Monday, 12 August 2024

भारत का समुज्ज्वल भविष्य

अमृत महोत्सव अर्थात् पञ्च कोष का जागरण
प्रो उमेश कुमार सिंह 
आलेख के परिप्रेक्ष्य दो हैं, पहला- ‘स्वाधीनता का अमृत महोत्सव’ और दूसरा ‘भारत का समुज्ज्वल भविष्य की संकल्पना’ । ‘अमृत महोत्सव’! किसका ? स्वाधीनता का !  शास्त्र कहते हैं, ‘वयम अमृतस्य पुत्राः’। फिर अमृत पुत्र को ‘अमृत महोत्सव’ मनाने का कारण ? सहज रूप से आप और हम समझ सकते हैं कि भारत की राजकीय सत्ता वर्षों तक पराधीन रही ? कुछ का मानना है कि हम स्वतंत्र हुए अर्थात् अपने तंत्र के आधार पर राज्य सत्ता का संचालन होगा ? इसे दो प्रकार से समझना होगा, एक- हम स्वाधीनता और स्वतन्त्रता को 75 साल पहले प्राप्त किये ।  ठीक बात है किन्तु क्या यह केवल इतना ही है ? तो उत्तर हाँ और न दोनों में ही आयेगा । हाँ, इसलिए की देश के सामान्य जन को यह बोध कराना कि हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं ? दूसरा अर्थ थोड़ा गहरा है ।  हम अमृत महोत्सव मना रहे है ? हम यानि कौन ? जो अमृत हैं ? इसका सीधा अर्थ है, हमको हमारा परिचय कराने वाला कार्यक्रम ? इसलिए यह महोत्सव है अन्यथा स्वतंत्रता किसी भी राष्ट्र के बाह्य संचालन की एक प्रक्रिया का अंग है । जब कोई राजकीय सत्ता स्वदेशी, लोकोन्मुखी होती है तो वह अपनी परम्परा के आधार पर सता का संचालन कराती है और जो भी परकीय सता होती है वह अपने परम्परा के आधार पर पर सत्ता का संचालन करती है । परिणाम जन गण उससे धीरे-धीरे उसी के अनुसार चलने का आदी हो जाता है ।  पराधीन मानसिकता को अपने स्वत्वों के आधार पर जन गण को स्मरण कराना ‘अमृत महोत्वव’ है । अर्थात् हमी को हमारा परिचय कराना । किन्तु इसके विरोधाभाष को भी समझना होगा । एक और जन गण स्वधीनता का अमृत महोत्सव की बात करता है वहीं तंत्र ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ की बात कराता है, क्या आजादी भारतीय चेतना अपने ‘स्व’ का, ‘अमरता’ का बोध करा सकता है ?
     फिर भी यह सत्य है कि भारत सरकार की पहल से ‘स्वाधीनता / आजादी के अमृत महोत्सव’ को कुछ ऐसा स्वरुप प्राप्त हुआ जो न केवल भारत के जन मन को आंदोलित किया, बल्कि करोड़ों प्रवासी, अप्रवासी और विदेशी नागरिकों के मन में भारत की एक ऐसी प्रतिमा खाड़ी हुई जो उनके मानस और नजरिये को भी बदला है । किसी भी देश के लिए यह गौरव का विषय है, किन्तु अंतिम पड़ाव नहीं, संतुष्टि का कारण भी नहीं ।
इस महोत्सव में प्रधानमंत्री जी ने चार बातें- जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुशंधान स्मरण दिलाई । लाल बहादुर शास्त्री से प्रारम्भ होकर अटल बिहारी बाजपाई तक बात आई, किन्तु अब उनका केवल दुहराव नहीं हुआ तो उसमें अनुसंधान को जोड़कर उसको धरती में दिखाया भी गया । सियाचिन में जाकर देश के सेना के साथ प्रधानमंत्री का राष्ट्रीय पर्वों में न केवल सहभाग करना, बल्कि पड़ोसी देशों की बदनीयति से पौरुषता के साथ निपटने की खुली छूट देना बड़ा कार्य हुआ है । 
भारत सदा से कृषि प्रधान देश रहा है किन्तु इसी कृषि प्रधान देश ने आकाल का काल भी देखा है, तो अमरीका के लाल गेहूं को भी खाया है । वही भारत आज विदेशों को गेहूँ के साथ अनेक कृषि उत्पाद भेज रहा है । सचमुच में देश अन्नदाता बन कर उभरा है ।
हम विज्ञान में नासा से भागी दारी कर रहे हैं, तो अनुसंधान में करोना काल के प्राणदाता भी बने हैं । कई देशों की सेटेलाइट को ही लांच नहीं किया है तो इस्रायल और अन्य देशों से तकनीक लेकर अपनी स्वदेशी तकनीक विकसित करने में सफलता भी पाई है । इस वर्ष के गणतंत्र दिवस पर सौर्य स्मारक पर स्वदेशी तोपों की सलामी आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है । तात्पर्य यह की जय जवान से लेकर जय अनुसंधान की सार्थक यात्रा ने स्वाधीनता के ‘अमृत महोत्सव’ को न केवल सार्थक किया है, बल्कि स्वतंत्रता से सुराज की यात्रा का मार्ग भी प्रशस्त किया है ।     
तब यहीं से दूसरा परिप्रेक्ष्य ‘भारत के समुज्ज्वल भविष्य की संकल्पना’ प्रारम्भ होता है । इसके लिए भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पञ्च प्रण को ठीक से समझना होगा ।  क्या हैं पञ्च प्रण -  (1) भारत को विकसित देश बनाना (2) जीवन से गुलामी का अंश मिटाना  (3)  अपनी विरासत पर गर्व  (4) एकता और एकजुटता   (5) नागरिकता का पालन । 
आइये इन पञ्च प्रणों को संकल्पना के साथ समझने का प्रयास करें कि इन संकल्पनाओं के अंदर ‘भारत का समुज्ज्वल भविष्य कैसा होगा ?  इस अमृत महोत्सव में स्वतन्त्रता के काल से ही नहीं तो पिछले हजार वर्षों के अतीत पर व्यापक विचार-मंथन हुआ है । कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी हमारे सामने आए हैं । 
(1) भारत को विकसित देश बनाना - आज भारत  का राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक परिदृश्य परिवर्तित स्वरुप में खड़ा है । प्रशासनिक तंत्र, सुरक्षा, शिक्षा, इतिहास, स्वास्थ्य, उद्योग, सबके लिए दृष्टि तय हुई है । भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप ढांचा खड़ा हुआ है । देश की एक दिशा निश्चित हुई है ।  देश की उपलब्धियां और चुनौतियां सभी हमारे सामने आई हैं ।  एक राष्ट्र ने स्वतंत्र होते ही विभाजन की हिंसा का दंश और सीमा पर आक्रमण का सामना किया । फिर भी पचहत्तर वर्षों में राष्ट्र ने लोकतंत्र को ही मजबूत नहीं किया बल्कि भारत के जन गण  के सामर्थ्य और इच्छाशक्ति से अपने को एकता के सूत्र में बांधा । पिछला दशक भारत के लिए अनेक उपलब्धियों से भरपूर रहा है । चाहे वह भारत के नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं- स्वास्थ्य, आवास, पेय जल और वित्तीय संसाधन उपलब्ध करने का विषय हो या भारत के नियमों, कानूनों की बात हो ।  भारत की मेधा शक्ति ने कोरोना समय में सबसे सस्ती और सबसे सुरक्षित वैक्सीन का निर्माण किया। जिसने पूरे विश्व की सहायता की और करोड़ों जीवन की रक्षा की । आज भारतीय अर्थ व्यवस्था तमाम संकटों के बाद भी आगे बढ़ रही है, मगर भारत की बढ़ी आबादी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इसे और तेजी से प्रगति करनी होगी । इसके लिए आवश्यक है कि हम भारतीय सूक्ष्म लघु उद्योगों और उपक्रमों को बढ़ावा दें । इसके बिना हम भारत की रोजगार की अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाएंगे । 
भारत सही मायने में तभी सशक्त होगा, जब भारत स्वावलंबी होगा । भारत की स्वाधीनता को जब आज ७५ वर्ष पूरे हो रहे हैं तो यह आवश्यक है कि हम विचार करें कि क्या भारत के नीति प्रतिष्ठान, वर्तमान के भारत की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप हैं । अगर वह नहीं हैं तो उसमे परिवर्तन कैसे हो सकता है, इस पर भी विचार की आवश्यकता है । आज हम बहुत सी ऐसी व्यवस्था देखते हैं, जिसमें एक साधारण आदमी अपने को असहज और असमर्थ पाता है, चाहे वह आज की न्यायिक व्यवस्था हो या राजनीतिक व्यवस्था । ये एक साधारण आदमी की पहुंच में सहजता और सुलभता से कैसे पहुंचे, इस पर विचार करने की आवश्यकता है । 
भारत वैश्विक चुनौतियों का सामना तभी कर सकता है, जब उसकी आंतरिक व्यवस्था मजबूत हो । आंतरिक व्यवस्था न केवल आर्थिक और सुरक्षा की है बल्कि इसके लिए सामाजिक सशक्तिकरण और समरसता एक चुनौती है। अब तक भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा उपकरण आयातक देश था । यह देश के बजट पर बड़ा बोझ तो था ही, उसमें हमारी महत्वपूर्ण रक्षा जरूरतों को विदेशी शक्तियों द्वारा नियंत्रित करने का जोखिम भी निहित था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में रक्षा उपकरणों के निर्माण को पूरी तरह देश की जिम्मेदारी बनाने का फैसला लिया गया । यह पहल ही आत्मनिर्भर भारत की नीति और भविष्य के भारत के समुज्ज्वल भविष्य का संकेत है । रक्षा सम्बन्धी उपकरण के साथ औषधियों, उन्नत कृषि उपकरणों का निर्माण अब मेक-इन-इंडिया का केंद्र बिंदु बन गया है । इसे मेक-क, मेक-क क और मेक-क क क श्रेणी में बांटा गया है । दूसरी श्रेणी के तहत परियोजनाओं का वित्त पोषण रक्षा उपकरणों के नए उभरते घरेलू विनिर्माण उद्योग द्वारा किया जा रहा है। इस श्रेणी की परियोजनाएं प्रोटोटाइप, स्पेयर पार्ट्स, राडार प्रणाली, इंस्ट्रूमेंटेशन पार्ट्स और संबद्ध घटकों से संबंधित हैं। इसके तहत सरकार ने निजी उद्योगों को रक्षा प्रणालियों के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया है । इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के साथ डीपीएसयू को रक्षा वस्तुओं के स्थानीय निर्माण में भाग लेने के इच्छुक स्थानीय एमएसएमई, स्टार्ट-अप के साथ संवाद करने की अनुमति देने के लिए भी एक प्रणाली बनाई गई है । 
समझना होगा की सरकार की आठ वर्ष की रक्षा आधुनिकीकरण की नीति ने न केवल सेना और रक्षा क्षेत्र की प्रकृति को  बदला है बल्कि पडोसी देश के साथ दुनिया के सबल राष्ट्रों के बीच अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराई है जो भविष्य के भारत , शसक्त भारत का उद्घोष है । नौसेना को स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत से आधुनिक बनाया गया है । फरवरी 2015 में भारत सरकार ने विशाखापत्तनम में शिप बिल्डिंग सेंटर में छह परमाणु पनडुब्बियों के स्वदेशी निर्माण को मंजूरी दी। भारत का परमाणु शक्ति संपन्न बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (एसएसबीएन) कार्यक्रम डीआरडीओ, परमाणु ऊर्जा विभाग और भारतीय नौसेना के प्रबंधन व संचालन के अधीन चल रहा है । वर्तमान में, भारत फ्रांस के नौसेना समूह के साथ साझेदारी में मुंबई में सरकारी स्वामित्व वाली मझगांव डॉक लिमिटेड में 6 नई स्कॉर्पीन-श्रेणी की पनडुब्बियों का निर्माण कर रहा है । वायु सेना की दक्षता बढ़ाने के लिए सरकार ने सुखोई लड़ाकू विमानों को उन्नत किया है और फ्रांस से चौथी पीढ़ी के राफेल लड़ाकू विमान खरीदे हैं। इनके अतिरिक्त रुद्र अटैक हेलिकॉप्टर, ध्रुव यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, एमआई 17वी ट्रांसपोर्ट हेलिकॉप्टर और कामोव केए-226टी लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर मौजूदा सरकार की कुछ प्रमुख उपलब्धियां रही हैं। एचएएल और वैमानिकी विकास एजेंसी (एडीए) संयुक्त रूप से उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान का विकास कर रहे हैं। यह एक स्वदेशी सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैन ऐरे राडार और सुपरक्रू क्षमता वाला एकल सीट और ट्विन-इंजन स्टील्थ आल-वेदर मल्टीरोल फाइटर विमान होगा। विचारणीय है की आज भारत राष्ट्रीय दृष्टि के करान बेहतर रक्षा परियोजनाओं को लागू करने में सक्षम हुआ है। फिर भी भारत को अभी भी अमेरिका, चीन और रूस के आयुध विकास को शान्ति का सन्देश देने दुर्गम किन्तु असम्भव नहीं ऐसा मार्ग तय करना है । सशक्त भारत, समर्थ भारत और अजेय भारत के लिए यही संकल्प सूत्र है ।
(2) जीवन से गुलामी का अंश मिटाना -  प्रायः गुलामी का सम्बन्ध हम स्वतन्त्रता से जोड़कर देखते है किन्तु यह तात्कालिक सम्बन्ध है । बाह्य वातावरण का प्रभाव है । हमारे शिक्षा और संस्कारों के सन्देश के विस्मरण का प्रभाव है । भारत सदा से बाह्य और आभ्यांतर दोनों प्रकार से जीवन को प्रकाशित करता रहा है । इसलिए यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आधार पर गुलामी को समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि संघर्ष के पदचिन्ह नगरों, ग्रामों, जंगलों, पहाड़ों व तटीय क्षेत्रों में हर जगह मिलते हैं। चाहे संथाल का विद्रोह हो या दक्षिण के वीरों का सशस्त्र संघर्ष । सभी संघर्षों में एक ही भाव मिलेगा स्वतन्त्रता । सभी लोग किसी भी कीमत पर स्वाधीनता चाहते थे और वो यह स्वाधीनता केवल अपने लिए ही नहीं, अपितु अपने समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए चाहते थे। यह भारतवासियों का सामर्थ्य और इच्छाशक्ति ही थी, जिसने १९४७ के बाद लगातार भारत के छूटे हुए हिस्से गोवा, दादरा एवं नगर हवेली, हैदराबाद और पुड्डुचेरी को फिर भारत भूमि में मिलाने का प्रयास जारी रखा और अंत में नागरिक प्रयासों से लक्ष्य की प्राप्ति की। और यह प्रयत्न आगे भी जरी रहेगा क्योंकि भारत की प्राकृत अखंड मंडलाकार है ।  
