Monday, 2 June 2025

प्रार्थना 2

 


केनोपनिषद्

ऊँ केनेषितं पतति प्रेषितं मन:

 केन प्राण: प्रथम: प्रेति युक्त:।

           केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षु: श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति।

 (केन./1/1)

                इसे ही उपनिषदों ने कहा है -

            ऊँ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

            पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।।

 तब एक दिन मुण्डकोपनिषद का ऋषि फटकारता हुआ कहता है-

 परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो

   निर्वेदमायात् नास्ति अकृत: कृतेन।

  तद्धिज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत

 इस तरह से जीवन के सत्य को जानने की इच्छा ने शाश्वत, अविनाशी, असीम की खोज प्रारंभ की और एक दिन उन्होंने सत्य को जाना-

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन

        देवात्मशक्तिं स्वगुणैनिगूढ़ाम।। (श्वे.1/13)

   -ध्यानयोग को विषय बनाकर मन की खोज प्रारंभ की। अपने गुणों में निहित ब्रह्म को देखा और गदगद कंठ से पुकार उठे-

 श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा

        आ ये धामानि दिव्यानि तस्यु:।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम

       आदित्यवर्णं तमस: परस्तात।

          तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति

             नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।। (श्वेता.2/5,3/8)

     -अहो विश्व के निवासियो! अमृत पुत्रो! सुनो। दिव्य लोकों में रहने वाले देवताओं, तुम लोग भी सुनो। मैंने सूर्य के समान चमकीले उस महान् पुरुष को जान लिया है, जो समस्त अज्ञान-अन्धकार से परे है। केवल उसी को जानकर मृत्यु की विभीषिका को पार किया जा सकता है। इससे भिन्न दूसरा रास्ता नहीं है। 

स्वर्ग प्राप्त की कामना से यज्ञ करना उचित नहीं -

      प्लवा हि एते अदृढा यज्ञरूपा

         अष्टादशेक्त्म् अवरं येशु कर्म।

     एतत् श्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढ़

            जरामृत्युं ते पुनरेवाति यन्ति।।   (मुण्ड.1/2/5)

  ऋषि कहता है, “अरे मूर्खों ! यदि तुमने यज्ञ को भव सागर पार करने की नौका माना है तो बड़ी भूल की है। यह यज्ञ रूपी नौका तुम्हारी जीर्ण शीर्ण है। इसमें सोलह ऋत्विज और यजमान एवं यजमान की पत्नी ऐसे अठारह लोग बैठे हैं, वे सब नीच कर्म करने वाले हैं और सबके सब मँझधार में डूबेगें। जो मूढ़ इस यज्ञ को कल्याणकर मानते हैं, वे बुढ़ापा और मृत्यु के फन्दे में बारम्बार फँसते हैं।”

ईशावास्य उपनिषद् में इस प्रकार के संकेत मात्र दिखाई देता है, जहाँ गुरु शिष्य से सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए कहता है-

  “ईषावास्यम्  इदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्। 

तेन त्येक्तेन भुञ्जिथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम।”

      कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समा:। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। (ईशो-1/1-2)

 अर्जुन से सभी कार्य को यज्ञ बना लेने को कहते हैं-

यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधन।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर।।  (गीता-3/9) 

अर्थात सारा कर्म भगवत्समर्पित बुद्धि से कर्म करना। एक प्रश्न का और समाधान भगवान करते हैं, कहते हैं इस बहाने दुष्कर्म को भी भगवान को अर्पित कर किया जा सकता है क्या ? भगवान कहते हैं-

 किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:। 

ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽषुभात।। (गीता- 4/16)

  हे पार्थ! कर्म क्या है, अकर्म क्या है इस सम्बन्ध में मनीषी जन भी भ्रमित हैं। अत: मैं कर्म का मर्म तुझे समझाता हूँ, जिसे जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जा-

 कर्मणो ह्यति बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।  

अकर्मणश्च बोद्धव्यं    गहना कर्मणों गति:।।  (गीता-4/17)

  अर्थात कर्म के तीन रूप हैं- कर्म, अकर्म और विकर्म।  इसीलिए भगवान ने कहा-

       उद्धरेदात्मनात्मनं   नात्मनामवसादयेत।

       आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।  (गीता-6/5)

   मनुष्य को चाहिए कि वह अपना स्वयं का उत्थान करे और अपने को गिरने न दे; क्योंकि वह स्वयं अपना मित्र और शत्रु भी है। इस प्रकार कर्म संस्कार उसको लिप्त न कर सकें। मनुष्य यह कर्म करता हुआ सौ वर्ष तक जिये-‘पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद: शतमं श्रृणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: शरद: शतम्।’ (शुक्ल यजु. 36/24)

  भगवान कहते हैं इसका प्रभाव यह होता है कि -

 नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्।।5.8।।

 प्रलपन् विसृजन् गृहणन उन्मिषन् निमिषन् अपि।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्। (गीता-5/8-9)

    अर्थात ऐसी समत्व एवं समर्पित बुद्धि से किया गया कार्य जब हम करते हैं तो हमारे यह सारे कार्य -देखना, सुनना, स्पर्श-करना, गंध लेना, खाना, चलना, सोना आदि सभी यज्ञमय हो जाते हैं। आगे कहते हैं -

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।5/10

 जो ब्रह्म का आश्रय और आधार मानकर, आसक्ति का त्याग करते हुए, कर्तव्य कर्म करता है, वह जल में कमलपत्रवत् पाप से अलिप्त रहता है। यही गीता की चरमावस्था है, यही ब्रह्मनिष्ठा और स्थितप्रज्ञता है।

  गीता में योग को दो प्रकार से परिभाषित किया 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । 
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।  

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥

                केन-उपनिषद

ऊँ आप्यायनतु ममांगानि वाक् प्राणश्चक्षु:

श्रोत्रमयो बलम् इन्द्रियाणि च सर्वाणि।

सर्वं  ब्रह्मौपनिषदं, माहं ब्रह्म निराकुयां, मा मा ब्रह्म निराकरोद्,

अनिराकरणमस्तु, अनिराकरणं मेंऽस्तु।

तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्तेमयि सन्तु, ते मयि संन्तु।

ऊँ शांति शांति शांति:


              

    

 

कर्मकाण्ड और उपासना का समुच्चय होना चाहिए-

''अन्ध तम: प्रविशन्ति येऽपिद्यामुपासते।"

 विद्यायाम = देवतोपासना और अविद्यायाम= कर्मकाण्ड।

विद्या- ‘सा विद्या या विमुक्तये’।

‘विद्या चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय सह।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुतू’ -(ईष-11)

      देवताओं की पूजा करके आदमी सिद्धि को प्राप्त करता है- ईश्वरीय गुणों को ऐश्वर्य कहते हैं। 

आठ ऐश्वर्य या सिद्धियाँ इस प्रकार हैं-

“अणिमा महिमा गरिमा लघिमा तथा।

ईषित्वं च वषित्वं च प्राप्ति: प्रकाम्यमेव च।।”

अर्थात् शूक्ष्म हो जाना, विशाल हो जाना, भारी हो जाना, हल्का हो जाना, शासक बन जाना, वश में कर लेना, इच्छानुसार वस्तु की प्राप्ति और जैसा चाहे वैसा रूप बना लेना।

“सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेभीय सह।

विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते”

अर्थात्- जो संम्भूत अर्थात् कारण ब्रह्म तथा विनाश अर्थात् कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) दोनों को साथ -साथ उपासना करने योग्य जानता है, वह कार्य-ब्रह्म की उपासना से मृत्यु को पार करके कारण-ब्रह्म की उपसना से अमृत अर्थात् प्रकृतिलय की अवस्था को प्राप्त करता है। (ईषा-14 )

 अर्थात् सभी जीव अपनी आत्मा ही हो जाते है” (‘आत्मा-एव-अभूद्-विजानत:’)

ऋषि कहता है-

“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम।

तत्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।।”

अर्थात्  हे जगत के पोशक! (पूषा) सूर्यदेव स्वर्णिम पात्र (हिरण्यगर्भ) के द्वारा सत्य (कार्यब्रह्म) का जो मुँह ढका हुआ है, मुझ सत्यधर्मा (उपासक) के दर्शन हेतु वह ढक्कन हटा दीजिए। (ईषा.15)

“पूषान्नेकर्षे यम सूर्य प्रजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजायत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुष: सोऽहमास्मि।।” (16 ईषा)

अर्थात् जगत का पोशण करने के कारण सूर्य को पूषा कहते है; अत: हे पूषा ! (गगन में) एकाकी विचरण करने के कारण वे एकर्षि कहे जाते हैं; (अत:) हे एकर्षि, प्राणों तथा रसों को खीच लेने के कारण वे सूर्य कहलाते हैं; (अत:) हे सूर्य! प्रजापति के पुत्र होने से वे प्राजापत्य हैं: (अत:) हे प्राजापत्य! अपनी रश्मियों को व्यूह अर्थात्  हटाइये। अपने तेज अर्थात् ताप देने वाले प्रकाश को एकत्र करके खीच लीजिए।(16, ईषा.)

“वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम।

ऊँ क्रतो स्मर कृतँ स्मर क्रतो स्मर कृतँ स्मर।।”

अर्थात् अब मेरा प्राण सर्वव्यापी वायु में विलीन हो जाय; मेरा शरीर भस्म में परिणत हो जाय। ऊँ, हे मेरे मन ! अब तक अपने द्वारा किये हुए कर्म तथा उपासनाओं का स्मरण करो, स्मरण करो। (17 ईषा.)

व्याहृतियाँ- भू:, भुव: तथा स्व: ये तीन व्याहृतियाँ हैं। (तै.उ. 1/5/1) । इनमें से ‘भू:’ अर्थात्  पृथ्वी का सिर है, ‘भुव:’ अर्थात्  आकाश उसकी दो भुजाएं हैं और ‘स्व:’ अर्थात् स्वर्ग उसके दो चरण हैं। (बृ.उ.5/5/3)

“अग्रे नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठंते नम उक्तिं विधेम।।”18

अर्थात्  हे अग्नि! हे देव! आप हमारे समस्त कर्म फलों के ज्ञाता हैं; हमें अपने कर्मफलों का भोग कराने के लिए अच्छे मार्ग से ले चलिए। कुटिल पापों को हमसे दूर कीजिए। हम आपको बारम्बार नमन करते हैं।

इस तरह से ईषोपनिषद में ऋषि सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना करता है कि उसे अमृत की ओर ले चलो।

इस तरह से ऋषि अविद्या (कर्म) के द्वारा मृत्यु को पार करके विद्या (उपासना) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है। वह विनाश के (कार्यब्रह्म) के द्वारा मृत्यु को पार करके, सम्भूति (कारणब्रह्म) की उपासना से अमृतत्व की प्राप्ति कर लेता है।

‘विद्यया देवलोका:’ अर्थात्  विद्या से देवलोक  मिलता है।- (बृउ.1.5.16)

‘विद्यया तदारोहन्ति’ अर्थात्  विद्या ऊपर उठाती है। (बृउ.1.5.)

