Friday, 20 October 2023

दरकार

दरकार जिसकी वह बात पुरानी है।
नये जमाने के तेवर  परख रहा हूं।।
ख़ुश हूं कि उनके मिजाज गरम हैं
खुली आंखों सपने समझ रहा हूं।।
शीत ने दी दस्तक जिस दुपहरी से।
आशियानों तपन ले भटक रहा हूं।।

2
साधु  
शत्रु-सैनिकों की 
कर रहे हो सेवा \
शत्रुदल !
मैं तो भगवान की सेवा कर रहा हूं
मैं तो प्राणियों की सेवा कर रहा हूं
मैं तो मानव धर्म की सेवा कर रहा हूं

असंतुष्ट था सिंकन्दर
तभी
फूस का सूखा
मरी चींटी टुकड़ा 
पकड़ा दिया सिकन्दर को
इसे हरा कर सकते हो
इसे जिन्दा कर दो

सूखी चीज हरी हो सकती है \
साधु] तुम पागल हो

सूखे को जीवन नहीं दे सकते
चीटी को जीवन नहीं दे सकते

तो 
फिर जीवित को मारने का अधिकार \

नत सिर सिकंदर 
सचमुच
भारत महान  
मेरा मन तो सैतान।

2-
 
तीर्थ है
रास्ता] घाट] जलाशय
साधना और मंत्रणा

तीर्थ है 
पवित्र] पावन
मोक्ष प्रदाता
हरता तन मन की यंत्रणा

तीर्थ है
स्थल परिक्रमा का
उपचार का
सधना का

तीर्थ है 
संज्ञा
व्यक्ति] वस्तु
स्थान और भाव रूप में
विराजित श्रद्धा लिए

तीर्थ है
विचारों का विस्तार
दण्डकों का उपचार
राम कृष्ण जहां
लेते हैं अवतार

तीर्थ है
नदी]जलाशय
मंदिर और गुरुद्वारे
जहां पीते हैं पानी
पंक्षी और पंथी प्यारे

तीर्थ है 
गुरु और उसकी वाणियां
स्नान करें उसमें 
काटे संसार बन्धन की वेणियां।



Tuesday, 10 October 2023

हिन्दुस्थान में हिंदी

"जापान में जापानी, चीन में चीनी तो हिन्दुस्थान में हिन्दी क्यों नहीं. 
इस संम्बन्ध में हमारी स्थिति -
मातृभाषा पर हमारा स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं. 
संस्कृत भाषा का स्थान क्या है ?
राष्ट्र भाषा हिन्दी हो या संस्कृत तय नहीं. 
अंग्रेजी कैसे हटेगी नीति तय नहीं. 
आइये कुछ तथ्यों को देखें -
1- नई शिक्षा नीति 2015 में संविधान की मान्यता प्राप्त 23भाषाओं को मातृभाषा का दर्जा प्राप्त हो और अनुच्छेद 350  (1)का कड़ाई से पालन कराते हुये वर्तमान व्यवस्था में पांचवी तक मातृभाषा शिक्षण का माध्यम हो. प्रयास करना पड़ेगा. 
2- संस्कृत भाषा और पाणिनी व्याकरण के आधार पर जापान और जर्मनी ने अपनी भाषा का व्याकरण बनाकर संस्कृत को कम्प्यूटर की सबसे सक्षम भाषा मानी है, अत: संस्कृत भविष्य की सबसे अधिक रोजगारोन्मुखी, वैज्ञानिक -तकनीकी शिक्षा एवं मनुष्य निर्माण की भाषा होगी. क्योकि 
एक जर्मन सर्वे के अनुसार 1998की स्थिति में संस्कृत में सबसे अधिक शब्द -102,87,50,00000 (एक सौ दो अरब सतासी करोड़,पचास लाख है. जो आगामी 20 वर्ष अर्थात् 2018 तक इसके दो गुने हो जायेंगे.
अस्तु संस्कृत भाषा का राजकीय सशक्तीकरण हो.
3. राष्ट्र भाषा संस्कृत हो एवं सरकारी राजभाषा हिन्दी हो जो संविधान में है, व्यवहार में नहीं. 
4. राष्ट्र भाषा संस्कृत और राजभाषा के राजकीय सशक्तीकरण हेतु जनजागरण तथा अंग्रेजी को सहराजभाषा से हटाने हेतु संविधान संशोधन करना होगा. 
इस कार्य के लिये योग्य व्यक्ति का उसी तरह चयन करना होगा जिस तरह पूज्य श्री गुरुजी ने एकनाथ जी का चयन किया था और उन्होंने सभी दलों के सांसदों से हस्ताक्षर कराकर गृहमंत्री लालबहादुर शास्त्री को दिया और नेहरू जी ने मुख्यमंत्री षड़मुखम् को संन्देश दे कर निर्विरोध विवेकानन्द शिला स्मारक बनवाई. 
मित्रों सरकार की इच्छा शक्ति और कुशल 