प्रश्न यह आता है कि जब हमने राजकीय स्वायतत्ता प्राप्त कर ली तो गुलामी से मुक्ति की बात फिर क्यों ? इसके लिए भारत को समझना होगा । जिस तरह दुनिया के अन्य आर्थिक रूप से संपन्न देशों की नागरिकों की मानसिकता से हमारी सम्पनता की मानसिकता अलग है, उसी प्रकार राजनीतिक गुलामी से मुक्ति के अतिरिक्त भी एक गुलामी से बाहर आने की हमारी सोच है । भारत पञ्च कोष के आधार पर जीता है । इसलिए इसे ठीक से समझाने की आवश्यकता है । राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के अन्दर यह सन्देश छिपा है । हमारा  आह्वान है -‘कृण्वन्तो विश्‍वमार्यम्  - (ऋग्वेद ९।६३।५) सारे संसार के मनुष्यों को श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव वाले बनाओ । जय और  विजय से आगे अजेय का संदेश । मानसिक गुलामी से बाहर आने का सन्देश । उपनिषदों का सन्देश ।  आर्यावर्त का सन्देश। युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः।शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥ ज्ञानियों के चरण-चिह्नों का अनुगमन करते हुए मैं निरन्तर ध्यान के द्वारा तुम दोनों का अनादि ब्रह्म में विलयन करता हूँ । महिमामय एकं प्रभु अपने आप को अभिव्यक्त करें! अमृत आनन्द के पुत्र मेरी बात सुनेंवे भी जो दिव्य धाम में निवास करते हैं, का सन्देश ।  ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का सन्देश ।  ‘अहम् ब्रह्म’ का सन्देश । अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् । यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं । उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है, का सन्देश । ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का सन्देश । 
इसलिए समझना होगा भारत का भविष्य हजार, दश हजार के संघर्ष के परिणामों को लेकर नहीं जीता।  भारत स्वायत प्रकाश में जीता है ।  और यही बोध हमें हमारी गुलाम मानसिकता से बाहर ला सकता है और इसके लिए सनातन शिक्षा को प्रकाश में लाना होगा ।  प्राणमय संकल्पना से मनोमय संकल्पना की और बढ़ाना होगा।  समझान होगा विज्ञानमय कोष के अन्दर ज्ञान पहले से उपस्थित है जिसे पहचाना है, क्योकि भारत का समुज्ज्वल भविष्य आनंदमय कोष में बसता है ।  इसे ही रामराज्य, स्वराज्य और सुराज कहते हैं  ।  इसलिए शिक्षा जो विद्या का एक उपांग है के साथ पूरी ज्ञान परम्परा जिसके अंदर शौर्य परम्परा है, संत परमपरा, भक्ति परम्परा है , तप है , तेज है, पराक्रम है , ओज है , सहिष्णुता है  को ठीक से जन गण के मानस में उतार कर गुलामी से बाहर लाना होगा । भारत का भविष्य भारत के सुषुम्ना में है और इसे साधने के लिए इड़ा और पिंगला की निरंतरता कायम रखनी होगी । स्पष्ट है स्वाधीनता की गारंटी निर्भयता में है, स्व केंद्रित है । इसलिए भविष्य में  भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक सभी विभाजनों के परे जाकर भारत के जनमानस को  भारत के ज्ञान परम्परा का बोध कराना होगा । इसके लिए किसी एक क्षेत्र में स्थिर रहने से काम नहीं चलेगा तो मूलाधार से लेकर सहस्त्रधार  की यात्रा करनी ही होगी । यदि भारत को भारत बनाए रखना है तो चिरातन किन्तु नित्य नूतन इतिहास को स्मरण रखना होगा , नान्यः पन्था ।  
(3)  अपनी विरासत पर गर्व - भारत की विरासत भारत की परम्परा में है । उसके राष्ट्रीयत्व में, धर्म में, संस्कृति में है । और इन सबका प्राणतत्व अध्यात्म है जिसका बोध सभी में एक ही ब्रह्म है । समझना होगा धर्म में, संस्कृति में विचलन तभी आता है जब उसकी नाभि का अमृत अध्यात्म काल के श्याह पक्ष में ,अन्धकार में, अज्ञानता से आच्छादित हो जाता है ।  विरासत मिटती, हटती नहीं कभी-कभी विलुप्त होती है, तब हम हीनता बोध से भर जाते हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ने योग का परिचय कराते हुए विरासत को सामने रखा - इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (गीता 4-1) ( मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था, विवस्वान ने यह उपदेश अपने पुत्र मनुष्यों के जन्म-दाता मनु को दिया और मनु ने यह उपदेश अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को दिया।) एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ (4/2) (हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त इस विज्ञान सहित ज्ञान को राज-ऋषियों ने बिधि-पूर्वक समझा, किन्तु समय के प्रभाव से वह परम-श्रेष्ठ विज्ञान सहित ज्ञान इस संसार से प्राय: छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो गया। )  
हमारे पास राम और रामायण हैं । समय चक्र घूमता है, साधना के तरीके बदलते हैं किन्तु तत्व शास्वत है, लक्ष्य स्पष्ट है, भारत की गौरव पताका विश्व में लहराना । भारत के अध्यात्मिकता को समझाने के लिए सांस्कृतिक परम्परा की उदात्त विरासत को याद रखना होगा।  स्मरण रखना होगा राम-लक्षमण, कृष्ण -बलराम के विरोधी सहस्तित्व को । उग्रता, अधीरता और क्रोध के समन्वय को । भारत के समुज्ज्वल भविष्य को देखने के लिए राम -रावन युध्य , महाभारत युद्ध के साथ 1959 में कम्युनिस्ट चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा और दलाईलामा के निष्कासन,  1962 में भारत पर चीन के हमले, और 1971 के बांग्लादेश के अस्तित्व को । एक और बात की और ध्यान खीचना चाहता हूँ , हमें नारद की पत्रकारिता से लेकर आज की पत्रकारिता की विरासत को भी समझना होगा । बाल्मीक के साथ कालिदास को  श्रीराम जन्मभूमि,काशी -मथुरा  और  कश्मीर को, जिनके अन्दर भारत के विरासत के मूल तत्व तथा भविष्य के सन्देश छिपे हैं। 
  भविष्य के सत्य का संधान करना है तो एक पूरी राष्ट्रीय और पर राष्ट्रीय, पंथीय, साहित्यिक और इतिहासकारों की इस विराटता को - चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, आचार्य कृपलानी, डॉ. भगवान दास, डॉ. संपूर्णानंद, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, राममनोहर लोहिया, मीनू मसानी, प्रख्यात वामपंथी विचारक मानवेंद्रनाथ राय, विनोबा भावे को,  डॉ. ईश्वरी प्रसाद, जदुनाथ सरकार, राधाकुमुद मुखर्जी, रमेशचंद्र मजूमदार, आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव, सतीश चंद्र मित्तल जैसे ख्यातिलब्ध इतिहासकारों ने अपने आलेखों से पाञ्चजन्य को समृद्ध किया और पाठकों की दृष्टि को दिशा दी। न्यायविदों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मेहरचंद महाजन, ननी पालकीवाला, वी.एम. तारकुण्डे, सुभाष कश्यप ने विधि की दृष्टि से विभिन्न विषयों पर दृष्टि दी। पाणिनि, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, भाषाविद् डॉ. नगेंद्र, नाटककार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, उपन्यासकार अमृतलाल नागर, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, डॉ. महीप सिंह, डॉ. रामकुमार भ्रमर, मनहर चौहान, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, महादेवी वर्मा, भवानीप्रसाद मिश्र, सोहनलाल द्विवेदी, नरेंद्र कोहली इत्यादि साहित्यकारों ने न केवल साहित्य पर, बल्कि अपनी विरासत पर विमर्श किया। इसी तरह कंप्यूटर विज्ञानी विजय पाण्डुरंग भटकर, अंतरिक्ष विज्ञानी कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन और रसायन विज्ञानी रघुनाथ अनंत माशेलकर का लेखकीय अवदान भी भारत के अभिलेखागार की थाती हैं । साहित्यकारों में हिंदी के पाणिनि कहे जाने वाले वैयाकरण आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, भाषाविद् डॉ. नगेंद्र, नाटककार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, उपन्यासकार अमृतलाल नागर, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, डॉ. महीप सिंह, डॉ. रामकुमार भ्रमर, मनहर चौहान, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, महादेवी वर्मा, भवानीप्रसाद मिश्र, सोहनलाल द्विवेदी, नरेंद्र कोहली इत्यादि साहित्यकारों ने न केवल साहित्य पर, बल्कि समाज के अन्य विषयों पर भी अपनी स्थापना रखी। इसी तरह शीर्ष वैज्ञानिकों कंप्यूटर विज्ञानी विजय पाण्डुरंग भटकर, अंतरिक्ष विज्ञानी कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन और रसायन विज्ञानी रघुनाथ अनंत माशेलकर का लेखकीय अवदान भी पाञ्चजन्य अभिलेखागार की थाती है ।
  (4) एकता और एकजुटता - किसी भी सभ्य, सुसंस्कृत और कालजई राष्ट्र न केवल  पंचमहाभूतों की एकता, योग के समत्व की आवश्यकता होती है बल्कि उसे अपने राष्ट्र की एकता और अखण्डता की भी रक्षा करनी होती है और उसके लिए न केवल वैचारिक एकता आवश्यक है बल्कि समाजगत पांचजन्य के बोध की,’वयम पंचाधिकं शतं’ भी आवश्यकता है ।  हमें सुरक्षित भविष्य के लिए मुंबई में 26/11 के हमले को स्मरण रखना होगा जिसने न सिर्फ भारत को, बल्कि पूरी मानवता को हिला दिया था । एकता और एकजुटता को बनायेंगे किन्तु  शर्त याद रखते हुए की ‘न भूलेंगे, न माफ करेंगे’ । आजादी के अमृत महोत्सव के बाद  भविष्य की एकता के लिए तीन चेहरे सामने रखने होंगे  - पहला आजादी की लड़ाई के समय का , दूसरा वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक उत्थान के लिए  और तीसरा चेहरा समाज सुधार और रूढ़ियों व कुरीतियों का विरोध करने के लिए । आजादी का अमृत महोत्सव तीनों को महाभाव को जोड़ता है ।  
वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के समय में एकता और एकजुटता के लिए पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है । दिग्गज तकनीकी कंपनियां तकनीक की आड़ में कुछ भी करें, कोई उसके विरुद्ध बोलने का साहस नहीं करता। हमें दो पत्रिकाएँ स्मरण होनी चाहिएं - एक ‘क्रॉस रोड्स’, जो वामपंथी विचार से प्रेरित थी, मद्रास से निकलती थी । दूसरी ‘आर्गेनाइजर’। हमें आपातकाल भी याद रखना होगा ।  आजाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर जिस तरह की वकालत हमारे प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की है, वह अपने आप में बेमिसाल है ।आज देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर फिर से एक बहस छिड़ी है ।  उसके भविष्य को भी तलाशना होगा । समरसता के लिए काम करने होंगे और प्रयास इन सभी बातों के बाद भी, भारतीय समाज और एक राष्ट्र के रूप में हमें कई आंतरिक और बाह्य संकटों का न केवल सामना करना है, अपितु उसका समाधान भी ढूंढना है । भारत को अभी भी समरसता के लिए और प्रयास करने होंगे क्योंकि समाज जितना समरस होगा, उतना सशक्त होगा । इसलिए इस पर और भी कार्य करने की आवश्यकता है । इसमें राजनीती की सुचिता और ब्यूरोक्रेसी की मानसिकता को भी बदलना होगा।  
 (5) नागरिकता का पालन - नागरिकता एक विशेष सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय या मानवी की  एक नागरिक होने की अवस्था है।
सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत के तहत नागरिकता की अवस्था में अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों शामिल होते हैं। सक्रिय नागरिकता" का दर्शन अर्थात् नागरिकों को सभी नागरिकों के जीवन में सुधार करने के लिए आर्थिक सहभागिता, सार्वजनिक, स्वयंसेवी कार्य और इसी प्रकार के प्रयासों के माध्यम से अपने समुदाय को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य आता है।  इस दिशा में, कुछ देशों में स्कूल  नागरिकता शिक्षा उपलब्ध करते हैं । वर्जीनिया लिएरी (1999) के द्वारा नागरिकता को "अधिकारों के एक समुच्चय-के रूप में परिभाषित किया गया है- उनके अनुसार नागरिकता की अवस्था में प्राथमिक रूप से सामुदायिक जीवन में राजनैतिक भागीदारी, मतदान का अधिकार, समुदाय से विशेष संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार और दायित्व शामिल हैं।
बाजारवाद ने नागरिकता को प्रभावित किया है । अमेजॉन जैसे अनेक संस्थानों द्वारा बाजार में छल करने के तौर-तरीकों ने सामान्य जीवन को प्रभावित किया है । इसी तरह संविधान, कोलेजियम व्यवस्था, कन्वर्जन जैसे मुद्दों पर जागरूकता लाकर नागरिक कर्तव्यों पर भविष्य आधारित बहस की आवश्यकता है ।
सारांश यह की जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुसंधान से लेकर पञ्च प्रण पर ही भारत का भविष्य टिका है । प्रकृति में हम दो प्रकार के तत्वों से घिरे हैं, एक है बहुमूल्य और दूसरा अमूल्य । बहुमूल्य शब्द अर्थशास्त्र से आता है । वे वस्तुएं जो कम हैं, उनकी कीमत अधिक है । यह आवश्यक नहीं कि वह वस्तु सबके लिए जरूरी हो । ऐसा भी नहीं कि इसके बिना काम नहीं चल सकता । लेकिन जिन्हें यह चाहिए, उनके लिए पर्याप्त नहीं है- जैसे सोना, चांदी, हीरा आदि । इसे प्राप्त करना किसी भी राष्ट्र का भौतिक विकास है क्योंकि यह सबके नागरिक अधिकार के अंतर्गत भी आता है  । दूसरा अमूल्य।  अमूल्य वह है जो प्राणिमात्र के कल्याण के लिए चाहिए, और जिसका कोई विकल्प नहीं है, जैसे हवा, पानी, आकाश । इनका कोई मूल्य नहीं है। ये अमूल्य हैं, क्योंकि इनके बिना जीवन नहीं हो सकता ।
  साहित्यकार को समय के साथ इन दोनों मूल्य और अमूल्य पर चर्चा करना चाहिए किन्तु इन दोनों से अधिक एक तीसरा भी है जो मूल्य से परे है और वह हैं मनुष्य होने का अर्थ । यह सम्पूर्ण विश्व को कोई सिखा सकता है तो केवल और केवल भारतवर्ष । इसलिए यदि भारतवर्ष  का स्वत्व, मूल्यबोध, सांस्कृतिक परम्परा, धर्म -दर्शन और  अध्यात्म का ‘ओरा’ कायम रहा तो दुनिया में ईश्वरीय सन्देश सार्थकता के साथ जीवित रहेगा । इसके लिए भारत को अपने पञ्च कोष को जागृत रखना होगा ।
नमस्कार  