‘कर्मणा पितृलोका’ अर्थात्  कर्म से पितृलोक मिलता है। (ईष.9)

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कुण्डलनी जागरण यानी 'तेजोऽस्मि'

श्वेताश्वतरोपानिषद कहता है- “यदाऽऽत्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दोपोपमेनेह युक्त: प्रपष्यते।

अजं ध्रुवं सर्वतत्वैविशुद्वं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाषै:।।”

ईश्वर कैसे मिलेगा- “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन” (मुण्डको.)

अथ योगानुशासनम् -परम्परागत योग विषयक शास्त्र की चर्चा करते हैं।

योगश्चित्तिवृत्तिनिरोध:- चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। अर्थात्  चित्त की वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना योग है। यह स्थिति कब आती है ? “तदा द्रष्टु:स्वरूपेऽवस्थानम।” जब चित्त की वृत्तियों का पूर्ण निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है; अर्थात्  केवल्य अवस्था को प्राप्त हो जाता है।

 चित्त वृत्तियाँवैसे तो चित्त वृत्तियाँ असंख्य हैं किन्तु मोटे तोर पर उन्हें पाँच प्रकार से बाँटा जा सकता है।

चित्त वृत्तियाँ पाँच हैं- “प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतय:” (1) प्रमाण (2) विपर्यय (3) विकल्प, (4)निद्रा- स्वप्न (5) स्मृति।

 यह सभी वृत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं- “वृत्तय:पंचतय: क्लिष्टाक्लिष्टा ।” 

क्लिष्ट - अर्थात्  अविद्या आदि क्लेषों को पुष्ट करने वाली और योगसाधना में विघ्नरूप होती हैं। 

अक्लिष्ट- क्लेशों को क्षय करने वाली और योगसाधन में सहायक होती हैं।

विपर्यय- ‘विपर्ययोंमिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम।।’ ‘तत:क्लेषकर्मनिवृति।’

विकल्प- ‘शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प ।’ अर्थात जैसे कोई मनुष्य भगवान के रूप का ध्यान करता है पर जिस रूप का ध्यान करता है उसे न तो उसने देखा है, न वेद-शास्त्र सम्मत है, और न ही वह भगवान का वास्तविक स्वरुप है केवल कल्पना मात्र है, विकल्प है।

 निद्रा- ‘अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा’- ज्ञान के अभाव का ज्ञान जिस चित्तवृति के आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है।” निद्रा भी चित्त की वृत्तिविशेष है। कई दर्शनकार निद्रा को वृत्ति नही मानते, इसे सुषुप्ति अन्तर्गत मानते हैं। 

गीता में आया है-

युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।

स्मृति- अनुभूतिविषयासम्प्रमोष: स्मृति:।


चितवृत्तियों का निरोध- 

योगी कहता है- 

‘अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।’ 

गीता कहती है- 

‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहयते’(6.35)

 चित्तवृत्तियों के निरोध के दो प्रकार हैं- अभ्यास और वैराग्य।

     अभ्यास क्या है-

“तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास” 

अर्थात्  जो स्वभाव से चंचल है। उसको स्थिर रखने के यत्न का नाम अभ्यास है।

गीता कहती है-

 ‘स निश्चयेन  योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।’ 

योग का अभ्यास बिना उकताये बिना समय सीमा के निश्चित किये निष्ठापूर्वक करते रहना है। 

वैराग्य क्या है- ‘दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम।’ 

यहाँ दो शब्द हैं, दृष्टा और अनुश्रविक । विषयों में सर्वथा तृष्णारहित चित की जो वशीकार नामक अवस्था है, वह वैराग्य (तत्परमं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम) है। 

 (यदाहिनेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते, सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते)  

 सिद्धि क्या है - ‘श्रद्वावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक: ।’

श्रद्वा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक, (क्रम) से सिद्धि प्राप्त होती है।’

‘श्रद्वावान लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिभचिरेणधिगच्छति।।’ 

(4/39,गीता)

सिद्धि प्राप्त करने हेतु योगी को अभ्यास और वैराग्य में तीव्रता लानी होती है। 


              ईश्वर कौन है

-‘क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।’ 

क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से जो (अपरामृष्ठ) है, असम्बद्व है, वह ईश्वर है।

 ईश्वर ज्ञान वैर यश, ऐश्वर्य की पराकाष्ठा है। क्या ईश्वर इस कारण से मिलता है ?

‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।’(मुण्ड.) 

ईश्वर स्वयं अनादि है क्योंकि वह सब के आदि है (योग,10-2-3) वह कालातीत है। उसका वाचक ‘प्रणव’ है।

 ‘तस्य वाचक: प्रणव:’

(प्रणव ऊँकार है) (प्रश्नोपनिषद में पाँचवे प्रश्नोत्तर में और माण्डूक्योपनिषद में ऊँकार की उपासना का विषय विस्तार से है) 

ऊँ, परमेश्वर का वेदोक्त नाम है।

 (गीता-17-23, कठो.1/2/15-17) साधक को ईश्वर के नाम का जप और उसके स्वरूप का स्मरण चिन्तन करना चाहिए।

भक्ति क्या है - महर्षि शाण्डिल्य ने कहा है-

 ‘सा परानुरक्त्रिीश्वरे।’ 

देवर्षि नारद ने भक्तिसूत्र में कहा है- ‘सात्वस्मिन परमप्रेमरूपा च।‘ 

अर्थात्   उस परमेश्वर में अतिशय प्रेमरूपता ही भक्ति है। यह अमृत स्वरूपा है-

‘अमृतस्वरूपा च।‘’ 

ईश्वर की भक्ति में आयु, रूप आदि का कोई अर्थ नही होता है-

“व्याधस्याचरणं धुवस्य च वयो विद्या गजेन्दस्य का

 का जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुप्रस्य किं पौरषम्।

कुव्जाया: कामनीरूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनं

भक्त्या तुश्यति केवलं न च गुणैर्भक्ति प्रियो माधव:।।

श्रीमद्भागवत में प्रहलाद ने भक्ति के लिए कहा है-

‘श्रवणं कीर्तनं विष्णों: स्मरणंपादसेवनम।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम।।’(7/5/23)

 ऋतम्भरा बुद्वि के प्रकट होने पर साधक को प्रकृति के यथार्थ रूप का भान हो जाता है तब उसे वैराग्य होता है।

“तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीज: समाधि:।”

 क्लेश क्या है- “अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेषा: क्लेषा:।” अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश कहलाते हैं।

अविद्या जिनका कारण हैं- 

‘अविद्या क्षेत्रमुत्तरेशां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोद्वाराणाम।’

अविद्या क्या है- “अनित्याशुचिदु:खानात्मसु नित्यशुचि सुखात्मख्यातिरविद्या ।” अनित्य, अपवित्र, दु:ख और अनात्मा में नित्य, पवित्र, सुख और आत्मा का आत्मभाव की अनुभूति ‘अविद्या’है।

अस्मिता क्या है-

“दृगदर्शन शक्त्योरेकात्मतेवास्मिता।” अविद्या के नाश होने से ‘अस्मिता’ का नाश होता  है। 

राग क्या है- ‘सुखानुशयी राग:।’ सुख की प्रतीत के पीछे रहने वाला क्लेष ‘राग’ है।

द्वेष क्या है- ‘दु:खानुशयी द्वेष।’ दु:ख की प्रतीत के पीछे रहने वाला क्लेश ‘द्वेष’ है।

  क्लेशों की स्थूल वृत्तियों को ‘ध्यानहेयास्तदृवत्तय:’ द्वारा सूक्ष्म बना दिया जाता है।

दु:ख के रूप- परिणाम दु:ख, ताप दु:ख, संस्कार दु:ख, गुणवृत्ति विरोध सब में विद्यमान रहते हैं।

  अष्टांग योग

‘यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।’

इनमें पाँच वहिरंग हैं जो इस प्रकार हैं- (1)  यम- ‘अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:’

() अहिंसा -   अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:।

(ख) सत्य- ‘सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम।’

(ग) अस्तेय- “अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम।”

(घ) ब्रह्मचर्य- ‘ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यालाभ:।’

मन, वाणी और शरीर से होनवाले सब प्रकार के मैथुनों की सब अवस्थाओं में सदा त्याग करके सब प्रकार से वीर्य की रक्षा करना ‘ब्रह्मचर्य’ हैं ।  “कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा। सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते।।” (गरुण.पूर्व.आचार 238.6) 

(ड) अपरिग्रह- 

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध:। 

(2) नियम- “शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा: ।”

 ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।’ (मुण्ड.)