संगठन के मेधावी कार्यकर्ताओं से ही यह सम्भव होगा. और  यू एन.ओ.तथा हिन्दी सम्मेलन इसमें कारक बनेंगे. 
5- देवनागरी लिपि दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि है, सभी भारतीय भाषाओं का लेखन देवनागरी में हो. 
भाषा समस्या समाधान और राष्ट्रीय गौरव हेतु अपने सुझावों के साथ इसे पोस्ट करें

Friday, 6 October 2023

उपनिषद् upnishad prarthana

उपनिषद् - प्रार्थना

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

(1,2)  ईशावास्योपनिषद-(1)
       बृहदारण्यकोपनिषद्(11)

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

(3,4)
केनोपनिषद् (2)
छंदोपनिषद (10)

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत् अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 

(5,6,7)
प्रश्नोपनिषद् (4)
मुण्डकोपनिषद्(5)
माण्डूक्योपनिषद् (6)

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा: सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

(8)
ऐतरेयोपनिषद् (7)

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम् ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

(9)
तैत्तिरीयोपनिषद (8)

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम्  ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः शान्तिः ।

(10,11)
श्वेताश्वतरोपनिषद्(9)
कठोपनिषद (3)

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
 सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। 
ॐ शान्तिः शान्तिः ॥ शान्तिः !!!


 

Thursday, 5 October 2023

उपनिषद: सार upnishad

 

उपनिषद

सनातन वैदिक धर्म के ज्ञानकाण्ड को उपनिषद् कहते हैं । सहस्त्रों वर्ष पूर्व भारतवर्ष में जीव-जगत तथा तत्सम्बन्धी अन्य विषयों पर गम्भीर चिन्तन के माध्यम से उनकी जो मीमांसा की गयी थी, उपनिषदों में उन्हीं का संकलन है। उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं । ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं । इनमें परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक विवेचन किया गया है । उपनिषदों में कर्मकांड को 'अवर' कहकर ज्ञान को इसलिए महत्व दिया गया कि ज्ञान स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है । ब्रह्म, जीव और जगत्‌ का ज्ञान पाना उपनिषदों की मूल शिक्षा है । उपनिषद ही समस्त भारतीय दर्शनों के मूल स्रोत हैं, चाहे वो वेदान्त हो या सांख्य या जैन धर्म या बौद्ध धर्म । उपनिषदों को स्वयं भी वेदान्त कहा गया है । दुनिया के कई दार्शनिक उपनिषदों को सबसे बेहतरीन ज्ञानकोश मानते हैं । उपनिषद् भारतीय सभ्यता की विश्व को अमूल्य धरोहर है । मुख्य उपनिषद 13 हैं । हरेक किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है । ये संस्कृत में लिखे गये हैं । १७वी सदी में दारा शिकोह ने अनेक उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया ।