प्रकृति प्रवाह 
21-22 शुभालय विलास 
बरखेडा पठानी , भोपाल 
462022
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पंचकोश

 


मानवी चेतना को पाँच भागों में विभक्त किया गया है। इस विभाजन को पाँच कोश कहा जाता है। प्राणियों का स्तर इन चेतनात्मक परतों के अनुरूप ही विकसित होता है। कृमि कीटकों की चेतना इन्द्रियों की प्रेरणा के इर्द गिर्द घूमती रहती है। शरीर ही उनका सर्वस्व होता है।

 उनका स्वकाया की परिधि में ही सीमित रहता है। इससे आगे न उनकी इच्छा होती है, न विचारणा न क्रिया।

 प्रत्येक कोश का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

वे एक दूसरे को प्रभावित करते हैं । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य यह छः शत्रु और ममता, तृष्णा आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मनोमय कोश में छिपी रहती है। कोश साधना से उन सब का निराकरण होता है। ये पाँच कोश इस प्रकार हैं -

(1) अन्नमयकोश -अन्नमय कोश का अर्थ है, इन्द्रिय चेतना ।अन्न से शरीर और मस्तिष्क निर्मित होता है ।सम्पूर्ण दृश्यमान जगत, ग्रह-नक्षत्र, तारे और पृथ्वी, आत्मा की परम सत्ता की अभिव्यक्ति है । वैदिक ऋषियों ने अन्न को ब्रह्म कहा है । यह प्रथम कोश है, जहाँ आत्मा स्वयं को अभिव्यक्त करती रहती है । इस जड़-प्रकृति जगत से बढ़कर भी कुछ है । जड़ का अस्तित्व मानव और प्राणियों से पहले का है। पहले पाँच तत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश) की सत्ता ही विद्यमान थी। यह सभी अन्नमय कोष के आधार तत्व हैं।

(2) प्राणमयकोश -प्राणमय कोश अर्थात् जीवनी शक्ति। प्राण पांच प्रकार के होते हैं- प्राण, समान, उदान, व्यान,अपान ।

 उपनिषद का ऋषि कहता है - तुम (शरीर ) और आत्मा (हृदय) प्राण में प्रतिष्ठित हो । प्राण अपान में प्रतिष्ठित है ।  अपान  व्यान में प्रतिष्ठित है ।  व्यान उदान में प्रतिष्ठित है । उदान सामान  में प्रतिष्ठित है , जिसको नेति -नेति कहकर  वर्णन किया गया है । 

यह प्राणमय कोश सभी वनस्पतियों, पशु और मानव दो भागों को मिलाकर भौतिक और आध्यात्मिक स्वरूप प्राणों से जुड़े हुए हैं ।

 उसी प्रकार वाणी का मन से, मन का अपान से, प्राण का अपान से, मृत्यु का अपान से, पांच तत्वों का तीन गुणों( सत, रज , तम) से, गुणों का महतत्व से, महतत्व का आत्मा से और अनंत आत्मा का परमात्मा से समलय होता है ।

 प्राणमय कोश की क्षमता जीवनी शक्ति के रूप में प्रकट होती है।


(3) मनोमयकोशविचार बुद्धि मनोमय कोष आत्मा को साधारणतया मन और बुद्धिः के संयोग को माना जाता है ।

 मन का अर्थ है संकल्प और विकल्प । हम जो देखते, सुनते हैं अर्थात हमारी इन्द्रियों द्वारा जब कोई सन्देश हमारे मस्तिष्क में जाता है तो उसके अनुसार वहाँ सूचना एकत्रित हो जाती है और मस्तिष्क से हमारी भावनाओं के अनुसार रसायनों का श्राव होता है जिससे हमारे विचार बनते हैं, जैसे विचार होते हैं उसी तरह से हमारा मन स्पंदन करने लगता है और इस प्रकार प्राणमय कोश के बाहर एक आवरण बन जाता है यही हमारा मनोमय कोश होता है। 

मनोमय स्थिति विचारशील प्राणियों की होती है। यह और भी ऊँची स्थिति है।

 मननात्-मनुष्य: । मनुष्य नाम इसलिए पड़ा कि वह मनन कर सकता है। मनन अर्थात् चिन्तन।

(4) विज्ञानमयकोश -इसमें अचेतन सत्ता का भाव प्रवाह होता है ।इसका निर्माण अन्तर्ज्ञान या सहजज्ञान से होता है ।इसे भाव-संवेदना का स्तर कह सकते हैं ।

 दूसरों के सुख-दुख में भागीदार बनने की सहानुभूति के आधार पर इसका परिचय प्राप्त किया जा सकता है। आत्मभाव का आत्मीयता का विस्तार इसी स्थिति में होता है। अन्तःकरण विज्ञानमय कोश का ही नाम है। 

दयालु, उदार, सज्जन, सहृदय, संयमी, शालीन और परोपकार परायण व्यक्तियों का अन्तराल ही विकसित होता है। उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श क्रियाकलाप अपनाने की महानता इसी क्षेत्र में विकसित होती है। महामानवों का यही स्तर समुन्नत रहता है।

(5) आनंदमयकोश -आत्म बोध-आत्म जागृति, आनंदमय कोश आत्मा की उस मूलभूत स्थिति की अनुभूति है जिसे आत्मा का वास्तविक स्वरूप कह सकते हैं।  

