Sunday, 10 March 2024

अक्षर अर्थ

 

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि ।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥

अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली सरस्वती और गणेश की मैं वंदना करता हूँ ॥

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥

श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप पार्वती और शंकर की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम् ।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥

ज्ञानमय, नित्य, शंकर रूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥

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स्मरणीय बातें –  जय जवान ,जय किसान ,जय विज्ञान,जय अनुसंधान । 

पञ्च प्रण:

+भारत को विकसित देश बनाना है

+जीवन से गुलामी का अंश मिटाना है । 

+हमें विरासत पर गर्व हो

+एकता और एकजुटता पर जोर । 

 +नागरिक के कर्तव्य पर जोर

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भारतीय ज्ञान परम्परा में ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की बात कही गई है । शिक्षा और विद्या के अंतर को जीवन का लौकिक और पर लौकिक विकास समझना चाहिए । जीवन के पुरुषार्थ को विद्या के माध्यम से साधा जा सकता है और उसका प्रवेश द्वार है,‘शिक्षा’ ।

भारत में गुरुकुल परंपरा प्राचीन काल से भारत के सत्य को जानने को प्रयत्नशील है । भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक पुरुषार्थ में, सनातन धर्म की साधना में, कोमलता में, ऋजुता में, विवेक में, धर्म और श्रेष्ठ कार्य में,  ईश्वरीय उपासना के माध्यम से बौद्धिक चेतना के जागरण का राजसूय यज्ञ कराती है । बौद्धिक आलस्य को छोड़कर हमें पुरुषार्थ करना होगा, इतिहास को समझना होगा,  इसके  लिए कठोर बौद्धिक परिश्रम करने की आवश्यकता है । हमारी गुरु परंपरा इसके लिए हमें प्रेरणा देती है ।

बोध वाक्य:जब तक समाज में आजकल की प्रचलित सभी कुरीतियों के विरुद्ध जबरदस्त आंदोलन न होगा, कुरीतियों पर जबरदस्त कुठाराघात न होगा, तब तक न तो समाज में समानता का भाव आएगा और न उसका कल्याण होगा।”-शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी

 प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहता है- ‘विज्ञान की अपनी अन्तिम खोज करते समय हमे ईश्वर का अस्तित्व समझ में आया।’

बोध वाक्य: “पंथ, संप्रदाय, मजहब अनेक हो सकते हैं, परंतु धर्म तो एक ही होता है । यदि पंथ- संप्रदाय उस ईश्वर की उपासना के लिए प्रेरणा देते हैं तो ठीक अन्यथा महाशक्ति का बाना पहनकर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना न ईश्वर भक्ति है न  धर्म।”-शहीद रामप्रसाद बिस्मिल

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नौमी भौम बार मधुमासा । 

अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । 

तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं ॥

              चैत्र मास की नवमी तिथि मंगलवार को अयोध्या में यह चरित्र प्रकाशित हुआ । जिस दिन श्री रामजी का जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ चले आते हैं ॥

रचि महेस निज मानस राखा । 

पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥
तातें रामचरितमानस बर । 

धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥

              महादेव जी ने इस कथा को अपने मानस में रच रखा था और समय आने पर उसको  पार्वती जी को सुनाया, इसीलिए इस ग्रन्थ का नाम रामचरितमानस रखा है ॥

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा ।

 गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा  ॥
अगुन अरूप अलख अज जोई ।

 भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥

              मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं कि सगुण और निर्गुण में कोई भेद नहीं है जो अलख और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है ॥

नेति नेति जेहि बेद निरूपा । 

निजानंद निरुपाधि अनूपा ॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। 

उपजहिं जासु अंस तें नाना ॥

ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई ।

 भगत हेतु लीलातनु गहई ॥

             जिन्हें वेद यह नहीं, यह भी नहीं निरूपित करते हैं, जो आनन्द स्वरुप हैं, जिनके अंश से शिव, ब्रहमा और विष्णु उत्पन्न होते हैं, ऐसे प्रभु सेवक और भगत के लिए शरीर धारण करते हैं ॥

नौमी तिथि मधु मास पुनीता । 

सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा ।

 पावन काल लोक बिश्रामा ॥

              पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि, शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित् मुहूर्त था । दोपहर का समय न बहुत सर्दी, न धूप थी वह समय सब लोक को शांति देने वाला था ॥

बोध वाक्य-मैं एक ऐसे धर्म में विश्वास करता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का प्रचार करता है।- चंद्रशेखर आजाद

एषाम् न विद्या न तपो न दानम् ज्ञानम् न शीलम् न गुणो न धर्म: ।

ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

 

                  जो व्यक्ति शिक्षित नहीं है, जो परिश्रम करने के लिए तैयार नहीं है, जो अपने पास जो कुछ भी दान नहीं करता है, जिसके पास ज्ञान नहीं है, जिसके पास अच्छे चरित्र, अच्छे गुण नहीं हैं और जो धर्म का पालन नहीं करता है, ऐसा व्यक्ति इस धरती पर सिर्फ एक बेकार व्यक्ति है, वह किसी भी अन्य जानवर की तरह अच्छा है।

बोध वाक्य: “भारत माता के रंगमंच का अपना पार्ट हम अदा कर चुके हैं । हमने गलत  सही जो कुछ किया,वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया । हमारे इस काम की कोई प्रशंसा करेंगे और कोई निंदा । किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ेगी।”-शहीदअशफाक उल्ला खां

भारति, जय, विजयकरे !
कनक-शस्य-कमलधरे !
लंका पदतल शतदल
गर्जितोर्मि सागर-जल,
धोता-शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे ।

या  निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

       सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है॥

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं -समुद्रमापः  प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।

तद्वत्कामा  यं   प्रविशन्ति  सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

       जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं॥

बोध वाक्य   “ वन की अग्नि चंदन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकता है। – चाणक्य

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
 

सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका   जीवन  हरियाली  पर,   मंगल  कुंकुम  सारा।।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।

यज्ञाद्भवति  पर्जन्यो  यज्ञः  कर्मसमुद्भवः ॥

              सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा की उत्पत्ति यज्ञ सम्पन्न करने से होती है और यज्ञ की उत्पत्ति नियत-कर्म (वेद की आज्ञानुसार कर्म) के करने से होती है ।

यद्यदाचरति  श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

              महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य मनुष्य भी उसी का ही अनुसरण करते हैं, वह श्रेष्ठ-पुरुष जो कुछ आदर्श प्रस्तुत कर देता है, समस्त संसार भी उसी का अनुसरण करने लगता है ।

बोध वाक्य– “ मैने अनुभव किया है कि आंतरिक संतोष-सहानुभूति और करुणा से प्राप्त होता  है । हम दूसरों की जितनी मदद करेंगे उतनी अधिक खुशी महसूस करेंगे । मन में दूसरों के लिए अच्छी भावनाएं आएंगी तो मन शांत होगा । भीतर का भय और असुरक्षा बहुत कम होगा । भीतरी ताकत बढ़ेगी। यही सफलता का मूल मंत्र है ।”-संत दलाई लामा