पाश्चात्य विद्वान और उपनिषद: सन् 1775 ई. के पहले तक किसी भी पाश्चात्य विद्वान की दृष्टि उपनिषदों पर नहीं पड़ी थी । अयोध्या के नवाब सुराजुद्दौला की राजसभा के फारसी रेजिडेंट श्री एम. गेंटिल ने सन् 1775 ई. प्रसिद्ध यात्री और जिन्दावस्ता के प्रसिद्ध आविष्कारक एंक्वेटिल डुपेर्रन को दारा शिकोह के द्वारा सम्पादित उक्त फारसी अनुवाद की एक पाण्डुलिपि भेजी । एंक्वेटिल डुपेर्रन ने कहीं से एक दुसरी पाण्डुलिपि प्राप्त की और दोनों को मिलाकर फ्रेंच तथा लैटिन भाषा में उस फारसी अनुवाद का पुन: अनुवाद किया । लैटिन अनुवाद सन् 1801-2 में ‘ओपनखत’ नाम से प्रकाशित हुआ । फ्रेंच अनुवाद नहीं छपा । बाद में प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक शेपेनहावर- सन् 1788-1860) ने गम्भीर अध्ययन पश्चात लिखा- ‘मैं समझता हूँ कि उपनिषद् के द्वारा वैदिक साहित्य के  साथ परिचय लाभ होना वर्तमान शताब्दी (सन् 1818) का सबसे अधिक परम लाभ है जो इसके पहले किन्हीं भी शताब्दियों को नहीं मिला । चौदहवीं शताब्दी के ग्रीक साहित्य के अभ्युदय में ग्रीक-साहित्य के पुनरभ्युदय से यूरोपीय साहित्य की जो उन्नति हुई थी, संस्कृत- साहित्य का प्रभाव उसकी अपेक्षा कम फल उत्पन्न करने वाला नहीं होगा।’ वे उपनिषदों  के बारे में आगे लिखते हैं- ‘जिस देश में उपनिषदों के सत्य समूह का प्रचार था, उस देश में ईसाई-धर्म का प्रचार व्यर्थ है।’ शेपेनहावर की भाविष्यवाणी सिद्ध हुई और स्वामी विवेकानन्द की शिष्या ‘सारा बुल’ ने अपने एक पत्र में लिखा कि “जर्मन  का दार्शनिक सम्प्रदाय, इग्लैण्ड के प्राच्य पण्डित और हमारे अपने देश के एरसन आदि साक्षी दे रहे हैं कि पाश्चात्य विचार आजकल सचमुच ही वेदान्त के  द्वारा अनुप्राणित हैं ।” सन् 1844 में बर्लिन में श्रीशेलिंग महोदय की उपनिषद सम्बन्धी व्याख्यानोंव्याखान को सुनकर मैक्समूलर का ध्यान सबसे पहले संस्कृत की ओर आकृष्ट हुआ । शोपेनहार लिखता है- “सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान जीवन को उँचा उठाने वाला कोई दूसरा अध्ययन का विषय नहीं है। उससे मेरे जीवन को शान्ति मिली है, उन्हीं से  मुझे मृत्यु में भी शान्ति मिलेगी।” शोपेनहार आगे लिखता है- ‘ये सिद्धान्त  ऐसे हैं, जो एक प्रकार से अपौरषेय ही हैं । ये जिनके मस्तिष्क की उपज हैं, उन्हें निरे मनुष्य कहना कठिन है ।  शोपेनहार के इन्हीं शब्दों के समर्थन में प्रसिद्ध पश्चिमी विद्धान मैक्स मूलर लिखता है-‘शोपेनहार के इन शब्दों के लिये यदि किसी समर्थन की आवश्यकता हो तो अपने जीवन भर के अध्ययन के आधार पर मैं उनका प्रसन्नतापूर्वक समर्थन करूँगा’

              जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान पाल डायसन ने उपनिषदों को मूल संस्कृत में अध्ययन कर अपनी टीप देते हुए अपनी पुस्तक (philosophy of the Upanisads) में लिखा-‘उपनिषद के भीतर, जो दार्शनिक कल्पना है, वह भारत में तो अद्वितीय है ही, सम्भवत: सम्पूर्ण विश्व में अतुलनीय है’  मैक्डानल कहता है,‘मानवीय चिन्तना के इतिहास में पहले पहल वृहदारण्यक उपनिषद में ही ब्रह्म अथवा पूर्ण तत्व को प्राप्त करके उसकी यर्थाथ व्यंजना हुई है।’ फ्रांसीसी विद्वान दार्शनिक विक्टर कजिन्स् लिखते हैं,-‘जब हम पूर्व की और उनमें भी शिरोमणि स्वरूपा भारतीय साहित्यिक एवं दार्शनिक महान् कृतियों का अवलोकन करते हैं, तब  हमें  ऐसे अनेक गम्भीर सत्यों का पता चलता है, जिनकी उन निष्कर्षों से तुलना करने पर जहाँ पहुँचकर यूरोपीय प्रतिभा कभी-कभी  रुक गयी है, हमें पूर्व के तत्वज्ञान के आगे घुटना टेक देना चाहिए । जर्मनी के एक दूसरे प्रसिद्ध दार्शनिक फ्रेडरिक श्लेगेल लिखते हैं- ‘ पूर्वीय आदर्शवाद के प्रचुर प्रकाश पुंज की तुलना में  यूरोपवासियों का उच्चतम तत्वज्ञान ऐसा ही लगता है, जैसे मध्याह्न सूर्य के व्योमव्यापी प्रताप की पूर्ण प्रखरता में टिमटिमाती और अनल शिखा की कोई आदि किरण, जिसकी अस्थि और निस्तेज ज्योति ऐसी हो रही हो मानो अब बुझी कि  तब ।’