आनंदमय कोश जागृत होने पर जीव अपने को अविनाशी ईश्वर अंग, सत्य, शिव, सुन्दर, मानता है। शरीर, मन और साधन एवं सम्पर्क परिकर को मात्र जीवनोद्देश्य के उपकरण मानता है। यह स्थिति ही आत्मज्ञान कहलाती है। यह उपलब्ध होने पर मनुष्य हर घड़ी सन्तुष्ट एवं उल्लसित पाया जाता है।

उच्च शिक्षा में नवाचार

उच्च शिक्षा के नवाचार व्यावहारिक आधार पर बनें

 अच्छी खबर- उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश शासन की राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के क्रियान्वयन में तीन साल पूरे होने पर एक अच्छी खबर। “एन सी सी को मुख्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा । मिलेगा रोजगार। नगर सैनिक से रक्षा के सभी क्षेत्रों तक प्राप्त कर सकेंगे सेवा का अवसर।” युवा हितैषी निर्णय के लिए सरकार को साधुवाद। एन एस एस के लिए भी इसी तरह की पहल हो ताकि उसमें सभी इक्छुक विद्यार्थी विषय को पढ़ सकें। 

 चिंता जनक समाचार - उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश द्वारा अग्रणी महाविद्यालयों को नया नाम "प्रधानमंत्री कॉलेज आफ एक्सीलेंस" दिया गया है। उक्त महाविद्यालयों में शिक्षकों के विभिन्न नामित पदों पर भर्ती हेतु जारी (आयुक्त स्तर से) विज्ञापन पर उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश शिक्षक भर्ती नियम 1990 व यथा संशोधन के विरुद्ध होने से विवाद की स्थिति पैदा हो गई है।

 अब यह प्रकरण माननीय उच्च न्यायालय में पहुंच गया है। माना जा रहा है कि आयुक्त के अधिकार क्षेत्र को चुनोती दी गई है? आयुक्त को इस प्रकार की भर्ती /पदस्थापना का विज्ञापन/आदेश जारी करने का अधिकार भर्ती नियम 1990 में नहीं है।

डेढ़ वर्ष पूर्व शासन स्तर से गलती -
 डेढ़ वर्ष पूर्व इसी तरह की प्रक्रिया अपनाकर उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान भोपाल में निर्देशक नियुक्त किया गया था, जिसमें एक जूनियर प्राध्यापक के अधीन आज भी वरिष्ठ प्राध्यापक कार्य कर रहे हैं, जहाँ आज भी शैक्षिक और प्रशासनिक वातावरण संस्था के अनुरूप नहीं है।

प्रकरण न्यायालय में -
 यह चयन लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित तथा पदस्थ शिक्षकों के बीच है,जो कई प्रश्न खड़ा करते हैं। 

क्या लोक सेवा आयोग के चयनित सहायक प्राध्यापक/प्राध्यापक प्रधानमंत्री उत्कृष्टता संस्थान में पढ़ाने के योग्य नहीं है? यदि नहीं हैं तो वे शिक्षक जहाँ पढ़ा रहे हैं क्या विद्यार्थियों के साथ न्याय हो रहा है? 

 याचिकाकर्ताओं के अनुलग्नक पी-4 दिनांक 08.07.2024 के माध्यम से पीएम उत्कृष्टता महाविद्यालयों में पूर्व से लोक सेवा आयोग से चयनित प्राचार्य, प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसरों की पदस्थापना की प्रणाली को तीन आधारों पर चुनौती दी गई है- 

एक - उक्त आदेश आयुक्त द्वारा जारी किया गया है जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। 

दो - जो प्रणाली अपनाई गई है वह यूजीसी नियमों के विपरीत है।

 तीन- यह राज्य द्वारा बनाए गए शैक्षणिक भर्ती नियमों के विपरीत है, जो एक निश्चित कैडर संरचना प्रदान करता है। 

 राज्य के सरकारी वकील ने उपरोक्त पहलुओं पर निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा और कहा कि राज्य सरकार द्वारा दिनांक 08.07.2024 के आदेश के लिए एक शुद्धिपत्र जारी किया जा रहा है और आवेदन की अंतिम तिथि भी 10.08.2024 तक बढ़ा दी गई है।

 'पी एम कालेज आफ एक्सीलेंस 'में-
 अब विभाग के पदस्थापना प्रक्रिया पूर्ण होने तक अतिथि विद्वान ( जिन्हें विभाग नियमित करने योग्य नहीं मानता) अथवा डेप्लॉयमेंट (अस्थाई पदस्थापना) के माध्यम से ही उन शिक्षकों से अध्यापन कराया जाएगा जिन्हें योग्य न मानते हुए प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

क्या यह शिक्षकों का अपमान (जिन्हें अभी पूर्णिमा के दिन गुरु माना गया था) एवं  महाविद्यालयों के छात्रों के साथ अन्याय नहीं होगा। संभवतः पूरा सत्र इसी खीचतान में निकल जाएगा।

 उच्च शिक्षा के सभी संस्थानों में संस्कृत अनिवार्य हो- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा’ आधारित शिक्षा का समावेश किया गया है। इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय ज्ञान परम्परा को ठीक से विद्यार्थियों के बीच लाने के लिए संस्कृत भाषा का अध्यापन कराया जाए। 

यह क्रम विद्यालयीन शिक्षा से विश्वविद्यायीन शिक्षा के सभी क्षेत्रों में पहुंचे। इसके लिए उच्च शिक्षा में अध्ययन मंडलों में भारतीय ज्ञान परम्परा के जानकार विद्वानों को रखा जाये,  ताकि पाठ्यसामग्री का सही चयन हो सके। भाषा नीति और अनुवाद के सम्बन्ध में शिक्षा नीति के मार्गदर्शी दिशा निर्देशों का पालान हो।

यू जी सी व्यवहारिक सलाह दे - यू जी सी जो भी सलाह जारी करे, वह देश की दूरस्थ सुदूर अंचलों की संस्थाओं को देख समझ कर जारी करे। आकाओं को प्रसन्न करने हेतु नहीं।
जरा विचार करें देश भर में साधारण महाविद्यालय, निजी महाविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय, स्टेट विश्वविद्यालय, निजी विश्वविद्यालय, केन्द्रीय विश्वविद्यालय, स्वायत्तशासी संस्थान।

सबके अपने पाठ्यक्रम, फीस ढ़ांचा, परीक्षा, पेपर सेटिंग, माडरेशन सब अलग अलग? जब एक देश,एक विधान और एक साथ चुनाव की चिन्ता है तो जो शिक्षा राष्ट्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास की बात करती है उसमें विविधता? एक पाठ्यक्रम,एक प्रश्न पत्र,एक मूल्यांकन क्यों नहीं?

 भारतीय ज्ञान परम्परा की पाठ्य सामग्री तय हो- देखा जा रहा है की भारतीय ज्ञान परम्परा में प्रयोग चल रहा है। अनाधिकृत विद्वानों से लेकर अधिकृति विद्वान् बिना उच्च शिक्षा के ढाँचे को ठीक से समझे अपनी राय ठूसते जा रहे हैं। जब की शिक्षा नीति में इसके साफ संकेत हैं।   

 आधार पाठ्यक्रमों के परीक्षा में प्रश्न : राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आधार पाठ्यक्रमों में महत्वपूर्ण सामग्री रखी गई है, जिसके अध्यापन के लिए शिक्षकों की पृथक से नियुक्ति होनी चाहिए तथा परीक्षा के प्रश्नपत्रों में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के साथ लघु और दीर्घ प्रश्न भी पूछें जाने चाहिए ताकि विद्यार्थियों के लिखने और उसके समझाने के स्तर का परीक्षक मूल्यांकन कर सके।

 क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी भाषा में सामग्री अद्यतन हो- चिकिस्ता शिक्षा से लेकर तकनीकी तक की पाठ्य सामग्री समय-सीमा में तैयार हो। भाषा का प्रयोग तकनीकी आधार पर जटिल न हो। 2047 की प्रतीक्षा क्यों?

 शिक्षा में आरक्षण- शिक्षा में आरक्षण को आय के आधार पर युक्तियुक्तिकरण हो। किसी भी आरक्षिति श्रेणी के उन्हीं छात्रों को लाभ मिले जिनकी आर्थिक स्थिति वास्तव में कम हो।

 जातीगत आरक्षण के नाम पर, सम्पन्न अभिभावकों, राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों के छात्र बार-बार लाभ लेकर बंचित को बंचित रहने को बाध्य न करें।

Umeshksingh58@gmail.com

योग का उद्देश्य

योग का उद्देश्य :  ‘योग शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है, जुड़ना या एकजुट होना । गीता में योग को दो प्रकार से परिभाषित किया गया है-‘योगा: कर्मसु कौशलम्’ और ‘समत्वं योग उच्यते’। वस्तुत: जब इन दोनों को एक साथ जोड़ा जाए तो उसे योग कहते हैं । इसका परिणाम तब सामने आता है, जब हम -‘ब्रह्मणि आधायकर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति य:’। ब्रह्म का आश्रय और आधार मानकर अपने कार्यों को संपन्न करने से बुद्धि संतुलित बनी रहती है । आज कई लोग प्रश्न खड़ा करते हैं,  कई विज्ञानवादी कहते हैं ईश्वर है कहाँ ? क्या सारी घटित बातें विज्ञान के माप पर चलती हैं । विज्ञान का आधार क्या है ? अनुमान ही न ! शून्य क्या है अक्षाँस और देशांन्तर रेखाएं कोई खींच कर बता सकता है ? बिन्दु और सरल रेखा का आधार क्या है ? बिन्दु वह है, जिसमें न लम्बाई है न चौड़ाई है । फिर कोई वैज्ञानिक इस बिन्दु को खींच सकता है ? यही बिन्दु वह ईश्वरीय सत्ता का आस्था बिन्दु है । जिसे खींचा नहींमाना और अनुभूत किया जा सकता है । प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहता है- ‘विज्ञान की अपनी अन्तिम खोज करते समय हमें ईश्वर का अस्तित्व समझ में आया ।’ अत: कर्म को कुशलता से और समत्व भाव से जब हम करते हैं तो ‘योग’ होता है । वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए योग करते हैं । आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है । शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम कहा गया है अत: शरीर ठीक होना ही चाहिए किन्तु योग जिस कर्म की बात करता है वह रोटी , कपड़ा , मकान तो हो सकता है किन्तु उसकी यात्रा उसके आगे की है , जहां यह प्रश्न उठाता है की मैं कौन हूँ , कहाँ से आया हूँ कहाँ जाना है ? क्या यह शरीर, कपड़ा और मकान हमारे साथ जायेगा ? फिर क्या इसके की यात्रा भी आगे है ? उत्तर है, जी हैं  । उस यात्रा को समझाने के लिए शरीर की यात्रा को समझना होगा । उसके 24 तत्वों, तीनों गुणों, पंचकोशों को भी समझना होगा । उसमें भू: प्राण, भुवःअपान, स्वःव्यान और मह अन्नं है का परिचय आता है ।  

                             अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: 21 जून, 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया । इस अवसर पर 192 देशों और 47 मुस्लिम देशों में योग दिवस का आयोजन किया गया । इसमें 84 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे । इस अवसर पर भारत ने दो विश्व रिकॉर्ड बनाकर 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्समें अपना नाम दर्ज करा लिया है । पहला रिकॉर्ड एक जगह पर सबसे अधिक लोगों के एक साथ योग करने का बनातो दूसरा एक साथ सबसे अधिक देशों के लोगों के योग करने का ।

