Thursday, 26 June 2025

एक भारत श्रेष्ठ भारत

 

 एक भारत श्रेष्ठ भारत

जब हम पूर्वजों के भारत और एक भारत श्रेष्ठ भारतकी पहचान की बात करते हैं तो आप कह सकते हैं कि एक दुविधा पैदा हो रही है कि हमें एक भारत श्रेष्ठ भारतबनाना है कि उसकी पुरानी पहचान सोने की चिडिय़ाऔर जगत् गुरुकी लौटानी है?

तो आइये इसे समझे एक  प्रसिद्ध स्विस लेखक बजोरन लेण्डस्ट्राम के माध्यम से भारत के सोने के चिडिय़ा के पक्ष को जिसने पुरातन मिस्त्रियों से लेकर अमेरिका की खोज तक तीन हजार वर्ष की साहसी यात्रायों और महान् खोजकर्ताओं की गाथा का अध्ययन कर अपनी पुस्तक भारत एक खोजमें लिखता है- ‘‘ मार्ग और साधन कई थे,परन्तु  उद्देश्य सदा एक ही रहा- प्रसिद्ध  भारत भूमि पर पहुँचने का जो देश सोना चाँदी, कीमती मणियों और रत्नों, मोहक खाद्यों, मसालों, कपड़ों से लबालब भरा पड़ा है।’’

 इसलिए समझें एक भारत श्रेष्ठ भारतके बारे में वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण क्या है? वस्तुत: इस अभिनव प्रयास से हमें एक भारत और श्रेष्ठ भारत दोनों पक्षों को प्राप्त करना है। जब आइये स्मरण करते हैं इस अभियान की। 31 अक्टूबर, 2015 अवसर है, सरदार पटेल जी की 140वीं जयंती का। आइये समझें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का वह वक्तव्य जहाँ से प्रारंभ होती है एक भारत श्रेष्ठ भारतके पहचान की यात्रा। ‘‘सरदार पटेल जी ने हमें एक भारत दिया। अब यह 125 करोड़ भारतीयों का सामूहिक कर्तव्य है कि सामूहिक रूप से इसे श्रेष्ठ भारत (पूर्वजों का भारत) बनाना है। हम सब सरदार साहिब के जीवन और योगदान से प्रेरणा ले कर ऐसा कर सकते हैं।इसमें से पहला एक भारत को विभिन्न राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों की सांस्कृति धरोहरों, परंपराओं और प्रथाओं, उनकी अपनी ज्ञान परम्पराओं के बीच आपसी समझ से एकता बनेगी। जिससे भारत की एकता और अखण्डता मजबूत होगी। तो पहले भारत सरकार की एक भारत की रचना को जानते हैं-

इसमें योजना तैयार की गई कि राज्यों और केन्द्र शासित राज्यों के बीच जोड़ी बनेगी और यह जोड़ी एक वर्ष या अगली घोषणा तक बनी रहेगी। राज्य स्तर की गतिविधियों के लिए इस जोड़ी का उपयोग किया जायेगा। जिला स्तर की जोड़ी राज्य स्तर की जोड़ी से स्वतंत्र होगी। इसके माध्यम से संस्कृति, पर्यटन, भाषा, शिक्षा, व्यापार आदि के क्षत्रों में उनकी अपनी मौलिक विशेषताओं के आदान-प्रदान से नागरिकों के बीच सांस्कृतिक विविधता का परिचय होगा और वे एक दूसरे को नजदीक महसूस करेंगे। अपने अनुभवों को साझा कर सकेंगे।

इसके उद्देश्य को समझे-

एक : राष्ट्र की विविधता में एकता के गौरव को अनुभव कराना और देश के लोगों के बीच परंपरागत रूप से वर्तमान भावनात्मक बंधनों के सम्बन्धों को बनाए रखने में सम्बल प्राप्त कराना।

दो : राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देने के लिए एक वार्षिक योजनाबद्ध भागीदारी के माध्यम से सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेश के बीच एक गहन और ढाँचेगत भागीदारी का निर्माण करना।

तीन : लोगों को अलग-अलग प्रांतों की समृद्ध विरासत और संस्कृति, रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं से अवगत कराना, जिससे वे भारत की विविधता के बारे में लोगों को समझाने और उनकी प्रशंसा करने के योग्य बनें। संयुक्त पहचान को बढ़ावा देना।

चार : दीर्घकालिक भागीदारी का निर्माण करना।

पाँच : एक ऐसा वातावरण बनाना जो राज्यों के बीच सर्वोत्तम प्रथाओं और अनुभवों को साझा करके शिक्षण को बढ़ावा देता हो।

भारत दुनिया का सबसे प्राचीन राष्ट्र तो है ही इसकी विविध भाषाई, सांस्कृतिक और पंथीय व्यवस्था एक ऐसे धागे से बँधी हैं जिसे हम माता-पुत्रका सम्बन्ध कहते हैं। भारत को हम अपनी माता मानने के कारण इसके सारे पुत्र सहोदर होने से भाई-भाई हैं। हमारे सुदीर्घ इतिहास और उसकी सांस्कृतिक धरोहरों ने विश्व में हमारी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। राष्ट्रीयता की यही पहचान हमारी विशिष्टता का वह सूत्र है जिसमें हम करोड़ों वर्षों से विविधता के साथ एकात्म हैं।

आज हम देखते हैं कि संचार और भौतिक समृद्धि के कारण सुदूर अंचलों से निरन्तर जुड़े हैं किन्तु यह हमारे लिए कोई नई बात नहीं है क्योंकि जब हमारे पास इस तरह के कोई संसाधन नहीं थे तब भी शंकराचार्य जैसे महानुभावों ने पैदल देश की चतुर्दिक यात्रा कर पीठों की स्थापना की। इतना ही नहीं जिन बावन शक्ति पीठियों की अवधारणा हमारे वैदिक ऋषियों ने सती-शिव के सूत्र में बाँधकर हमारे सामने रखी थी वह केवल भावनात्मक कथाओं के आधार नहीं हैं, बल्कि आज वे सब शक्ति स्थल बने हैं और वहाँ नाना प्रकार की धातुएँ, तेल आदि की खानें मिल रही हैं। यह हमारी वैज्ञानिक समझ और भावनात्मक एकात्मता की परिचायक हैं। प्राचीन काल से आज के आधुनिक काल तक भारतीय दृष्टि सदा मानवीय सरोकारों और राष्ट्रनिर्माण के लिए एक विशिष्ट दृष्टिकोण लेकर चलता आया है। आपसी समझ चाहे वह पंथीय हो या जातीय  ही भारत की असली सामथ्र्य है।

