेकानंद को समझना होगा। स्वामी विवेकानंद जी कहते थे. ‘are you own yourself’ अर्थात क्या आप ‘स्व’ में हैं ?

      समझना होगा कि ‘स्व’ से ही सारे सूत्र जुड़े हैं, चाहे वे स्वाबलंबन के हों या शिक्षा। दूसरे शब्दों में क्या हम अपने संस्कृति परंपरा , स्वभाषा, भूषा, भेषज, भजन, भोजन में ‘स्व’ हैं ? दूसरा ‘स्व’ जो हमारे ‘अस्तित्व’ का बोध कराता है। तो क्या हम अपने देश, समाज, राष्ट्र में रहते हैं या देश, समाज, राष्ट्र हमारे अन्दर जीता है ? तो क्या हम आत्मनिर्भर भारत में है ? यदि नहीं तो हम कैसे आत्मनिर्भर हो सकते है ?

दूसरा शब्द है, भारत अर्थात ‘ज्ञान में रत’। ‘प्रकाश में लीन।‘ भारत का एक नाम ‘अजनाभ वर्ष‘ भी है। अर्थात विश्व का नाभि केंद्र। न केवल भौगोलिक दृष्टि से बल्कि सम्पूर्ण विश्व की नाभि जहाँ से सभी को ‘आत्म प्रकाश’ प्राप्त होता है। और इसे सम्पूर्ण  दुनिया अध्यात्म प्रधान देश कहती है। और हम हैं।  इसे हम प्रत्येक भारतवासी को जन्मजात संस्कारों से बताया जाता है ।

इन संस्कारों को पाते कहाँ से है तो एक लोक , दूसरा वेद से। जब हम स्व की बात कर रहे होते हैं तो वहां भाषा भी आती है । तो लोक को समझने के लिए मातृभाषा चाहिए तो वेद को समझने को संस्कृत भाषा चाहिए । क्योंकि संस्कृत भारतीय  सभ्यता और संस्कृति का यथार्थ दर्पण है। 

  अनेक सृजनात्मक युगों को प्राप्त  कर भारत  ने जो अपनी प्रगति की यात्रा की है , उसे वाणी देनेवाला विपुल ज्ञान भंडार साहित्य के रूप में वेदों से लेकर अद्यतन संस्कृत ग्रंथों में भरे पड़े हैं।

 आप सोच रहें होंगे ‘आत्मनिर्भर भारत और शिक्षानीति -2020’ से इसका क्या लेना देना है, बेकार को पाठकों को ज्ञान बता रहें हैं। जी हाँ, ठीक समझें हैं। ज्ञान ही की बात कर रहे हैं।

  जरा समझे कैसे? तो पहली बात कुछ संस्कृति और संस्कृत प्रेमी कह रहें हैं कि इस नीति में संस्कृत कहाँ है ? तो कई लोगों ने कहाँ संस्कृत भाषा को उसी श्रेणी में रख दिया जिस में अरबी को रखा है। चौकिये नहीं ऐसा इसलिए हुआ कि  मातृभाषा को प्राथमिक शिक्षा में पढ़ने की जब बात आई तो नीति बनाने वाले यह भूल गए की जिस तरह मदरसों में अरबी की पढ़ाई होती है उसी तरह संस्कृत भी। 

जबकि संस्कृत विद्यालयों में और वेदपाठी ब्राह्मणों के घरों में न केवल मातृभाषा के रूप बोली जाती है बल्कि सम्पूर्ण भारतीय वांग्मय की धात्री भी है। 

इसी तरह दूसरे लोग यह पूछने के पहले कि संस्कृत पढ़कर कौन सा रोजगार मिलेगा ?  भूल जाते हैं कि लाखों लोगों को संस्कृत ज्ञान के ही कारण ज्योतिष, कर्मकांड , रीति-रिवाजों, पूजा पाठों में लाखों से करोड़ों रूपये मिलते हैं ।शिक्षकीय पद और सामाजिक प्रतिष्ठा अलग से।

 और सबसे बड़ी बात यह कि धरती से जुड़े जिस विश्वमानव बनाने की कल्पना शिक्षा नीति में की गई है उसके सम्पूर्ण सूत्र तो संस्कृत भाषा में ही हैं। 