                             योग सूत्र: योग सूत्र महर्षि पतंजलि द्वारा रचित है । यह ग्रंथ सूत्रों के रूप में लिखा गया है । सूत्र-शैली भारत की प्राचीन दुर्लभ शैली है, जिसमें विषय को बहुत संक्षिप्त शब्दों में प्रस्तुत किया जाता है । यह चार पदों में- समाधि ,साधनविभूति और कैवल्य  में विभक्त है, जिसमें 195 सूत्र निबद्ध है । इस ग्रंथ में महर्षि पतंजलि ने यथार्थ रूप में योग के आवश्यक आदर्शों और सिद्धांतों को प्रस्तुत किया है । समाधि पाद में 51साधन पाद में 55विभूति पद में 55 और कैवल्य पाद में 34 सूत्र हैं । कुल मिलाकर सम्पूर्ण योग सूत्र 195 सूत्रों में उपलब्ध होता है ।विषय की दृष्टि से चारों अध्यायों की विषय वस्तु को संक्षिप्त रूप से कुछ इस प्रकार समझ सकते हैं-(1) समाधि पाद- समाधि पाद के अन्तर्गतसमाधि से सम्बन्धित मुख्य-मुख्य विषयों को लिया गया है । इस अध्याय में सर्वप्रथम योग की परिभाषा बताई गयी है, जो कि चित्त की वृत्तियों का सभी प्रकार से निरुद्ध होने की स्थिति का नाम है । यहां पर भाष्यों के अन्तर्गत यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि यह योग समाधि है । समाधि के आगे दो भेद- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात बताए गए हैं । दोनों ही प्रकार की समाधियों के अन्तर भेदों को भी विस्तार से बताया गया है । समाधि की स्थिति को प्राप्त करने के साधनों के विषय में भी विस्तार से चर्चा की गयी है । समाधिपाद में यह बतलाया गया है कि योग के उद्देश्य और लक्षण क्या हैं और उसका साधन किस प्रकार होता है। (2) साधनपाद- साधनपाद में क्लेशकर्मविपाक और कर्मफल आदि का विवेचन है। (3) विभूतिपाद-विभूतिपाद में यह बतलाया गया है कि योग के अंग क्या हैंउसका परिणाम क्या होता है और उसके द्वारा अणिमामहिमा आदि अष्ट सिद्धियों की किस प्रकार प्राप्ति होती है। (4)  कैवल्यपाद- कैवल्यपाद मेंकैवल्य या मोक्ष का विवेचन किया गया है। संक्षेप में योग दर्शन का मत यह है कि मनुष्य को अविद्याअस्मितारागद्वेष और अभिनिवेश ये पाँच प्रकार के क्लेश होते हैंऔर उसे कर्म के फलों के अनुसार जन्म लेकर आयु व्यतीत करनी पड़ती है तथा भोग भोगना पड़ता है। 

              पतंजलि ने इन सबसे बचने और मोक्ष प्राप्त करने का उपाय योग बतलाया है और कहा है कि क्रमशः योग के अंगों का साधन करते हुए मनुष्य सिद्ध हो जाता है और अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ईश्वर के संबंध में पतंजलि का मत है कि वह नित्यमुक्तएकअद्वितीय और तीनों कालों से अतीत है और देवताओं तथा ऋषियों आदि को उसी से ज्ञान प्राप्त होता है। योगदर्शन में संसार को दुःखमय और हेय माना गया है । पुरुष या जीवात्मा के मोक्ष के लिये वे योग को ही एकमात्र उपाय मानते हैं । पतंजलि ने चित्त की क्षिप्तमूढ़विक्षिप्तनिरुद्ध और एकाग्र ये पाँच प्रकार की वृत्तियाँ मानी हैजिनका नाम उन्होंने 'चित्तभूमिरखा है। उन्होंने कहा है कि आरंभ की तीन चित्तभूमियों में योग नहीं हो सकताकेवल अंतिम दो में हो सकता है। इन दो भूमियों में संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात ये दो प्रकार के योग हो सकते हैं । जिस अवस्था में ध्येय का रूप प्रत्यक्ष रहता होउसे संप्रज्ञात कहते हैं । यह योग पाँच प्रकार के क्लेशों का नाश करनेवाला है। असंप्रज्ञात उस अवस्था को कहते हैंजिसमें किसी प्रकार की वृत्ति का उदय नहीं होता अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं रह जातासंस्कारमात्र बचा रहता है । यही योग की चरम भूमि मानी जाती है और इसकी सिद्धि हो जाने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

             योगसाधन के उपाय में यह बतलाया गया है कि पहले किसी स्थूल विषय का आधार लेकरउसके उपरांत किसी सूक्ष्म वस्तु को लेकर और अंत में सब विषयों का परित्याग करके चलना चाहिए और अपना चित्त स्थिर करना चाहिए । चित्त की वृत्तियों को रोकने के जो उपाय बतलाए गए हैं, वह इस प्रकार हैं-अभ्यास और वैराग्यईश्वर का प्रणिधान,प्राणायाम और समाधि, विषयों से विरक्ति आदि। यह भी कहा गया है कि जो लोग योग का अभ्यास करते हैंउनमें अनेक प्रकार की विलक्षण शक्तियाँ आ जाती है, जिन्हें 'विभूतिया सिद्धि कहते हैं।  यम, नियमआसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान और समाधि ये आठों योग के अंग कहे गए हैंऔर योगसिद्धि   के लिये इन आठों अंगों का साधन आवश्यक और अनिवार्य कहा गया है। 

इनमें से प्रत्येक के अंतर्गत कई बातें हैं । कहा गया है जो व्यक्ति योग के ये आठो अंग सिद्ध कर लेता हैवह सब प्रकार के क्लेशों से छूट जाता हैअनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है और अंत में कैवल्य (मुक्ति) का भागी बनता है। सृष्टितत्व आदि के संबंध में योग का भी प्रायः वही मत है जो सांख्य का हैइससे सांख्य को 'ज्ञानयोगऔर योग को 'कर्मयोगभी कहते हैं।

             भारतीय ज्ञान परम्परा में योग छह आस्तिक दर्शनों में एक है । इसका परिचय भोजवृति और व्यास भाष्य में मिलता है । स्वामी आमानन्द के ‘पातंजलि योग प्रदीप एवं श्री हरिदास गोयन्दका जी का ‘पातंजलि योग दर्शन’ महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं । इनके अतिरिक्त अनेक पुस्तकें योग शास्त्र पर हैं । प्रत्येक योग प्रेमी को योग सीखनेकरने के पूर्व कुछ महत्वपूर्ण शब्दों उनके निहितार्थ को समझना आवश्यक है ।

श्वेताश्वतरोपानिषद कहता है-  ‘

‘यदाऽऽत्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दोपोपमेनेह युक्त: प्रपष्यते।

अजं धु्रवं सर्वतत्वैविशुद्वं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाषै:।।

             जब योगी यहाँ दीपक के सदृश्य (प्रकाशमय) आत्मतत्व के द्वारा ब्रह्म तत्व को भली भांति प्रत्यक्ष देख लेता हैउस समय वह उस अजन्मानिश्चलसमस्त तत्वों से विशुद्व परमदेव परमात्मा को जानकर सब बन्धनों से सदा के लिये छूट जाता है । 

योगशास्त्र से वर्णित साधनों का प्राय: उपनिषदगीताभागवत आदि सभी धर्मग्रंथ समर्थन करते हैं । योगशास्त्र में प्रवृत्ति के चौबीस भेद एवं आत्मा और ईश्वर-इस प्रकार कुल छब्बीस तत्व माने गये हैं । उसमें प्रकृति तो जड़ और परिणामशील है तथा मुक्त पुरुष और ईश्वर- ये दोनों नित्यचेतनस्वंप्रकाशअसंगदेशकालातीत तथा निर्विकार एवं अपरिणामी है । प्रकृति में बँधा पुरुष अल्पज्ञसुख-दु:खों का भोक्ताअच्छी -बुरी योनियों में जन्म लेने वाला और देश कालातीत होते हुए भी एक देशी-सा माना गया है।

             व्यायाम योग : योग मनशरीर और आत्मा का मेल है । एक बार जीवन में जब इन तीनों में  मेल हो जाता हैतो हम पूर्णता की और बढ़ते हैं । व्यायाम योग, योग का प्रथम चरण माना जा सकता हैजिससे शरीर सधता है । हम कोई भी शारीरिक व्यायाम करें उसका गहरा और स्थाई परिणाम होता है । इसलिए अगर व्यवस्थित और चरणबद्ध तरीके से पहले व्यायाम योग फिर आसन और फिर साँस -प्रस्वास आदि क्रियाएं करते हुए चलते हैं, तो योग की दिशा में बढ़ना प्रारम्भ होता है । व्यायाम योग के साथ प्रारम्भ कर योग करेंगे तो योग केवल चित्तमन को ही शांत नहीं करता, बल्कि शरीर को भी  स्वस्थ करता है और शरीर में शक्ति भी बढ़ाता है । व्यायाम योग के पहले शरीर संचालन की क्रिया करनी चाहिए ।  फिर द्रुति गति के व्यायाम योग अपनी क्षमता के आधार पर करना चाहिए । 

             शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ाने के नियम: योग केवल शरीर को खींचना ही नहीं हैशरीर को खींचते रहने से कार्य क्षमता में कमी आती है । योग कामकाजी शक्ति बढ़ाता है जो कि प्रतिदिन के कार्यों में जैसे- उठनाझुकनाबैठनाचलना आदि में सहायता करता है । अधिकतर योग मुद्राएंविपरीत रूप से विशिष्ट श्वास पद्धति के साथ मिलकर केंद्रित और संकुचन की एक श्रृंखला बनाती हैंजो लचीलेपनगतिशीलता और शक्ति में लाभ पैदा करती हैं ।

आष्टांग योग :‘यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।’इनमें पाँच वहिरंग हैं जो इस प्रकार हैं-(1)यम-‘अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:’ (अ) अहिंसा- मनवाणी और शरीर से किसी प्राणी को कभी किसी प्रकार किचिंत मात्र भी दु:ख न देना ‘अहिंसा’ है ।परदोष दर्शन का सर्वथा त्याग भी इसी के अन्तर्गत है । ‘अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:।’ जब योगी का अहिंसा भाव पूर्णतया दृढ़ स्थिर हो जाता है, तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैर भाव से रहित हो जाते हैं । इतिहास ग्रन्थों में जहाँ मुनियों के आश्रमों की शोभा का वर्णन आता हैवहाँ वन जीवों में स्वाभाविक बेर का अभाव दिखलाया गया है । यह उन ऋषियों के अहिंसा भाव की प्रतिष्ठा का द्योतक है। (ब) सत्य- सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम’ जो योगी सत्य का पालन करने में पूर्णतया परिपक्व हो जाता हैउसमें किसी प्रकार की कमी नहीं रहतीउस समय वह स्वयं कर्तव्य पालन रूपी  क्रियाओं के फल का आश्रय बन जाता है । जो कर्म किसी ने नहीं किया हैउसका भी फल उसे प्रदान कर देने की शक्ति उस यागी में आ जाती हैअर्थात जिसको जो वरदानशाप या आशीर्वाद देता हैवह सत्य हो जाता है । इन्द्रिय और मन से प्रत्यक्ष देखकरसुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया होठीक वैसा ही भाव प्रकट करने के लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरे को उद्वेग उत्पन्न करने वाले जो वचन बोले जाते हैं उनका नाम सत्य है । (स) अस्तेय- ‘अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम’’। जब साधक में चोरी का अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाता हैतब पृथ्वी में जहाँ कहीं भी गुप्त स्थान में पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने प्रकट हो जाते है।  अर्थात उसकी जानकारी में आ जाते हैं। दूसरे के स्वत्व का अपहरण करनाछल से या अन्य किसी उपाय से अन्याय पूर्वक अपना बना लेना ‘स्तेय’ चोरी हैइसमें सरकार की टैक्स की चोरी घूसखोरी भी सम्मिलित है। इन सब प्रकार की चोरियों का अभाव ‘अस्तेय’ है। (द) ब्रह्मचर्य- ‘ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यालाभ:’। जब साधक में ब्रह्मचर्य की पूर्णतया दृढ़ स्थिति  हो जाती है तब उसके मनबुद्धिइन्द्रिय और शरीर में अपूर्व शक्ति का प्रादुर्भाव हो जाता है। साधारण मनुष्य उनकी बराबरी नही कर पाते। मनवाणी और शरीर से होनवाले सब प्रकार के मैथुनों की सब अवस्थाओं में सदा त्याग करके सब प्रकार से वीर्य की रक्षा करना ‘ब्रह्मचर्य’ हैं । ‘‘कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा। सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते’’।। (गरुण.पूर्व.आचार 238.6) अत: साधक को चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थों का सेवन करेन ऐसे दृष्यों को ही मन में लावे तथा स्त्रियों का और स्त्री साहित्य को पढ़े और न ही ऐसे पुरुषों का संग करे जो स्त्री पर आसक्त हों। (ई) अपरिग्रह- अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध:। जब योगी में अपरिग्रह का भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता हैतब उसे अपना पूर्व और वर्तमान जन्म की सब बातें मालूम हो जाती हैं । यह ज्ञान भी संसार में वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरण से छुटकारा पाने के लिए योगसाधना में प्रवृत करने वाला है। अपने स्वार्थ के लिये ममता पूर्वक धनसम्पति और भोग-सामग्री का संचय करना ‘परिग्रह’ हैइसके अभाव का नाम अपरिग्रह है।