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट !
मेरे  भारत  के  दिव्य भाल ! मेरे नगपति ! मेरे विशाल !
-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त, युग-युग गर्वोन्नत, नित महान,
निस्सीम  व्योम  में तान  रहायुग  से किस महिमा का वितान?
कैसी अखंड यह चिरसमाधि! यतिवर  कैसा यह अमर ध्यान?
तू  महाशून्य  में  खोज रहा किस  जटिल समस्या का निदान ?
उलझन  का  कैसा  विषम  जाल  ? मेरे  नगपति मेरे विशाल !   
तू पूछ, अवध से, राम कहाँ? वृन्दा ! बोलो, घनश्याम कहाँ?
ओ मगध ! कहाँ  मेरे अशोक ? वह चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ ?
री  कपिलवस्तु !  कह,बुध्ददेव के वे मंगल - उपदेश कहाँ ?
तिब्बत,  इरान,  जापान,चीन  तक  गये  हुए  सन्देश  कहाँ?
प्राची के प्रांगण-बीच देख, जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल,
तू  सिंहनाद  कर  जाग  तपी ! मेरे  नगपति !  मेरे  विशाल !
कह  दे  शंकर  से, आज  करें वे प्रलय-नृत्य  फिर  एक बार।
सारे  भारत   में  गूँज उठे ,'हर-हर-बम'  का  फि र महोच्चार।
ले  अंगडाई  हिल  उठे  धराकर निज विराट स्वर में निनाद
तू   शैली   विराट हुँकार  भरे  फट  जाए कुहा, भागे प्रमाद
तू  मौन  त्याग,कर सिंह नाद रे तपी आज तप का न काल

नवयुग- शंखध्वनि   जगा  रही तू जाग, जाग, मेरे  विशाल!

बोध वाक्य –“अध्यापक का कार्य केवल तात्कालिक शिक्षण या परीक्षा में अच्छे अंक अर्जित करने के लिए प्रेरित करना ही नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसे मूल्य सिखाना भी है, जो उनका चरित्र निर्माण कर सकें, जो स्थाई हो और विद्यार्थी को जीवन में सफल बनने में मदद करें ।”-  डॉ अब्दुल कलाम

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।

 सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति । ।

              जिस प्रकार आकाशसे गिरा जल विविध नदियों के माध्यम से अंतिमत: सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओंके लिए किया हुआ नमन एक ही परमेश्वरको प्राप्त होता है ||

चिरविजय की कामना ले , कर्म पथ पर चल  तरूण मन।

संगठन  की  साधना  में ,प्राण  अर्पित  और   तन- मन ।।

 

पतित   पावन   राम  ने   थे , गिरी   अरण्य महान   घूमे ।

छोड़कर    माया   अवध   की , ऋषिजनों  के  पांव  चूमे ।

दीं   दुखियों   पर   दया    के , अश्रु  कण छलके वरुण वन ।

चिर विजय …………

 

 

भक्ति   का   धुव   भाव  लेकर , बढ़ चलो तुम ध्येय पथ पर ।

पवन   सूत   की  शक्ति   लेकर , बढ़  चलो  तुम गेय बनकर।

फिर  उदित  इठला  रहा  है , आज  राघव  के   नयन   बन  ।

चिर विजय …………

 

टूट    विद्युत  के   पड़ो   तुम ,राक्षस  की   वृत्तियों  पर ।

गिर   पड़ो  तुम  आज  फिर से , वज्र  बन  आपत्तियों पर ।

पाश   नागों   के  चले  है , काट   डालो   तुम  गरुड़  बन ।

चिर विजय …………..

अपाने  जुह्वति  प्राणं  प्राणेऽपानं  तथापरे ।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥

अपरे  नियताहाराः  प्राणान्प्राणेषु  जुह्वति ।

सर्वेऽप्येते  यज्ञविदो  यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥

              दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ॥

श्रद्धावाँल्लभते  ज्ञानं  तत्परः  संयतेन्द्रियः ।

ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

              जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ॥

बोध वाक्य : “जिसके हृदय में हरि का निवास नहीं है, वह तो सूने घर के समान है। ईश्वर की शक्ति से ही समस्त जगत प्राणमय है । उसकी गति विचित्र है, वह किसी से भी किसी समय अलग नहीं है। ईश्वर का नाम ही भवसागर से पार उतारने में समर्थ है।”- संत रज्जब

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥

यह मेरा है, वह उसका है जैसे विचार केवल संकुचित मस्तिष्क वाले लोग ही सोचते हैं ।


यम-‘अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:’

(2) नियम- ‘‘शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा:’’।

बोध वाक्य : “ अपार संपत्ति एकत्र करना अथवा योगी बनकर शरीर में भस्म लगाना, पांच प्रकार की अग्नि को सहना  या समुद्र के आर पार के राज्य को जीत लेना, अनेक प्रकार के तप और संयम करना, हजारों तीर्थों की यात्रा करना आदि व्यर्थ है, यदि नंदकुमार श्री कृष्ण से प्रेम ना किया और उनका दर्शन ना किया ।”- रसखान

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।

 

 


Wednesday, 28 February 2024

भारतीय ज्ञान परम्परा को कैसे प्राप्त करें

उच्च शिक्षा विभाग की छोटी -छोटी समस्याएं -दस हजार एजीपी, पदोन्नति सक्षम प्राचार्य, कुलपति, रजिस्ट्रार नियुक्त हों, चापलूसी और अवसर वादिता खत्म हो, सलाहकारों की करनी कथनी एक हो तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ज्ञान परम्परा स्वत: लागू होती जायेगी ।

विभाग विद्वानों की (तथाकथित विद्वानों की नहीं अर्थात पदेन कुलपतियों, आयातित-प्रदेश के बाहर के विद्वान नहीं जो प्रदेश को पहचानते ही न हों,जिनकी पहचान उनके आकाओं से होती हो) एक समिति बनाये, उनकी नियमित बैठकें हों, पाठ्यक्रम, परीक्षा मूल्यांकन, विश्वविद्यालय/महाविद्यालयों का परिसर, परिवेश प्राचीन ज्ञान (अध्यात्मिक वातावरण ) आधारित हो तो भारतीय ज्ञान परम्परा के परिणाम दिखेंगे।

बोनसाई को पर्दे पर आदम कद रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, वह तत्वज्ञानी भी दिख सकता है किन्तु वास्तविक धरातल पर परिवर्तन नहीं कर सकता। भारतीय ज्ञान परम्परा आचरण से समझ में आती है न कि उपदेश या प्रवक्ताओं के पी पी टी से।

Sunday, 25 February 2024

भारतीय ज्ञान परम्परा (ख) लोक के राम bhaarteey gyaan parmpaar (look men raam )

भारतीय ज्ञान परम्परा 

(ख)   लोक के राम

 लोक के राम : राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इन्हें श्रीराम, श्रीरामचन्द्र, रघुनन्दन, राजाराम जैसे सहस्त्रों नामों से जाना जाता है। रामायण में वर्णन के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजा, चक्रवर्ती सम्राट दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ (पुत्र प्राप्ति यज्ञ) कराया, जिसके फलस्वरूप चार पुत्रों का जन्म हुआ। श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में ‘चैत्रेनावमिकेतिथौ।। नक्षत्रेऽदिति दैवत्येस्वोच्चसंस्थेषुपञ्चसु। ग्रहेषु ककर्टेलग्नेवाहस्पताविन्दुनासह।।’

 अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र में, पांच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर राम का जन्म देवी कौशल्या के गर्भ से अयोध्या में हुआ था। श्रीराम जी चारों भाइयों में सबसे बड़े थे। हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम जयंती या रामनवमी का पर्व मनाया जाता है।

   श्रीराम ने मर्यादा-पालन और लोक कल्याण के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, कुटुम्ब का भी परित्याग किया। राम रघुकुल में जन्में थे, जिसकी परंपरा ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाई पर बचन न जाई।‘ की थी।  माता-पिता के वचन की रक्षा के लिए राम ने खुशी से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। पत्नी सीता ने आदर्श पत्नी का उदाहरण देते हुए, पति के साथ वन जाना उचित समझा। लक्ष्मण ने भी आदर्श भ्राता के रूप में राम के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए। भरत ने न्याय के लिए माता का आदेश ठुकराया और बड़े भाई राम के पास वन जाकर उनकी चरण पादुकाएँ ले आए, जिन्हें ही राज गद्दी पर रखकर राजकाज किया। 

वनवासी अवधि में ही पत्नी सीता को रावण हरण कर ले गया। जंगल में राम को सुग्रीव जैसा मित्र और भक्त मिला, जिसने राम के सारे कार्य पूरे कराये। राम  की विशेषता रही है कि उनके सम्पर्क में आनेवाले छोटे से छोटे व्यक्ति का सहयोग लिया। भारतीय वैज्ञानिकता का उपयोग करते हुए राम समुद्र में पुल बना कर लंका पहुँचे और रावण का बध कर सीता को वापस ले कर अयोध्या आये। 

राम के अयोध्या लौटने पर भरत ने आदर्श का पालन करते हुए राज्य राम को सौंप दिया। राम न्याय प्रिय थे। उन्होंने शासन का एक ऐसा आदर्श सुराज स्थपित किया जिसे लोग आज भी ‘रामराज्य’ की उपमा देते हैं।

 भारतीय परंपरा के कई त्योहार, जैसे-दशहरा, रामनवमी और दीपावली राम कीवन-कथा से जुड़े हुए हैं तथा जीवन संघर्ष हेतु प्रेरणा देते हैं।


 राम की व्याप्ति  (क) में आई टिप्पणियों में एक टिप्पणी थी की कबीर के राम अलग थे ! इस सम्बन्ध में मेरा कहना है की राम की व्यापकता से संसार का कोई भक्त , संत, मुनि, ऋषि , साधक , आस्तिक , नास्तिक अछूता नहीं था तो कबीर राम की व्यापकता से कैसे दूर रह सकते हैं।

 मेरा यह भी मानना है की पहले तो राम को धाराओं में बांटा गया फिर उसमे कुछ भक्त कवियों को बिठाया गया जो आज भी चल रहा है ! 

इसे ठीक से समझना होगा । विद्यार्थिओं को समझाने के लिए रामचंद्र शुक्ल जी कुछ सूत्र रूप में विषय तैयार करते थे और उसी सूत्र की देन हैं, कबीर निर्गुनिया संत हो गए । 

इसके पीछे के भी कारण थे कि कबीर को जुलाहा से ऊपर उठाकर संत नहीं बनाया गया,  क्योकि कबीर यदि जुलाहा है तो वे सगुन रूप को कैसे मान सकते हैं और आलोचकों ने अपने बनाए सांचे में कबीर को ढाल दिया ।

 दूसरा तर्क है कि कबीर कहते हैं -दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना,राम नाम का मरम है आना। 

अब इसके शब्दार्थ  में नहीं सन्दर्भ में जाइये । राम नाम का मर्म क्या है ? कबीर के इस कथन को कभी उजागर नहीं किया गया क्यों ? 


वस्तुतः कबीर अपने को जीव और राम को ब्रह्मस्वरूप बता रहे हैं क्यों ?


 क्योंकि उनका मानना है कि अहंकार और भगवत प्रेम दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते। कबीर के इस कथन को भी याद करलें -‘हरि मेरा पिव मैं हरि की बहुरिया।’ 

और इतना ही नहीं गुरु नानक भी कहते हैं- ‘एक राम दशरथ का बेटा-एक राम घट घट में बैठा’ और रैदास कहते हैं-‘मन्दिर मस्जिद एक है, इन मंह अंतर नाहिं।'

 रैदास को समझें - 'राम रहमान का, झगड़ऊ कोऊ नाहिं।’ 

तात्पर्य यह कि भारतीय संतों ने कभी भी राम को निर्गुण सगुन के घेरे में नहीं बांधा ।  रविदास से इसकों समझा जा सकता है ।

दूसरी टिप्पणी थी की राम बाल्मीक के पहले भी थे तो यह क्यों लिखा गया की बाल्मीक से राम कथा या राम का आदि काव्य बाल्मीकी है ?

 प्रश्न अनुचित नहीं है किन्तु यह विचार करिए क्या वेदव्यास के पहले वेद (ज्ञान) नहीं थे । अनेक ऋषियों की अनुभूतियों को संग्रहीत कर चार वेद और मनचाहे वेद की शाखाएं बनी हैं ।

 इसे तुलसी से भी समझना होगा कि -

 ‘रचि महेस निज मानस राखा।पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥

 तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥’ 

फिर यदि आप बाल्मीक नारद संवाद पढ़े तो शायद यह भ्रम दूर हो जाएगा ? 

तुलसी को फिर बड़े अर्थ में समझें -

हरि अनंत हरि कथा अनंता।

 कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥

रामचंद्र के चरित सुहाए । 

कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥

तर्क ,कुतर्क आलोचक नुमा कुछ विशिष्ट जनों का काम हैं । अपने राम तो चराचर जीवों के राम हैं, इतना ही नहीं तो पत्थर के अन्दर बसे राम को राम ने उजागर कर संसार के सामने हृदयहीन मस्तिष्क को प्रेरणा दी है।

 अंत में - 

‘राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। 

मत हमार अस सुनहि सयानी॥

तदपि संत मुनि बेद पुराना। 

जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥

(क्रमशः)

भारतीय ज्ञान परम्परा (क) राम की व्याप्ति bhaarteey gyaan parmparaa (a) raam kii vyaapti

 

भारतीय ज्ञान परम्परा

(क)

राम की व्याप्ति

              ‘राम’ व्युत्पत्तिएवं अर्थ: ‘रम्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय के योग से ‘राम’ शङ्घ द निष्पन्न होता है। ‘रम्’ का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से संबद्ध है। वे प्राणिमात्र के हृदय में ‘रमण’ (निवास) करते हैं, इसलिए ‘राम’ हैं, तथा भक्त जन उनमें ‘रमण’ करते (ध्यान निष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे ‘राम’ हैं - ‘रमते कणे कणे इतिराम:’। आद्य शंकराचार्य ने ‘पद्मपुराण’ का उदाहरण देते हुए कहा है कि 'नित्यानन्दस्वरूपभगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे ‘राम’ हैं।‘ राम को राष्ट्र का प्रतीक मानते हुए संतों कीपरंपरा में ‘रा’ अर्थात् राष्ट्र और ‘म’ अर्थात् मंगल। यानी राम राष्ट्र के मंगल (कल्याण) के प्रतीक हैं।