अक्षर ब्रह्म - भारतीय दर्शन में परम ब्रह्म अक्षर है - अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:। (8,3)

 गीता कहती है-

सहस्त्रयुगपर्यन्तमहृर्यद ब्रह्मणो बिन्दु:।

रात्रिं युगसहस्त्रन्तां तेऽहोरात्रविदो जना:।

अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा प्रभवन्त्यहरागमे।

रान्न्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञके।।

भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रान्न्यागमेऽवश: पार्थ  प्रभवन्त्यहरागमे।।

परस्तस्मातु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:।

य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।

अव्यक्तोऽक्षर  इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्वाम परमं मम।।

(अर्थात)

              ऊँ विष्णुर्विष्णुविष्णु:। ऊँ नम: परमात्मने श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य  श्रीब्रह्मणों द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमें कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते आर्यावर्तान्तर्गत  ब्रह्मावर्तैकदेशे बौद्धावतारे अमुकनाम संवत्सरे अमुकायने (उत्तरायणे/दक्षिणायने) महामांगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमें अमुक मासे अमुकपक्षे (शुक्लपक्षे / कृष्णपक्षे) अमुक तिथौ अमुक वासरान्वितायां अमुक नक्षत्रै अमुक राषिस्थिते सूर्ये  अमुकराषिस्थिते चन्द्रे अमुकराषिस्थिते भौमें अमुकराषिस्थिते बुधे अमुकराषिस्थिते गुरौ अमुकराषिस्थिते शुक्रे अमुकराषिस्थिते शनौ सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेष विशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्रश्रुतिस्मृतपुराणोक्त फलप्राप्तिकाम: अमुकोऽहं ममात्मन: सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतिराजकृतसर्वाविधपीड़ानिवृतिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायु: पुष्टिधनधान्यसृद्व्यर्थं सर्वापन्निवृति सर्वाभीष्टफलावाप्ति धर्मार्थकाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थ द्वारा अमुक (राष्ट्र) देवताप्रीत्यर्थं पूजनपूर्वकं संकल्पं (अमुक कर्मं) करिष्ये।


परमसत्ता की अवधारणा -

 परमसत्ता की अवधारणा वेद के साथ चलती हैं। नासदीय सूक्त में अध्याय दस में श्लोक आता है -

नासदासीन्नोसदासीतदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत।

किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद  गहनं गभीरम।।

 यथा- को, अद्वा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टि:।

        अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेनाथ को वेद यत आवभूव।। (1,128,6)

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।

यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद  यदि वा न वेद।।

              मुण्डकोपनिषद में कहा है- ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन’ अर्थात आत्मज्ञान केवल तीव्र इच्छा शक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।  यथा-‘मंत्र मूलं गुरुर्वाक्यं, पूजा मूलं गुरु:पदम्। ध्यान मूलं गुरु:मूर्ति, मोक्ष मूलं गुरु: कृपा।।’ सत चेतना हेतु पातंजलि योग दर्शन में कहा है- ‘सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च’ (3-49)

              कठोपनिषद में कहा है- ‘उतिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्निवोधत’। क्षुरस्य धारा निशिता  दुरत्या। दुर्गं पंथस्यकवयो वदन्ति। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘सर्वधर्म परितज्यान मामेकम शरणं ब्रज’। अहं त्वाम सर्वपापेभ्यो मा शुच:। मैत्रेयोपनिषद में कहा गया है कि साधक छ: माह में आत्मसाक्षातकार कर सकता है।

              ऐतरेयोपनिषद में कहा है- 'स येतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दम।। इसके अनुसार गर्भस्थ रूप में जीवात्मा सातवें महीने कपाल के बीच तालु से प्रवेश करती है, पहले यह कोमल होता है बाद में कठोर हो जाता है । 

              सुबालोपनिषद में कहा गया है- “स्थानानि, स्थानिभ्यों यच्छति नाड़ी तेषां निबन्धनम” । उसे यह बोध हो जाता है कि- 'मैं यह शरीर नहीं, बल्कि यह शरीर मेरा है गीता में कहा गया है- ‘देहोस्मिनाहं मम् देह इति स्मर’।

              भगवान कृष्ण कहते हैं- ''कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरति। योगिन: कर्म कुर्वन्ति संगंत्यक्त्वात्मशुद्वये। अर्थात आत्मज्ञानी कभी अपने कर्मों का निर्वाह कम नही करता। 

 

 

 

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''विद्यया देवलोका: अर्थात विद्या से देवलोक  मिलता है।- बृ.1.5.16

''विद्यया तदारोहन्तिअर्थात विद्या ऊपर उठाती है। बृउ.1.5.

'कर्मणा पितृलोकाअर्थात कर्म से पितृलोक मिलता है।- ईष.9

कुण्डलनी जागरण यानी तेजोऽस्मि

श्वेताश्वतरोपानिषद कहता है- ''यदाऽऽत्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दोपोपमेनेह युक्त: प्रपष्यते।

अजं धु्रवं सर्वतत्वैविशुद्वं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाषै:।।

ईश्वर कैसे मिलेगा- ''नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन’ (मुण्डको.)

अथ योगानुशासनम् -परम्परागत योगविषयक शास्त्र की चर्चा करते हैं।

योगश्चित्तिवृत्तिनिरोध:- चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। अर्थात चित्त की वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना योग है। यह स्थिति कब आती है ? ''तदा द्रष्टु:स्वरूपेऽवस्थानम।जब चित्त की वृत्तियों का पूर्ण निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है; अर्थात केवल्य अवस्था को प्राप्त हो जाता है। चित्त वृत्तियाँ-

वैसे तो चित्त वृत्तियाँ असंख्य हैं किन्तु मोटे तोर पर उन्हें पाँच प्रकार से बाँटा जा सकता है। 

चित्त वृत्तियाँ पाँच हैं- 

''प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतय:’ (1) प्रमाण (2) विपर्यय (3) विकल्प, (4)निद्रा- स्वप्न (5) स्मृति। यह सभी वृत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं- ''वृत्तय:पंचतय: क्लिष्टाक्लिष्टा । क्लिष्ट अर्थात अविद्या आदि क्लेषों को पुष्ट करने वाली और योगसाधना में विघ्नरूप होती हैं। अक्लिष्ट-क्लेशों को क्षय करने वाली और योगसाधन में सहायक होती हैं। 

विपर्यय-'विपर्ययोंमिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम।। 

'तत:क्लेषकर्मनिवृति 

विकल्प- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प। अर्थात जैसे कोई मनुष्य भगवान के  रूप का ध्यान करता है पर जिस रूप का ध्यान करता है उसे न तो उसने देखा है, न वेद-शास्त्र सम्मत है, और न ही वह भगवान का वास्तविक स्वरुप है केवल कल्पना मात्र है विकल्प है। 

 निद्रा- 'अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा’- ज्ञान के अभाव का ज्ञान जिस चित्तवृति के आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है।निद्रा भी चित्त की वृत्तिविशेष है। कई दर्शनकार निद्रा को वृत्ति नही मानते, इसे सुषुप्ति अन्तर्गत मानते हैं। गीता में आया है- 

युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। 

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।

स्मृति- अनुभूतिविषयासम्प्रमोष: स्मृति:- 

चितवृत्तियों का निरोध- योगी कहता है 'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध: 

गीता कहती है- 'अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहयते’ (6.35)। चित्तवृत्तियों के निरोध के दो प्रकार हैं-अभ्यास और वैराग्य। 

              अभ्यास क्या है-'तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासअर्थात जो स्वभाव से चंचल है 

गीता कहती है- 'स निश्चयेन  योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा। योग का अभ्यास बिना उकताये बिना समय सीमा के निश्चित किये निष्ठापूर्वक करते रहना है।  

वैराग्य क्या है-

'दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम। यहाँ दो शब्द हैं, दृष्टा और अनुश्रविक । विषयों में सर्वथा तृष्णारहित चित की जो वशीकार नामक अवस्था है, वह वैराग्य (तत्परमं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम) है।  

 (यदाहिनेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते, सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते) 

 

 सिद्धि क्या है -  ''श्रद्वावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक:’। श्रद्वा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक, (क्रम) से सिद्धि प्राप्त होती है।

'श्रद्वावान लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिभचिरेणधिगच्छति।। (4/39,गीता)

सिद्धि प्राप्त करने हेतु योगी को अभ्यास और वैराग्य में तीव्रता लानी होती है।  

ईश्वर कौन है -

'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:। क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से जो (अपरामृष्ठ) है, असम्बद्व है, वह ईश्वर है। ईश्वर ज्ञान वैर यश, ऐश्वर्य की पराकाष्ठा है। क्या ईश्वर इस कारण से मिलता है ? 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।’(मुण्ड.) ईश्वर स्वयं अनादि है क्योंकि वह सब के आदि है (योग,10-2-3) वह कालातीत है। उसका वाचक 'प्रणवहै। 'तस्य वाचक: प्रणव:’ (प्रणव ऊँकार है) (प्रश्नोपनिषद में पाँचवे प्रश्नोत्तर में और माण्डूक्योपनिषद में ऊँकार की उपासना का विषय विस्तार से है) ऊँ, परमेश्वर का वेदोक्त नाम है (गीता-17-23, कठो.1/2/15-17) साधक को ईश्वर के नाम का जप और उसके स्वरूप का स्मरण चिन्तन करना चाहिए। महर्षि शाण्डिल्य ने कहा है- ''सा परानुरक्त्रिीश्वरे। देवर्षि नारद ने भक्तिसूत्र में कहा है- 'सात्वस्मिन परमप्रेमरूपा च। अर्थात उस परमेश्वर में अतिशय प्रेमरूपता ही भक्ति है। यह अमृत स्वरूपा है-'अमृतस्वरूपा च। ईश्वर की भक्ति में आयु, रूप आदि का कोई अर्थ नही होता है-

''व्याधस्याचरणं धुवस्य च वयो विद्या गजेन्दस्य का 

 का जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुप्रस्य किं पौरषम्।

कुव्जाया: कामनीरूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनं

भक्त्या तुश्यति केवलं न च गुणैर्भक्ति प्रियो माधव:।।

श्रीमद्भागवत में प्रहलाद ने कहा है-

'श्रवणं कीर्तनं विष्णों: स्मरणं् पादसेवनम।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम।।(7/5/23)

 ऋतम्भरा बुद्वि के प्रकट होने पर साधक को प्रकृति के यथार्थ रूप का भान हो जाता है तब उसे वैराग्य होता है।

''तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीज: समाधि:।

 क्लेश क्या है- 'अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेषा: क्लेषा:। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश कहलाते हैं। 

अविद्या जिनका कारण हैं- ''अविद्या क्षेत्रमुत्तरेशां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोद्वाराणाम

 

अविद्या क्या है- ''अनित्याशुचिदु:खानात्मसु नित्यशुचि सुखात्मख्यातिरविद्या। अनित्य, अपवित्र, दु:ख और अनात्मा में नित्य, पवित्र, सुख और आत्मा का आत्मभाव की अनुभूति 'अविद्याहै।

अस्मिता क्या है- ''दृगदर्शन शक्त्योरेकात्मतेवास्मिता। अविद्या के नाश होने से 'अस्मिताका नाश होता  है।  

राग क्या है- 'सुखानुशयी राग:। सुख की प्रतीत के पीछे रहने वाला क्लेष 'रागहै।

द्वेष क्या है- 'दु:खानुशयी द्वेष। दु:ख की प्रतीत के पीछे रहने वाला क्लेश 'द्वेषहै।

  क्लेशों की स्थूल वृत्तियों को 'ध्यानहेयास्तदृवत्तय:द्वारा सूक्ष्म बना  दिया जाता है।

दु:ख के रूप- परिणाम दु:ख, ताप दु:ख, संस्कार दु:ख, गुणवृत्ति विरोध सब में विद्यमान रहते हैं।

  अष्टांग योग

'यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।

इनमें पाँच वहिरंग हैं जो इस प्रकार हैं-

(1)  यम 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:

() अहिंसा -   अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:।  

(ख) सत्य- सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम  

(ग) अस्तेय- 'अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम  

(घ) ब्रह््मचर्य- 'ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यालाभ:  

मन, वाणी और शरीर से होनवाले सब प्रकार के मैथुनों की सब अवस्थाओं में सदा त्याग करके सब प्रकार से वीर्य की रक्षा करना 'ब्रह्मचर्यहैं ।     ''कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा।

          सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते।। (गरुण.पूर्व.आचार 238.6) 

 

(ड) अपरिग्रह- अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध:।  

(2) नियम- ''शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा:

  'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।’ (मुण्ड.)