             (2) नियम- ‘‘शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा:’’। (क) शौच- जलमृतिकादि के द्वारा शरीरवस्त्र और मकान आदि के मल को दूर करना बाहर  की शुद्वि हैइसके सिवा अपने वर्णाश्रम और योग्यता के अनुसार न्यायपूर्वक धन को और शरीर निर्वाह के लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओं को प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल शुद्ध भोजनादि करना तथा सबके साथ यथा योग्य पवित्र बर्ताव करना यह भी  बाहरी शुद्धि के ही अन्तर्गत है। जपतप और शुद्ध विचारों के द्वारा एवं मैत्री आदि की भावना से अन्त:करण के राग-द्वेषादि मलों का नाश करना भीतर की पवित्रता है। (ख)संतोष- कर्तव्य कर्म का पालन करते हुए उसका जो कुछ परिणाम हो तथा प्रारब्ध के अनुसार अपने-आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस अवस्था और परिस्थिति में रहने का संयोग प्राप्त हो जायउसी में संतुष्ट रहना और किसी प्रकार की भी कामना या तृष्णा न करना संतोष है । (ग) तप- वर्णआश्रमपरिस्थिति और योग्यता के अनुसार स्वधर्म का पालन करना और उसके करने में शारीरिकमानसिक कष्ट सहने की सामर्थ्य ‘तप’ है । (घ) स्वाध्याय- अध्ययन (वेदशास्त्रमहापुरूषों के जीवन चरित्र) तथा ऊँकार आदि किसी नाम का जप ‘स्वाध्याय’ है । (ड) ईश्वर प्राणिधान - ईश्वर के नामगुणलीलाध्यानप्रभाव में अपने को पूर्णत: समर्पित कर देना ईश्वर प्राणिधान है। तपस्वाध्यायईश्वर प्राणिधान के माध्यम से अर्थात नियमों के पालन अथवा क्रियायोग से हम अपने क्लेशों को नष्ट करते हैं या क्लेशों से मुक्त होते हैं।

             (3) आसन :‘यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।’इनमें यमनियमआसनप्राणायामप्रत्याहार, पाँच वहिरंग हैं । आसन  का स्थान तृतीय है, इसके  अंतर्गत-बैठनाबैठने का आधारबैठने की विशेष प्रक्रिया, बैठ जाना इत्यादि  आता है । जबकि गोरक्षपीठ द्वारा प्रवर्तित षडंगयोग (छः अंगों वाला योग) में आसन का स्थान प्रथम है । चित्त की स्थिरताशरीर एवं उसके अंगों की दृढ़ता और कायिक सुख के लिए इस क्रिया का विधान मिलता है ।

              विभिन्न ग्रन्थों में दिए आसन के लाभ - उच्च स्वास्थ्य की प्राप्तिशरीर के अंगों की दृढ़ताप्राणायाम आदि उत्तरवर्ती साधन क्रमों में सहायताचित्त स्थिरताशारीरिक एवं मानसिक सुख दायी आदि । पंतजलि ने मन की स्थिरता और सुख को लक्षणों के रूप में माना है । प्रयत्न शैथिल्य और परमात्मा में मन लगाने से इसकी सिद्धि बतलाई गई है । इसके सिद्ध होने पर द्वंद्वों का प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता। किन्तु पतंजलि ने आसन के भेदों का उल्लेख नहीं किया । उनके व्याख्याताओं ने अनेक भेदों का उल्लेख (जैसे-पद्मासनभद्रासन आदि) किया है । इन आसनों का वर्णन लगभग सभी भारतीय साधनात्मक साहित्य में मिलता है ।

             शरीर को पुष्ट करने वाले मुख्य यौगिक व्यायाम या मुद्राएं- त्रिकोणासनवीरभद्रासनगोमुखासन,  नटराजासन एकपादासनवृक्षासनताडासनउत्कटासन आदि हैंजिन्हें तीन प्रकार से समझा जा सकता है-  बैठकर : पद्मासनवज्रासनसिद्धासनमत्स्यासनवक्रासनअर्ध-मत्स्येन्द्रासनगोमुखासनपश्चिमोत्तनासनब्राह्म मुद्राउष्ट्रासनगोमुखासन । पीठ के बल लेटकर : अर्धहलासनहलासनसर्वांगासनविपरीतकर्णी आसनपवनमुक्तासननौकासनशवासन आदि । पेट के बल लेटकर : मकरासनधनुरासनभुजंगासनशलभासनविपरीत नौकासन आदि । पतञ्जलि के योगसूत्र के अनुसार - ‘स्थिरसुखमासनम्’ अर्थात् सुखपूर्वक स्थिरता से बैठने का नाम आसन है  या जो स्थिर भी हो और सुखदायक अर्थात आरामदायक भी होवह आसन है । इस प्रकार हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि आसन वह है जो आसानी से किए जा सकें तथा हमारे जीवन शैली में विशेष लाभदायक प्रभाव डाले ।

             (4) प्राणायाम (अनुलोम-विलोम:योग के माध्यम से योगी प्राणवायु को अपान वायु में और अपान वायु को प्राण वायु में हवन करते हैं । अन्य लोग परिमित भोजन सेवी होदर प्राण और अपान की गति को रोक कर प्राणायाम करते हुए इन्द्रियों को प्राणों में  हवन करते हैं ।  प्राणायाम अर्थात  प्राणवायु का विस्तार तीन प्रकार से होता है- पूरक, कुम्भक, और रेचक ।  जब वायु नाक और मुख से आती जाती रहती है तब उसे प्राण कहते हैं और जो वायु मल मूत्र को बाहर   निकाल देती है  वह अपान है । प्राण गति को रोकना ही कुम्भक है । पूरक, कुम्भक और रेचक ये तीन प्राणायाम के अंग हैं ।

             अनुलोम का अर्थ सीधा और विलोम का अर्थ उल्टा होता है । यहां पर सीधा का अर्थ है नासिका या नाक का दाहिना छिद्र और उल्टा का अर्थ नाक का बायां छिद्र है । अर्थात अनुलोम-विलोम प्राणायाम में नाक के दाएं छिद्र से सांस खींचते हैंतो बायीं नाक के छिद्र से सांस बाहर निकालते है । इसी तरह यदि नाक के बाएं छिद्र से सांस खींचते हैंतो नाक के दाहिने छिद्र से सांस को बाहर निकालते हैं ।अनुलोम-विलोम प्राणायाम को कुछ योगीगण 'नाड़ी शोधक प्राणायामभी कहते हैं ।  (i) विधि: अपनी सुविधानुसार पद्मासनसिद्धासनस्वस्तिकासन अथवा सुखासन में बैठ जाएं । दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दाएं छिद्र को बंद कर लें और नासिका के बाएं छिद्र से 4 तक की गिनती में सांस को भरे और फिर बायीं नासिका को अंगूठे के बगल वाली दो अंगुलियों से बंद कर दें । तत्पश्चात दाहिनी नासिका से अंगूठे को हटा दें और दायीं नासिका से सांस को बाहर निकालें । अब दायीं नासिका से ही सांस को 4 की गिनती तक भरे और दायीं नाक को बंद करके बायीं नासिका खोलकर सांस को 8 की गिनती में बाहर निकालें । इस प्राणायाम को 5 से 15 मिनट तक कर सकते हैं । (ii) लाभ : फेफड़े शक्तिशाली होते हैं । सर्दीजुकाम व दमा की शिकायतों से काफी हद तक बचाव होता है । हृदय बलवान होता है । गठिया के लिए फायदेमंद है । मांसपेशियों की प्रणाली में सुधार करता है । पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है । तनाव और चिंता को कम करता है । पूरे शरीर में शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाता है । (iii) सावधानियां: कमजोर और एनीमिया से पीड़ित रोगी इस प्राणायाम के दौरान सांस भरने और सांस निकालने (रेचक) की गिनती को क्रमश: चार-चार ही रखें । अर्थात चार गिनती में सांस का भरना तो चार गिनती में ही सांस को बाहर निकालना है । स्वस्थ रोगी धीरे-धीरे यथाशक्ति पूरक-रेचक की संख्या बढ़ा सकते है ।  कुछ लोग समयाभाव के कारण सांस भरने और सांस निकालने का अनुपात 1:2 नहीं रखते । वे बहुत तेजी से और जल्दी-जल्दी सांस भरते और निकालते हैं । इससे वातावरण में व्याप्त धूलधुआंजीवाणु और वायरससांस नली में पहुंचकर अनेक प्रकार के संक्रमण को पैदा कर सकते हैं । अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते समय यदि नासिका के सामने आटे जैसी महीन वस्तु रख दी जाएतो पूरक व रेचक करते समय वह न अंदर जाए और न अपने स्थान से उड़े। अर्थात सांस की गति इतनी सहज होनी चाहिए कि इस प्राणायाम को करते समय स्वयं को भी आवाज न सुनायी पड़े ।

             (5) प्रत्याहार : प्रत्याहार का मतलब है असंगता ।इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना महर्षि पतंजलि के अनुसार जो इन्द्रियां चित्त को चंचल कर रही हैंउन इन्द्रियों का विषयों से हट कर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है । प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है । अतः चित्त के निरुद्ध हो जाने पर इन्द्रियां भी उसी प्रकार निरुद्ध हो जाती हैंजिस प्रकार रानी मधुमक्खी के एक स्थान पर रुक जाने पर अन्य मधुमक्खियां भी उसी स्थान पर रुक जाती हैं । सोते समय  अदि तुम चिंता चिंताओं से घिर जाओ तो तुम्हें नीद नहीं आएगी , ऐसे में मन से आते विचारों को  अलग करना प्रत्याहार है

: ।।

योग का उद्देश्य

 