              उपनिषदों सार - उपनिषदों की संख्या लगभग 108 है, जिनमें से प्रायः 11 उपनिषदों को मुख्य उपनिषद् कहा जाता है । मुख्य उपनिषद, वे उपनिषद हैं, जो प्राचीनतम हैं और जिनका आदि शंकराचार्य से लेकर अन्य आचार्यों ने भाष्य किए हैं - (1) ईशावास्योपनिषद्, (2) केनोपनिषद् (3) कठोपनिषद् (4) प्रश्नोपनिषद् (5) मुण्डकोपनिषद् (6) माण्डूक्योपनिषद् (7) तैत्तरीयोपनिषद्  (8) ऐतरेयोपनिषद् (9) छान्दोग्योपनिषद्  (10) बृहदारण्यकोपनिषद्  (11) श्वेताश्वतरोपनिषद् ।आदि शंकराचार्य ने इनमें से १० उपनिषदों पर टीका लिखी थी। इनमें माण्डूक्योपनिषद सबसे छोटा और बृहदारण्यक सबसे बड़ा उपनिषद। 

Thursday, 7 September 2023

महात्मा गांधी और स्वच्छता

महात्मा गाँधी और स्वच्छता (भाग एक )

  गांधी जी ने कहा था ‘स्वच्छता आजादी से अधिक महत्त्वपूर्ण है। मुझे पहले स्वच्छ भारत चाहिए बाद में आजादी।’
१९१७ में गाँधी ने कहा था, जब तक हम अपने गाँवों और शहरों को नहीं बदलते, अपनी आदतों को नहीं बदलते, बेहतर शौचालय नहीं बनाते तब तक स्वराज का कोई अर्थ नहीं।
चम्पारन से स्वच्छता का गाँधी का पहला कदम था।
एक तरफ देश की आजादी की लड़ाई चल रही थी तो दूसरी ओर गाँधी साथ में स्वच्छता आन्दोलन की बात भी उतनी ही सिद्दत से कर रहे थे। 
उनका मानना था कि स्वच्छता से स्वास्थ्य ठीक होगा और स्वच्छता और स्वास्थ्य दोनों से देश मजबूत होगा।
जब देश स्वच्छ नहीं होगा तब तक देश का विकास अधूरा है।

वस्तुतः विचार करें तो स्वतंत्रता से देश की मोदी सरकार के आने तक किसी भी सरकार ने स्वच्छता को उतना जोर नहीं दिया जितना गाँधी जी की इच्छा थी। 
मोदी जी का यह स्वच्छता उनकी न केवल गाँधी के प्रति श्रद्धांजलि है, बल्कि देश को समझने का परिणाम है।
स्वच्छता के लिए इस देश के कुछ नेताओं ने भी अवश्य प्रयत्न किया जिनमें, डॉ राम मनोहर लोहिया, इंदिरा गाँधी, जयराम रमेश और डॉ रघुवंश प्रसाद।
मोदी जी ने १५ आगस्त ,२०१४ को लाल किले से अभियान की घोषणा कर खुले में शौचालय से मुक्ति और हर घर में शौचालय का अभियान चलाया।
मोदी जी का मिशन हडप्पा काल की स्वच्छता से अपने को जोडऩा है।
आज स्वच्छता आन्दोलन बन गया है।
स्कूल, कालेज तथा विभिन्न सरकारी एजेन्सियाँ पोस्टर, जागरण, गोष्ठियों तथा प्रतियोगिताओं के माध्याम से जागरण कर रही हैं। 