भारतीय दर्शन में परम ब्रह्म अक्षर है - अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभवोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:। (8,3) 

 गीता कहती है- 

सहस्त्रयुगपर्यन्तमहृर्यद ब्रह्मणो बिन्दु:। 

रात्रिं युगसहस्त्रन्तां तेऽहोरात्रविदो जना:।

अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा प्रभवन्त्यहरागमे।

रान्न्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञके।।

भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रान्न्यागमेऽवश: पार्थ  प्रभवन्त्यहरागमे।।

परस्तस्मातु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:। 

य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।

अव्यक्तोऽक्षर  इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्वाम परमं मम।।

(अर्थात)

 

ऊँॅ विष्णुर्विष्णुविष्णु:। ऊँ नम: परमात्मने श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य  श्रीब्रह््मणों द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमें कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते आर्यावर्तान्तर्गत  ब्रह्मावर्तैकदेशे बौद्धावतारे अमुकनाम संवत्सरे  अमुकायने (उत्तरायणे/दक्षिणायने) महामांगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमें  अमुक मासे अमुकपक्षे (शुक्लपक्षे/कृष्णपक्षे) अमुक तिथौ अमुक वासरान्वितायां अमुक नक्षत्रै अमुक राषिस्थिते सूर्ये  अमुकराषिस्थिते चन्द्रे अमुकराषिस्थिते  भौमें अमुकराषिस्थिते बुधे अमुकराषिस्थिते गुरौ अमुकराषिस्थिते शुक्रे अमुकराषिस्थिते शनौ सत्सु शुुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेष विशिष्टायां शुुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्रश्रुतिस्मृतपुराणोक्त फलप्राप्तिकाम: अमुेकोऽहं ममात्मन: सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतिराजकृतसर्वाविधपीड़ानिवृतिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायु: पुष्टिधनधान्यसृद्व्यर्थं सर्वापन्निवृति सर्वाभीष्टफलावाप्ति धर्मार्थकाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थ द्वारा अमुक (राष्ट्र) देवताप्रीत्यर्थं पूजनपूर्वकं संकल्पं (अमुक कर्मं) करिष्ये।

 परमसत्ता की अवधारणा वेद के साथ चलती हैं। नासदीय सूक्त में अध्याय दस में श्लोक आता है -

नासदासीन्नोसदासीतदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत।

किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद  गहनं गभीरम।।

 यथा-

को, अद्वा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टि:।

अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेनाथ को वेद यत आवभूव।। (1,128,6)

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।

यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद  यदि वा न वेद।। 

मुण्डकोपनिषद में कहा है- 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेनअर्थात आत्मज्ञान केवल तीव्र इच्छा शक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।   यथा-

'मंत्र मूलं गुरुर्वाक्यं, पूजा मूलं गुरु:पदम्। ध्यान मूलं गुरु:मूर्ति, मोक्ष मूलं गुरु: कृपा।।

 सत चेतना हेतु पातंजलि योग दर्शन में कहा है- 

''सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च’ (3-49)

कठोपनिषद में कहा है- 'उतिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्निवोधत। क्षुरस्य धारा निशिता  दुरत्या। दुर्गं पंथस्यकवयो वदन्ति।

  गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं- 'सर्वधर्म परितज्यान मामेकम शरणं ब्रज। अहं त्वाम सर्वपापेभ्यो मा शुच:। मैत्रेयोपनिषद में कहा गया है कि साधक छ: माह में आत्मसाक्षातकार कर सकता है। 

 ऐतरेयोपनिषद में कहा है- 'स येतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दम।।

इसके अनुसार गर्भस्थ रूप में जीवात्मा सातवें महीने कपाल के बीच तालु से प्रवेश करती है, पहले यह कोमल होता है बाद में कठोर हो जाता है।  

सुबालोपनिषद में कहा गया है- “स्थानानि, स्थानिभ्यों यच्छति नाड़ी तेषां निबन्धनम

 उसे यह बोध हो जाता है कि- “मैं यह शरीर नही, बल्कि यह शरीर मेरा हैगीता में कहा गया है- 'देहोस्मिनाहं मम् देह इति स्मर 

भगवान कृष्ण कहते हैं- ''कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरति। योगिन: कर्म कुर्वन्ति संगंत्यक्त्वात्मशुद्वये। अर्थात आत्मज्ञानी कभी अपने कर्मों का निर्वाह कम नही करता।  

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प्रार्थना

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

ईशावास्योपनिषद

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

केनोपनिषद्

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत् अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

प्रश्नोपनिषद्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः !! शान्तिः !!!

मुण्डकोपनिषद्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाःसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः !! शान्तिः !!!

 

माण्डूक्योपनिषद्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा: सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

ऐतरेयोपनिषद्

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

तैत्तिरीयोपनिषद

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम्  

ॐ शान्तिः । शान्तिः शान्तिः ।

श्वेताश्वतरोपनिषद्

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।

 सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः शान्तिः ॥ शान्तिः !!!

छान्दोग्योपनिषद्

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

बृहदारण्यकोपनिषद् -

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

……………………………………………….

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।

जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥

ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते ।

 गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते ॥

तप्तकाञ्चनगौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि ।

वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये ।

हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे

हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाम्।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।

सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्।

कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम।।

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यंपादस्पर्शं क्षमस्व मे ।

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । ।

 छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।

              मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः। (भगवद्गीता ८.७)।

यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।

   तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥भगवद्गीता  (८.६)

विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा ।

 अविद्याकर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ विष्णु पुराण  (६.७.६१)

यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्  तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ भगवद्गीता  (८.६)

             निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।

        द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ (गीता 15/5)

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।

एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम् ।।भगवद्गीता (६.३३)।

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना

श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ।। (भगवद्गीता ६.४७)

श्रवणं कीर्तनं  स्मरणं विष्णो: पादसेवनम् ।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥(श्रीमद्भावतम १५.२३)

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥( भगवद्गीता 8.8)

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ (भगवद्गीता ९.३२-३३):

गीता शास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान्–(गीता माहात्म्य १) ।

गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च ।

नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥ (गीता माहात्म्य २)।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ भगवद्गीता (१८.६६)

मलिनेमोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने ।

सकृद्गीतामृतस्नानं संसारमलनाशनम् ॥ (गीता  माहात्म्य ३)

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥ (गीता माहात्म्य ४) ।

भारतामृतसर्वस्वं विष्णुवक्त्राद्विनिःसृतम् ।

गीता-गङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥ " (गीता माहात्म्य ५) ।

एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम् ।

 एको देवो देवकीपुत्र एव ।

एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि । 

कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ॥

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥18/5

ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ।

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।

इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। 

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।

भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ।

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।


Sunday, 1 June 2025

देवता किसे कहते है?

*प्र०-  देवता किसे कहते है?
उ०-देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा द्योतनाद्वा , द्युस्थानो भवतीति वा । दान देने वाले देव कहाते हैं   दीपन अर्थात विद्या रुपी प्रकाश करने वाले देव कहाते हैं ।  द्योतन अर्थात सत्योपदेश करने वाले देव कहाते हैं ।विद्वान भी विद्या आदि का दान करने से देव कहाते हैं विद्वानसो ही देवा । सब मूर्ति मान पदार्थों का प्रकाश करने से सूर्य आदि को भी देवता कहते हैं । देव देवी देवता- इन सबका एक ही अर्थ है ।

प्र०- देवता कितने प्रकार के होते है?
उ०- देवता दो प्रकार के होते हैं-
जड देवता और चेतन देवता ।

प्र०- चेतन देवता कौन से है?
उ०- माता , पिता , गुरु , आचार्य , अतिथि , पति पत्नी ये सब चेतन देवता है। 

प्र०- क्या चेतन देवों की पूजा करनी चाहिये और करे तो कैसे ?
उ०- हां करनी चाहिये क्योंकि ये हमारा पालन पौषण करते हैं, हमारी रक्षा करते हैं, हमे ज्ञान देकर मनुष्य बनाते हैं । और पूजा का अर्थ है सत्कार करना,  इन सबका सम्मान करना इनकी आज्ञा का पालन करना , इनकी आवश्यकता पूरी करना यही इनकी पूजा है ।और जो ऐसा नहीं करता उसे कृत्घ्नता का पाप लगता है।

प्र०- क्या यदि माता पिता उल्टी गलत शिक्षा दे तो उसे भी मानना चाहिये ? 
उ०- नहीं, उनकी गलत बात बिल्कुल न माने । यदि वे पशुबलि, पाषाण पूजा, शिवलिंग पूजा, ग्रहपूजा, महूर्त, जन्मपत्री , मिथ्याभाषण, चोरी, मद्यपान आदि की बुरी सलाह दे तो उसको न माने लेकिन सेवा फिर भी करे।

प्र०- पौराणिक लोग कहते हैं कि तैंतीस करोड़ देवता हैं , क्या यह सच है ? 
उ०- नहीं , कोटि शब्द के दो अर्थ हैं, पहला कोटि का अर्थ करोड़ और दूसरा कोटि का अर्थ प्रकार । जड देवता तैंतीस प्रकार के है।