स्वतंत्रता के बाद भारत की एकता को दृढ़ करने के लिए जो सांस्कृतिक व्यवहार होने चाहिए उसमें अवश्य कुछ कमी रही, जिसके कारण सुदूर पूर्वांचल का व्यक्ति आज भी दिल्ली जैसी राजधानी में अपने को अकेला समझता है। इस प्रयास में कमी के कारण शारीरिक रंग, रूप संरचना के आधार पर भी हम आपस में दुव्र्यवहार कर बैठते रहे हैं।

इसी को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने सरदार पटेल की जयन्ती पर 2015 में राष्ट्रीय एकता दिवस के दौरान विभिन्न प्रकार के भेदों, उपभेदों और दूरियों को दूर करने के लिए साम्प्रदायिक, पंथीय, जातीय, क्षेत्रीय दूरी को खत्म कर भारत की गहरी एकता कल्पना दी थी।

इसके लिए देश के विभिन्न प्रदेशों के बीच कुछ कार्यक्रम तैयार किए गये- वर्तमान में 2020 तक के लिए कुछ रचना इस प्रकार है, (यह ठीक है कि कोरोना ने अभी इसमें व्यवधान डाला है)-पंजाब-आन्ध्रप्रदेश, हिमांचल-केरल,उत्तराखण्ड -कर्नाटक, हरियाणा-तेलंगाना, राजस्थान-असम, गुजरात-छत्तीसगढ़, महारष्ट्र -उड़ीसा, गोवा-झारखण्ड, दिल्ली-

सिक्किम,मध्यप्रदेश-मणिपुर और नागालैण्ड, उत्तरप्रदेश-अरुणांचल प्रदेश और मेघालय, बिहार-त्रिपुरा और मिजोरम, चंडीगढ़-दादरा और नगर हवेली, पुद्दुचेरी-दमन और दीव,लक्ष्यदीप-अंडमान और निकोबार आदि।

तत्कालीन मानव संसाधन विभाग अब का शिक्षा विभाग भारत सरकार इसका नोडल विभाग है। इसी तरह राज्यों में उच्च शिक्षा या शिक्षा विभाग इसके नोडल हैं। बातचीत के लिए मुख्य विषय बिन्दु- भारत के विचार को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में मनाने के लिए जिसमें विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विभिन्न सांस्कृतिक इकाइयाँ एक दूसरे के साथ मेल खाती हैं और एक दूसरे के साथ बाातचीत करती हैं विविध व्यंजनों, संगीत, नृत्य, रंगमंच, फिल्मों, हस्तशिल्प, खेल, साहित्य, त्योहारों, चित्रकला की यह शानदार अभिव्यक्ति है। यह सब बिन्दु सभी भारतीयों को आपस में बन्धुता भाव के साथ अत्मसात करने को सक्षम बनाएगी। इससे विभिन्न संम्प्रदायों, राज्यों के बीच आपस में छोटे-छोटे मसलों के कारण दूरी पैदा होती है।

इसके लिए पच्चीस-छब्बीस प्रमुख गतिविधियाँ की रूपरेखा तैयार की गई,जिनको हम चार पाँच बिन्दुओं के माध्यम से उनको स्मरण कर लें या कहिये दुहरा लें- एक: कम से कम पाँच ऐसी पुस्तकों का जिन्हें विभिन्न स्थापित मान्य पुरस्कारों से पुरस्कृत किया गया हो, और इसी तरह दोनों राज्यों के पाँच-पाँच गीत-गानों को साझेदारी राज्य की भाषा में अनुवाद हो। साथ ही दोनों राज्यों की समान अर्थवाली कहावतों की पहचान और उनका अनुवाद कर उनके उपयोग के लिए व्यवहार में प्रयोग किया जाये।

दो: सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के माध्याम से गृह राज्य में पहचाने गए मंडलों की सहायता से राज्यों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रम। साहित्योत्सव के रूप में लेखकों और कवियों आदि के लिए विनिमय कार्यक्रम हों। सहभागी राज्यों के आगंतुकों के लिए राज्य अतिथि संस्कृति को बढ़ावा दिया जाये। विद्यापीठ के छात्रों द्वारा शैक्षणिक भ्रमण में सहभागी राज्यों में उस राज्य की विशिष्ट पहचानों को सामने लाया जाये। एक राज्य के छात्रों का वर्णमाला, गीत, कहावत और सहभागी राज्य की भाषाओं में सौ वाक्यों का प्रदर्शन। युग्म राज्यों की दो भाषाओं में शपथ प्रतिज्ञाओं के  प्रशासन को प्रोत्साहित करना। भागीदारी वाले राज्य की भाषा में विद्यालयों की पाठ्यक्रम पुस्तकों में कुछ पन्नों को शामिल करना। सहभागी राज्य की भाषा में छात्रों के बीच निबंध प्रतियोगिता का आयोजन। साझीदार राज्यों की भाषाओं में विद्यालय और महाविद्यालयों में वैकल्पिक कक्षाओं का अभ्यास कराना।  सहभागी राज्य के शिक्षण संस्थानों में अन्य राज्य के नाटकों के प्रदर्शन का आयेजन कराना।

तीन: भागीदार राज्य की पाक प्रथाओं को सीखने के अवसर के साथ पाक त्योहार मनाना। राज्यों की भागीदारी वाले पर्यटकों के लिए राज्य दर्शन कार्यक्रमों को बढ़ावा देना। एक राज्य के टूर ऑपरेटर्स के लिए परिचितों के पर्यटन का आयोजन भागीदारी राज्य के लिए करना।

चार : राज्यों में किसानों के बीच पारंपरिक कृषि प्रथाओं और पूर्वानुमान के बारे में आदन-प्रदान की व्यवस्था करना। राज्यों की भागीदारी वाले क्षेत्रीय टीवी, रेडियों चैंनलों पर साझा राज्यों को आपसी कार्यक्रमों के प्रसारण की व्यवस्था करना।

पाँच : पन्द्रह अगस्त और 26 जनवरी के अवसर पर साझेदारी वाले राज्यों की संयुक्त झांकी का आयोजन। भागीदारी वाले राज्य के औपचारिक कार्यों में एक राज्य से परेड आदि की भागीदारी। साझेदारी राज्यों की उपशीर्षक वाली फिल्मों का प्रसारण कराना।

