Friday, 2 December 2022

गुरु नानक देव

गुरु नानक देव

 धार्मिक कट्टरता के वातावरण में गुरु नानक जी ने धर्म को उदारता की एक नई परिभाषा दी। उन्होंने अपने सिद्धान्तों के प्रसार हेतु बिना गृहस्थ आश्रम का त्याग किए एक संन्यासी की भांति परिवार के साथ रहते हुए लोगों को सत्य और प्रेम का पाठ पढ़ाया और जगह-जगह घूमकर अंधविश्वासों, पाखण्डों का जमकर विरोध किया।

वे  सनातन सिद्धांत के प्रतिस्थापक थे, जिसमें  सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर का निवास माना जाता है। इसलिए वे सभी मत-पंथों को आपस में प्रतिस्पर्धा और बैर को त्याग कर साम्प्रदायिक सदभाव की स्थापना के पक्षपाती थे। 

इसके लिए सभी तीर्थों की यात्रायें की और सभी मत-पंथ के लोगों को अपना शिष्य बनाया। तथा हिन्दू जीवन-दर्शन और अन्य मत पंथों की मूल एवं सर्वोत्तम शिक्षाओं को सम्मिश्रित करके सनातन संस्कृति में एक नए मत की स्थापना की जिसका मूलाधार प्रेम और समानता थी,  यही बाद में सिख-धर्म कहलाया। 

भारत में अपने ज्ञान की ज्योति जलाने के बाद उन्होंने मक्का-मदीना की यात्रा की और वहाँ के निवासी भी उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। 25 वर्ष के भ्रमण के पश्चात् नानक कर्तारपुर में बस गये और वहीं रहकर उपदेश देने लगे।

 उनकी वाणी आज भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संगृहीत है। जिन-जिन स्थानों से गुरु नानक गुजरे थे वे आज तीर्थ स्थल का रूप ले चुके हैं। 

गुरु नानक ने अपने उपदेशों से जिस सांप्रदायिक एकता एवं सदभाव की ज्योति जलाई थी वह आज भी प्रज्वलित है। 

उनका धर्म सेवा, करुणा, प्रेम और आस्था का प्रतीक है तथा विश्वबन्धुत्व की प्रेरणा देता है।
              
गुरु  नानक जी का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गाँव में कार्तिक पूर्णिमा को एक खत्रीकुल में हुआ था। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। 

 इनके पिता का नाम कल्याणचंद या मेहता कालू जी था, माता का नाम तृप्ता देवी था। इनकी बहन का नाम नानकी था। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लडक़पन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढऩे लिखने में इनका मन नहीं लगा।

सात-आठ साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्राप्ति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोडऩे आ गए। 

तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएँ घटीं जिन्हें देखकर गाँव के लोग इन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानने लगे। बाल्यकाल से ही इनमें श्रद्धा रखने वालों में इनकी बहन नानकी तथा गाँव के शासक राय बुलार प्रमुख थे। नानक के सिर पर सर्प द्वारा छाया करने का दृश्य देखकर राय बुलार उनके सामने नतमस्तक हो गये।

नानक का विवाह सोलह वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ था। 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ। चार वर्ष पश्चात् दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ। दोनों लडक़ों के जन्म के उपरांत 1507 में नानक अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोडक़र मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़े।

गुरु नानाक देव चारों ओर घूमकर उपदेश करने लगे। 1521 तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य-मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। इन यात्राओं को पंजाबी में ‘उदासियाँ’ कहा जाता है।

मक्का में गुरु नानक देव जी पधारे थे। नानक जी सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्होंने निरर्थक माना। रूढिय़ों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। 

ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।

    उनके उपदेश का सार यही होता था कि ‘ईश्वर एक है’, उसकी उपासना हिंदू- मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपूजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। 

हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। लोगों ने इसकी  तत्कालीन इब्राहीम लोदी से  शिकायत की और ये बहुत दिनों तक कैद रहे। अंत में पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहीम हारा और बाबर के हाथ में राज्य गया तब इनका छुटकारा हुआ।

जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ। स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा आदि करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर अश्विन कृष्ण 10, संवत् 1597 (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को इनका परलोकवास हुआ।

 मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए। जब कि लोग यह विचार कर रहे थे कि नानक जी अपने बेटे श्रीचन्द को अपना उत्तराधिकारी बनायेंगे। किन्तु उन्होंने परिवार को नहीं प्रतिभा को मान दिया।

नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा ‘बहता नीर’ थी जिसमें  फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।
गुरु नानक सिखों के ऐसे गुरु (आदि गुरु) हैं , जिनके जीवन से जुड़े प्रमुख गुरुद्वारा साहिब आज भी श्रद्धा के केन्द्र तो हैं ही, उनके जीवन को भी समेटे हुए हैं-
1. गुरुद्वारा कंध साहिब- बटाला (गुरुदासपुर) गुरु नानक का यहाँ बीबी सुलक्षणा से 18 वर्ष की आयु में संवत् 1544 की 24वीं जेठ को विवाह हुआ था। यहाँ गुरु नानक की विवाह वर्षगाँठ पर प्रतिवर्ष उत्सव का आयोजन होता है।
2. गुरुद्वारा हाट साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) गुरुनानक ने बहनोई जैराम के माध्यम से सुल्तानपुर के नवाब के यहाँ शाही भंडार के देखरेख की नौकरी प्रारंभ की। वे यहाँ पर मोदी बना दिए गए। नवाब युवा नानक से काफी प्रभावित थे। यहीं से नानक को ‘तेरा’ शब्द के माध्यम से अपनी मंजिल का आभास हुआ था।
3. गुरुद्वारा गुरु का बाग- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) यह गुरु नानकदेवजी का घर था, जहाँ उनके दो बेटों बाबा श्रीचंद और बाबा लक्ष्मीदास का जन्म हुआ था।
4. गुरुद्वारा कोठी साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) नवाब दौलतखान लोधी ने हिसाब-किताब में गड़बड़ी की आशंका में नानकदेवजी को जेल भिजवा दिया। लेकिन जब नवाब को अपनी गलती का पता चला तो उन्होंने नानकदेवजी को छोड़ कर माफी ही नहीं माँगी, बल्कि प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन गुरु नानक ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
5. गुरुद्वारा बेर साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) जब एक बार गुरु नानक अपने सखा मर्दाना के साथ वैन नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए, जहाँ पर कि उन्होंने ईश्वर से साक्षात्कार किया। सभी लोग उन्हें डूबा हुआ समझ रहे थे, लेकिन वे वापस लौटे तो उन्होंने कहा- एक ओंकार सतनाम। गुरु नानक ने वहाँ एक बेर का बीज बोया, जो आज बहुत बड़ा वृक्ष बन चुका है।
6. गुरुद्वारा अचल साहिब- गुरुदासपुर अपनी यात्राओं के दौरान नानकदेव यहाँ रुके और नाथपंथी योगियों के प्रमुख योगी भांगर नाथ के साथ उनका धार्मिक वाद-विवाद यहाँ पर हुआ। योगी सभी प्रकार से परास्त होने पर जादुई प्रदर्शन करने लगे। नानकदेव जी ने उन्हें ईश्वर तक प्रेम के माध्यम से ही पहुँचा जा सकता है, ऐसा बताया।
7. गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक- गुरुदासपुर जीवनभर धार्मिक यात्राओं के माध्यम से बहुत से लोगों को सिख धर्म का अनुयायी बनाने के बाद नानकदेवजी रावी नदी के तट पर स्थित अपने फार्म पर अपना डेरा जमाया और 70 वर्ष की साधना के पश्चात सन् 1539 ई. में परम ज्योति में विलीन हो गए।

तात्पर्य यह कि नानक साहब का जीवन भारतीय सनातन परम्परा की वह उत्कृष्ट दृष्टि को प्रतिपादित करती है जो इस्लाम के संक्रमण काल में भारतीय चेतना को आत्मबोध कराने और हिन्दू से इस्लाम बने बन्धुओं के अन्दर एक ही ईश्वर का भाव पैदा करने में सहायक थी। यह बात अलग है कि इन सारे प्रयत्नों के बाद भी देश इस्लाम और ईसाइयत के ऐसे थपेड़ों को सहने को मजबूर हुआ जिसमें न केवल सिख परम्परा के गुरु का अकल्पनीय बलिदान हुआ बल्कि बार-बार हिन्दू बटा और देश के कई टुकड़े हुए। फिर भी यदि नानक देव न होत तो शायद ही हमें गुरु गोविन्द सिंह प्राप्त होते और देश की अस्मिता की पहचान स्थिर रहती। भावी पीढ़ी इस परमआत्मा की सदा ऋणी रहेगी।
प्रकाश पर्व पर नमन।

Thursday, 20 October 2022

सुप्रभात के साथ 
मेरे मित्र ने भेजा 
पुष्पित यौवन भरा गुच्छ 
उंगलियां मचल उंठी 
कुछ इस प्रकार 
नियति है देखना इनको 
यह जानते हुए भी 
कल इन्हें झड़ना है 
मुस्कराते इनके पराग 
मलय को उत्तेजित ही नहीं 
विवश कर रहे हैं 
पहुंचाने वंचितों की वस्तियों में 
जहां शीलन भरी वैचारिक 
गंदगी नथुनों को कर रही बीमार 
माली, मालिक, बगीचा, 
पड़ोसी टेसू और बबूल भी 
नहीं छोड़ना चाहता इन्हें 
किन्तु कोई भी तैयार नहीं 
स्थानीपन्न होने को

Sunday, 17 July 2022

अकादमिक मृत्यु नहीं होगी

विश्वास रखें,विश्वविद्यालयों में अकादमिक मृत्यु नहीं होगी ।

समझें,शिक्षा से जुड़ी संसदीय समिति की अहम सिफारिशें और देखें मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा की एक झलक भी।

   संसदीय समिति ने अपनी यह सिफारिशें सोमवार को राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू को सौंप दी है । करीब दो दर्जन सिफारिशों में समिति ने परीक्षा प्रक्रिया को मजबूती देने, शिक्षा को चंद संस्थानों की बढ़ती दखल आदि को लेकर भी अहम सुझाव दिए गए है। 