              राम की व्याप्ति और विस्तार: राम के परिचय का आधार ‘रामकथा’ है। भारतीय जीवन मूल्य कीआन्तरिक संरचना के ताने-बाने में ‘रामकथा’ गुम्फित है। भारतीय संस्कृति के उद्दात-मूल्यों का सृजन ‘रामकथा’ के मूल में है। इसी रूप में इस कथा कीकालजयिता भी सिद्ध होती है। ‘रामकथा’ में निबद्ध संवेदना भारतीयता के मूल स्वत्वों का विस्तार करती है। समय के बदलावों में इस कथा कीशक्ति कभी क्षीण नहीं हुई। ‘राम’ कथा कीयह सांस्कृतिक व्यापकता इतिहास के परिवर्तन के साथ विस्तार पाती गई। माना जाता है कि ‘राम’ ने अपने जीवन से लोक को अभिव्यक्ति दी तो लोक ने ‘रामकथा’ को युगानुरूप विकसित कर विस्तार दिया। 

              राम कथा का मूल आधार आदिकवि वाल्मीकि की संस्कृत भाषा में रचित ‘रामायण’ है। ‘रामायण’ के बाद ही साहित्य और समाज में राम का परिचय आया। संस्कृत के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में इस रामायण को स्रोत रूप में ग्रहण किया गया। काव्य, नाटक, कथा और अन्य साहित्यिक विधाओं में ‘रामायण’ को आधार बनाकर विपुल साहित्य का सृजन हुआ। राम के जीवन पर शोध करने वाले कामिल बुल्के लिखते हैं, 'रामकथा अनेक रूप धारण करते हुए शनै: शनै: संपूर्ण भारतीय-संस्कृति में व्याप्त हो गयी है। उसकीअद्वितीय लोकप्रियता निरन्तर अक्षुण्ण ही नहीं वरन् शताब्दियों तक जिन कृतियों में उनकीझलक मिलती है उनमें-‘भुशुण्डिरामायण’, ‘योगवसिष्ठ’, ‘अध्यात्मरामायण’,  ‘अद्भुत्रामायण’,  ‘आनन्द रामायण’, प्रमुख हैं

                उपनिषदों, पुराणों, जैन, बौद्ध और प्राकृत साहित्य में भी रामकथा व्याप्त है। बौद्ध परंपरा में श्रीराम से संबंधित दशरथजातक, अनामकजातक तथा दशरथकथानक नामक तीन जातक कथाएँ उपलब्ध हैं। जैन साहित्य में रामकथा सम्बन्धी कई मुख्य ग्रंथ -विमलसूरिकृत ‘पउमचरियं’ (प्राकृत), आचार्य रविशेणकृत ‘पद्मपुराण’ (संस्कृत), स्वयंभू कृत ‘पउमचरिउ’ (अपभ्रंश), रामचंद्र चरित्रपुराण तथा गुणभद्र कृत उत्तरपुराण (संस्कृत) आदि हैं। परमार भोज ने भी ‘चंपुरामायण’ में राम कथा का वर्णन किया है। महाभारत में भी ‘रामोपाख्यान’ के रूप में आरण्यक पर्व (वनपर्व) में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त ‘द्रोणपर्व’ तथा ‘शांतिपर्व’ में भी राम के सन्दर्भ उपलब्ध्  हैं।

              राम को विष्णु का अवतार माना गया। ‘राम’ का जीवन हमारे संवेगों को अधिक प्रभावित करता हैं। कुबेरनाथराय ‘रामायण महातीर्थम्’ नामक पुस्तक में लिखते हैं, 'श्रीराम भारतीय परंपरा में सर्वाधिक व्यापक और संकल्प-संवेग-संपन्न नायक हैं। भारतीय परंपरा पूरे एक समाज के सामने आती है और वह समाज भारत के आज के मानचित्र से ज्यादा व्यापक  है। वह वंक्षुधारा से लेकर पूर्वीद्वीप समूह तक के संपूर्ण मनोमय भारत से है। यानी ‘सेरेहिन्दी’, ‘लघुहिन्दी’, ‘हिन्दखास’ एवं ‘हिन्देशिया’ के साथ-साथ महाचीन-तिब्बत तक। इस समूचे विशाल भूखण्ड में कुरतन (खोतान) से लेकर कम्पूचिया तक राम कथा के भिन्न-भिन्न संस्करण पाये जाते हैं। इस प्रकार इस बहुरूपी विस्तार से इसकीआन्तरिक ऋद्धि तो समृद्धतर हुई ही है, यह तथ्य इस बात का भी संकेत देता है कि राम का वास्तविक इतिहास है।’

                आज की स्थिति में रमाकथा पर आधारित ग्रंथ तीन सौ से लेकर तीन हजार तक कीसंख्या में विविध रूपों में मिलते हैं। श्रीराम का चरित भारतीय भाषाओं में जैसे- मराठी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु तथा उड़िया, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, असमिया, उर्दू, आदि में मिलते हैं।

              गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’   विश्व के कोने-कोने में श्रीराम के चरित को पहुँचाया है। भगवान भोलनाथ आदिदेव महादेव से प्रारंभ होकर यह राम का चरित, महर्षि नारद, लोमश, याज्ञवल्क्य, कागभुशुण्डि, महाकवि कालिदास, भट्ट, प्रवरसेन, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, समर्थ रामदास, संत तुकड़ोजी महाराज, केशवदास, सूरदास, स्वामी करपात्री, मैथिलीशरण गुप्त, आदि ऋषियों-मुनियों, संतों, आचार्यों और कवियों ने अलग-अलग भाषाओं में राम को जन-जन तक पहुँचाया है। 

              विदेशों में भी तिब्ब्ती रामायण, पूर्वी तुकिर्स्तान कीखोतानी रामायण, इंडोनेशिया कीकबिन रामायण, जावा का सेरतराम, सैरीराम, पातानी रामकथा, इण्डो चायना कीरामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैर रामायण, बर्मा (म्यांम्मार) कीयूतोकीरामयान, थाईलैंड कीराम कियेन आदि में रामचरित्र का व्यापक विस्तार है। (क्रमशः)

 

Sunday, 14 January 2024

लोक के राम

 

                                                                       लोक के राम :   श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद में कहा गया है कि जब ॐश्रीहरि दशरथ जी के यहाँ अवतीर्ण हुए, उस समय उनका नाम ‘राम’ हुआ। विद्वानों ने लोक में ‘राम’ शब्द के अर्थ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-‘ जो महीतलपर स्थित होकर भक्तजनों का सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करते और राजा के रूप में सुशोभित होते हैं, ओ राम हैं।’ (राति राजते वा महीस्थित: सन इतिराम:) इस विग्रह के अनुसार ‘राति’ या ‘राजते’ का प्रथम अक्षर ‘रा’ और ‘महीस्थित:’ का आदि अक्षर ‘म’ लेकर ‘राम’ बनाता है।  