माना जाता है कि सिंगापुर के प्रधान लीक बान यून ने १९६५ में जब देश की सत्ता संभाली तो अपने प्रधानमंत्री से पूछा कि देश के विकास के लिए क्या करना चाहिए। 
तब उनके प्रधान मंत्री ने चार बातें बताई थीं जिनमें दो बाते प्रधान थीं- एक: हमारे यहाँ के नागरिक सडक़ों, रास्तों में न केवल थूकते हैं बल्कि नाना प्रकार की गंदगी करते हैं, उसे बन्द किया जाना चाहिए। इसके लिये कड़ा दण्ड विधान हो।
दूसरा: सिंगापुर को उद्योगिक घरानों से मुक्त रखना चाहिए। हमें अपनी मार्कटिंग पर ज्यादा ध्यान रखना चाहिए।
प्रभाव यह हुआ कि जिस देश की प्रति व्यक्ति आय १९६४ में ४०० डालर थी, वह १९९० में १२०० डालर हुई और आज ५७००० डालर है। 
तात्पर्य यह कि स्वच्छता विकास का कारगर पैमाना है। और इसे गांधी जी के अभियान से जोड़कर समझाने में मुझे कोई सकोंच नहीं.

गांधी जयन्ती के अवसर पर हमारे देश ने भी स्वच्छता का संकल्प लिया है जिसमें खेल जगत से लेकर, सिने, किसान और फौज तथा स्कूल तक जुड़ गये हैं। 
सार्वजनिक स्थान स्वच्छ दिखने भी लगें हैं किन्तु हमें अभी गाँधी के स्वच्छता के दस सूत्रों को विस्मरण नहीं करना चाहिए जो न केवल भौतिक सफाई की बात का रहे हैं बल्कि पूरी मनुष्यता के उत्थान की बात कर रहे है. उस अस्पृश्यता की ओर संकेत कर रहे है जो मनुष्यता के लिए कलंक है.
 

इस अवसर पर गाँधी के स्वच्छता के सूत्र को आत्मसात करना होगा जो आज भी उतने ही प्रासंगिक है जो देश की स्वतंत्रता के पहले थे -
१. स्वच्छता स्वभाव बने। हर कोई अपना कचरा स्वयं साफ करे।
२. राजनीतिक स्वतंत्रता से जरूरी स्वच्छता है। ( चूकि अब हमें आजादी मिल चुकी है तो शारीरिक और मानसिक स्वच्छता की उतनी ही आवश्यकता है।)
 ३. यदि कोई व्यक्ति स्वच्छ नहीं है तो वह स्वस्थ्य नहीं रह सकता।
४. बेहतर साफ-सफाई से ही गाँवों को आदर्श बनाया जा सकता है।
५. शौचालय को ड्राइंग रूम से भी अधिक साफ रखना चाहिए।
६. नदियों को स्वच्छ रख कर हम अपनी सभ्यता को जिन्दा रख सकते हैं।
७. अपने अन्दर की स्वच्छता को बढ़ाया जाना चाहिए, शेष बातें सब अपने आप ठीक हो जायेगी।
८. मैं किसी को गंदे पैर से अपने मन और घर से नहीं गुजरने दूँगा। 
९. अपनी गलती को स्वीकार करना छाडू लगाने के समान है, जो अपने अन्दर को चमकदार बनाये रखती है।
१०. स्वच्छता आचरण में बादत बन जाये।
पढ़ते – पढ़ते (निरन्तर)..

Monday, 4 September 2023

आओ
तुम  भी
स्मरण कर लो
भूलने से पहले 
वह दर्द क्या था ?

दो पीढ़ियों ने झेली है 
वह असह्य वेदना
निरापराध सजा
तोड़ दी थी नशें
विकलांग जीने को
विवश कर दिया था
तुम्हारे पुरखों ने 
 चाहते हो जानना 
वह दर्द क्या था ?
 