समिति ने स्कूल शिक्षा के लिए 20 और उच्च शिक्षा के लिए 16 सिफारिशें दी हैं । समिति का कहना है कि मौजूदा समय में परीक्षाओं में प्रश्न पत्र लीक होना, गलत प्रश्न पत्र देना, बड़े पैमाने पर नकल और छात्र- परीक्षक जैसे गठजोड़ लगातार देखने को मिल रहें हैं। 

रिपोर्ट में कहा गया कि इसकी जानकारी वेबसाइट पर भी डाली जाए, जिससे आम जन को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों और निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने की समय सीमा का ज्ञान हो सकेगा। 

 समिति ने कहा कि कोचिंग के साथ उच्च शिक्षण संस्थानों और कालेजों का गठजोड़ एक तरह का ब्लैक एजुकेशन है। ऐसी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए ऐसे संस्थानों की मान्यता रद्द करने और उन्हें दंडित करने के लिए सरकारों को एक तंत्र बनाना चाहिए। समिति ने ऐसे मामलों की जांच के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दल गठित करने का सुझाव दिया है।

 शिक्षा किसी भी राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वर्तमान परिदृश्य में रोजगार और नई वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए संसद की शिक्षा संबंधी समिति ने स्कूली पाठ्यपुस्तकों में सुधार को लेकर भी अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की।

 संसदीय समिति ने अपनी पड़ताल में ना सिर्फ सभी पहलुओं की समीक्षा की बल्कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं।

 शिक्षा से जुड़ी इस संसदीय समिति के अध्यक्ष राज्यसभा सदस्य डॉ विनय सहस्त्रबुद्धे हैं। शिक्षा संबंधी संसदीय समिति की सिफारिशें पाठ्यपुस्तकों में सुधार विषय पर रिपोर्ट –

 शिक्षण संस्थानों की कोचिंगों से मिलीभगत पर लगे रोक । शिक्षण संस्थानों के साथ कोचिंग संस्थानों की मिलीभगत, प्रश्न पत्र लीक, छात्र-परीक्षक गठजोड़ जैसे मुद्दों को लेकर संसदीय समिति ने चिंता जताई है और शिक्षा मंत्रालय से सिफारिश की है कि उच्च शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाना है तो इन विषयों से निपटना ही होगा। 

  उच्च शिक्षण संस्थानों को मिलने वाले सभी तरह के दान को शत-प्रतिशत टैक्स फ्री करने की भी सिफारिश की है। विदेश की तरह शिक्षकों के प्रदर्शन का आंकलन हो । परीक्षा प्रबंध और योग्यता के मानक भी तय हो । 

  स्कूल शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा के क्षेत्र तक जवाबदेही तय हो । इसमें शिक्षा विभाग को तिथिवार तय कार्यक्रम और कार्ययोजना के बारे में जानकारी दे ।  

   राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्धारित लक्ष्यों को स्कूल शिक्षा के माध्यम से हासिल करने के लिए संसदीय समिति ने शिक्षा विभाग से 30 जून तक खाका तैयार कर पेश करने को कहा है ।

  उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की कमी को दूर करने और पर्याप्त और योग्य शिक्षकों की तैनाती के लिए सरकार को शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में सुधार करने तथा स्कूली शिक्षा सबके लिए सुलभ हो और खाली पदों पर तुरंत भरने की चर्चा की है । 

  इसके अलावा विदेशों तर्ज पर देश में स्कूली शिक्षा से विश्वविद्यालय व कालेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की जवाबदेही भी तय करने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि इस तरह के प्रदर्शन मूल्यांकन से शिक्षण गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिलेगी।

  पाठ्यपुस्तकें पूर्वाग्रह से मुक्त हों, बाल सुलभ हो और उनमें संवैधानिक मूल्यों का समावेश भी हो। बस्ते का बोझ कम हो तथा कौशल विकास के लिए नई तकनीकों का हो इस्तेमाल।

  पढ़ाई- चित्रों, ग्राफिक्स और भ्रमण के माध्यम से हो। पढ़ाई में खेलों, नाटकों, अभिनय और कार्यशालाओं का हो उपयोग। नशीले पदार्थों के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जागरूकता हो ।

  संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में पाठ्य पुस्तकें हों साथ ही स्थानीय भाषा और बोली में पढ़ाई हो जिसके लिय  पुस्तकें होनी चाहिए ।पाठ्यपुस्तक बनाने में विषयों के विशेषज्ञों से लें राय। किताबों को स्टूडेंट फ्रेंडली बनाने पर हो जोर। 

  नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे मॉडल  विकसित हों। इतिहास की शिक्षा के लिए नई तकनीकों का हो इस्तेमाल। पाठ्यपुस्तकों में महिलाओं के योगदान को मिले प्रतिनिधित्व।

 उच्च शिक्षा संस्थानों को उद्योगों के साथ अपने जुड़ाव और वर्तमान स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। ताकि कुशल कर्मचारियों की कमी को खत्म किया जा सके।