              इसी तरह ‘राम’ नाम को लेकर लोक में अनेक सन्दर्भ हैं । राम भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे अभिराम होने से राम हैं। राक्षस जिनके द्वारा मरण को प्राप्त होते है, वे राम हैं । जैसे राहू मनसिज (चन्द्रमा ) को हतप्रभ कर देता है, उसी प्रकार जो राक्षसों को मनुष्य रूप में रहकर प्रभाहीन (निष्प्रभ) कर देते है, वे राम हैं । अथवा जो महीपालों को अपने आदर्श चरित्र के द्वारा धर्ममार्ग का उपदेश देते हैं वे राम हैं ।  जो नामोच्चारण करने पर ज्ञानमार्ग की प्राप्ति कराते हैं, ध्यान करने पर वैराग्य देते हैं और अपने विग्रह की पूजा करने पर ऐश्र्वर्य देते है, इसलिए वे लोक में (भूतल पर) राम हैं । इन सब विशेषताओं/ गुणों को समाटे जो लोक में ही नहीं ज्ञानी और विज्ञानियों के लिए भी अनंत, नित्यानन्दस्वरुप, चिन्मय ब्रह्म हैं और योगीजन जिनमें रमण करते हैं, वे परब्रह्म परमात्मा ही ‘राम’ हैं ।

              शास्त्रीय व्याख्या में रम्धातु में घञ्प्रत्यय के योग से ‘रामशब्द निष्पन्न होता है। रम्धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से संबद्ध है। वे प्राणिमात्र के हृदय में रमण’ (निवास) करते हैं, इसलिए रामहैं, तथा भक्तजन उनमें रमणकरते (ध्यान निष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे रामहैं - रमते कणे कणे इतिराम:। आद्य शंकराचार्य ने पद्मपुराणका उदाहरण देते हुए कहा है कि नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे रामहैं। राम को राष्ट्र का प्रतीक मानते हुए संतों की परंपरा में राअर्थात् राष्ट्र और अर्थात् मंगल। यानी राम राष्ट्र के मंगल (कल्याण) के प्रतीक हैं।

               श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में चैत्रेनावमिकेतिथौ।। नक्षत्रेऽदिति दैवत्येस्वोच्चसंस्थेषुपञ्चसु। ग्रहेषु कर्कटेलग्नेवाहस्पता विन्दुनासह।।अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र में, पांच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर रामजी का जन्म देवी कौशल्या के गर्भ से अयोध्या में हुआ था। श्रीराम जी चारों भाइयों में सबसे बड़े थे। हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम जयंती या रामनवमी का पर्व मनाया जाता है।

              भारत में श्रीराम भारतीय संस्कृति के शिखर पुरुष और आदर्श हैं। विश्व के अनेक देशों जैसे-थाईलैंड, इंडोनेसिया, मॉरीशस आदि में भी श्रीराम पूर्वज रूप में मान्य हैं। इन्हें पुरुषोत्तम शब्द से भी अलंकृत किया जाता है। श्रीराम ने मर्यादा-पालन और लोक कल्याण के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, कुटुम्ब का भी परित्याग किया। राम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परंपरा रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाई पर बचन न जाई।की थी। राम के पिता दशरथ ने राम की सौतेली माता कैकेयी को दो वचन (वरदान) दिये थे। कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज सिंहासन और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा। पिता के वचन की रक्षा के लिए राम ने खुशी से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। पत्नी सीता ने आदर्श पत्नी का उदाहरण देते हुए, पति के साथ वन जाना उचित समझा। लक्ष्मण ने भी आदर्श भ्राता के रूप में राम के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए। भरत ने न्याय के लिए माता का आदेश ठुकराया और बड़े भाई राम के पास वन जाकर उनकी चरण पादुकाएँ ले आए, जिन्हें ही राज गद्दी पर रखकर राजकाज किया। वनवासी अवधि में ही पत्नी सीता को रावण हरण करले गया। जंगल में राम को सुग्रीव जैसा मित्र और भक्त मिला, जिसने राम के सारे कार्य पूरे कराये। राम  की विशेषता रही है कि उनके संपर्क में आनेवाले छोटे से छोटे व्यक्ति का सहयोग लिया। भारतीय वैज्ञानिकता का उपयोग करते हुए राम समुद्र में पुल बना कर लंका पहुँचे, और रावण का बध कर सीता जी को वापस ले कर अयोध्या आये। राम के अयोध्या लौटने पर भरत ने आदर्श का पालन करते हुए राज्य राम को ही सौंप दिया। राम न्याय प्रिय थे। उन्होंने शासन का एक ऐसा आदर्श सुराज स्थपित किया जिसे लोग आज भी रामराज्यकी उपमा देते हैं। भारतीय परंपरा के कई त्योहार, जैसे-दशहरा, रामनवमी  और दीपावली राम की वन-कथा से जुड़े हुए हैं तथा जीवन संघर्ष हेतु प्रेरणा देते हैं। राम शब्द का मनन (निश्चय) और त्रारण(रक्षा) करने के कारण वह मन्त्र बन गया है।

               लोक में राम का एक दरवार है जो इस प्रकार मिलता है- कौसल्यानन्दन श्रीराम अपनी प्रकृति-ह्लादिनीशक्ति श्रीसीताजी के साथ विराजमान हैं । उनका वर्ण श्याम है। वे पीताम्बर धारण किये हुए हैं। उनके सिरपर जटाभार सुशोभित है। उनके दो भुजाएँ हैं। कानों में कुण्डल शोभा पा रहे हैं। गले में रत्नों की माला चमक रही है। वे स्वभावतः धीर (निर्भय एवं गम्भीर) हैं। धनुष धारण किये हुए हैं। उनके मुखपर सदा प्रसन्नता छायी रहती है। वे संग्राम में सदा ही विजयी होते हैं। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्यशक्तियाँ उनकी शोभा बढ़ाती हैं। इस जगत की कारणभूता मूल प्रकृतिरूपा परमेश्वरी सीता उनके वाम अंग को विभूषित कर रही हैं। सीताजी के श्रीअंगों की कान्ति सुवर्ण के सदृश गौर है। उनके भी दो भुजाएँ हैं। वे समस्त दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं तथा हाथ में कमल धारण किये हुए हैं। उन चिदानन्दमयी सीता से सटकर बैठे हुए भगवान् श्रीराम बड़े हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं । दक्षिण भाग में श्रीरघुनाथ जी के छोटे भाई सुवर्ण-गौर कान्तिवाले श्रीलक्ष्मण जी हाथ में धनुष-बाण लिये खड़े हैं।  



Saturday, 13 January 2024

राम की व्याप्ति और विस्तार

राम की व्याप्ति और विस्तार: राम के परिचय का आधार ‘रामकथा’ हमारी स्मृति का अनिवार्य हिस्सा है। भारतीय संस्कृति और जन-मन की आन्तरिक संरचना के ताने-बाने को रचने में ‘रामकथा’ की भूमिका सर्वाधिक है। मानवीय चेतना के उदात्त-मूल्यों का सृजन ‘रामकथा’ के मूल में है।

 बाज़ारवादी और उपभोक्तावादी अमानवीय मूल्यों के वर्तमान दौर में शाश्वत मानवीय मूल्यों की भारतीय छवि को इस कथा ने निरूपित किया है। इसी रूप में इस कथा की कालजयता भी सिद्ध होती है। ‘रामकथा’ में निबद्ध संवेदना ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ के समानान्तर भारतीयता के मूल स्वत्वों का विस्तार करती है। समय के बदलावों में इस कथा की शक्ति कभी क्षीण नहीं हुई। ‘राम’ की कथा-संस्कृति की यह व्यापकता ही है कि इतिहास के परिवर्तन के साथ इस कथा का विस्तार होता चला गया। ‘राम’ ने अपने जीवन से लोक की संवेदना को समृद्ध किया तो लोक ने ‘रामकथा’ को युगानुरूप विकसित भी किया। राम से अधिक राम के नाम की महिमा है। तुलसीदास कहते हैं, ‘राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।’