आधी रात को
उठा लिया गया था
बीमार, बूढ़े बाप को
डाल दी गई थी
हाथ पैर में 
हथकड़ी और बेड़ियां 
 
बताते रहे वे 
निरपराध जन हूँ 
शिक्षक हूं
  लेखक हूं
 बर्तन,घी,गल्ले का
व्यावसायी हूं
  युवा-विद्यार्थी हूं
  मजदूर- अन्नदाता हूं
  पत्रकार हूं, समाजसेवी हूं
मार खा घिसटते रहे 

पूछोंगे नहीं !
क्या आपराध था उनका ?
स्वीकार नहीं था नेतृत्व
उन्हें तुम्हारा  
क्योंकि तुमने 
तोड़ी थी लोकतंत्र की मर्यादा 
अनदेखा किया था न्याय का आदेश 
हिला दिया था प्रजातंत्र के खम्भे 
बना दिया था गूंगा-बहरा 
सारे तंत्र को 

बस जनता ने जनता को
इतना ही तो बताया था

और 
तुमने 
 बंद कर दिया उन्हें 
काल कोठरी में
जड़ दिए ताले
मकान, दुकान पर
बिलखते भूखे परिवार को
बा़ंध दिया था 
थाना-पुलिस ने 
आतंकी धमकियों से
पूछोंगे नहीं क्यों ?
 
तुम्हारे 
आश्वासन के मार्ग पर
 चलना नहीं चाहता था जन 
सत्ता की कल्याणकारी योजनाएं !
बना रही थीं बधिया
जवान -बूढ़े -अपाहिज को भी   
बंद कर दी थी तुमने
प्रेस की आवाज
 चाहते थे 
उनके साथ
चल कर हत्या करता चलूं 
उनके दुश्मनों के नाम पर अपनों को 

सच तो यह था कि
तुमको हमारे सुख -दुख से
पिता के असामयिक मृत्यु से
बिलखती मां से
पथराई आंखों से
डायलिसिस पर पड़े बूढ़े से 
नहीं था कुछ भी सरोकार 
 
तोड़ दी थी 
न केवल बैसाखी परिवार की
बल्कि रौंद डाला था तुमने 
जनता के सपने
तोड़ दी थी हमारी टाँगें
व्यर्थ हो गया था
हमारा जीना न जीना

कोई दिलचस्पी नहीं थी
तुम्हारी देश दुनिया में 
चिंता थी तो सत्ता में बने रहने की

बुझ गया था आशा का सूरज
उनके  जुगनुओं के आश्वासन से

तुम्हारी  गरज
महज इतनी थी कि
जब तुम कहो  तब तुम्हारे  नारे में 
मेरा भी गला हो शामिल
तुम्हारे भाषण के लिखे
स्क्रिप्ट हम समाज में
नुक्कड़ चौराहों में 
मुनादी की तरह सुनाएँ 
जिससे बची रहे  
तुम्हारे कुचक्रों की सत्ता

किंतु दर्द सलाखों का
परिवार के होते विनाश का भी 
नहीं दिला सका  
अनुमोदन तुम्हारे स्याह-काले
इरादों को

आखिर तुम्हारा 
जमा क्रूर आसन
 डिगा, हिला,चरमराया
और धंसता गया
दिन -मास की गिनती के साथ 
जनता की आह में, कराह में

हां ! 
आज भी तुम काले बादल से
डरावने भूत से
विदेशी नक्कारों -नगाड़ों के साथ
छाये हो स्मृति पटल पर
दो कम पचास साल बाद भी।

किंतु 
अब भगवा किरणों ने
 दिया है
जीने का आश्वासन
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
अब तुम्हारी राह कठिन है
क्योंकि लोगों ने
उतार दिया है
तुम्हारा झंडा
तुम्हारे झंडे
अब जनता के झंडे नहीं हैं
तुम्हारी ताकत
हमारी ताकत नहीं है

हमें भर लिया है
वीर्यवान, धैर्यवान आश्वस्ति ने 
अपने बाजुओं में
 तुम्हारे पड़ोसियों को भी बता दी है
किस राह चलना है
 तय मंजिल पहुँचना है

हमने  प्रतिवर्ष 
तुम्हें भुलाते हुए
चलते-चलते बना ली है
दुर्गा दशप्रहरणधारिणी 
की मूर्ति 
तुम्हारे द्वारा रौंदे अधिष्ठान पर
जो दे रही है आश्वासन
उस काली छाया से  रक्षा की
समृद्धि की, एकात्मकता की
वसुधैव कुटुम्बकम् की
सर्वेभवन्तु सुखिन: की
जिसमें तुम्हारे वंशज भी शामिल हैं 