प्र०- जड़ देवता कौन से है?
उ०- आठ वसु-
 अग्नि पृथ्वी वायु अन्तरिक्ष आदित्य द्यौ चन्द्रमा और नक्षत्र, इन्हें वसु इसलिए कहते हैं कि सब पदार्थ इन्हीं में वसते हैं ।

 ग्यारह रुद्र - प्राण अपान व्यान उदान समान नाग कूर्म कृकल देवदत्त धनञ्जय और जीवात्मा क्योंकि जब ये शरीर से निकलते हैं तो मरण होने से सब सम्बन्धी रोते हैं इसलिए इन्हें रुद्र कहते हैं । 

आदित्य बारह महिनों को कहते हैं क्योंकि सब जगत के पदार्थों का ये आदान करते हैं और सबकी आयु को ग्रहण करते हैं । 

इन्द्र बिजली को कहते हैं क्योंकि सब ऐश्वर्य की विद्या का आधार वही है। 

यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहते हैं क्योंकि सब वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है, पशुओं को भी यज्ञ कहते है क्योंकि उनसे भी प्रजा का पालन होता है। ये तैंतीस देव कहाते हैं  । 

इनके अतिरिक्त  तीन देव स्थान नाम जन्म को कहते हैं और अन्न व प्राण को भी देव कहते हैं ।

प्र०- क्या इन जड़ देवों की पूजा करनी चाहिये और कैसे?
उ०- जी हां, ईश्वर द्वारा दिये जड़ पदार्थों  का अपने व दूसरे के सुख के लिए सदुपयोग करना ही जड़ पूजा है। ईश्वर द्वारा बनाये पदार्थों की रक्षा करना उन्हें गन्दा न करना ही पूजा है क्योंकि ये अमूल्य है ।

प्र०- क्या ये सारे देव उपास्य है? 
उ०- नहीं । ईश्वर सब देवो का देव होने से महादेव कहाता है और केवल वही उपास्य है दूसरा नहीं।

प्र०- वेद मन्त्रों के साथ देवता लिखा होता है क्यों ? 
उ०- जिस मन्त्र का जो विषय जिस ऋषि ने समाधि अवस्था मे बैठकर साक्षात्कार किया उस मन्त्र का वही देवता व ऋषि होता है।

Friday, 23 May 2025

राष्ट्रीय शिक्षा नीति मूल्यांकन

'यशस्वी' न लिखते तो एक शब्द की किफायत करने के साथ उस शब्द की मर्यादा न बिखरने देते। 

दरअसल राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 को लेकर कौन क्या कर रहा है, उसका प्रकटीकरण आवश्यक है किन्तु उससे अधिक आवश्यक है समन्वय कर एक दिशा देने और उसमें चलने की।

 साथ ही जिन राज्यों में नीति लागू नहीं हुई या सरकारें नहीं कर रहीं हैं वहां संगठन और सरकार को समन्वय बना कर लागू कराने की आवश्यकता है। अभी जहां नीति लागू करने वाली सरकारें हैं,हम वहीं मुगदर (सेमीनार, वेबीनार, गोष्ठी, परिचर्चाओं की जुगाली कर रहे हैं) (पेल, पसीना बहा रहे हैं) भांज रहे हैं।

परीक्षा, मूल्यांकन के दौर से स्नातक का एक सर्किल पूरा हो गया है। समीक्षा होनी चाहिए कि इंटर्नशिप, स्टार्टअप, स्वरोजगार और रोजगार का तुलनात्मक प्रतिशत कितना बढ़ा?

परिसरों में बढ़ती उदंडता,कुलगुरुओं के कर्म और व्यवहार,आये दिन जांच,जेल यात्राएं नैतिक मूल्यों की परते खोल रही हैं।

कुल गुरुओं की नियुक्ति कुलपति के आचरण को नहीं बदल पा रही है,क्यों?

 नियुक्ति में मूल अर्हता को भी न देखना, वैचारिक संकीर्ण सम्बन्ध, व्यक्तिगत क्षेत्र, भाषा -भाषी जनित चहेतों की नियुक्ति में ठेलमठेल क्या इसका कारण नहीं?

मध्यप्रदेश में पिछले पन्द्रह वर्षों में कुछ ऐसे कुलपति बन गये जो न तो प्राध्यापक पद नाम प्राप्त थे,न ही दस हजार, नौ हजार एजीपी। आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है? 

क्या प्रतिभा व्यक्ति की दासता से मुक्त होकर कुलगुरु का दायित्व नहीं सम्हाल सकती?

कौन बोले और बोले तो कौन सुनेगा?
बाबा तुलसी ने कहा -
.......प्रिय बोलहिं भय आस।......नाश।'

एक देश में अनेक प्रकार के स्नातक से स्नातकोत्तर तक के पाठ्यक्रमों से दी जाने वाली उपाधियां?

हां , साक्षर बनाने के लिए ठीक है किन्तु यह पूरा दृश्य शिक्षा के स्तर को मापने का बड़ा अवरोध है।

अभी तक स्नातक विज्ञान और वाणिज्य का विद्यार्थी कला, संगीत, साहित्य, सामाजिक विज्ञानों से पीजी कर प्राध्यापक बन जाता था।अब नवाचार में क्या देख कर इसे बदला गया?

वैसे भी यदि शिक्षक नहीं बना तो किस विषय में स्नातक किया और किस विषय में परास्नातक क्या फर्क पड़ता है? केवल बेरोजगारों की भीड़ ही बढ़ रही है।

वर्तमान में पालीटेक्निक, आयुर्वेद, होम्योपैथी की स्नातक की पढ़ाई कर विद्यार्थी कला, मानविकी से परास्नातक करके, पीएचडी भी कर चुके हैं और शासकीय/अशासकीय महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं,उनका क्या करेंगे?

 क्या प्राध्यापकों की भर्ती में नियम बनाकर भूतलक्ष्यी प्रभाव से लागू करेंगे?

जब भाषा (आधार पाठ्यक्रम) के प्रश्न- पत्र वस्तुनिष्ठ कर दिए गये हैं तो विद्यार्थियों के शब्दों के व्यवहार की क्षमता कैसे पता करेंगे?

 हां,न के तुक्केबाज भविष्य में शिक्षण कैसे करेंगे? वैसे शिक्षण कार्य कैसे करेंगे यह भी मजाक ही है!

मध्यप्रदेश में वस्तुनिष्ठ प्रश्न व्यवस्था को लेकर उच्च शिक्षा विभाग ने तर्क़ दिया दीर्घ और लघु प्रश्न का मूल्यांकन करने में समय लगता है और समय पर परिणाम नहीं आ पाते। है न सटीक और वैज्ञानिक जिम्मेदारी भरा उत्तर !!

भारतीय प्रशासनिक सेवा में भी क्या विषय की बाध्यता हो सकती है कि इंजीनियरिंग और मेडिकल, गणित, प्राणिशास्त्र का विद्यार्थी अपने स्नातक, स्नातकोत्तर के विषय लेकर परीक्षा देगा? 

शायद यह प्रश्न भी फिजूल है क्योंकि अधिकांश तो सामाजिक विज्ञान,कला और राजनीति विज्ञान को लेकर ही यूपीएससी पास करते हैं। स्नातक चाहे जिस विधा से किया हो अर्थात् पिछली पढ़ाई का लेन-देन बंद!!

इसलिए अपने -अपने संगठनों के गैर शिक्षकीय तर्क के साथ बढ़ते कदम कभी सिंहावलोकन भी करेंगे,ऐसी अपेक्षा है।

तभी 'यशस्वी' लिखना सार्थक होगा।

जीवन के अनेक क्षेत्रों में सफल होने के अनेक मार्ग हो सकते हैं किंतु शिक्षा/विद्या के मार्ग में सार्थक होने के लिए लघु अथवा लघुतम् मार्ग ढूंढना अपने को ठगना ही है। क्योंकि शिक्षक राष्ट्र निर्माण करता है,हम सब कम से कम चाणक्य सीरीयल के बाद तो हर भाषण में दुहराने लगे हैं।

शेष आप सब अधिक जानते हैं।

23/5/2025

Sunday, 18 May 2025

न्यायालय

क्षमा करेंगे महानुभावों!
जब आपके न्यायालय संविधान की धाराओं को हथियार बना कर राज्यपाल, राष्ट्रपति पर ऐसे निर्णय दे रहे हैं, जैसे संविधान की धाराएं न होकर स्वछंद बरसाती नदी हों जो शिलाओं, वृक्षों और तटों को मदमस्त तोड़ती चलती है।

जब आपके न्यायालय कंटेम्पट के नाम पर चीफ सेक्रेटरी,एसीएस, डीजीपी, पीएस को कठघरे में ऐसे बुला लेते हैं/ खड़ा कर देते हैं जैसे निजी सेवक हों, जबकि कई बार वे दोषी भी नहीं होते।

आप जिसे चाहें आधी रात को जमानत दे दें, चाहें तो चार पीढ़ी दीवानी में  चप्पल घिसती उम्मीद लिए कई बार धरती में ही स्वर्ग -नर्क में आये जाये।

तब आपके न्यायालय को प्रोटोकॉल स्मरण नहीं रहता शायद? वास्तव में हर किसी पात्र में विक्रमादित्य ढूंढना ही व्यर्थ है।

तुलसी बाबा ने लिखा है -

बिनु विज्ञान की समता आवइ।
(विज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान, परम्परा के संज्ञान में लाये बिना)
कोउ अवकाश कि नभ बिनु पावइ।।

श्रद्धा बिनु धर्म  नहिं होई।
 (धर्म -आचरण) 
बिनु महि गंध की पावइ कोई।।

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा।
जल बिनु रस कि होइ संसारा।।
(रस -स्निग्धता, प्रेम)

सील की मिल बिनु बुध सेवकाई।
(बुध -तत्वज्ञानियों का सत्संग)
जिमि बिनु तेज न रूप गोंसांई।।

कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा।
बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।
(हरि भजन -लोककल्याण की कामना)

अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।।
(राम रघुबीर -राष्ट्र जन की मंगल कामना)

  प्रोटोकॉल का पालन दोनों हाथ की ताली की तरह होना चाहिए। 

इसलिए अपेक्षा सही है कि आना चाहिए किन्तु सम्मान मांगने से नहीं चरित्र और व्यवहार से अर्जित किया जाता है। 