  भारतीय उच्च शिक्षा आयोग के गठन के दौरान यह ध्यान दिया जाए कि किसी भी नियामक के कामकाज व अधिकारों में किसी तरह का टकराव न पैदा हो। उनके अधिकार और जवाबदेही में स्पष्टता होना चाहिए।

  डीम्ड विश्वविद्यालय की जगह सिर्फ विश्वविद्यालय शब्द के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए। क्योंकि इससे उच्च शिक्षा में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। खासकर विदेशों में इन संस्थानों को लेकर भ्रम रहता है।

  उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए परीक्षा प्रबंध योग्यता के मानक तय होने चाहिए। जिनका मूल्यांकन नैक रेटिंग के दौरान होना चाहिए । इससे ऐसे सभी संस्थानों की पहचान भी हो सकेगी।

मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा की एक झलक

संतोष का विषय है की मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा विभाग ने शिक्षक भर्ती, पाठ्यक्रमों का निर्माण, इतिहास बोध, रोजगारोन्मुखी, परिणाम मूलक पाठ्यक्रमों को लागू किया है ।

 मेडिकल, कृषि आधारित पाठ्यक्रमों को लागू किया है । शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा के मद्देनजर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण दिया जा चुका है ।

कम्पुटर, उद्यमिता , कौशल उन्नयन और भाषा कौशल आधारित प्रशिक्षण सभी शिक्षकों के लिए इसी माह से प्रारम्भ हो रहे हैं।

विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक कैलेंडर का कड़ाई से पालन होने से परिणाम समय पर आ पाए हैं । 

शोध और रोजगार के लिए विश्वविद्यालयों में एन्क्युवेशन सेंटर खोले जा रहे हैं । 

हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी में चिकित्सा और अभियन्त्रिकी के लिए पुस्तकें लिखाई जा रही हैं ।

नैतिक मूल्यों के लिए पाठ्यक्रम लागू किये गए हैं . आधारभूत संरचना के लिए प्रदेश भर के महाविद्यालयों,विश्वविद्यालयों को अनुदान देकर उन्नत किया जा रहा है ।

 राजगढ़ में व्यावसायिक पाठ्यक्रम आधारित स्वतंत्र महा विद्यालय खोला गया है । 

भारत सरकार के मदद से प्रदेश में लगभग सभी ट्रायबल एरिया में उच्च मानक के आधार पर स्वतंत्र माडल महाविद्यालय खोले जा रहे हैं ।

सच कहूँ तो इन दो वर्षों में  विद्यार्थियों को केंद्र बनाकर शिक्षक की गुणवत्ता , आधारभूत संरचना, वर्षों के लंबित न्यायालयीन प्रकरणों को सुलझाया गया है ।

नैक मूल्यांकन में पहली वार देश का कोई महाविद्यालय ए++ पाया है , तो माधव महाविद्यालय उज्जैन है ।

फिर भी जी ई आर बढ़ाना और रोजगार, स्वरोजगार देना चुनौती है, पर असम्भव चुनौती नहीं।

 तात्पर्य यह की तीन दिन पहले पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर जी की जो चिंताएं समाचार पत्र से लाकर फेसबुक तक आई हैं, जिन पर पाठकों ने अपनी भरपूर प्रतिक्रया दी है, उन सब का समाधान यदि आप धैर्य से समझें तो उच्च शिक्षा विभाग मध्य प्रदेश कर रहा है । 

सच यह भी है की कुलपतियों के चयन और उनकी कार्यशैली पर कहीं न कहीं चिंता स्वाभाविक है। प्रशासनिक अनुभव उनमें अवश्य कम होगा किन्तु अकादमिक अनुभव प्राय: सभी कुलपतियों में है। विभाग के पास क्षमतावान संम्भावनाओं से भरी शिक्षकों की (संख्या बल में थोड़ा कम सही किन्तु) अच्छी टोली है। 

 विश्वास रखिए मध्यप्रदेश में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में  अकादमिक मृत्यु नहीं होगी ।
 
सादर

Monday, 11 July 2022

गुरु शिष्य परंपरा



भारत की संपूर्ण परंपरा को ज्ञान परंपरा, ऋषि परंपरा, साधना परंपरा और सिद्ध परंपरा, गुरु- शिष्य परंपरा रही है।  विवेकानंद, महात्मा गांधी सहित संपूर्ण तेज परंपरा प्रकाश परंपरा ज्ञान परंपरा शौर्य परंपरा का बोध समाज में यथाशक्ति फैलाने को ही अपना स्वधर्म समझना चाहिए। जो सत्य का चित का और आनंद का धर्म है वही भारतीय संस्कृति का सुधर्म है ।

राष्ट्र से आगे ब्रह्मांड और परमेष्ठी तक को बौद्धिक स्तर पर स्पर्श करना चाहिए। इस व्यापक संदर्भ में स्वयं को तलाशना चाहिए। अंतर्दृष्टि की शक्ति को विकसित कर विराट लोक चेतना में प्रवेश करने की सामर्थ्य प्राप्त करना चाहिए ,तभी स्वधर्म का समझना संभव है ।
वर्तमान में वैचारिक दृष्टि में अनेक आसुरी शक्तियां दिखाई देती है जो व्यक्तित्व निर्माण में बाधक और अवरोधक तत्व के रूप में सामने आती है ।