छह : फैशन शो को प्रोत्साहित करना और राज्य के विद्यार्थियों और लोगों द्वारा भागीदारी राज्यों की पोषाकों को पहनना।

सात : माय गवन्र्मेट पोर्टल और संचार माध्यमों का सहारा लेकर भागीदारी वाले राज्य की भाषा में राष्ट्रीय प्रश्रोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन तथा एक भारत श्रेष्ठ भारत पर ब्लॉग प्रतियोगिता का आयोजन करना। साथ ही आपसी राज्यों के लिए फोटोग्राफी प्रतियोगिता का आयोजन, स्थान, वस्तुओं और दृश्यों का चयन।

 आठ : सहभागी राज्यों में सायकलिंग अभियान का आयोजन। एक राज्य के एन.सी.सी. और एन.एस.एस के शिविरों का आयोजन जो सहभागी राज्यों के स्थानो पर हों। तो यह है  सरकारी कार्यक्रम जिनसे भारत की एकता में युवाओं की सहभागिता कर भारत परिचय कराया जाये और उनके अन्दर एक भावनात्मक एकता पैदा की जाये। अब जरा श्रेष्ठ भारत पर विचार किया जाये। ध्यान में आता है कि स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल को अपनी पूरी ताकत राष्ट्रीय एकता के लिए लगानी पड़ी जिसमें विभाजन की विभीषिका के बाद भारत का एक खण्डित भौगोलिक स्वरूप हमारे सामने आया। इसलिए एक प्रश्र उठना स्वाभाविक है कि क्या जिस श्रेष्ठ भारत की संकल्पना हमने 2015 में एकता दिवस के दिन की वह इस एक पक्ष के प्राप्त करने से पूर्व हो जायेगी ?

इसलिए अब हमें श्रेष्ठ भारत के आवश्यक तत्वों पर भी यहाँ विचार करना होगा।  कारण कि भारत मात्र भौतिकता के  साथ जीने वाला राष्ट्र नहीं है। यह उसके स्वस्थ्य शरीर का परिचायक हो सकता है किन्तु उस आत्मा की खोज और बोध करना अभी निरन्तरता में है जिसे हम धर्म और अध्यात्म कहते हैं।  और एक जो विशिष्ट बात ध्यान में आती है कि जब हम भौतिक रूप से सम्पन्न थे तभी हमारी अध्यात्म भूमि भी उतनी ही उर्जावान थी। स्वत्व आधारित थी। भारत ने सदा से यह विचार किया है कि हम भौतिक समृद्ध, विज्ञान और तकनीकी विकास के शिखर पर तो पहुँचे ही किन्तु वह विकास हमारी संस्कृति, प्रकृति और आत्मविकास के विपरीत न हो।

इसी के साथ दूसरा पक्ष जो भारत के जगत्गुद् गुरु की पहचान को बताता है पाश्चात्य चिंतक मार्क ट्वेन के इस वक्तव्य समझें- ‘‘भारत उपासना पंथों की भूमि, मानव जाति का पालना, भाषा की जन्म भूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दादी एवं परंपरा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सृजनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है। यह ऐसी भूमि है जिसके दर्शन के लिए सब लालायित रहते हैं और एक बार उसकी हल्की सी झलक मिल जाए तो दुनिया के अन्य सारे दृश्यों के बदले में भी वे उसे छोडऩे के लिए तैयार नहीं होंगे।’’ अब इसी तरह के एक भारत श्रेष्ठ भारतके बारे में दुनिया के अनेक चिंतकंो, शोधकों यथा हीगल, गैलबैनो, मार्कपोलो आदि के हैं। दूसरा कथन अर्नोल्ड टायनवी एडिनवर्ग का समझे- 21वी सदी का नेता भारत होगा, प्रत्येक क्षेत्र में भारत की महान प्रगतिहोगीक। उससे भी अधिक यह विज्ञान  एवं धर्म को समन्वित करेेगा। मात्र भारत  यह कर सकता है और करेगा भी। तो करना क्या है? सर्वप्रथम  तो हमारे देश मे एक धारणा  बनी हुई है कि पश्चिम का व्यक्ति बुद्धिवादी, तर्कशील तथा प्रयोगशील होताहै और भारत का व्यक्ति  ग्रंथ को ही प्रमाण मानने वाला, अंधश्रद्धालु तथा प्रयोग से दूर भागने वाला होता है।

परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत है।इस लिए पहले स्व का बोध। अपने पूर्वजों की खोजो पर अभिमान और उसको समाज के सामने तथ्य के साथ रखना। वे दोनेां प्रकार की हैं, वैदिक विज्ञान पर आधारित किन्तु वर्ममान में लिए पूर्णत: उपयोगी। दूसरी हमारी आध्यात्मिक परंपरा जो वैश्विक मानव बनने की क्षमता रखती है। आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में जाते हैं जो भारत के पास ये क्षमताएँ उस समय थी जब दुनिया ठीक से चलना भी नहीं जानती थी। पश्चिम के कई देशों का जन्म भी नहीं हुआ था। भारत के प्रथम परमाणु वैज्ञानिक महर्षि कणाद ने वैशेष्ज्ञिक दर्शन में कहा है, ‘दृष्टनां दृष्ट प्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोऽभ्युदयायअर्थात् प्रत्यक्ष देखे हुए और अन्यों को दिखाने के  उद्देश्य से अथवा सव्यं और अधिक गहराई से ज्ञान प्राप्त करने हेतु रखकर किये गये प्रयोगों से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी तरह कण से लेकर ब्रहमांड  और उनका प्रयोजन जानने के लिए महर्षि  गौतम न्याय दर्शन में सोलह चरण की प्रक्रिया बताते हैं। और पृथ्वी, जल, जेज, वायु, आकाश, दिक्् काल, मन ओर आत्मा को जानना चाहिए ऐसाकहा है। गीता के 7वें अध्याय में श्रीकृष्ण जी बताते हैं कि ब्रह्म के समग्र रूप को जानने के लिए ज्ञान-विज्ञान दोनेां को जानना चाहिए, क्योंकि इन्हें जानने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रहता।