यह मैं नहीं कह रहा हूँ तो उन नीति विरोधियों को भी समझना चाहिए की यह बात और कौन–कौन कह रहें हैं । 

पंडित जवाहर लाल नेहरू का कथन है, “ संस्कृत भाषा और साहित्य भारत की सर्वोत्तम विरासत है। यह शानदार विरासत है और जब तक यह कायम रहेगी और हमारे लोगों के जीवन को प्रभावित करती रहेगी, तब तक भारत की मौलिक प्रतिभा जीवंत बनी रहेगी।”

कोई दो सौ वर्ष पहले विलियम जोन्स ने कहा था, “संस्कृत ग्रीक की अपेक्षा अधिक पूर्ण, लैटिन की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल और  इनमें  प्रत्येक से अधिक  उत्कृष्ट, परिष्कृत और सुंदर है।” इसलिए आत्म निर्भर भारत में संस्कृत भाषा की दोहरी भूमिका है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ' आत्मनिर्भर भारत के निर्माण' का वादा किया है। यह 'आत्मनिर्भर भारत अभियान', उनकी ही नहीं तो देश के प्रत्येक भारतवासी की महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसका उद्देश्य सिर्फ़ कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों से लड़ना नहीं, बल्कि भविष्य के नए भारत का र्निर्माण करना है। तभी तो वे कहते हैं, "अब एक नई प्राण शक्ति, नई संकल्प शक्ति के साथ हमें आगे बढ़ना है।"

इसका सूत्र क्या है ? तो सूत्र मिलाता है ‘शिक्षा और संस्कृति से। इसलिये प्रारंभ में ही समझ लेना चाहिए की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘शिक्षा तथा संस्कृति’ का सम्बन्ध क्या है। 

वस्तुत: भारत में 'स्वदेशी' एक विचार के रूप में देखा जाता है, जो भारत की न केवल संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था का आर्थिक मॉडल रहा बल्कि  स्वभाषा ही में सम्पूर्ण भारतीय ज्ञानसंपदा का स्रोत है।

 किन्तु पी.एम. मोदी ने अपने भाषण में कहीं भी 'स्वदेशी' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। परन्तु आत्म-निर्भर भारत बनाने का पीएम मोदी का विचार मातृभाषा से ही प्रारंभ होता है। 

  प्रधानमंत्री जी की चिंता है, सब का विकास। पंडित दीनदयाल जी जिसे अन्त्योदय कहते हैं। और विकास की गंगा विद्यालयों से ही बहती है’ इसलिए अठारह वर्ष तक के लिए सत् प्रतिशत की बात आई है । यदि  उनकी चिंता है कि हमारा कच्चा माल विदेश जाता है और दूने-तिगुने दाम में हम पक्का मॉल विदेशों से खरीदते हैं। हमारे पास कृषि है, जल है, वायुमंडल है, जनसँख्या है, ऊर्जा के स्रोत हैं तो फिर हम स्वदेशी का सहारा लेकर ‘आत्मनिर्भर’ क्यों नहीं बन सकते ? 

 अर्थात संसाधनों का दोहन करते हुए, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करते हुए, मानविकी का सही उपयोग कर हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ बन सकते हैं।

   इसलिए जब हम ‘आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी’ की बात करते हैं तो उसके अंदर सर्वांगीण विकास, सतत विकास, अनवरत विकास आदि की ओर जाते हैं। ठीक उसी तरह हमारी प्रतिभाएं भी पलायन न करें चाहे शिक्षा लेने की बात हो या शिक्षा प्राप्त कर रोजगार, उद्यौग और नौकरी की बात हो। 

इसलिए समझाना होगा आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य प्रमुख रूप से देश के समस्त नगरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति (रोटी, कपड़ा, मकान की गारंटी), राष्ट्रीय सुरक्षा, एकात्मता और अखंडता, के साथ एक ‘आत्मनिर्भर भारत’ का निर्माण करना है।

 कोरोना महामारी से आई आर्थिक मंदी और अंतरराष्ट्रीय स्थितियों को देखते हुए समय की मांग है कि हम हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने।

शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में वैदिक ज्ञान परम्परा को स्वभाषा से प्राप्त कर  देश का आत्मविश्वास बढ़ना है। आर्थिक व सैन्य रूप से जिस दिन देश आत्मनिर्भर हो जाएगा, उस दिन दुनिया भारत का लोहा मानना प्रारंभ कर देगी। कुछ पड़ोसी भी अपनी नापाक हरकत बंद कर देंगे। इसलिए आत्मनिर्भरता ही हम भारतीयों का एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए। और शिक्षा इसमें क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सकती है।

  भारतीय संस्कृति के मूल्यों का संरक्षण हो, गुलामी की मानसिकता से मुक्ति हो, स्वरोजगार की ओर युवाओं का ध्यान जाएँ। अत: सुचिता के साथ धर्म आधारित आर्थिक संरचना का आधार खड़ा करना, देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर उपयोग करना, राष्ट्र का सर्वान्गीण विकास करना होगा ।

 इसका निहितार्थ यह भी है कि सभी वर्गों को सामान विकास का अवसर उपलब्ध कराना, भौतिक ऊर्जा से लेकर भारतीय ज्ञान संपदा का युगानुकूल विकास करना , इसमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति कैसे और कितना कारगर होगी यही हमारे चिन्तन का विषय होना चाहिए।

शिक्षा के माध्यम से आत्म निर्भर भारत बनाने के लिए आवश्यक है कि हम स्वभाषा, स्वभूषा, स्वभोजन, स्वभेषज, स्वशिक्षा, स्वरीति-रिवाज, स्वरोजगार, जैविक कृषि, लघु उद्योग आदि पर बल दें।

आत्मनिर्भर भारत के परिणाम क्या होंगे ? यह दो प्रकार से हमारे सामने आता है। भौतिक विकास, सबको रोटी, कपड़ा, मकान, सभी के स्वस्थ्य की चिंता, निरोगी काय। सभी को शिक्षा और चौथा, हर हाथ को काम।  

 दूसरा आत्मनिर्भर भारत का महत्वपूर्ण पहलू है विश्व की ही नहीं तो जीवमात्र की चिंता। मानवता की चिंता। इसलिए मनुष्य का सम्पूर्ण विकास– शरीर, मन, बुद्धि से आत्मा के बोध तक की यात्रा, और यह यात्रा चार पुरुषार्थों- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के साथ करनी है। यह आत्मनिर्भरता पश्चिम के व्यक्ति आधारित विकास से नहीं तो एकात्मता आधारित विकास से प्राप्त करनी है। 

इसलिए समझना होगा कि आत्मनिर्भर भारत के अर्थ हैं – भारतीय संस्कृति का संरक्षण, समाज में न्यासी के रूप में जीने की अवधारणा, पूजीवाद और समाजवाद का निषेध, आर्थिक लोकतंत्र, अनावश्यक भारी उद्योगीकरण का निषेध, विकेन्द्रित नीति। आरक्षण का युक्त युक्तिकरण । भारत एक बार फिर 'आत्म-निर्भर' बनने के लिए भीतर की ओर देख रहा है।

भारत के लिए पीएम मोदी के दृष्टिकोण में आत्मनिर्भरता ना तो बहिष्करण है और ना ही अलगाववादी रवैया। यह अपनी दक्षता में एक तरह की गुणात्मक विस्तार का प्रयत्न है। इसके अतिरिक्त दुनिया के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करते हुए दुनिया की मदद करना, जो भारत की ‘वसुधैव’ सस्कृति के अनुरूप है, यह सरकार करने जा रही है। 

इसीलिए शिक्षा के क्षेत्र में पहली वार भारत के बहार के सामर्थ्य विश्वविद्यालयों को आने को कहा गया है। कोरोना महामारी के बाद आर्थिक राष्ट्रबोध के साथ  जागरण सभी देशों में आएगा। 

  वैसे भी "हम तो वर्षों से आत्म-निर्भरता और स्वदेशी मॉडल की वकालत कर रहे हैं। अब हमें लोकल चीज़ों को लेकर वोकल होना है।“ यानी भारतीयों को स्थानीय चीज़ों के बारे में ज़्यादा बात करनी चाहिए, खुलकर बात करनी चाहिए। यही विश्व गुरु बनाने का रास्ता है। जिसे वंकिमचंद ने, “तुम दुर्गा दसप्रहरण धारणीम” कहा है।

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