भारतीय ज्ञान परम्परा यही कहती है जो व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों में लागू होती है।

दुखद है कि न्यायालय के सर्वोच्च को टिप्पणी करनी पड़ी और मध्यप्रदेश सरकार को जनप्रतिनिधियों को सलामी देने के लिए आदेश जारी करना पड़ा।
🙏🕉️

Thursday, 15 May 2025

चैतन्य

चैतन्य तो अशुद्ध हो ही नहीं सकता? जो अशुद्ध है वह चैतन्य नहीं है।

बुद्धत्व ऐसा मील का पत्थर है जो ब्रह्म का दर्शन  सम्यकता में बताता है।

विराट चैतन्य में स्व चैतन्य की विराटता का बोध बुद्धत्व की ओर ले जाता है।

इस देश की गढ़ी गई दलित आवृत- चेतना यदि बुद्ध के सहारे जाति की सामूहिक-राजनैतिक- चेतना से अनावृत हो जाये तो बुद्ध का स्मरण सार्थक होगा।

यह ठीक है कि भगवान समर्पित भक्तों के सहारे ही जिंदा रहते हैं, किंतु यदि मंदिर का आकार छोटा हुआ तो भक्त और भगवान दोनों व्यक्तिगत से समष्टिगत यात्रा नहीं कर पाते।

करुणा छोटे तालाब में नीर हैं, जहां नीर-छीर विवेक की आवश्यकता होती है, किंतु सागर में वही नीर विशाल जलराशि बन जाती है, जो अनेक रूपों में जगतव्यापी और लोक कल्याण कारी सिद्ध होती है।

सनातन की जय हो। वेद  श्रद्धामय हों। भारतवर्ष अजेय हो।

शुभकामनाएं

Wednesday, 30 April 2025

geeta 10-11

 

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ (10/१५)


भावार्थ : हे पुरूषोत्तम! हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी! हे समस्त देवताओं के देव! हे समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाले! हे सभी प्राणियों के ईश्वर! एकमात्र आप ही अपने आपको जानते हैं या फ़िर वह ही जान पाता है जिसकी अन्तर-आत्मा में प्रकट होकर आप अपना ज्ञान कराते हैं। (१५)


(अर्जुन द्वारा भगवान के ऎश्वर्यों के वर्णन के लिए प्रार्थना)


वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्याह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ (१६)


भावार्थ : हे कृष्ण! कृपा करके आप अपने उन अलौकिक ऎश्वर्यपूर्ण स्वरूपों को विस्तार से कहिये जिसे कहने में केवल आप ही समर्थ हैं, जिन ऎश्वर्यों द्वारा आप इन सभी लोकों में व्याप्त होकर स्थित हैं। (१६)

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌ ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ (१७)


भावार्थ : हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार आपका निरन्तर चिंतन करके आपको जान सकता हूँ, और मैं आपके ईश्वरीय स्वरूप का किन-किन भावों से स्मरण करूँ? (१७)

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌ ॥ (१८)


भावार्थ : हे जनार्दन! अपनी योग-शक्ति और अपने ऎश्वर्यपूर्ण रूपों को फिर भी विस्तार से कहिए, क्योंकि आपके अमृत स्वरूप वचनों को सुनते हुए भी मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। (१८)


(भगवान द्वारा अपने ऎश्वर्यों का वर्णन)
श्रीभगवानुवाच


हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ (१९)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे कुरुश्रेष्ठ! हाँ अब मैं तेरे लिये अपने मुख्य अलौकिक ऎश्वर्यपूर्ण रूपों को कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार की तो कोई सीमा नहीं है। (१९)

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ (२०)


भावार्थ : हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ और मैं ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति का, मैं ही सभी प्राणियों के जीवन का और मैं ही सभी प्राणियों की मृत्यु का कारण हूँ। (२०)

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ (२१)


भावार्थ : मैं सभी आदित्यों में विष्णु हूँ, मैं सभी ज्योतियों में प्रकाशमान सूर्य हूँ, मैं सभी मरुतों में मरीचि नामक वायु हूँ, और मैं ही सभी नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ। (२१)

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ (२२)


भावार्थ : मैं सभी वेदों में सामवेद हूँ, मैं सभी देवताओं में स्वर्ग का राजा इंद्र हूँ, सभी इंद्रियों में मन हूँ, और सभी प्राणियों में चेतना स्वरूप जीवन-शक्ति हूँ। (२२)

रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌ ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥ (२३)


भावार्थ : मैं सभी रुद्रों में शिव हूँ, मैं यक्षों तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ, मैं सभी वसुओं में अग्नि हूँ और मै ही सभी शिखरों में मेरु हूँ। (२३)

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ (२४)


भावार्थ : हे पार्थ! सभी पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति मुझे ही समझ, मैं सभी सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ, और मैं ही सभी जलाशयों में समुद्र हूँ। (२४)

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ (२५)


भावार्थ : मैं महर्षियों में भृगु हूँ, मैं सभी वाणी में एक अक्षर हूँ, मैं सभी प्रकार के यज्ञों में जप (कीर्तन) यज्ञ हूँ, और मैं ही सभी स्थिर (अचल) रहने वालों में हिमालय पर्वत हूँ। (२५)

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ (२६)


भावार्थ : मैं सभी वृक्षों में पीपल हूँ, मैं सभी देवर्षियों में नारद हूँ, मै सभी गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ और मै ही सभी सिद्ध पुरूषों में कपिल मुनि हूँ। (२६)

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ ।
एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥ (२७)


भावार्थ : समस्त घोड़ों में समुद्र मंथन से अमृत के साथ उत्पन्न उच्चैःश्रवा घोड़ा मुझे ही समझ, मैं सभी हाथियों में ऐरावत हूँ, और मैं ही सभी मनुष्यों में राजा हूँ। (२७)

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ (२८)


भावार्थ : मैं सभी हथियारों में वज्र हूँ, मैं सभी गायों में सुरभि हूँ, मैं धर्मनुसार सन्तान उत्पत्ति का कारण रूप प्रेम का देवता कामदेव हूँ, और मै ही सभी सर्पों में वासुकि हूँ। (२८)

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌ ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌ ॥ (२९)


भावार्थ : मैं सभी नागों (फ़न वाले सर्पों) में शेषनाग हूँ, मैं समस्त जलचरों में वरुणदेव हूँ, मैं सभी पितरों में अर्यमा हूँ, और मैं ही सभी नियमों को पालन करने वालों में यमराज हूँ। (२९)

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌ ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌ ॥ (३०)


भावार्थ : मैं सभी असुरों में भक्त-प्रहलाद हूँ, मै सभी गिनती करने वालों में समय हूँ, मैं सभी पशुओं में सिंह हूँ, और मैं ही पक्षियों में गरुड़ हूँ। (३०)

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌ ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ (३१)


भावार्थ : मैं समस्त पवित्र करने वालों में वायु हूँ, मैं सभी शस्त्र धारण करने वालों में राम हूँ, मैं सभी मछलियों में मगर हूँ, और मैं ही समस्त नदियों में गंगा हूँ। (३१)

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥ (३२)


भावार्थ : हे अर्जुन! मैं ही समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत हूँ, मैं सभी विद्याओं में ब्रह्मविद्या हूँ, और मैं ही सभी तर्क करने वालों में निर्णायक सत्य हूँ। (३२)

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ (३३)


भावार्थ : मैं सभी अक्षरों में ओंकार हूँ, मैं ही सभी समासों में द्वन्द्व हूँ, मैं कभी न समाप्त होने वाला समय हूँ, और मैं ही सभी को धारण करने वाला विराट स्वरूप हूँ। (३३)

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌ ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ (३४)


भावार्थ : मैं ही सभी को नष्ट करने वाली मृत्यु हूँ, मैं ही भविष्य में सभी को उत्पन्न करने वाली सृष्टि हूँ, स्त्रीयों वाले गुणों में कीर्ति, सौन्दर्य, वाणी की मधुरता, स्मरण शक्ति, बुद्धि, धारणा और क्षमा भी मैं ही हूँ। (३४)

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌ ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहऋतुनाम कुसुमाकरः॥ (३५)


भावार्थ : मैं सामवेद की गाने वाली श्रुतियों में बृहत्साम हूँ, मैं छंदों में गायत्री छंद हूँ, मैं महीनों में मार्गशीर्ष और मैं ही ऋतुओं में वसंत हूँ। (३५)

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌ ॥ (३६)


भावार्थ : मैं छलने वालों का जुआ हूँ, मैं तेजस्वियों का तेज हूँ, मैं जीतने वालों की विजय हूँ, मैं व्यवसायियों का निश्चय हूँ और मैं ही सत्य बोलने वालों का सत्य हूँ। (३६)

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ (३७)


भावार्थ : मैं वृष्णिवंशियों में वासुदेव हूँ, मैं ही पाण्डवों में अर्जुन हूँ, मैं मुनियों में वेदव्यास हूँ, और मैं ही कवियों में शुक्राचार्य हूँ। (३७)

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌ ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌ ॥ (३८)


भावार्थ : मैं दमन करने वालों का दंड हूँ, मैं विजय की कामना वालों की नीति हूँ, मैं रहस्य रखने वालों का मौन हूँ और मैं ही ज्ञानीयों का ज्ञान हूँ। (३८)

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥ (३९)


भावार्थ : हे अर्जुन! वह बीज भी मैं ही हूँ जिनके कारण सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि संसार में कोई भी ऎसा चर (चलायमान) या अचर (स्थिर) प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना अलग रह सके। (३९)

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ (४०)


भावार्थ : हे परन्तप अर्जुन! मेरी लौकिक और अलौकिक ऎश्वर्यपूर्ण स्वरूपों का अंत नहीं है, मैंने अपने इन ऎश्वर्यों का वर्णन तो तेरे लिए संक्षिप्त रूप से कहा है। (४०)

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥ (४१)


भावार्थ : जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तुयें है, उन-उन को तू मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ समझ। (४१)

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥ (४२)


भावार्थ : किन्तु हे अर्जुन! तुझे इस प्रकार सारे ज्ञान को विस्तार से जानने की आवश्यकता ही क्या है, मैं तो अपने एक अंश मात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण करके सर्वत्र स्थित रहता हूँ। (४२)


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद्भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में 'विभूति-योग' नाम का दसवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ।

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

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अध्याय ११ - विश्वरूप दर्शन योग

(अर्जुन द्वारा विश्वरूप के दर्शन के लिये प्रार्थना)