भृगु संहिता में शिल्प की परिभाषा करते हुए कहते हैं-

नानाविधानां वस्तूनां यंत्रणाँ कल्पसंपदा

धातूनां साध्रानां च वस्तूनां शिल्पसंज्ञितम्।

कृषिर्जलं खनिश्चेति धातुखंड त्रिधाभिधम्।।

नौका-रथाग्रिनानां, कृतिसाधनमुच्यते।

वेश्म, प्राकार नगररचना वास्तु संज्ञितम्।।

इन्होंने दस शास्त्रों का उल्लेख किया किन्तु बात यहीं पूर्ण नहीं होती तो पूरे विज्ञान सम्पदा और उसकी भारतीय खोज को देखे तो - विद्युत शास्त्र,यंत्र विज्ञान, धातुशास्त्र, विमान विद्या, नौका शास्त्र, वस्त्रुशास्त्र,गणित शास्त्र, काल गणना, खगोल सिद्धांत, स्थापत्य शास्त्र, रसायन शास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, कृषि विज्ञान, प्राणि विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, घ्वनि विज्ञान, लिपि विज्ञान, यह हमारी वो उपलब्धियाँ है जो श्रेष्ठ भारत की परिचायक हैं। आवश्यकता है इन्हें आधुनिक सन्दर्भ और काल के साथ ठीक से संगति बैठाकर समाज के सामने लाना और उनका खोया स्वाभिमान जाग्रत करना और डीकोलनाइजेशन की ओर ले जाना। यही श्रेष्ठ भारत की निशानी है। इसे ही हमें स्वयं बोध कर दुनिया को बोध कराना है। जिसे भारत के महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र वशु कुछ इस प्रकार कहते हैं-

To my country men

Who will yet claim

The intellectual heritage

Of their ancestors

    मेरे देश वासियो को जो उनके पूर्वजों की, बौद्धिक विरासत के अभी भी अधिकारी हैं। अपने पुरुषार्थ को जगाना होगा तभी हम अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्राप्ति कर एक भारत श्रेष्ठ भारत के सपने को पुन: पूरा कर सकते हैं। आप ने हमें सुना आभार।

गुरु नानक देव


   

  गुरु नानक देव

 साम्प्रदायिक (पंथियों की) कट्टरता के वातावरण में गुरु नानक जी ने धर्म को उदारता की एक नई परिभाषा दी। उन्होंने अपने सिद्धान्तों के प्रसार हेतु बिना गृहस्थ आश्रम का त्याग किए एक संन्यासी की भांति परिवार के साथ रहते हुए लोगों को सत्य और प्रेम का पाठ पढ़ाना आरंभ कर दिया। उन्होंने जगह-जगह घूमकर अंधविश्वासों, पाखण्डों का जमकर विरोध किया।

वे उस सनातन सिद्धांत के प्रतिस्थापक थे जिसमें सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर का निवास है। इसलिए वे न केवल हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते थे, बल्कि सभी मत-पंथों को आपस में प्रतिस्पर्धा और बैर को त्याग कर साम्प्रदायिक सदभाव की स्थापना हो इसके लिए सभी तीर्थों की यात्रायें की और सभी मत-पंथ के लोगों को अपना शिष्य बनाया।

 उन्होंने हिन्दू जीवन-दर्शन और अन्य मत पंथों की मूल एवं सर्वोत्तम शिक्षाओं को सम्मिश्रित करके सनातन संस्कृति में एक नए मत की स्थापना की जिसका मूलाधार प्रेम और समानता थी,  यही बाद में सिख-धर्म कहलाया। 

भारत में अपने ज्ञान की ज्योति जलाने के बाद उन्होंने मक्का-मदीना की यात्रा की और वहाँ के निवासी भी उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। 25 वर्ष के भ्रमण के पश्चात् नानक कर्तारपुर में बस गये और वहीं रहकर उपदेश देने लगे। उनकी वाणी आज भी गुरु ग्रंथ साहिबमें संगृहीत है। जिन-जिन स्थानों से गुरु नानक जी गुजरे थे वे आज तीर्थ स्थल का रूप ले चुके हैं। 

गुरु नानक ने अपने उपदेशों से जिस सांप्रदायिक एकता एवं सदभाव की ज्योति जलाई थी वह आज भी प्रज्वलित है। उनका धर्म सेवा, करुणा, प्रेम और आस्था का प्रतीक है तथा विश्वबन्धुत्व की प्रेरणा देता है।
              
गुरु नानक जी का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गाँव में कार्तिक पूर्णिमा को एक खत्री कुल में हुआ था। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। 

 इनके पिता का नाम कल्याणचंद उर्फ मेहता कालू जी था, माता का नाम तृप्ता देवी था। इनकी बहन का नाम नानकी था। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लडक़पन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढऩे लिखने में इनका मन नहीं लगा।

सात-आठ साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्राप्ति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोडऩे आ गए। 

तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएँ घटीं जिन्हें देखकर गाँव के लोग इन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानने लगे। बचपन के समय से ही इनमें श्रद्धा रखने वालों में इनकी बहन नानकी तथा गाँव के शासक राय बुलार प्रमुख थे। नानक के सिर पर सर्प द्वारा छाया करने का दृश्य देखकर राय बुलार उनके सामने नतमस्तक हो गये।

नानक का विवाह सोलह वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ था। 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ। चार वर्ष पश्चात् दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ। दोनों लडक़ों के जन्म के उपरांत 1507 में नानक अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोडक़र मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़े।

गुरु नानाक देव चारों ओर घूमकर उपदेश करने लगे। 1521 तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य-मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। इन यात्राओं को पंजाबी में उदासियाँकहा जाता है।

मक्का में गुरु नानक देव जी पधारे थे। नानक जी सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्होंने निरर्थक माना। रूढिय़ों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। 

ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।

    उनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है’, उसकी उपासना हिंदू- मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपूजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। 

हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। लोगों ने तत्कालीन इब्राहीम लोदी से इनकी शिकायत की और ये बहुत दिनों तक कैद रहे। अंत में पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहीम हारा और बाबर के हाथ में राज्य गया तब इनका छुटकारा हुआ।

जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ। स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा आदि करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर अश्विन कृष्ण 10, संवत् 1597 (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को इनका परलोकवास हुआ।

 मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए। जब कि लोग यह विचार कर रहे थे कि नानक जी अपने बेटे श्रीचन्द को अपना उत्तराधिकारी बनायेंगे। किन्तु उन्होंने परिवार को नहीं प्रतिभा को मान दिया।

नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा बहता नीरथी जिसमें  फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।