योग का उद्देश्य :  ‘योग’ शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ हैजुड़ना या एकजुट होना । गीता में योग को दो प्रकार से परिभाषित किया गया है-योग: कर्मसु कौशलम्और समत्वं योग उच्यते। वस्तुत: जब इन दोनों को एक साथ जोड़ा जाए तो उसे योग कहते हैं । इसका परिणाम तब सामने आता हैजब हम -ब्रह्मणि आधायकर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति य:। ब्रह्म का आश्रय और आधार मानकर अपने कार्यों को संपन्न करने से बुद्धि संतुलित बनी रहती है । आज कई लोग प्रश्न खड़ा करते हैं,  कई विज्ञानवादी कहते हैं ईश्वर है कहाँ ? क्या सारी घटित बातें विज्ञान के माप पर चलती हैं । विज्ञान का आधार क्या है ? अनुमान ही न ! शून्य क्या है ? अक्षाँश और देशांन्तर रेखाएं कोई खींच कर बता सकता है ? बिन्दु और सरल रेखा का आधार क्या है ? बिन्दु वह है, जिसमें न लम्बाई है न चौड़ाई है । फिर कोई वैज्ञानिक इस बिन्दु को खींच सकता है ? यही बिन्दु वह ईश्वरीय सत्ता का आस्था बिन्दु है । जिसे खींचा नहींमाना और अनुभूत किया जा सकता है । प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहता है- विज्ञान की अपनी अन्तिम खोज करते समय हमें ईश्वर का अस्तित्व समझ में आया ।अत: कर्म को कुशलता से और समत्व भाव से जब हम करते हैं तो योगहोता है ।

 वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए योग करते हैं । आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है । 'शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम' कहा गया है अत: शरीर ठीक होना ही चाहिए किन्तु योग जिस कर्म की बात करता है, वह रोटी , कपड़ा , मकान तो हो सकता है किन्तु उसकी यात्रा उसके आगे की है , जहां यह प्रश्न उठाता है की मैं कौन हूँ , कहाँ से आया हूँ कहाँ जाना है ? क्या यह शरीर, कपड़ा और मकान हमारे साथ जायेगा ? फिर क्या इससे की यात्रा भी आगे है ? उत्तर है, जी है 

 उस यात्रा को समझने के लिए शरीर की यात्रा को समझना होगा । उसके 24 तत्वों, तीनों गुणों, पंचकोशों को भी समझना होगा । उसमें भू: प्राण, भुवः,अपान, स्वःव्यान और मह अन्नं है का परिचय आता है ।

 भारतीय ज्ञान परम्परा में योग-

             भारतीय ज्ञान परम्परा में योग छह आस्तिक दर्शनों में एक है । इसका परिचय भोजवृति और व्यास भाष्य में मिलता है । स्वामी आमानन्द के पतंजलि योग प्रदीप एवं श्री हरिदास गोयन्दका जी का पतंजलि योग दर्शनमहत्वपूर्ण ग्रंथ हैं । इनके अतिरिक्त अनेक पुस्तकें योग शास्त्र पर हैं । प्रत्येक योग प्रेमी को योग सीखनेकरने के पूर्व कुछ महत्वपूर्ण शब्दों उनके निहितार्थ को समझना आवश्यक है ।

श्वेताश्वतरोपानिषद कहता है-

  ‘‘यदाऽऽत्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दोपोपमेनेह युक्त: प्रपष्यते। 

अजं ध्रुवम सर्वतत्वैविशुद्वं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाषै:।।

       जब योगी यहाँ दीपक के सदृश्य (प्रकाशमय) आत्मतत्व के द्वारा ब्रह्म तत्व को भली भांति प्रत्यक्ष देख लेता हैउस समय वह उस अजन्मानिश्चलसमस्त तत्वों से विशुद्व परमदेव परमात्मा को जानकर सब बन्धनों से सदा के लिये छूट जाता है । 

योगशास्त्र से वर्णित साधनों का प्राय: उपनिषदगीताभागवत आदि सभी धर्मग्रंथ समर्थन करते हैं । योगशास्त्र में प्रकृत्ति के चौबीस भेद एवं आत्मा और ईश्वर-इस प्रकार कुल छब्बीस तत्व माने गये हैं । उसमें प्रकृति तो जड़ और परिणामशील है तथा मुक्त पुरुष और ईश्वर- ये दोनों नित्य,  चेतनस्वंप्रकाशअसंगदेशकालातीत तथा निर्विकार एवं अपरिणामी है । प्रकृति में बँधा पुरुष अल्पज्ञसुख-दु:खों का भोक्ताअच्छी -बुरी योनियों में जन्म लेने वाला और देश कालातीत होते हुए भी एक देशी-सा माना गया है। 


Sunday, 4 August 2024

म प्र उच्च शिक्षा के व्यावहारिक नवाचार

 

उच्च शिक्षा के व्यावहारिक नवाचार

(नवाचार में उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश के बढ़ते क़दम)

              उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश में 16 शासकीय , 50 अशासकीय ( लिखते तक दो चार और खुल गये हों तो आश्चर्य नहीं)सहित कुल 56 विश्वविद्यालय संचालित है । प्रदेश में  शासकीय और अशासकीय सहित कुल 1360 महाविद्यालय संचालित है। जिनमें  तीन सौ से ऊपर  पाठ्यक्रम  प्रचलित है तथा 14.85 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत है । 


उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश शासन की राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के क्रियान्वयन में तीन साल पूरे होने पर  तीन अच्छी पहल का जिक्र कर आगे नवाचारों पर बात रखूंगा ।

 उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश प्रदेश के हर जिले में स्थापित अग्रणी महाविद्यालयों को नया नाम "प्रधानमंत्री कॉलेज आफ एक्सीलेंस" दिया गया है। दूसरा - एन सी सी को मुख्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में जोड़ा जा रहा है ।  तीसरा - शैक्षणिक सत्र 2024-25 से एबिएशन सेक्टर स्किल कौंसिल के सर्टीफिकेट कोर्स (कुछ महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में ) प्रारम्भ किया जा रहा है ।

              गत वर्ष हैदराबाद में आयोजित इंटरनेशनल एजुकेशन समिट में प्रदेश के  उच्च शिक्षा विभाग को डिजिटल लर्निंग के माध्यम से किए गए नवाचारों के लिए पुरस्कृत किया गया है । इसी प्रकार कलकत्ता में आयोजित नेशनल इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजी समिट में भी मध्य प्रदेश को शिक्षा एवं कौशल के क्षेत्र में डिजिटल इनिशियेटिव्स के लिए पुरुस्कृत किया गया है ।

सरकार ने प्रदेश के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार एवं कौशल उन्नयन के अवसर उपलब्ध कराने के लिए हर संभव प्रयास किए हैं , ताकि प्रदेश का हर युवा आत्मनिर्भर बनकर मध्य प्रदेश को सबसे आगे ले जाने में अपना योगदान दे सके। 

              एन सी सी को मुख्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम - संभवतः देश का ऐसा राज्य है जहाँ एन सी सी को मुख्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा । मिलेगा रोजगार। नगर सैनिक से रक्षा के सभी क्षेत्रों तक प्राप्त कर सकेंगे सेवा का अवसर।युवा हितैषी निर्णय के लिए सरकार को साधुवाद। एन एस एस के लिए भी इसी तरह की पहल हो ताकि उसमें सभी इक्छुक विद्यार्थी विषय को पढ़ सकें। 

              ई.फाइल - एक दिन में आयुक्त के पास पहुंची चालीस से अधिक ई.फाइल । गत वर्ष संचालनालय उच्च शिक्षा के सभी कर्मचारियों / अधिकारियों को एन आई सी के सहयोग से ई-फाइल तैयार करने हेतु प्रशिक्षण दिया गया है । नई व्यवस्था के कारण एक और जहॉं काम में गति आएगी वही दूसरी तरफ नस्तियों का शीघ्र संधारण हो सकेगा एवं शासकीय कार्य में पारदर्शिता बढ़ेगी।

      राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान- राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान एक केंद्र प्रवर्तित योजना है जो वर्ष 2013 में राज्य के उच्च शैक्षणिक संस्थानों को चरणबद्ध तरीके से वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से आरम्भ की गयीl जिसका मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा की पहुंच, गुणवत्ता एवं समानता के अवसर सुनिश्चित करना है। रूसा के माध्यम से शैक्षणिक संस्थाओं को अनुदान एवं अधोसंरचना प्रदान करते हुये अकादमिक गुणवत्ता सुनिश्चित गई है। रूसा कार्ययोजना के तहत उच्च शिक्षा का विकास, गुणवत्ता वृद्धि के साथ-साथ ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की पहुँच एवं कमजोर वर्ग तथा महिलाओं को समान रूप से उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना है। इसके लिए ग्राम दर्शन (एन एस के मध्यम से ) योजना तैयार कर विद्यार्थियों को भावनात्मक रूप से जोड़ा जा रहा है  

              उच्च शिक्षा ऋण गारंटी योजना - प्रदेश में निम्न आय वर्ग के मेधावी विद्यार्थी को उच्च शिक्षा ऋण प्राप्त करने में कठिनाई होती है क्योंकि बैंकों द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक (4 लाख ) ऋण प्राप्त करने पर कोलेटरल सिकुरिटी मांगी जाती है निम्न आय वर्ग के विद्यार्थी के लिए भूमि, भवन,आदि की गारंटी दे पाना संभव नहीं होता है  अत : ऐसे गरीब मेधावी विद्यार्थियों  को सरकार गारंटी पर ऋण उपलब्ध कराती है इसमें चिकित्सा, अभियांत्रिकी, और आयुष आदि की पढ़ाई के लिए प्रयेक वर्ष 200 विद्यार्थियों को सहायता दी जाती है इस नवाचार के द्वारा उच्च शिक्षा विभाग की पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के माध्यम से प्रदेश के हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा, रोजगार एवं खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर प्राप्त हुए हैं । विभाग की  विदेश अध्ययन छात्रवृति योजना के माध्यम से प्रदेश की छह छात्राओं को ऑस्ट्रलिया, यूके  के विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने अवसर प्राप्त हुआ है ।

                  यूथ महापंचायत एवं खेलो इण्डिया - शहीद दिवस और स्वामी विवेकानद के जन्म जयंती पर विगत वर्षों से ऐसे विद्यार्थियों जिन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत से प्रदेश का मान बढ़ाया है उनके कार्य को सामने लाने के लिए यूथ महापंचायत आयोजित हो रहे हैं । यह एक तरह का शहीदों को नमन और उनके उत्सर्ग को स्मरण करने आ नवाचार है ।

 इसी तरह प्रत्येक वर्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा के चयनित विद्यार्थियों  यंग अचीवर्स का सम्मान कार्यक्रम होता है । इस नवाचार में विद्यार्थी सफल  छात्रों से अपनी जिज्ञासा शांत करते हैं। 

युवा पंचायत में युवाओं के द्वारा दिए गए सुझावों को समाहित  कर युवा नीति लॉन्च की गई। यह युवाओं के लिए युवाओं द्वारा बनाई गई नीति देश भर के लिए अनुकरणीय पहल है।

खेलो इंडिया अंतर्गत प्रदेश में पहली वार  22 अंतरराष्ट्रीय तथा 05 पारंपरिक खेल विधाओं  सहित कुल 27 प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया  । इन प्रतियोगिताओं में 1280 पदकों का वितरण किया जाना प्रस्तावित है । इन प्रतियोगिताओं में 10500  खिलाड़ियों के द्वारा सहभागिता की जायेगी।

              लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम से प्रशिक्षण - देश का पहला प्रदेश है जो न केवल राष्ट्रीय शिक्षा नीति का सबसे पहले लागू करने वाला राज्य बना बल्कि उसने इसके मापदंडों और दिशा निर्देशों के अनुसार अपने यहाँ शिक्षक, विद्यार्थियों  के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की। यह भी उल्लेखनीय है की उच्च शिक्षा विभाग ने अलग-अलग यथा- ई- पाठ्यक्रम निर्माण, ई लाइब्रेरी, रोजगार, स्वरोजगार के लिए देश की ऐसी संस्था से प्रशिक्षण कराया जहाँ से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं  उच्च शिक्षा विभाग द्वारा लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से प्रदेश के विद्यार्थियों को नए पाठयक्रम के अनुसार सभी विषयों की जानकारी उपलब्ध कराती है। इस हेतु प्रदेश के प्राध्यापकों को प्रशिक्षित किया गया है।