हमें भारत अर्थात प्रकाश में रत , ज्ञान में रत भारती कहलाने का अधिकार है ।चेतना सूर्य की उपासना करते हुए स्वयं को ट्रांस एंड करते हुए पूरे भारत की चेतना के साथ और विश्वेश्वर की चेतना के साथ एक में वो कर हमारा यह समाज का मारी उच्च शिक्षा संस्थाएं काम करें यही मेरी मंगल कामना है भारत के अमर मदन की महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण है भारत में भारत में कुल परंपरा कुल परंपरा के गुरु परंपरा कहती है हमें भारत के साथ शेष विश्व को भी आधुनिक काल के संपूर्ण विश्व को जानने का शांत चित्र से प्रयास करना चाहिए पहले हमें भारत के सत्य को जानना चाहिए फिर उसको विश्व के सत्य के रूप में प्रकृति करण करना चाहिए यह संपूर्ण शक्ति अगर कहीं है तो भारतीय गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत है भारत को महत्व इस आर्थिक सांस्कृतिक पुरुषार्थ में है सनातन धर्म की साधना में है कोमलता में है रिजुता विवेक और पुण्य कर्मों की साधना में है बर्बरता पैसा चिता मैं जिस तरह से उभर रही है उसका सामना हम भारतीय प्रज्ञा परंपरा धर्म और श्रेष्ठ कार्य ईश्वरी उपासना के माध्यम से ही समाप्त कर सकते हैं बौद्धिक चेतना का जागरण बॉडी को का कर्तव्य राजसूय यज्ञ करना है बौद्धिक आलस्य के साथ केवल पश्चिम कर देना या विरोध प्रदर्शन करना दयनीय स्थिति है हमें पुरुषार्थ करना चाहिए इतिहास को समझना होगा इसके मूंग को कठोर बौद्धिक परिश्रम करने की आवश्यकता है और इसके लिए हमारी गुरु परंपरा उन्हें प्रेरणा देती है हमारी दृष्टि अगर हमारी परम जुड़ जाती है तो निश्चित रूप से मान्यताओं आस्थाओं और सत्य के आधार पर आज वैश्विक हमारी भी कुरु कुरु ताऊ के साथ लड़ सकते हैं.
आज के इस अत्यंत महान्य मैं आत्मा भरीत भावा भारित प्रेरणास्पद पावन अवसर पर मां भारती के चरणो में कोटि-कोटि नमन अर्पित करता हूं साथ ही उस गुरु परंपरा को भी प्रणाम करता हूं परंपरा आज अक्षर रुप से हमारे सामने हैं दिव्य चेतना को मंगलमय चेतना को भी प्रणाम करते हैं जो हमारे इन गुरु परंपराओं के अंदर विराजित है. हम जिस विराट चेतना की बात करते हैं व्हाट इस ब्रह्मांड से किस प्रकार जुड़ी हुई है इसकी संस्कृति की गहराई में जाना होगा संस्कृति सनातन संस्कृति है यह लक है आनंद मुल्क है चेतन मुल्क है सत्य मुल्क है वे द मुल्क है ऋषि मुल्क है ईश्वर मुल्क है आत्मा मुल्क है वह हम सबको किशन हम सब में से अपने आप को अभिव्यक्त करना चाहती है व्यक्त हो दान देना चाहते हैं या नहीं यह हमें तय करना होगा. जींस पहन लेने में कोई डर नहीं है जो जींस गुनगुना रहा है छटपटा रहा है वेद की दिशाओं की अभिव्यक्ति करना चाहता है उसको दबाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए
टी के अंदर तीन प्रकार की शक्तियां काम करती है वरना की एक चिंतन की और एक क्रिया की. एक प्रवाह है एक देवकूल और एक ऋषि कुल 1 पुत्र को. के पीछे हमारी संस्कृत का अत्यंत समृद्ध रूप में प्रामाणिक रूप में परिषद रूप में प्रवाह है देव कॉल रिसीव कॉल गुरुकुल और पवित्र कॉल.
हम परिवर्तन के विरोधी नहीं हैं अरे शास्त्र कहते हैं कि परिवर्तन का एक प्रयोजन होना चाहिए. गच्छति की जगत:, संस रति इति संसार:। वेद इसे नीति नीति कह कर बताना चाहते हैं एपीके विकसित हो रही है हास कर रही है उल्लास कर रही है । प्रहास कर रही है क्रीड़ा कर रही है।
हमारी संस्कृति चिरयौवना संस्कृति है।
इसी संदीपनी आश्रम में शिक्षा प्राप्त विद्या प्राप्त करने वाले श्री कृष्ण कहते हैं मैं चीर एक अव्यक्त हूं, विलसित होता हुआ निरंतर गुंजायमान निरंतर प्रकाशमान हूं। यही दृष्टि हमेशा चैतन्य की दृष्टि रही है। इसे ठीक से समझना होगा समझना होगा। हमारा सुधर्मा और जो धर्म का प्रभु अच्युत है उससे अलग होकर हम अपनी सुधर्म को समझ नहीं पाएंगे।
आदिगुरु वेदव्यास जी ने कहा है- मैं गुह्य ही ब्रह्म को बताता हूं- मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ नहीं है सारी सृष्टि के केंद्र में यह मनुष्य है. इसीलिए केंद्र को हम पटोले. उसकी ताकत क्या है उसका लक्ष्य क्या है और हम पूरे समाज को लेकर चिंतन करें. बोल समाज को क्यों लास्ट को लेकर. पूरे राष्ट्र ही को क्यों पूरे ब्रह्मांड को , परमेष्ठी को भी आत्मसात करें.
यह कैसे होगा? इसके लिए और बुद्धि की आवश्यकता है बुद्धि के लिए गुरु चाहिए, शास्त्र चाहिए इष्ट देवता चाहिए चाहिए।
आज के इस पावन अवसर पर इतना ही कहना चाहूंगा कि हम गुरु की मां में प्रवेश करें, तब तो रूपी गुरु को आत्मसात करें, गुरु को आत्मसात करें, शास्त्र की आत्मा को आत्मसात करें, और भारतीय गुरु शिष्य परंपरा को जीवन में जीने अभ्यास करें। हम सब ईश्वर के पी के निमित्त है गीता कहती है - निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन। हे सव्यसाची निमित्त मात्र हो जा।