गुरु नानक सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) है।

उनके जीवन से जुड़े प्रमुख गुरुद्वारा साहिब-
1. गुरुद्वारा कंध साहिब- बटाला (गुरुदासपुर) गुरु नानक का यहाँ बीबी सुलक्षणा से 18 वर्ष की आयु में संवत् 1544 की 24वीं जेठ को विवाह हुआ था। यहाँ गुरु नानक की विवाह वर्षगाँठ पर प्रतिवर्ष उत्सव का आयोजन होता है।
2. गुरुद्वारा हाट साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) गुरुनानक ने बहनोई जैराम के माध्यम से सुल्तानपुर के नवाब के यहाँ शाही भंडार के देखरेख की नौकरी प्रारंभ की। वे यहाँ पर मोदी बना दिए गए। नवाब युवा नानक से काफी प्रभावित थे। यहीं से नानक को तेराशब्द के माध्यम से अपनी मंजिल का आभास हुआ था।
3. गुरुद्वारा गुरु का बाग- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) यह गुरु नानकदेवजी का घर था, जहाँ उनके दो बेटों बाबा श्रीचंद और बाबा लक्ष्मीदास का जन्म हुआ था।
4. गुरुद्वारा कोठी साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) नवाब दौलतखान लोधी ने हिसाब-किताब में गड़बड़ी की आशंका में नानकदेवजी को जेल भिजवा दिया। लेकिन जब नवाब को अपनी गलती का पता चला तो उन्होंने नानकदेवजी को छोड़ कर माफी ही नहीं माँगी, बल्कि प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन गुरु नानक ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
5. गुरुद्वारा बेर साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) जब एक बार गुरु नानक अपने सखा मर्दाना के साथ वैन नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए, जहाँ पर कि उन्होंने ईश्वर से साक्षात्कार किया। सभी लोग उन्हें डूबा हुआ समझ रहे थे, लेकिन वे वापस लौटे तो उन्होंने कहा- एक ओंकार सतनाम। गुरु नानक ने वहाँ एक बेर का बीज बोया, जो आज बहुत बड़ा वृक्ष बन चुका है।
6. गुरुद्वारा अचल साहिब- गुरुदासपुर अपनी यात्राओं के दौरान नानकदेव यहाँ रुके और नाथपंथी योगियों के प्रमुख योगी भांगर नाथ के साथ उनका धार्मिक वाद-विवाद यहाँ पर हुआ। योगी सभी प्रकार से परास्त होने पर जादुई प्रदर्शन करने लगे। नानकदेव जी ने उन्हें ईश्वर तक प्रेम के माध्यम से ही पहुँचा जा सकता है, ऐसा बताया।
7. गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक- गुरुदासपुर जीवनभर धार्मिक यात्राओं के माध्यम से बहुत से लोगों को सिख धर्म का अनुयायी बनाने के बाद नानकदेवजी रावी नदी के तट पर स्थित अपने फार्म पर अपना डेरा जमाया और 70 वर्ष की साधना के पश्चात सन् 1539 ई. में परम ज्योति में विलीन हो गए।

तात्पर्य यह कि नानक साहब का जीवन भारतीय सनातन परम्परा की वह उत्कृष्ट दृष्टि को प्रतिपादित करती है जो इस्लाम के संक्रमण काल में भारतीय चेतना को आत्मबोध कराने और हिन्दू से इस्लाम बने बन्धुओं के अन्दर एक ही ईश्वर का भाव पैदा करने में सहायक थी। 

यह बात अलग है कि इन सारे प्रयत्नों के बाद भी देश इस्लाम और ईसाइयत के ऐसे थपेड़ों को सहने को मजबूर हुआ जिसमें न केवल सिख परम्परा के गुरु का अकल्पनीय बलिदान हुआ बल्कि बार-बार हिन्दू बटा और देश के कई टुकड़े हुए। फिर भी यदि नानक देव न होते तो शायद ही हमें गुरु गोविन्द सिंह प्राप्त होते और देश की अस्मिता की पहचान स्थिर रहती। भावी पीढ़ी इस परमआत्मा की सदा ऋणी रहेगी।
      
          प्रो उमेश कुमार सिंह 

(संग्रहीत सामग्री के लिए सभी ग्रंथकारों का आभार)
  