 राम को जानने का मूल आधार वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ संस्कृत भाषा की अनुपम कृति है। यह राम का परिचय कराने वाली आदि रचना है। आदि कवि वाल्मिकि के ‘रामायण’ के बाद ही साहित्य और समाज में राम का परिचय आया। संस्कृत के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में इस रामायण को स्रोत रूप में ग्रहण किया गया। काव्य, नाटक, कथा और अन्य साहित्यिक विधाओं में ‘रामायण’ को आधार बनाकर विपुल साहित्य का सृजन हुआ।

 राम के जीवन पर शोध करने वाले कामिल बुल्के अपने शोध ग्रन्थ ‘रामकथा’ में लिखते हैं, ‘रामकथा अनेक रूपधारण करते हुए शनै:-शनै: संपूर्ण भारतीय-संस्कृति में व्याप्त हो गयी है। उसकी अद्वितीय लोक प्रियता निरन्तर अक्षुण्ण ही नहीं वरन् शतादियों तक झलक मिलती है। इन कृतियों में ‘भुशुण्डिरामायण’, ‘योगवसिष्ठ’, ‘अध्यात्मरामायण’, ‘अद्भुत्रामायण’, ‘आनन्द -रामायण’, प्रमुख हैं।’

 वेदोत्तर काल में रामायण, उपनिषद् और बौद्ध, जैन साहित्य में भी रामकथा व्याप्त है। भारतीय दृष्टि से बौद्ध परम्परा में श्रीराम से संबंधित दशरथजातक, अनामकजातक तथा दशरथकथानक नामक तीन जातक कथाएँ उपलब्ध हैं। जैनसाहित्य में रामकथा सम्बन्धी कई ग्रंथ लिखे गये, जिनमें मुख्य हैं- विमलसूरिकृत ‘पउमचरियं’ (प्राकृत), आचार्य रविशेणकृत ‘पद्मपुराण’ (संस्कृत), स्वयंभू कृत ‘पउमचरिउ’ (अपभ्रंश), रामचंद्र चरित्रपुराण तथा गुणभद्र कृत उत्तरपुराण (संस्कृत)। परमार भोज ने भी ‘चंपुरामायण’ की रचना की थी।
 कालान्तर में पुराणों में राम के जीवन वृत्त में अवतारवाद को विशेष महत्त्व मिला। पुराणों में राम को विष्णु का अवतार माना गया। ‘राम’ का जीवन हमारे संवेगों को अधिक प्रभावित करता हैं। कुबेरनाथराय ‘रामायणमहातीर्थम्’ नामक पुस्तक में लिखते हैं, ‘श्रीराम भारतीय परंपरा में सर्वाधिक व्यापक और संकल्प-संवेग-संपन्न नायक हैं। भारतीय परंपरा पूरे एक समाज के सामने आती है और वह समाज भारत के आज के मानचित्र से ज्यादा व्यापक  है। वे लिखते हैं - “वह वंक्षुधारा से लेकर पूर्वीद्वीप समूह तक के संपूर्ण मनोमय भारत से है। यानी ‘सेरेहिन्दी’, ‘लघुहिन्दी’, ‘हिन्दखास’ एवं ‘हिन्देशिया’ के साथ-साथ महाचीन-तिब्बत तक। इस समूचे विशाल भूखण्ड में कुरतन (खोतान) से ले कर कम्पूचिया तक राम कथा के भिन्न-भिन्न संस्करण पाये जाते हैं। 


इस प्रकार इस बहुरूपी विस्तार से इसकी आन्तरिक ऋद्धि तो समृद्धतर हुई ही है, यह तथ्य इस बात का भी संकेत देता है कि राम का वास्तविक इतिहास है।’’

 तात्पर्य यह कि भारतीय भाषाओं में राम का विचार करते ही सबसे पहले ध्यान में आता है कि राम के चरित के विभिन्न आयामों का कवियों ने जिस आधार पर वर्णन किया, उसे रामायण या रामोपाख्यान कहा गया। आज की स्थिति में रामाकथा पर आधारित ग्रंथ तीन सौ से लेकर तीन हजार तक की संख्या में विविध रूपों में मिलते हैं। श्रीराम का चरित वाल्मीकीय रामायण के बाद व्यास रचित महाभारत में भी ‘रामोपाख्यान’ के रूप में आरण्यक पर्व (वनपर्व) में प्राप्त होता है। इसकेअतिरिक्त ‘द्रोणपर्व’तथा‘शांतिपर्व’ में भी राम के सन्दर्भ उपलब्ध हैं।

 राम के वृत्त ग्रंथ संस्कृत और हिन्दीतर भारतीय भाषाओं में जैसे- मराठी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु तथा उडिय़ा, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, असमिया, उर्दू, आदि में मिलते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ में न केवल उत्तर भारत में विशेष स्थान पाया है, बल्कि इस ग्रंथ ने विश्व के कोने-कोने में श्रीराम के चरित को पहुँचाया है। भगवान भोलनाथ आदिदेव महादेव से प्रारंभ होकर यह राम का चरित, महर्षि नारद, लोमश, यज्ञवल्क्य, कागभुशुण्डि, महाकवि कालिदास, भट्ट, प्रवरसेन, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, समर्थ रामदास, संत तुकड़ोजी महाराज, केशवदास, सूरदास, स्वामी करपात्री, मैथिलीशरण गुप्त, आदि ऋषियों-मुनियों, संतों, आचार्यों और कवियों ने अलग-अलग भाषाओं में राम को जन-जन तक पहुँचाया है। अकबर की अनुमति से अब्दुल रहीम खानखाना के लिए रामायण की एक प्रति तैयार की गई। शाहजहाँ के पुत्र दारा शिकोह ने भी रामायण का फारसी में स्वयं अनुवाद किया था।

 विदेशों में भी तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तान की खोतानी रामायण, इंडोनेशिया की कबिन रामायण, जावा का सेरतराम,सैरीराम,पातानी रामकथा, इण्डो चायना की रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैर रामायण, बर्मा (म्यांम्मार) की यूतोकी रामयान, थाईलैंड की रामकियेन आदि रामचरित्र का व्यापक बखान करती है। इसके अलावा विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति डायोनीशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता है। विश्व साहित्य में इतने विशाल एवं विस्तृत रूप से विभिन्न देशों में विभिन्न कवियों / लेखकों द्वारा राम के अतिरिक्त किसी और चरित्र का इतनी श्रद्धा से वर्णन नही किया गया। तात्पर्य यह कि श्रीराम का प्रभाव भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में व्याप्त है।(क्रमशः)

Saturday, 6 January 2024

KUNDALINI JAGARAN

  

''विद्यया देवलो•ा: अर्थात विद्या से देवलो•  मिलता है।- बृउ.1.5.16

''विद्यया तदारोहन्तिÓ अर्थात विद्या ऊपर उठाती है। बृउ.1.5.

'•र्मणा पितृलो•ाÓ अर्थात •र्म से पितृलो• मिलता है।- ईष.9


•ुण्डलनी जागरण यानी तेजोऽस्मि

श्वेताश्वतरोपानिषद •हता है- ''यदाऽऽत्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दोपोपमेनेह युक्त: प्रपष्यते।

अजं धु्रवं सर्वतत्वैविशुद्वं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाषै:।।

ईश्वर •ैसे मिलेगा- ''नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेनÓÓ (मुण्ड•ो.)