संपूर्ण परंपरा की ज्ञान परंपरा निषाद परंपरा साधना परंपरा और सिद्ध परंपरा डोगरा परंपरा की अध्यक्षता रही है इतिहास डिस्ट्रिक्ट के सामने लाए तो जो घटनाओं के मध्य में पढ़ती हैं उनके बाहरी विस्तार तक संकीर्ण नहीं रहती विवेकानंद महात्मा गांधी सहित संपूर्ण तेज परंपरा प्रकाश परंपरा ज्ञान परंपरा शौर्य परंपरा का बोध समाज में यथाशक्ति फैलाने को ही अपना स्वधर्म समझना चाहिए जो सत्य का चित्र का और आनंद का धर्म है वही भारतीय संस्कृति का सुधर्म है राष्ट्र से आगे ब्रह्मांड और परमेष्ठी तक को बौद्ध के स्तर पर स्पर्श करना चाहिए इस व्यापक संदर्भ में स्वयं को लोकेट करना चाहिए अंतर्दृष्टि की शक्ति को विकसित कर विराट लोक चेतना में प्रवेश करने की सामर्थ्य प्राप्त करना चाहिए तभी स्वधर्म का बहुत संभव है दृष्टि से समाज में अनेक आसुरी शक्तियां दिखाई देती है बाधक और अवरोधक तत्व है हमें भारत अर्थात और रक्त निरंतरता के साथ भारती कहलाने का अधिकार है चेतना सूर्य की उपासना करते हुए स्वयं को ट्रांस एंड करते हुए पूरे भारत की चेतना के साथ और विश्वेश्वर की चेतना के साथ एक में वो कर हमारा यह समाज का मारी उच्च शिक्षा संस्थाएं काम करें यही मेरी मंगल कामना है भारत के अमर मदन की महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण है भारत में भारत में कुल परंपरा कुल परंपरा के गुरु परंपरा कहती है हमें भारत के साथ शेष विश्व को भी आधुनिक काल के संपूर्ण विश्व को जानने का शांत चित्र से प्रयास करना चाहिए पहले हमें भारत के सत्य को जानना चाहिए फिर उसको विश्व के सत्य के रूप में प्रकृति करण करना चाहिए यह संपूर्ण शक्ति अगर कहीं है तो भारतीय गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत है भारत को महत्व इस आर्थिक सांस्कृतिक पुरुषार्थ में है सनातन धर्म की साधना में है कोमलता में है रिजुता विवेक और पुण्य कर्मों की साधना में है बर्बरता पैसा चिता मैं जिस तरह से उभर रही है उसका सामना हम भारतीय प्रज्ञा परंपरा धर्म और श्रेष्ठ कार्य ईश्वरी उपासना के माध्यम से ही समाप्त कर सकते हैं बौद्धिक चेतना का जागरण बॉडी को का कर्तव्य राजसूय यज्ञ करना है बौद्धिक आलस्य के साथ केवल पश्चिम कर देना या विरोध प्रदर्शन करना दयनीय स्थिति है हमें पुरुषार्थ करना चाहिए इतिहास को समझना होगा इसके मूंग को कठोर बौद्धिक परिश्रम करने की आवश्यकता है और इसके लिए हमारी गुरु परंपरा उन्हें प्रेरणा देती है हमारी दृष्टि अगर हमारी परम जुड़ जाती है तो निश्चित रूप से मान्यताओं आस्थाओं और सत्य के आधार पर आज वैश्विक हमारी भी कुरु कुरु ताऊ के साथ लड़ सकते हैं.