Friday, 20 June 2025

#विद्या_भारती_वार्षिक_पत्रकार_वार्ताविद्या भारती की वार्षिक पत्रकार वार्ता : मूल्य-आधारित और समावेशी शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण20 जून 2025, शुक्रवार को विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान ने नई दिल्ली स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में अपनी वार्षिक राष्ट्रीय प्रेस वार्ता का आयोजन किया. अ.भा.अध्यक्ष डॉ. रविंद्र कान्हेरे ने महामन्त्री श्री देशराज शर्मा, उपाध्यक्ष श्री अवनीश भटनागर और प्रचार संयोजक डॉ. रामकुमार भावसार की उपस्थिति में विद्या भारती की विशिष्ट गतिविधियों, उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं के बारे में अपना वक्तव्य दिया. आपने कहा कि विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान आज देश के सबसे बड़े शैक्षणिक आंदोलनों में से एक है, जो गुणवत्तापूर्ण (गुणात्मक) और संस्कृति-युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। विद्या भारती आज संपूर्ण देश में 684 जिलों में 12,118 विद्यालयों का संचालन कर रही है । इसके अतिरिक्त, संस्था देशभर में 8,000 से अधिक अनौपचारिक शिक्षा केंद्र भी संचालित कर रही है, जो समाज के वंचित वर्ग को नि:शुल्क शिक्षा सुविधा प्रदान कर रहे हैं । वर्तमान में 35.33 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं विद्या भारती के स्कूलों में अध्ययनरत हैं और उन्हें 1.53 लाख से अधिक शिक्षक शिक्षित कर रहे हैं।पूर्व छात्रों के बारे में बताते हुए आपने कहा कि विद्या भारती के 10 लाख 30 हजार से अधिक पूर्व छात्र इसके पोर्टल पर पंजीकृत हैं, जिससे यह विश्व का सबसे बड़ा पूर्व छात्र संगठन बन गया है। ये पूर्व छात्र 87 से अधिक देशों में रहकर विविध क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं और अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान प्राप्त सेवा, संस्कृति और प्रतिबद्धता के मूल्यों को आगे बढ़ा रहे हैं। विद्या भारती की विशेषता इसकी मूल्याधारित शिक्षा को आधुनिक तकनीकी दृष्टिकोण से जोड़ने में है।हमारे विद्यालयों में AI-सक्षम लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल क्लासरूम अपनाए जा रहे हैं और यह सब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के अनुरूप है। वर्तमान में, 507 से अधिक विद्यालयों में अटल टिंकरिंग लैब्स की स्थापना की जा चुकी है, जो AI, Robot, Coding और अन्य उभरती तकनीकों में बच्चों को हाथों-हाथ सीखने का अवसर देती हैं। वैश्विक STEM मानकों की दिशा में कार्य करते हुए भी संस्था का नैतिक मानदंड भारतीय दर्शन द्वारा निर्धारित होता है.हमारे आईटीआई, जन शिक्षण संस्थान और स्किल हब जैसे व्यावसायिक शिक्षा के केंद्र जनजातीय और ग्रामीण युवाओं को रोजगारपरक कौशल प्रदान करते हैं । कारगिल (लद्दाख), शिमला और मंडी (हिमाचल प्रदेश), और किफिरे (नागालैंड) जैसे दुर्गम क्षेत्रों में इन केंद्रों की स्थापना की गई है।विशेष शिक्षा गतिविधि में विद्या भारती सैनिक विद्यालय, सीमा क्षेत्र विद्यालय और आवासीय जनजातीय विद्यालय भी संचालित करती है ताकि कोई भी क्षेत्र शिक्षा से वंचित न रह जाए । भारतीय शिक्षा शोध संस्थान (लखनऊ) और समर्थ भारत अनुसंधान केंद्र (गांधीधाम, गुजरात) जैसे संस्थान भारतीय ज्ञान परंपराओं पर आधारित पाठ्यक्रम एवं अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि मानक परिषद (भोपाल) पूरे देश में स्कूलों की गुणवत्ता के मानकीकरण एवं उन्नयन का कार्य कर रही है। अपने अखिल भारतीय आयोजनों में राष्ट्रीय विज्ञान मेले, गणित ओलंपियाड, खेल प्रतियोगिताओं आदि में भी हमारे छात्रों ने लगातार प्रथम स्थान प्राप्त किए हैं । विद्यालय से अखिल भारतीय स्तर तक आयोजित विज्ञान मेला, सांस्कृतिक कला पर्व, खेल, वैदिक गणित, कम्प्युटर विषयों के कार्यकर्मों से जहां गुणवत्ता, रुचि, नवाचार को बढ़ावा मिलता है वहीं राष्ट्रीय एकात्मता, परम्पराओं का आदान-प्रदान तथा मिलजुल कर कार्य करने की भावना का विकास होता है । अभी तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर इस वर्ष UPSC परीक्षा में 27 से अधिक पूर्व छात्रों ने सफलता प्राप्त की है श्री प्रकाश यादव (प्रयागराज), श्री विभोर सारस्वत (शिकारपुर, बुलंदशहर, यूपी) और श्री ऋषभ चौधरी (गरोठ, मध्य प्रदेश) ने टॉप 50 में स्थान प्राप्त किया । यह सब प्रमाणित करता है कि जन साधारण की मूल्याधारित शिक्षा भी वैश्विक मानकों से कहीं अधिक बेहतर परिणाम दे रही है ।विजन 2047 और पंच परिवर्तन की चर्चा करते हुवे आपने बताया कि विद्या भारती का भावी रोडमैप पंच परिवर्तन के पाँच उद्देश्यों द्वारा निर्देशित है:सामाजिक समरसता – जाति, वर्ग और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता और एकता को बढ़ावा देना विद्या भारती का मुख्य उद्देश्य है। यह संगठन सभी सामाजिक वर्गों के लिए शिक्षा को सुलभ और समावेशी बनाने के लिए कार्य करता है। जनजाति, ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों में कम शुल्क वाले विद्यालयों की स्थापना के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया है कि कोई भी बच्चा आर्थिक या सामाजिक बाधाओं के कारण शिक्षा से वंचित न रह जाए।कुटुंब प्रबोधन – परिवार शिक्षा केन्द्र की एक इकाई है । उनके प्रबोधन से भारतीय परिवार को मूल्यों, भावनात्मक स्थिरता और नागरिक शिक्षा का केंद्र बनाना आवश्यक है। विद्या भारती की भारतीय परंपराओं पर आधारित मूल्य-आधारित शिक्षा के माध्यम से यह संभव हो रहा है । शिशु वाटिका की गतिविधियाँ और मातृ-पितृ पूजन, अभिभावक संपर्क जैसे कार्यक्रम पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करते हैं और बच्चों में आदर, प्रेम व जिम्मेदारी की भावना पैदा करते हैं।पर्यावरण संरक्षण – 2024–25 में ठोस परिणाम देखने को मिले: 5.2 लाख से अधिक पौधों का रोपण किया गया, 1,827 स्कूलों में जल संरक्षण के प्रयास हुए, 3,939 स्कूलों में ऊर्जा बचत गतिविधियाँ चलाई गईं, और 2,790 स्कूलों में कचरा प्रबंधन अभियान चलाए गए । छात्रों और आचार्यों ने मिलकर 1,643 स्कूलों में इको-क्लब का नेतृत्व किया, 1,209 औषधीय बग़ीचे तैयार किए, और 3,408 स्कूल परिसरों को हरित एवं पॉलीथीन मुक्त घोषित किया गया ।नागरिक कर्तव्य बोध - विद्यालयों की दैनंदिन गतिविधियों में अपने संवेधानिक कर्तव्यों को जीवन व्यवहार में लाने हेतु अभ्यास किया जाता है । नियमों का पालन, राष्ट्रीय मानबिन्दुओं का सम्मान, बड़े बुजुर्गों की सेवा, स्वच्छता, राष्ट्रीय संपत्ति का संरक्षण आदि यह सब गतिविधियां इस कार्य का आधार है । स्व - भारतीय भाषाओं, संस्कृति और लोक ज्ञान के माध्यम से आत्म-चेतना का विकास हमारे विद्यालयों की विशेषता है । संस्कृत शिक्षण और भारतीय ज्ञान प्रणाली का समावेश छात्रों को अपनी जड़ों से जोड़ता है। दूसरी ओर, कौशल विकास केंद्र, ITI और जन शिक्षण संस्थान युवाओं को आत्मनिर्भरता की दिशा में व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। आत्म पहचान + कौशल विकास = आत्म निर्भरता यह सूत्र हमारे विद्यार्थियों में उद्यमिता एवं चरित्र निर्माण का कार्य करता है ।नारी सम्मान – बालिकाओं और महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और नेतृत्व की भूमिकाओं के साथ सशक्त बनाना विद्या भारती का एक प्रमुख लक्ष्य है। कुल 34,75,757 विद्यार्थियों में से 14,41,601 बालिकाएँ हैं। परिवार में महिला की विशेष भूमिका को ध्यान में रखते हुए, विद्या भारती बालिका शिक्षा पर विशेष बल देती है। माँ-बेटी संवाद, किशोरी परामर्श, और आत्मरक्षा प्रशिक्षण जैसे मंचों के माध्यम से संगठन भारतीय मूल्यों पर आधारित समग्र सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है। विद्या भारती विद्यार्थियों को ज्ञानवान, चरित्रवान, प्रखर राष्ट्रभक्त बनाने में सतत सक्रिय रहने के साथ ही देश की आपदा की किसी भी परिस्थिति में सहयोग के लिए तत्पर रहा है। विद्या भारती शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय पुनर्जागरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराती है। हम समाज के सभी वर्गों से आह्वान करते हैं कि वे इस प्रयास में सहभागी बनें, जिससे राष्ट्र की आवश्यकता अनुसार व्यक्तियों का निर्माण हो और राष्ट्र विकसित और आत्मनिर्भर बने ।