अब नहीं लगेगा आपातकाल 
मेरे पक्षधर न सही 
पर अब तुम भी 
बधुआ और पिट्ठू नहीं हो 
तुम्हें भी देश की खातिर 
चलना होगा हमारे साथ
हम दिलाते रहेंगे स्मरण
बार -बार इस दिन को
तब तक
जब तक तुम्हारे आंखों में 
 न दिखेगा शर्म का पानी,
झुक नहीं जायेगा 
माथा पछताबे से 

कायरता -भीरुता से अलग 
आत्म-सम्मान चाहिए तो
अब भी समझो तुम -हम 
हम हैं
और अब हमें 
स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर, जगद्गुरु ‘भारत’ होना है। 
आ जाओ साथ
या मार डालो अपनी जमीर को ।

   -उमेश  (25/6/23)

Monday, 28 August 2023

सफल राजनीति किंतु राष्ट्र नीति नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र सिंह जी आप ठीक कह रहे हैं किंतु -

यह सफल राजनीति होगी! किन्तु राष्ट्र नीति नहीं है। 

सत्ता रहेगी। व्यक्तिगत पद प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। किंतु समाज का एक बड़ा तबका जेंडर कोई भी हो जिस तरह प्रलोभी और अकर्मण्य हो रहा है उसका क्या होगा?

समाजिक सम्मान,समानता समरसता के नाम पर आरक्षण के दंश से पीड़ित प्रतिभा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शरण में देश -विदेश में कब तक शरणागत बधुआ मजदूर रहेगी।

आपको स्मरण होगा गरीबी उन्मूलन के समय और 1980 के आसपास से जिस तरह अर्जुन सिंह जी गरीबों के मसीहा बने थे, उसका हश्र क्या हुआ?

बोरा जी आये और उस काल से जो प्रदेश में तुष्टिकरण चला उसने सबसे पहले शिक्षा विभाग की रीढ़ तोड़ दी। बाद में दिग्विजय सिंह की अतिथि,संविदा,कर्मी विदेशी आयातित योजना ने प्रदेश के तंत्र को करप्शन और निठल्ले पन में ऐसा ढकेला। सड़कें, पुलिया तो धूल धूसरित गड्ढे में बदली ही थी, पंचायती राज ने पूरे गांवों को कई धड़ों में बांट दिया। तथाकथित अगड़ी -पिछड़ी सामाजिक संरचना में जबरदस्त खाई बढ़ती गई।

 आज शिवराज सिंह जी को भी सम्हालना कठिन हो रहा है। बल्कि उसी रास्ते पर चलना भी पड़ रहा है।

न चर्च कम हुए न मस्जिद और न ही श्रद्धा के नाम पर गली कूचों में खड़े होते जमीन अतिक्रमण के नाम पर मंदिर! 

ऊपर से करैला और नीम चढ़ा ब्यूरोक्रेट्स! गोविन्द नारायण सिंह के बाद अर्जुन सिंह जी और वीरेंद्र कुमार सकलेचा जी ही दो मुख्यमंत्री रहे जिनके आंख के इशारे से ब्यूरोक्रेट्स नाचते थे। 

मुख्यमंत्री की घोषणाएं विभाग और वित्त विभाग के बीच फुटबॉल बनी हैं। शीर्षस्थ ब्यूरोक्रेट्स का आपसी झगड़ा भी बड़ा कारण है।

एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सारी सरकार घिर गई है। मंत्री अपने सचिवों से परेशान हैं तो ब्यूरोक्रेट्स अपने अधीनस्थ से। 

पहले मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी का फोन कलेक्टर को हड़बड़ा देता था,अब पीएस, एसीएस की बात कलेक्टर मानने बाध्य नहीं तो स्थानीय मंत्री, नेता की कौन सुनता है! सबके अपने-अपने आका जो हैं।

ऐसे में घोषणाओं के वशीकरण से सरकार भले किसी की  बन जाये असरकार दलों को दल-दल में फंसना अपरिहार्य है। 

किसी ने फेसबुक पर लिखा है कि इतनी कैडरवान पार्टियों में मंत्री के लिए 24 कैरेट छोड़िए आठारह कैरेट के 30 चेहरे नहीं मिलते हैं। फिर 200 से ऊपर लाने का नारा किसी तरफ का हो क्या संदेश दे रहा है?