(भगवान द्वारा विश्वरूप का वर्णन)
श्रीभगवानुवाच


पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ (५)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों अनेक प्रकार के अलौकिक रूपों को और अनेक प्रकार के रंगों वाली आकृतियों को भी देख। (५)

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ (६)


भावार्थ : हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तू मुझमें अदिति के बारह पुत्रों को, आठों वसुओं को, ग्यारह रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को, उनचासों मरुतगणों को और इसके पहले कभी किसी के द्वारा न देखे हुए उन अनेकों आश्चर्यजनक रूपों को भी देख। (६)

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्‌ । मम देहे गुडाकेशयच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ॥ (७)


भावार्थ : हे अर्जुन! तू मेरे इस शरीर में एक स्थान में चर-अचर सृष्टि सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देख और अन्य कुछ भी तू देखना चाहता है उन्हें भी देख। (७)

न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्‌ ॥ (८)


भावार्थ : किन्तु तू अपनी इन आँखो की दृष्टि से मेरे इस रूप को देखने में निश्चित रूप से समर्थ नहीं है, इसलिये मैं तुझे अलौकिक दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मेरी इस ईश्वरीय योग-शक्ति को देख। (८)


(संजय द्वारा धृतराष्ट्र के समक्ष विश्वरूप का वर्णन)
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्‌ ॥ (९)


भावार्थ : संजय ने कहा - हे राजन्‌! इस प्रकार कहकर परम-शक्तिशाली योगी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्य-युक्त अलौकिक विश्वरूप दिखलाया। (९)

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌ ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌ ॥ (१०)
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ ।सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌ ॥ (११)

भावार्थ : इस विश्वरूप में अनेकों मुँह, अनेकों आँखे, अनेकों आश्चर्यजनक दिव्य-आभूषणों से युक्त, अनेकों दिव्य-शस्त्रों को उठाये हुए, दिव्य-मालाऎँ, वस्त्र को धारण किये हुए, दिव्य गन्ध का अनुलेपन किये हुए, सभी प्रकार के आश्चर्यपूर्ण प्रकाश से युक्त, असीम और सभी दिशाओं में मुख किए हुए सर्वव्यापी परमेश्वर को अर्जुन ने देखा। (१०-११)

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ (१२)


भावार्थ : यदि आकाश में एक हजार सूर्य एक साथ उदय हो तो उनसे उत्पन्न होने वाला वह प्रकाश भी उस सर्वव्यापी परमेश्वर के प्रकाश की शायद ही समानता कर सके। (१२)

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ (१३)

भावार्थ : पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से अलग-अलग सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सभी देवताओं के भगवान श्रीकृष्ण के उस शरीर में एक स्थान में स्थित देखा। (१३)

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ (१४)

भावार्थ : तब आश्चर्यचकित, हर्ष से रोमांचित हुए शरीर से अर्जुन ने भगवान को सिर झुकाकर प्रणाम करके और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोला। (१४)

अर्जुन द्वारा विश्वरूप की स्तुति करना)

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌ ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌ ॥ (१५)


भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे भगवान श्रीकृष्ण! मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं को तथा अनेकों विशेष प्राणीयों को एक साथ देख रहा हूँ, और कमल के आसन पर स्थित ब्रह्मा जी को, शिव जी को, समस्त ऋषियों को और दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ। (१५)

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्‌ ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ (१६)


भावार्थ : हे विश्वेश्वर! मैं आपके शरीर में अनेकों हाथ, पेट, मुख और आँखें तथा चारों ओर से असंख्य रूपों को देख रहा हूँ, हे विश्वरूप! न तो मैं आपका अन्त, न मध्य और न आदि को ही देख पा रहा हूँ। (१६)

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌ ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌ ॥ (१७)


भावार्थ : मैं आपको चारों ओर से मुकुट पहने हुए, गदा धारण किये हुए और चक्र सहित अपार तेज से प्रकाशित देख रहा हूँ, और आपके रूप को सभी ओर से अग्नि के समान जलता हुआ, सूर्य के समान चकाचौंध करने वाले प्रकाश को कठिनता से देख पा रहा हूँ। (१७)

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ (१८)


भावार्थ : हे भगवन! आप ही जानने योग्य परब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत के परम-आधार हैं, आप ही अविनाशी सनातन धर्म के पालक हैं और मेरी समझ से आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। (१८)

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्‌ ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्‌ ॥ (१९)


भावार्थ : आप अनादि है, अनन्त है और मध्य-रहित हैं, आपकी महिमा अनन्त है, आपकी असंख्य भुजाएँ है, चन्द्र और सूर्य आपकी आँखें है, मैं आपके मुख से जलती हुई अग्नि के निकलने वाले तेज के कारण इस संसार को तपते हुए देख रहा हूँ। (१९)

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्‌ ॥ (२०)


भावार्थ : हे महापुरूष! सम्पूर्ण आकाश से लेकर पृथ्वी तक के बीच केवल आप ही अकेले सभी दिशाओं में व्याप्त हैं और आपके इस भयंकर आश्चर्यजनक रूप को देखकर तीनों लोक भयभीत हो रहे हैं। (२०)

अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ (२१)


भावार्थ : सभी देवों के समूह आप में प्रवेश कर रहे हैं उनमें से कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपका गुणगान कर रहे हैं, और महर्षिगण और सिद्धों के समूह 'कल्याण हो' इस प्रकार कहकर उत्तम वैदिक स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं। (२१)

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्‍घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ (२२)


भावार्थ : शिव के सभी रूप, सभी आदित्यगण, सभी वसु, सभी साध्यगण, सम्पूर्ण विश्व के देवता, दोनों अश्विनी कुमार तथा समस्त मरुतगण और पितरों का समूह, सभी गंधर्व, सभी यक्ष, समस्त राक्षस और सिद्धों के समूह वह सभी आश्चर्यचकित होकर आपको देख रहे हैं। (२२)

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌ ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌ ॥ (२३)


भावार्थ : हे महाबाहु! आपके अनेकों मुख, आँखें, अनेकों हाथ, जंघा, पैरों, अनेकों पेट और अनेक दाँतों के कारण विराट रूप को देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और उन्हीं की तरह मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। (२३)

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌ ।
दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ (२४)


भावार्थ : हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करता हुआ, अनेको प्रकाशमान रंगों से युक्त मुख को फैलाये हुए और आपकी चमकती हुई बड़ी-बड़ी आँखों को देखकर मेरा मन भयभीत हो रहा है, मैं न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ और न ही शान्ति को प्राप्त कर पा रहा हूँ। (२४)

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ (२५)


भावार्थ : इस प्रकार दाँतों के कारण विकराल और प्रलयंकारी की अग्नि के समान आपके मुखों को देखकर मैं आपकी न तो कोई दिशा को जान पा रहा हूँ और न ही सुख पा रहा हूँ, इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप मुझ पर प्रसन्न हों। (२५)

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ (२६)

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै ॥ (२७)


भावार्थ : धृतराष्ट्र के सभी पुत्र अपने समस्त सहायक वीर राजाओं के सहित तथा पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, सूत पुत्र कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धा भी आपके भयानक दाँतों वाले विकराल मुख में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं, और उनमें से कुछ तो दाँतों के दोनों शिरों के बीच में फ़ंसकर चूर्ण होते हुए दिखाई दे रहे हैं। (२६-२७)

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ (२८)


भावार्थ : जिस प्रकार नदियों की अनेकों जल धारायें बड़े वेग से समुद्र की ओर दौड़तीं हुयी प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार सभी मनुष्य लोक के वीर योद्धा भी आपके आग उगलते हुए मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। (२८)

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ (२९)


भावार्थ : जिस प्रकार पतंगे अपने विनाश के लिये जलती हुयी अग्नि में बड़ी तेजी से प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार यह सभी लोग भी अपने विनाश के लिए बहुत तेजी से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। (२९)

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ (३०)


भावार्थ : हे विश्वव्यापी भगवान! आप उन समस्त लोगों को जलते हुए सभी मुखों द्वारा निगलते हुए सभी ओर से चाट रहे हैं, और आपके भयंकर तेज प्रकाश की किरणें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आच्छादित करके झुलसा रहीं है। (३०)

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌ ॥ (३१)


भावार्थ : हे सभी देवताओं में श्रेष्ठ! कृपा करके आप मुझे बतलाइए कि आप इतने भयानक रूप वाले कौन हैं? मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न हों, आप ही निश्चित रूप से आदि भगवान हैं, मैं आपको विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपके स्वभाव को नहीं जानता हूँ। (३१)


(भगवान द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन)
श्रीभगवानुवाच


कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ (३२)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मैं इस सम्पूर्ण संसार का नष्ट करने वाला महाकाल हूँ, इस समय इन समस्त प्राणीयों का नाश करने के लिए लगा हुआ हूँ, यहाँ स्थित सभी विपक्षी पक्ष के योद्धा तेरे युद्ध न करने पर भी भविष्य में नही रहेंगे। (३२)

तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌ ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ॥ (३३)


भावार्थ : हे सव्यसाची! इसलिये तू यश को प्राप्त करने के लिये युद्ध करने के लिये खडा़ हो और शत्रुओं को जीतकर सुख सम्पन्न राज्य का भोग कर, यह सभी पहले ही मेरे ही द्वारा मारे जा चुके हैं, तू तो युद्ध में केवल निमित्त बना रहेगा। (३३)

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्‌ ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌ ॥ (३४)


भावार्थ : द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और भी अन्य अनेक मेरे द्वारा मारे हुए इन महान योद्धाओं से तू बिना किसी भय से विचलित हुए युद्ध कर, इस युद्ध में तू ही निश्चित रूप से शत्रुओं को जीतेगा। (३४)


(भययुक्त अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति)
संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ (३५)


भावार्थ : संजय ने कहा - भगवान के इन वचनों को सुनकर अर्जुन ने हाथ जोड़कर बारम्बार नमस्कार किया, और फ़िर अत्यन्त भय से कांपता हुआ प्रणाम करके अवरुद्ध स्वर से भगवान श्रीकृष्ण से बोला। (३५)

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा: ॥ (३६)


भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे अन्तर्यामी प्रभु! यह उचित ही है कि आपके नाम के कीर्तन से सम्पूर्ण संसार अत्यन्त हर्षित होकर आपके प्रति अनुरक्त हो रहा है तथा आसुरी स्वभाव के प्राणी आपके भय के कारण इधर-उधर भाग रहे हैं और सभी सिद्ध पुरुष आपको नमस्कार कर रहे हैं। (३६)