Friday, 13 June 2025

परिवार प्रवोधन और उच्च शिक्षा

( यह सुझाव बौद्धिक जुगाली करनेवालों और गोपियों की भाषा में -"आयो घोष बड़ों ब्यापारी " , नासमझों के लिए नहीं है, इसलिए सार्थक सुझाव जोड़ सकते हैं किन्तु के लिए आप की समझदारी पर छोड़ता हूं -सादर)

उच्च शिक्षा में यूजीसी द्वारा भारत में जिस तरह नित नये नवाचार/प्रयोग  हो रहे हैं उनको देखते हुए लगता है , उसके साथ एक कालांश प्रतिदिन परिवार प्रवोधन का भी होना चाहिए।

यह शिक्षक -अभिभावक योजना अन्तर्गत उसके वर्तमान जड़ स्वरूप को बदल कर किया जा सकता है।

 इसमें आदर्श पारिवारिक जीवन के मानकों और ज्वलंत घटनाओं को रखा जाना चाहिए। एक -दो कक्षा के विद्यार्थी और अभिभावकों को एक कालांश में (अधिकतम 80-से100)बुलाया जाये। बदल बदल कर नित्य एक दो कालांश हो सकते हैं। 

 इसका कोई निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं हो किंतु समाज में अच्छे परिवारों के अनुभव कथन, आध्यात्मिक वातावरण, पारिवारिक सदस्यों के आपस में साथ उठने बैठने जैसे विषय हों। बातचीत का स्वरूप हो। आदर्श पारिवारिक वातावरण जैसा ही इस कालांश का स्वरूप हो। 

बैठक सरस्वती वंदना, वैदिक मंत्रों से प्रारंभ हो और समापन राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान से हो।

अतिथि नाम का कोई प्राणी न हो। फूल -माला, स्वागत न हो। स्थानीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, राजनेता भी अभिभावक के रूप में ही सम्मिलित हो। 

अभिभावकों के अनुभव कथन हों। इससे जो गीता -रामायण, रामचरित मानस या अन्य भाषा भाषियों के लिए उनकी भाषा के सद्ग्रंथों को पाठ्यक्रम में रखने का उद्यम किया जा रहा है उसकी भी पूर्ति  चर्चा और उदाहरणों के माध्यम से हो।

एक तरफा ज्ञान न परोसा जाये। पारिवारिक जीवन के व्यवहारिक पक्षों पर सरस और सार्थक चर्चा भारतीय ज्ञान परम्परा के आधार पर भी हो सकती है।

इसमें विद्यार्थियों के परफार्मेंस पर चर्चा न हो।

अंत में उपस्थित किसी ऐसे व्यक्ति का अनुभव कथन हो जो भले ही बड़ा ज्ञानी -विज्ञानी न हो किंतु अपने जीवन में वह कुछ सार्थक प्रयास कर रहा हो। वह किसान,व्यापारी , कर्मचारी, सफाई वाला या संत भी हो सकता है।

सद्ग्रंथों को बोध कथाओं के रूप में शिक्षक अपने पाठ्यसामग्री में सम्मिलित कर पढ़ायेंगे तो उन्हें अलग से प्रश्न पत्र,परीक्षा आदि नहीं बनाने -करने होंगे, इस पर कैसे वातावरण बनाया जाये बातचीत हो।

इससे शासन में विराजमान माननीयों को भी गीता, गंगा,गौ को पाठ्यक्रम में जोड़ने की रोज घोषणा नहीं करनी पड़ेगी। और शासन को रिपोर्टिंग से बचा जा सकेगा। प्राचार्यों -शिक्षकों की वेतन बृद्धि भी नहीं रुकेगा और ऐसे अधिकारियों से भी निजात मिलेगी जिनका नितांत मशीनकरण हो चुका है।

भारतीय ज्ञान परम्परा और व्यक्तित्व विकास तथा चरित्र निर्माण में पाठ्यक्रम की नहीं शासन, प्रशासन,शिक्षक और अभिभावकों को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से बताना होगा। यह आचरण का विषय है न कि वेबीनार और सेमीनार का।

इसके स्थानीय आधार पर स्वरूप भिन्न हो सकते हैं किन्तु केन्द्र में सामाजिक सरोकारों और आध्यात्मिक वातावरण से जुड़ा सुचिता पूर्ण राष्ट्रीय परिवार हो।
सादर

Tuesday, 3 June 2025

(चाक्षुषोपनिषद्) आंख ठीक रखने का मंत्र



चाक्षुषोपनिषद् (चाक्षुषी विद्या )

विनियोग - ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिर्गायत्री छन्दः सूर्यो देवता चक्षुरोगनिवृत्तये विनियोगः ।

ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय। यथा अहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय। कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय ।

ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणा-करायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः । खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः । तमसे नमः। 

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः । हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः ।

य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति । ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

॥ श्रीकृष्णयजुर्वेदीया चाक्षुषी विद्या सम्पूर्णा ॥

* इस चाक्षुषी विद्याके श्रद्धा-विश्वासपूर्वक पाठ करनेसे नेत्रके समस्त रोग दूर हो जाते हैं।