अथ योगानुशासनम् -परम्परागत योगविषय• शास्त्र •ी चर्चा •रते हैं।

योगश्चित्तिवृत्तिनिरोध:- चित्त •ी वृत्तियों •ा निरोध योग है। अर्थात चित्त •ी वृत्तियों •ा सर्वथा रु• जाना योग है। यह स्थिति •ब आती है ? ''तदा द्रष्टु:स्वरूपेऽवस्थानम।ÓÓ जब चित्त •ी वृत्तियों •ा पूर्ण निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है; अर्थात •ेवल्य अवस्था •ो प्राप्त हो जाता है। चित्त वृत्तियाँ-

वैसे तो चित्त वृत्तियाँ असंख्य हैं •िन्तु मोटे तोर पर उन्हें पाँच प्र•ार से बाँटा जा स•ता है। 

चित्त वृत्तियाँ पाँच हैं- 

''प्रमाणविपर्ययवि•ल्पनिद्रास्मृतय:ÓÓ (1) प्रमाण (2) विपर्यय (3) वि•ल्प, (4)निद्रा- स्वप्न (5) स्मृति। यह सभी वृत्तियाँ दो प्र•ार •ी होती हैं- ''वृत्तय:पंचतय: क्लिष्टाक्लिष्टा ÓÓ। क्लिष्ट अर्थात अविद्या आदि क्लेषों •ो पुष्ट •रने वाली और योगसाधना में विघ्नरूप होती हैं। अक्लिष्ट-क्लेशों •ो क्षय •रने वाली और योगसाधन में सहाय• होती हैं। 

विपर्यय-'विपर्ययोंमिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठमÓ।। 

'तत:क्लेष•र्मनिवृतिÓ। 

वि•ल्प- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो वि•ल्पÓ। अर्थात जैसे •ोई मनुष्य भगवान •े  रूप •ा ध्यान •रता है पर जिस रूप •ा ध्यान •रता है उसे न तो उसने देखा है, न वेद-शास्त्र सम्मत है, और न ही वह भगवान •ा वास्तवि• स्वरुप है •ेवल •ल्पना मात्र है वि•ल्प है। 

 निद्रा- 'अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्राÓ- ज्ञान •े अभाव •ा ज्ञान जिस चित्तवृति •े आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है।ÓÓ निद्रा भी चित्त •ी वृत्तिविशेष है। •ई दर्शन•ार निद्रा •ो वृत्ति नही मानते, इसे सुषुप्ति अन्तर्गत मानते हैं। गीता में आया है- 

युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य •र्मसु। 

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।


स्मृति- अनुभूतिविषयासम्प्रमोष: स्मृति:- 

चितवृत्तियों •ा निरोध- योगी •हता है 'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:Ó। 

गीता •हती है- 'अभ्यासेन तु •ौन्तेय वैराग्येण च गृहयतेÓ (6.35)। चित्तवृत्तियों •े निरोध •े दो प्र•ार हैं-अभ्यास और वैराग्य। 

अभ्यास क्या है-'तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासÓ अर्थात जो स्वभाव से चंचल है 

गीता •हती है- 'स निश्चयेन  योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसाÓ। योग •ा अभ्यास बिना उ•ताये बिना समय सीमा •े निश्चित •िये निष्ठापूर्व• •रते रहना है।  

वैराग्य क्या है-

'दृष्टानुश्रवि•विषयवितृष्णस्य वशी•ारसंज्ञा वैराग्यमÓ। यहाँ दो शब्द हैं, दृष्टा और अनुश्रवि• । विषयों में सर्वथा तृष्णारहित चित •ी जो वशी•ार नाम• अवस्था है, वह वैराग्य (तत्परमं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम) है।  

 (यदाहिनेन्द्रियार्थेषु न •र्मस्वनुषज्जते, सर्वसं•ल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते) 

 

 सिद्धि क्या है -  ''श्रद्वावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्व•:Ó। श्रद्वा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्व•, (•्रम) से सिद्धि प्राप्त होती है।Ó

'श्रद्वावान लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिभचिरेणधिगच्छतिÓ।। (4/39,गीता)

सिद्धि प्राप्त •रने हेतु योगी •ो अभ्यास और वैराग्य में तीव्रता लानी होती है।  

ईश्वर •ौन है -

'क्लेश•र्मविपा•ाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:Ó। क्लेश, •र्म, विपा• और आशय से जो (अपरामृष्ठ) है, असम्बद्व है, वह ईश्वर है। ईश्वर ज्ञान वैर यश, ऐश्वर्य •ी परा•ाष्ठा है। क्या ईश्वर इस •ारण से मिलता है ? 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।Ó(मुण्ड.) ईश्वर स्वयं अनादि है क्यों•ि वह सब •े आदि है (योग,10-2-3) वह •ालातीत है। उस•ा वाच• 'प्रणवÓ है। 'तस्य वाच•: प्रणव:Ó (प्रणव ऊँ•ार है) (प्रश्नोपनिषद में पाँचवे प्रश्नोत्तर में और माण्डूक्योपनिषद में ऊँ•ार •ी उपासना •ा विषय विस्तार से है) ऊँ, परमेश्वर •ा वेदोक्त नाम है (गीता-17-23, •ठो.1/2/15-17) साध• •ो ईश्वर •े नाम •ा जप और उस•े स्वरूप •ा स्मरण चिन्तन •रना चाहिए। महर्षि शाण्डिल्य ने •हा है- ''सा परानुरक्त्रिीश्वरेÓÓ। देवर्षि नारद ने भक्तिसूत्र में •हा है- 'सात्वस्मिन परमप्रेमरूपा चÓ। अर्थात उस परमेश्वर में अतिशय प्रेमरूपता ही भक्ति है। यह अमृत स्वरूपा है-'अमृतस्वरूपा चÓ। ईश्वर •ी भक्ति में आयु, रूप आदि •ा •ोई अर्थ नही होता है-

''व्याधस्याचरणं धुवस्य च वयो विद्या गजेन्दस्य •ा 

 •ा जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुप्रस्य •िं पौरषम्।

•ुव्जाया: •ामनीरूपमधि•ं •िं तत्सुदाम्नो धनं

भक्त्या तुश्यति •ेवलं न च गुणैर्भक्ति प्रियो माधव:।।

श्रीमद्भागवत में प्रहलाद ने •हा है-

'श्रवणं •ीर्तनं विष्णों: स्मरणं् पादसेवनम।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनमÓ।।(7/5/23)

 ऋतम्भरा बुद्वि •े प्र•ट होने पर साध• •ो प्र•ृति •े यथार्थ रूप •ा भान हो जाता है तब उसे वैराग्य होता है।

''तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीज: समाधि:।ÓÓ

 क्लेश क्या है- 'अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेषा: क्लेषा:ÓÓ। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश •हलाते हैं। 

अविद्या जिन•ा •ारण हैं- ''अविद्या क्षेत्रमुत्तरेशां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोद्वाराणामÓ।

 