आज के इस अत्यंत महान्य मैं आत्मा भरीत भावा भारित प्रेरणास्पद पावन अवसर पर मां भारती के चरणो में कोटि-कोटि नमन अर्पित करता हूं साथ ही उस गुरु परंपरा को भी प्रणाम करता हूं परंपरा आज अक्षर रुप से हमारे सामने हैं दिव्य चेतना को मंगलमय चेतना को भी प्रणाम करते हैं जो हमारे इन गुरु परंपराओं के अंदर विराजित है. हम जिस विराट चेतना की बात करते हैं व्हाट इस ब्रह्मांड से किस प्रकार जुड़ी हुई है इसकी संस्कृति की गहराई में जाना होगा संस्कृति सनातन संस्कृति है यह लक है आनंद मुल्क है चेतन मुल्क है सत्य मुल्क है वे द मुल्क है ऋषि मुल्क है ईश्वर मुल्क है आत्मा मुल्क है वह हम सबको किशन हम सब में से अपने आप को अभिव्यक्त करना चाहती है व्यक्त हो दान देना चाहते हैं या नहीं यह हमें तय करना होगा. जींस पहन लेने में कोई डर नहीं है जो जींस गुनगुना रहा है छटपटा रहा है वेद की दिशाओं की अभिव्यक्ति करना चाहता है उसको दबाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए
टी के अंदर तीन प्रकार की शक्तियां काम करती है वरना की एक चिंतन की और एक क्रिया की. एक प्रवाह है एक देवकूल और एक ऋषि कुल 1 पुत्र को. के पीछे हमारी संस्कृत का अत्यंत समृद्ध रूप में प्रामाणिक रूप में परिषद रूप में प्रवाह है देव कॉल रिसीव कॉल गुरुकुल और पवित्र कॉल.
हम परिवर्तन के विरोधी नहीं हैं अरे शास्त्र कहते हैं कि परिवर्तन का एक प्रयोजन होना चाहिए. गच्छति की जगत:, संस रति इति संसार:। वेद इसे नीति नीति कह कर बताना चाहते हैं एपीके विकसित हो रही है हास कर रही है उल्लास कर रही है । प्रहास कर रही है क्रीड़ा कर रही है।
हमारी संस्कृति चिरयौवना संस्कृति है।
इसी संदीपनी आश्रम में शिक्षा प्राप्त विद्या प्राप्त करने वाले श्री कृष्ण कहते हैं मैं चीर एक अव्यक्त हूं, विलसित होता हुआ निरंतर गुंजायमान निरंतर प्रकाशमान हूं। यही दृष्टि हमेशा चैतन्य की दृष्टि रही है। इसे ठीक से समझना होगा समझना होगा। हमारा सुधर्मा और जो धर्म का प्रभु अच्युत है उससे अलग होकर हम अपनी सुधर्म को समझ नहीं पाएंगे।
आदिगुरु वेदव्यास जी ने कहा है- मैं गुह्य ही ब्रह्म को बताता हूं- मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ नहीं है सारी सृष्टि के केंद्र में यह मनुष्य है. इसीलिए केंद्र को हम पटोले. उसकी ताकत क्या है उसका लक्ष्य क्या है और हम पूरे समाज को लेकर चिंतन करें. बोल समाज को क्यों लास्ट को लेकर. पूरे राष्ट्र ही को क्यों पूरे ब्रह्मांड को , परमेष्ठी को भी आत्मसात करें.
यह कैसे होगा? इसके लिए और बुद्धि की आवश्यकता है बुद्धि के लिए गुरु चाहिए, शास्त्र चाहिए इष्ट देवता चाहिए चाहिए।
आज के इस पावन अवसर पर इतना ही कहना चाहूंगा कि हम गुरु की मां में प्रवेश करें, तब तो रूपी गुरु को आत्मसात करें, गुरु को आत्मसात करें, शास्त्र की आत्मा को आत्मसात करें, और भारतीय गुरु शिष्य परंपरा को जीवन में जीने अभ्यास करें। हम सब ईश्वर के पी के निमित्त है गीता कहती है - निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन। हे सव्यसाची निमित्त मात्र हो जा।