              स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन योजना के माध्यम से शासकीय महाविद्यालय में अध्ययनरत 2 लाख, 41 हजार विद्यार्थियों को एलएमएस के माध्यम से प्रशिक्षण प्रदान किया गया है । यह प्रशिक्षण भारत सरकार और प्रशासन अकादमी के माध्यम से हुआ जो उल्लेखनीय प्रयास है, जिसमें विद्यार्थीं उस महत्वपूर्ण संस्था से प्रशिक्षण प्राप्त किये जहाँ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी प्राप्त करते हैं ।  

              एआईएसएचई के माध्यम से डाटा प्रविष्ट -  AISHE कोड की अनिवार्यता को देखते हुए शिक्षा संस्थानों को भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत आने वाले शिक्षा संस्थान ; IIFM, IITTM, राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान –IISER, AIIMS, IIT आदि के नोडल अधिकारियों का विभाग से समन्वय कर डाटा प्रविष्टि कराई है,  प्रदेश  के उच्च शिक्षा संस्थानों के डाटा प्रविष्ट के कार्य में मप्र ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है । 

  म.प्र. देश में 22वें स्थान से 17वें स्थान पर आ गया।  यह योजना के साथ नवाचार कर बहुत बड़ी उपलब्धि हांसिल की है ।  इस डाटा बेस का इस्तेमाल कई बार यूनेस्को, डब्ल्यूएचओ जैसे  विश्वस्तरीय संगठन भी करते हैं। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि मप्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग की छात्राओं के नामांकन में उल्लेखनीय वृद्वि हुई । इसके लिए निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं  

            इन्क्युवेशन केन्द्रों की स्थापना -उच्च शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश के सभी शासकीय और निजी विश्वविद्यालयों तथा स्वायत्तशासी संस्थानों में इन्क्यूबेशसेंटर्स स्थापित किये जा रहे हैं । जहां विद्यार्थियों को स्टार्टअप विकसित करने के लिए विशेषज्ञ एवं सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

              राज्य स्तरीय नैक प्रकोष्ट (SLNC)स्थापना - नैक प्रत्यायन एवं बेहतर ग्रेड के लिए मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग ने नवीन पहल करते हुए नैक मूल्यांकन के पूर्व तैयारी के लिए अपने प्रदेश में राज्य स्तरीय नैक प्रकोष्ट (SLNC ) स्थापना किया है। SLNC प्रदेश का नया प्रयोग है। इससे शिक्षा में सुधार तथा संस्थनों को A+ तथा A++ की प्राप्ति हो रही है । इससे हमारा विद्यार्थी प्रदेश में ही मानक शिक्षा प्राप्त कर सकेगा । उज्जैन के शासकीय माधव विज्ञान महाविद्यालय को A++ (देश का पहला शासकीय महाविद्यालय है जिसे A++) नैक प्रत्यायन की वजह से महाविद्यालयों को छात्र उपयोगी सभी आधारभूत संरचनाए  प्रदान की  जा रही है । 

महाविद्यालयों को नैक प्रकोष्ट के प्रयासों से विश्व बैंक परियोजना की सहायता से ओपन जिम , लैब उपकरण , e– ग्रंथालय , स्मार्ट क्लास इत्याति आधुनिक सुविधाएँ प्रदान की जा रहीं है । 

Enriching Thursday नमक कार्यक्रम के माध्यम से नित नए पहल जैसे - हरित वसुंधरा, आंतरिक निगरानी समिति, अलुम्नाई मीट, अकादमिक एवं प्रशासनिक आडिट के लिए विशेषज्ञों के प्रेरक उद्वोधन होते हैं ।

 महाविद्यालय में विद्यार्थियों को प्रदान किए जाने वाले रिसर्च वर्क एवं तकनीकी प्रशिक्षण के साथ कनीकी प्रशिक्षण, प्रोजेक्ट वर्क, इंर्टनशिप , औद्योगिक भम्रण, व्यक्तित्व विकास एवं वोकेशनल कोर्सेस की जानकारी जाती है ।

 महाविद्यालयों को ओपन जिम, लैब उपकरण, ग्रंथालय, स्मार्ट क्लास आदि आधुनिक सुविधाएँ भी प्रदान की जा रहीं है । इसके साथ ही ऑनलाइन व्यवसायिक ,रोजगार मेलों का भी आयोजन किया जा रहा है ।

इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को बहु विषयक शिक्षा का लाभ मिल रहा है । साथ ही  स्थानीय आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए 35 से अधिक व्यावसायिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं ।

              विगत दो वर्षों में 43000 हजार विद्यार्थियों को  रोजगार और स्वरोजगार प्राप्त हो चुका है । कौशल विकास एवम् उन्नयन में 2.60 लाख विद्यार्थी पंजीकृत है । जिनको प्रशिक्षित किया गया है ।फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम में 8000 हजार शिक्षकों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया पंजीकृत है । यह   प्रशिक्षण स्वामी विवेकानंद करिएर मार्गदर्शन योजना के माध्यम किया गया है ।

साथ ही स्वामी विवेकानंद करिएर मार्गदर्शन योजना के माध्यम से शासन के सात विभागों से एम् ओ यू किया गया है , जो  विद्यार्थिओं को राजगार और स्वरोजगार में सहयोगी सिद्ध ही रहा है ।

              मध्यप्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी के नवाचार - बता दें मध्य प्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी उच्च शिक्षा विभाग का स्वायत्तशासी उपक्रम है। वर्षों से यहाँ केवल पाठ्यक्रम आधारित पुस्तक छापने का कार्य होता रहा है किन्तु विगत तीन वर्षों में यहाँ उल्लेखनीय नवाचार हुए हैं, जिसने उच्च शिक्षा मध्यप्रदेश का देश भर में नाम और मान बढाया है । उच्च शिक्षा विभाग के साथ मिलकर प्रदेश के सभी शासकीय महाविद्यालयों में हिंदी दिवस पर विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के लिए एक साथ क्रमशः महाविद्यालय स्तर, जिला स्तर, विश्वविद्यालय स्तर तक प्रतियोगिताएं सम्पन्न हुई जिसमें पहली वार प्रदेश के दूरस्थ के विद्यार्थियों ने प्रथम स्थान प्राप्त किया । 

इसके साथ प्रदेश और देश के विश्वविद्यालयों के साथ एमओयू कर हिंदी ग्रन्थ अकादमी के पुस्तकालय विश्वविद्यालयों के परिशर में स्थापित किये गए, जिससे छात्र सहजता से पुस्तकें प्राप्त कर रहे हैं । 

राष्टीय शिक्षा नीति और उसके पाठ्यक्रम तथा पुस्तक निर्माण में भी नवीन प्रयोग कर उल्लेखनीय कार्य किया है । राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के भिभिन्न आयामों जैसे प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास चरित्र निर्माण आदि की अनेक पहलुओं के साथ अनेक चिकित्सा और अभियांत्रिकी की पुस्तकों का निर्माण कराये जाने की पहल उल्लेखनीय कार्य है । प्रदेश के ऐसे छात्रों के लिए जो संघ लोक सेवा आयोग और प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रतियोगिता परीक्षा में बैठना चाहते है उन्हें ज्ञान वर्धन और अद्यतन जानकारी के साथ पुस्तकें दी जा रहीं हैं ।

              उक्त सभी नवाचारों  को और प्रयोगधर्मी तथा प्रभावी बनाने के लिए अभी बहुत कुछ करना शेष है ,जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है शिक्षकों की पूर्ति। फिर भी यह कहने में कोई संकोच नहीं की मध्यप्रदेश जैसा भी है अन्य प्रदेशों की तुलना में बहुत आगे बढ़ा है ।

   

Umeshksingh58@gmail.com

Thursday, 1 August 2024

जाति न पूछो साधु की

कल ही उच्च शिक्षा की चर्चा करते हुए मैंने आग्रह किया था कि यदि आरक्षण में सही गरीब, उपेक्षितों को लाभ देना है तो आरक्षण का युक्तियुक्तकरण होना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी इस बात को स्वीकार करता है कि आरक्षण का लाभ जाति के आधार पर देने से जाति के अंदर के अंतिम पायदान पर खड़े निर्धन को धन और मान कब मिलेगा?

जाति के सच को भी समझें -

सिद्धांत और व्यवहार -
जाति न पूछो साधु की,पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार की पड़ी रहन दो म्यान।।

फिर भी -
व्यवहार - बाल्मीकि -ब्राह्मण- शूद्र?
तुलसी ब्राह्मण, कबीर -जुलाहा, हिंदू या मुसलमान?

राष्ट्रपति -दलित, पिछड़ा!
प्रधानमंत्री -पंडित जवाहरलाल, लाल बहादुर शास्त्री (कायस्थ - जाति व्यवस्था में यह कौन-सी जाति है?), पिछड़ा आदि आदि।

अनुसंधानकर्ताओं के शोधग्रंथों को भी देखें।
विद्या निवास मिश्र बिना पंडित के अधूरे हैं ?
मुख्यमंत्री, न्यायाधीश, कलेक्टर, आयुक्त सभी की तो जाति के आधार पर फील्ड में पदस्थापना होती है।

मुख्यमंत्री से मंत्री तक के प्रमुख सचिव, सचिव,, विशेष सहायक की तलाश करिये। बिना जाति के विश्वास ही नहीं।

इसके अतिरिक्त खाने वाले दांत तो अजाति,कुजाति,विजाति भी चलते हैं!

 कल एक नई जाति टी वी में सुना -टोटी चोर। दूसरे ने कहा -चायवाला? क्या यह भी जातियां हैं?

दर असल कोई नहीं पूछता मोलतजा है, बेहना है-मैमल ,पंगल , मैमल ( शेख ) ,जोलहा (मोमिन और अंसारी ) ,मारिया (एम-बीसी) , धुनिया (मुस्लिम) {शेख मंसूरी} ...अशराफ़', 'अजलाफ़', और 'अरज़ाल कौन हैं ?

आंध्र ईसाई, अक्कासलिगा ईसाई, बंजारा ईसाई, बेस्टारू ईसाई, बिलवा ईसाई, ब्राह्मण ईसाई, एडिगा ईसाई, गोला ईसाई, गौडी ईसाई, गौडी ईसाई, होलेया ईसाई, जंगमा ईसाई, कम्मा ईसाई, कुरुबा ईसाई, लमनी ईसाई, लम्बानी ईसाई आदि कहां से आये हैं? जनगणना से 
प्रोटेस्टेंट, कैथोलिक ग़ायब।  

आर्थिक परिस्थिति, सामाजिक स्थिति क्या है, जनसंख्या कितनी हैं?
फिर भी अल्पसंख्यक हैं! आरक्षण चाहिए ?

अल्पसंख्यकों के नाम पर शिक्षा में छूट। अल्पसंख्यकों के विद्यालय से विश्वविद्यालय तक पढ़ने वाले बहुसंख्यक?

फिर चर्चा दलित, पिछड़ा,अति दलित की ही क्यों?

बंचित, दलित भी बंचिका की तरह एक अलग कहानी कहते हैं।

गरीब और उपेक्षित की चिंता कौन करेगा? 

क्या यह जाति की लड़ाई हिंदुत्व को जिंदा रखने वालों को नष्ट-भ्रष्ट करने का सोचा समझा एजेंडा है?

देश के बजट तैयार करने में भी जाति?
मज़े की बात जब भी संसद में भाषण होता है तो कहा जाता है वे इस मुद्दे पर 'राजनीति' कर रहे हैं तो वे दूसरे मुद्दे पर।

क्या सचमुच 'राजनीति' शब्द का अर्थ 'षणयंत्र' के लिए रूढ़ हो रहा है। क्या यह आसन्न खतरा नहीं?