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ॥ (३७)


भावार्थ : हे महात्मा! यह सभी श्रेष्ठजन आपको नमस्कार क्यों न करें क्योंकि आप ही ब्रह्मा को भी उत्पन्न करने वाले हैं, हे अनन्त! हे देवादिदेव! हे जगत के आश्रय! आप अविनाशी, समस्त कारणों के मूल कारण, और आप ही परमतत्व है। (३७)

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ (३८)


भावार्थ : आप आदि देव सनातन पुरुष हैं, आप इस संसार के परम आश्रय हैं, आप जानने योग्य हैं तथा आप ही जानने वाले हैं, आप ही परम धाम हैं और आप के ही द्वारा यह संसार अनन्त रूपों में व्याप्त हैं। (३८)

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ (३९)


भावार्थ : आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तथा सभी प्राणीयों के पिता ब्रह्मा भी है और आप ही ब्रह्मा के पिता भी हैं, आपको बारम्बार नमस्कार! आपको हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! फिर भी आपको बार-बार नमस्कार! करता हूँ। (३९)

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ (४०)


भावार्थ : हे असीम शक्तिमान! मैं आपको आगे से, पीछे से और सभी ओर से ही नमस्कार करता हूँ क्योंकि आप ही सब कुछ है, आप अनन्त पराक्रम के स्वामी है, आप ही से समस्त संसार व्याप्त हैं, अत: आप ही सब कुछ हैं। (४०)

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ (४१)

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌ ॥ (४२)


भावार्थ : आपको अपना मित्र मानकर मैंने हठपूर्वक आपको हे कृष्ण!, हे यादव! हे सखा! इस प्रकार आपकी महिमा को जाने बिना मूर्खतावश या प्रेमवश जो कुछ कहा है, हे अच्युत! यही नही हँसी-मजाक में आराम करते हुए, सोते हुए, बैठते हुए या भोजन करते हुए, कभी अकेले में या कभी मित्रों के सामने मैंने आपका जो अनादर किया हैं उन सभी अपराधों के लिये मैं क्षमा माँगता हूँ। (४१,४२)

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌ ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ (४३)


भावार्थ : आप इस चल और अचल जगत के पिता और आप ही इस जगत में पूज्यनीय आध्यात्मिक गुरु हैं, हे अचिन्त्य शक्ति वाले प्रभु! तीनों लोकों में अन्य न तो कोई आपके समान हो सकता हैं और न ही कोई आपसे बढकर हो सकता है। (४३)

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌ ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌ ॥ (४४)


भावार्थ : अत: मैं समस्त जीवों के पूज्यनीय भगवान के चरणों में गिरकर साष्टाँग प्रणाम करके आपकी कृपा के लिए प्रार्थना करता हूँ, हे मेरे प्रभु! जिस प्रकार पिता अपने पुत्र के अपराधों को, मित्र अपने मित्र के अपराधों को और प्रेमी अपनी प्रिया के अपराधों को सहन कर लेता हैं उसी प्रकार आप मेरे अपराधों को सहन करने की कृपा करें। (४४)


(अर्जुन द्वारा चतुर्भुज रूप के लिए प्रार्थना)


अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ (४५)


भावार्थ : पहले कभी न देखे गये आपके इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथ ही मेरा मन भय के कारण विचलित भी हो रहा है, इसलिए हे देवताओं के स्वामी! हे जगत के आश्रय! आप मुझ पर प्रसन्न होकर अपने पुरूषोत्तम रूप को मुझे दिखलाइये। (४५)

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ (४६)


भावार्थ : हे हजारों भुजाओं वाले विराट स्वरूप भगवान! मैं आपके मुकुट धारण किए हुए और हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए रूप का दर्शन करना चाहता हूँ, कृपा करके आप चतुर्भुज रूप में प्रकट हों। (४६)


(भगवान द्वारा विश्वरूप के दर्शन की महिमा और चतुर्भुज दर्शन)
श्रीभगवानुवाच


मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्‌ ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्‌ ॥ (४७)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के प्रभाव से तुझे अपना दिव्य विश्वरूप दिखाया है, मेरे इस तेजोमय, अनन्त विश्वरूप को तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। (४७)

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ (४८)


भावार्थ : हे कुरुश्रेष्ठ! मेरे इस विश्वरूप को मनुष्य लोक में न तो यज्ञों के द्वारा, न वेदों के अध्ययन द्वारा, न दान के द्वारा, न पुण्य कर्मों के द्वारा और न कठिन तपस्या द्वारा ही देखा जाना संभव है, मेरे इस विश्वरूप को तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। (४८)

मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌ ।
व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ (४९)


भावार्थ : हे मेरे परम-भक्त! तू मेरे इस विकराल रूप को देखकर न तो अधिक विचलित हो, और न ही मोहग्रस्त हो, अब तू पुन: सभी चिन्ताओं से मुक्त होकर प्रसन्न-चित्त से मेरे इस चतुर्भुज रूप को देख। (४९)

संजय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ (५०)


भावार्थ : संजय ने कहा - वासुदेव भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से इस प्रकार कहने के बाद अपना विष्णु स्वरूप चतुर्भुज रूप को प्रकट किया और फिर दो भुजाओं वाले मनुष्य स्वरूप को प्रदर्शित करके भयभीत अर्जुन को धैर्य बँधाया। (५०)


(चतुर्भुज रूप के दर्शन की दुर्लभता और अनन्य भक्ति द्वारा सुलभता)
अर्जुन उवाच


दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ (५१)


भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे जनार्दन! आपके इस अत्यन्त सुन्दर मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिर चित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ। (५१)

श्रीभगवानुवाच


सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः ॥ (५२)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, उसे देख पाना अत्यन्त दुर्लभ है देवता भी इस शाश्वत रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं। (५२)

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा ॥ (५३)


भावार्थ : मेरे इस चतुर्भुज रूप को जिसको तेरे द्वारा देखा गया है इस रूप को न वेदों के अध्यन से, न तपस्या से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जाना संभव है। (५३)

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ (५४)


भावार्थ : हे परन्तप अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही मेरा साक्षात दर्शन किया जा सकता है, वास्तविक स्वरूप को जाना जा सकता है और इसी विधि से मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है। (५४)

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ (५५)


भावार्थ : हे पाण्डुपुत्र! जो मनुष्य केवल मेरी शरण होकर मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करता है, मेरी भक्ति में स्थित रहता है, सभी कामनाओं से मुक्त रहता है और समस्त प्राणियों से मैत्रीभाव रखता है, वह मनुष्य निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करता है। (५५)


ॐतत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः॥ इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद्भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में विश्वरूप दर्शन-योग नाम का ग्यारहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ॥



॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

Wednesday, 16 April 2025

रिटायर्ड परचून की दुकान

सेवानिवृत्त छोटा कर्मचारी परेशान है-

किसी ने सुझाव दिया -
" रिटायर्ड लोग परचून की दुकान खोलें। गौ आश्रम खोलें। सरकार के स्थानीय प्रतिनिधियों की जय जोहार करें। शेष की इच्छा जगत प्रपंच है। 'दिल्लीश्वरोवा जगदीश्वरोवा'।"

"सरकारें पंजाब सरकार से सीखे और सब को समान न्याय के आधार पर विधायकों /सांसदों (केन्द्र सरकार भी) को भी एक पेंशन का ही प्रावधान रखे।" 

सरकारों का खजाना नहीं लुटेगा। पूर्व मुख्यमंत्रियों की आजीवन बंगला, गाड़ी, विशेष सहायक, टेलीफोन, बिजली के बिल, चिकित्सा सुविधाएं भी बंद होनी चाहिए। 

एक मुख्यमंत्री आने वाली सात पीढ़ी के लिए कमा लेता है फिर क्या वह अपने जीवन काल में भी उस धन का अपने जनता की सेवा में  ख़र्च नहीं कर सकता? कैसा त्याग और कैसी सेवा?

 जब मुख्यमंत्री रहते हैं तो समझाते हैं -"क्या लेके आया बंदे,क्या ले के जायेगा!"

फिर यह सुविधा स्वीकार करना सरकारी खजाने का दुरुपयोग नहीं है?

 इस सुविधा का दुरुपयोग सबसे अधिक मुख्यमंत्री करते हैं।अपने रहते अपने पुराने बंगले को आलीशान (केजरीवाल की तरह) कोठी बना लेते हैं और उनकी सुविधा बरकरार रहती है। 

यह बंद होना चाहिए। त्याग तपस्या के आधार को लिए भाजपा को इस पर अवश्य चिंतन करना चाहिए। 

यदि मुख्यमंत्रियों को सुविधा देना है तो भाजपा कार्यालय में उन्हें जनता की समस्या सुनने और संगठन में योगदान करने के लिए कमरा देना चाहिए।

यही चलता रहा तो कुछ दिनों में राजधानी के महत्वपूर्ण इलाकों की अरबों-खरबों की जमीन, बंगला भूतपूर्व (भूतों)के हवाले हो जायेगी। क्योंकि पांच साल में कभी-कभी तीन मुख्यमंत्री भी बन जाते हैं!

ऐसे अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए जो नियम के विरुद्ध जाकर निर्माण की अनुमति देकर निर्माण कराते हैं।

एक फ़ैशन गौ शाला का चला है। सरकारी बंगलों में सरकारी खर्च पर गौशालाओं की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

ऐसे प्रेमी,कृपाल जनों को फ़ार्म हाउस बना कर गौसेवा करनी चाहिए। सब लोग लालूजी ही बनना चाहते हैं तो उस ग्वाल के बेटे को चारा खाने की सज़ा क्यों?

अब जब मुखिया ही अपने भविष्य को तय करने में जुटा हो तो पेंशनर्स -सेवक क्या पायेंगे? इसीलिए कहता हूं सेवानिवृत्त के पहले अपने लिए धंधा तय कर लें। 

क्या आप को नहीं लगता कि दरअसल यह लोकतंत्र प्रकारांतर से राजतंत्र ही है।
क्योंकि  राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स, विभिन्न प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आखिर आचरण से क्या प्रकट करते हैं? 

कथा लम्बी है फिर किसी प्रसंग में। शेष आप सब जानते ही हैं।

उमेश कुमार सिंह 
16/4/25