Saturday, 2 July 2022

Ram Bhuwan Singh Kushwah कुलपति तो कुल के पति हैं।उनका वरण नहीं स्थापन होता है। घर जमाई बिगड़ैल बन जाये और कुल परम्परा तो बंदर के हाथ में झुनझुना ही होगी।

ऐसे में कुल की पद-प्रतिष्ठा चाटुकार,भाई- भतीजा,जाति -विरादरी, भाषा -भाषा, क्षेत्र-क्षेत्रीय हथिया ले तो वरण के लिए चयन करनेवाले ही दोषी हैं।

चयन की प्रक्रिया के पीछे मनोनयन हो रहा हो तो मन के नयन सदा नयन सुख ही बनेंगे आवश्यक नहीं।

मत छेड़िए, गहरा दर्द झेल रहा है, भारतीय ज्ञान परम्परा इस अजब गजब चयन तंत्र से। 

जाने दीजिए जिन्होंने तंत्र सुधारने का ठेका लिया है वो जाने।

Tuesday, 28 June 2022

आपको जाति, अगड़ा -पिछड़ा का प्रमाण-पत्र क्यों चाहिए? कुछ कठिनाई है? 

स्मरण रहे, पुरखों ने कहा है, जिस दिन आपके सामने कोई कठिनाई नहीं होगी, समझ लेना चाहिए कि आप ग़लत मार्ग पर चल रहे हैं।



यदि सिंहासन के एक, दो , तीन पायदान के लिए स्थान चाहिए तो इंतजार करते - करते कई पीढ़ियां भू-लुंठित हो जायेंगी।

और आप को तब तक इंतज़ार करना होगा जब तक कि आप यूज मी बनने लायक नहीं हो जायेंगे।

फिर भी स्मरण रहे, कोई लक्ष्य मनुष्य से बड़ा नहीं,हारा वही जो लड़ा नहीं।

 हां इसमें यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि आप तथाकथित अगड़ी के कौन से पायदान पर हैं? हां यहां भी लोचा है। आप तर्जनी हैं तो भी सुरक्षित हैं।समायोजन लायक हैं। 

यदि बहुत सारे धनुष बचपन में ही तोड़ डाले हैं तो फिर प्रतीक्षा आगे की कई पीढियों तक लम्बित है।

स्मरण रहे, जब तक आप दुःख पर विश्वास नहीं करते,तब तक आप ईश्वर पर भी विश्वास नहीं करते।

 परशुराम की प्रतीक्षा है या एकलब्य का अंगूठा दोनों में धनुष की टंकार अन्त:निहित है।

अतः स्मरण रहे, जैसा सोचोगे वैसा बन जाओगे।


महाभारत अभी पांच हजार साल पहले ही तो हुआ है। अश्वत्थामा अभी यदि जिंदा है तो भीष्म और धृतराष्ट्र भी हैं।

स्मरण रहे, ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारे पास हैं,वह हम ही हैं जो गांधारी बने, धृतराष्ट्र की सेवा कर रहे हैं।

वर्षों से एक पंक्ति पीढ़ी दर पीढ़ी सुनी जा रही है - बस वही लोग जीते हैं जो दूसरों के जीवन के लिए काम करते हैं।

अनुभव ही आपका सर्वोत्तम शिक्षक है,जब तक जीवन है, सीखते रहें।

हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिसमें चरित्र बसे, मानसिक विकास 



 

Sunday, 19 June 2022

योग yog

आप सही कह रहे हैं। सही भी है पेंशन पाकर, मुफ्त सुविधा हथिया कर जीवन का संघर्ष समाप्त होता है।

जीवन में भोग की वृत्ति बढ़ती है।

 वैराग्य का अभ्यास लगभग शून्य हो जाता है।

साहित्य स्मरण कराता है-

साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूं अतिथि न भूखा जाय।।

आज शिक्षा से विद्या जो जीवन में कला और मूल्य का बोध कराता है, पाठ्यक्रम में सिकुड़ता जा रहा है।

रोजगार और स्वरोजगार नैतिक आधार छोड़ रहे हैं।

दवा हो या दारू, भोजन हो भजन सब मिलावट के शिकार होकर समाज में ज़हर घोल रहे हैं।

पंच परमेशवर, दीपदान कहानी, हल्दीघाटी, तो छोड़िए चार पंक्ति की कविता-
'मुझे तोड़ लेना वन माली ' भी पाठ्यक्रम से गायब हो गई।

भाषा की परीक्षा वस्तु निष्ठ प्रश्न आधारित हो गई। कैसे जिंदा रहेगी मातृभाषा? जब विद्यार्थियों को लिखना ही नहीं आयेगा?

मंदिर, गुरुद्वारे,पूजाघर के मनोविज्ञान को पढ़ना-पढ़ाना गंगा -जमुनी के लय ताल के रसास्वाद को स्वाद विगाड़ता है!

तकनीकी ग्यान, आर्टीफिशियल इंन्टेलीजेंस की अपनी मर्यादा होते हुए भी सुरसा मुखी हो रही है।

अतः समझना होगा-

भारत भोग नहीं 'तेनत्यक्तेनभुंजिथा' है। संचय नहीं अपरिग्रह है। 

कल योग  को योगा दिवस के रूप में मनाया जायेगा, जहां से यम और नियम के दसों  नियामक तत्व गायब होंगे!

हर उस व्यक्ति का भाषण होगा , जो अंग -अंग को तोड़ता है, जो अपने पांचों इंद्रियों से अहार लेता है,वह खाद्य सामग्री का प्रत्याहार समझायेगा। 

जो पंच प्राण और उनके उप प्राणों को भी नहीं जानता वह प्राणायाम समझायेगा।

फिर भी इस योग की सुरसरी में अगर कुछ लोग भी गोता लगा ध्यान और समाधि का मोती प्राप्त कर सकेंगे तो भी इस आह्वान को सार्थक माना जायेगा।

विश्वास है आसन में बैठकर  सनातनी धारणा को आत्मसात कर हम अग्निवीर, त्यागवीर, दानवीर, कर्मवीर बन राष्ट्र और संस्कृति के संरक्षण और सेवा योग्य बन सकेंगे।

शुभकामनाएं

20/6/22