अविद्या क्या है- ''अनित्याशुचिदु:खानात्मसु नित्यशुचि सुखात्मख्यातिरविद्याÓ। अनित्य, अपवित्र, दु:ख और अनात्मा में नित्य, पवित्र, सुख और आत्मा •ा आत्मभाव •ी अनुभूति 'अविद्याÓ है।

अस्मिता क्या है- ''दृगदर्शन शक्त्योरे•ात्मतेवास्मिताÓÓ। अविद्या •े नाश होने से 'अस्मिताÓ •ा नाश होता  है।  

राग क्या है- 'सुखानुशयी राग:Ó। सुख •ी प्रतीत •े पीछे रहने वाला क्लेष 'रागÓ है।

द्वेष क्या है- 'दु:खानुशयी द्वेषÓ। दु:ख •ी प्रतीत •े पीछे रहने वाला क्लेश 'द्वेषÓ है।

  क्लेशों •ी स्थूल वृत्तियों •ो 'ध्यानहेयास्तदृवत्तय:Ó द्वारा सूक्ष्म बना  दिया जाता है।

दु:ख •े रूप- परिणाम दु:ख, ताप दु:ख, संस्•ार दु:ख, गुणवृत्ति विरोध सब में विद्यमान रहते हैं।

  अष्टांग योग

'यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टवगांनि।।Ó

इनमें पाँच वहिरंग हैं जो इस प्र•ार हैं-

(1)  यम 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:Ó

(•) अहिंसा -   अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:।  

(ख) सत्य- सत्यप्रतिष्ठायां •्रियाफलाश्रयत्वमÓ।  

(ग) अस्तेय- 'अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानमÓÓ।  

(घ) ब्रह््मचर्य- 'ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यालाभ:Ó।  

मन, वाणी और शरीर से होनवाले सब प्र•ार •े मैथुनों •ी सब अवस्थाओं में सदा त्याग •र•े सब प्र•ार से वीर्य •ी रक्षा •रना 'ब्रह्मचर्यÓ हैं ।     ''•र्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा।

          सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षतेÓÓ।। (गरुण.पूर्व.आचार 238.6) 

 

(ड) अपरिग्रह- अपरिग्रहस्थैर्ये जन्म•थन्तासंबोध:।  

(2) नियम- ''शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा:ÓÓ।

  'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।Ó (मुण्ड.)

भारतीय दर्शन में परम ब्रह्म अक्षर है - अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभवोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भव•रो विसर्ग: •र्मसंज्ञित:। (8,3) 

 गीता •हती है- 

सहस्त्रयुगपर्यन्तमहृर्यद ब्रह्मणो बिन्दु:। 

रात्रिं युगसहस्त्रन्तां तेऽहोरात्रविदो जना:।

अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा प्रभवन्त्यहरागमे।

रान्न्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञ•े।।

भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रान्न्यागमेऽवश: पार्थ  प्रभवन्त्यहरागमे।।

परस्तस्मातु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:। 

य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।

अव्यक्तोऽक्षर  इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्वाम परमं मम।।

(अर्थात)

 

ऊँॅ विष्णुर्विष्णुविष्णु:। ऊँ नम: परमात्मने श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य  श्रीब्रह््मणों द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेतवाराह•ल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमें •लियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते आर्यावर्तान्तर्गत  ब्रह्मावर्तै•देशे बौद्धावतारे अमु•नाम संवत्सरे  अमु•ायने (उत्तरायणे/दक्षिणायने) महामांगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमें  अमु• मासे अमु•पक्षे (शुक्लपक्षे/•ृष्णपक्षे) अमु• तिथौ अमु• वासरान्वितायां अमु• नक्षत्रै अमु• राषिस्थिते सूर्ये  अमु•राषिस्थिते चन्द्रे अमु•राषिस्थिते  भौमें अमु•राषिस्थिते बुधे अमु•राषिस्थिते गुरौ अमु•राषिस्थिते शु•्रे अमु•राषिस्थिते शनौ सत्सु शुुभे योगे शुभ•रणे एवं गुणविशेष विशिष्टायां शुुभ पुण्यतिथौ स•लशास्त्रश्रुतिस्मृतपुराणोक्त फलप्राप्ति•ाम: अमुे•ोऽहं ममात्मन: सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रह•ृतिराज•ृतसर्वाविधपीड़ानिवृतिपूर्व•ं नैरुज्यदीर्घायु: पुष्टिधनधान्यसृद्व्यर्थं सर्वापन्निवृति सर्वाभीष्टफलावाप्ति धर्मार्थ•ाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थ द्वारा अमु• (राष्ट्र) देवताप्रीत्यर्थं पूजनपूर्व•ं सं•ल्पं (अमु• •र्मं) •रिष्ये।

 परमसत्ता •ी अवधारणा वेद •े साथ चलती हैं। नासदीय सूक्त में अध्याय दस में श्लो• आता है -

नासदासीन्नोसदासीतदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत।

•िमावरीव: •ुह •स्य शर्मन्नम्भ: •िमासीद  गहनं गभीरम।।

 यथा-

•ो, अद्वा वेद • इह प्रवोचत् •ुत आजाता •ुत इयं विसृष्टि:।

अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेनाथ •ो वेद यत आवभूव।। (1,128,6)

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।

यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद  यदि वा न वेद।। 

मुण्ड•ोपनिषद में •हा है- 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेनÓ अर्थात आत्मज्ञान •ेवल तीव्र इच्छा शक्ति से ही प्राप्त •िया जा स•ता है।   यथा-

'मंत्र मूलं गुरुर्वाक्यं, पूजा मूलं गुरु:पदम्। ध्यान मूलं गुरु:मूर्ति, मोक्ष मूलं गुरु: •ृपा।।Ó

 सत चेतना हेतु पातंजलि योग दर्शन में •हा है- 

''सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं चÓÓ (3-49)

•ठोपनिषद में •हा है- 'उतिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्निवोधतÓ। क्षुरस्य धारा निशिता  दुरत्या। दुर्गं पंथस्य•वयो वदन्ति।

  गीता में श्री•ृष्ण •हते हैं- 'सर्वधर्म परितज्यान मामे•म शरणं ब्रजÓ। अहं त्वाम सर्वपापेभ्यो मा शुच:। मैत्रेयोपनिषद में •हा गया है •ि साध• छ: माह में आत्मसाक्षात•ार •र स•ता है। 

 ऐतरेयोपनिषद में •हा है- 'स येतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दम।।

इस•े अनुसार गर्भस्थ रूप में जीवात्मा सातवें महीने •पाल •े बीच तालु से प्रवेश •रती है, पहले यह •ोमल होता है बाद में •ठोर हो जाता है।  

सुबालोपनिषद में •हा गया है- 'स्थानानि, स्थानिभ्यों यच्छति नाड़ी तेषां निबन्धनमÓÓ ।

 उसे यह बोध हो जाता है •ि- 'मैं यह शरीर नही, बल्•ि यह शरीर मेरा हैÓ गीता में •हा गया है- 'देहोस्मिनाहं मम् देह इति स्मरÓ। 

भगवान •ृष्ण •हते हैं- ''•ायेन मनसा बुद्धया •ेवलैरिन्द्रियैरति। योगिन: •र्म •ुर्वन्ति संगंत्यक्त्वात्मशुुद्वये। अर्थात आत्मज्ञानी •भी अपने •र्मों •ा निर्वाह •म नही •रता।