* आँख की ज्योति स्थिर रहती है। इसका पाठ नित्य करनेवाले के कुलमें कोई अन्धा नहीं होता।

* पाठ के अन्त में गन्धादियुक्त जलसे सूर्यको अर्घ्य देकर नमस्कार करना चाहिये।

शुभाषितानि


सच्चे अर्थों में बन्धु किसे कहते हैं-

उत्सवे व्यसने युद्धे दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लव:।  राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धव:।।
 (हितोपदेश)

अर्थात्- इन सात स्थानों पर यथा- १.विवाह आदि समारोह में, २.किसी दैवी संकट में,३.युद्ध में,४.दुर्भिक्ष में,५. राष्ट्र में विद्रोह फैल जाने पर,६. राजद्वार-न्यायालय, राजसत्ता द्वार आदि, ७.श्माशान में साथ देने वाला सच्चे अर्थों में बन्धु कहलाता है।

अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चय:।
ऐश्वर्य प्रियसंवासो मुह्येत्तत्र न पण्डित:।। (हितोपदेश)

अर्थात् - यौवन, रूप-सौन्दर्य, जीवन, धन-संग्रह,ऐश्वर्य तथा स्त्री-पुत्रादि प्रियजनों का संग आदि सब अनित्य है। अत: बुद्धिमान व्यक्ति को इनमें कदापि आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयतां महोदधौ।
समेत्य च व्यपेयतां तद्धअद्भुतसमागम:।। (हितोपदेश)

अर्थात् - समुद्र में बहती दो लकडिय़ाँ संयोग से एक दूसरे से मिल जाती हैं और फिर अलग हो जाती हैं, यही स्थिति प्राणियों के स्त्री-पुत्रादि परिवार और बन्धु-बान्धवों से मिलने-बिछडऩे की है।

पञ्चभिर्निर्मिते देहे पञ्चत्वं च पुनर्गते।
 स्वां स्वां योनिमनुप्राप्ते तत्र का परिदेवना ?
 (हितोपदेश)

पंच भूतों से निर्मित  इस शरीर के पांचों तत्त्वों-पृथ्वी, जल, अग्रि,वायु और आकाश -के अपने मूल  में आने का नाम ही मृत्यु है। इसमें शोक करने वाली कौन-सी बात है।

स्वदेशं पतितं कष्टे दूरस्था लोकयन्ति ये।
नैव च प्रतीकुर्वन्ति ते नरा: शत्रुनन्दना:।।

अर्थात् - जब देश संकट में पड़ा हो तो ,जो उदासीन भाव से दूर खड़े हो कर केवल देखते रहते हैं और काई भी प्रतिकार नहीं करते ऐसे व्यक्ति अथवा समूह, शत्रु को देने वाले होते हैं।




Monday, 2 June 2025

शुभाषितानि

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं।
 शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतं। 
अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।

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 ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः । 
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकरणम् ।।(ब्रह्मसंहित भागवत मे)

 आत्मा के दो प्रकार हैं- एक तो अणु-आत्मा और दूसरा विभु-आत्मा - कठोपनिषद् में (१.२.२० ) इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है-

अणोरणीयान्महतो महीयान्
आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । 
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
 धातुःप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥
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 मुण्डक उपनिषद् (३.१.२) तथा श्वेताश्वतर-उपनिषद् (४.७) समान रूप से इसकी पुष्टि करते हैं-

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ "

 यद्यपि दोनों पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं, किन्तु फल खाने वाला पक्षी वृक्ष के फल के भोक्ता रूप में चिन्ता तथा विषाद में निमग्न है। यदि किसी तरह वह अपने मित्र भगवान् की ओर उन्मुख होता है और उनकी महिमा को जान लेता है तो वह कष्ट भोगने वाला पक्षी तुरन्त समस्त चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है।" 
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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३॥
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 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
 ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते । 

 अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
 स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते । 

सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । 
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।
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 दातव्यमिति दीयतेऽनुपकारिणे ।
 देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।

 यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
 दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ।

 अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
 असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्। 
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 तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । 
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।
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 भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में (४.१-३) भगवान् कहते हैं : 
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
 विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ 

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । 
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ 

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि में सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् 
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 श्रीभगवानुवाच-
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः । 
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥

यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । 
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ 18/5॥
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 पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ 18/13 ॥

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । 
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ 18/14॥

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । 
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ 18/18 ॥

 मुक्तसङ्गोऽ नहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ 18/26।।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ 18/30 ॥

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 मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु-ये छः प्रजापति है। 

बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और दो अश्विनीकुमार ये तैतीस देवता है।
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 दीनो वा राज्यहीनो वा यो मे भर्ता स गुरुः
 तं नित्यमनुरक्तास्मि यथा सूर्य सुवर्चला ॥। ९ ।।

'मेरे पति दीन हों अथवा राज्यहीन - वे ही मेरे स्वामी हैं,
वे ही मेरे गुरु हैं, मैं सदा उन्हींमें अनुरक्त हूँ और रहूँगी। जैसे  सुवर्चला सूर्य में अनुरक्त रहती हैं ॥ ९ ॥ 

यथा शची महाभागा शक्रं समुपतिष्ठति । 
अरुन्धती वसिष्ठं च रोहिणी शशिनं यथा ।। १० ।। 
 लोपामुद्रा यथागस्त्यं सुकन्या च्यवनं यथा । 
तां कृशां दीन सावित्री सत्यवन्तं च कपिलं श्रीमती यथा ॥ ११ ॥ 
भर्त्सयाञ्चक्रिरे सौदासं मदयन्तीव केशिनी सगरं यथा ।
 नैषधं दमयन्तीव भैमी पतिमनुव्रता ।। १२ ।।
 तथाहमिक्ष्वाकुवरं रामं पतिमनुव्रता ।

'जैसे महाभागा शची इन्द्र की सेवा में उपस्थित होती हैं, जैसे देवी अरुन्धती महर्षि वसिष्ठ में, रोहिणी चन्द्रमा में, लोपामुद्रा अगस्त्य में, सुकन्या च्यवन में, सावित्री सत्यवान्‌ में, श्रीमती कपिल में, मदयन्ती सौदास में, केशिनी सगर में तथा भीमकुमारी दमयन्ती अपने पति निषध नरेश नल में अनुराग  रखती हैं, उसी प्रकार मैं भी अपने पतिदेव इक्ष्वाकुवंश शिरोमणि भगवान् श्रीराम में अनुरक्त हूँ' ॥१० – १२३ ॥

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