Wednesday, 18 August 2021

 

स्वाधीनता आन्दोलन की आधार भूमि  आध्यात्मिक रही है

यह बात हमारे इन महानुभाओं के कथन से स्पष्ट है -

स्वामी विवेकानंद : 

" स्वामी विवेकानंद ने 1892 में अपने भारत भ्रमण के दौरान यह जाना कि कोई भी राष्ट्र किसी गुलाम देश से शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता इसलिए नियति द्वारा भारत के लिए निर्धारित, मानवतावादी भूमिका को निभाने के लिए ‘भारत की स्वतंत्रता’ एक आवश्यकता थी। लेकिन यह स्वतंत्रता तब तक संभव नहीं हो सकती, जब तक कि भारत वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से एक नहीं हो जाता।"

 

उन्होंने भारत का आह्वान करते हुए कहा था- 'भारत जागो! विश्व जगाओ...।'

और  यही कारण था कि स्वामीजी ने संपूर्ण विश्व में वेदांत के अध्यात्म का परचम लहराकर देश को यह संदेश दिया कि जरूरत है कि हम अपने मूल ज्ञान की ओर अब लौट आएं। इसे ही स्वाधीनता सेनानियों ने माना की  भारत का राष्ट्रवाद ‘आध्यात्मिकता और सनातन धर्म’ ही है। इसका आधार  हिंदुत्वा है  और  भारत में हिन्दुत्व के पुनरुद्धार के बिना कोई राष्ट्रीय आंदोलन संभव नहीं था। स्वामी विवेकानंद ने ठीक यही किया, उन्होंने हिन्दुत्व का पुनरुद्धार किया। उन्होंने कहा, 'प्रत्येक राष्ट्र के जीवन की एक मुख्य धारा होती है, भारत में धर्म ही वह धारा है। इसे शक्तिशाली बनाइए और दोनों ओर का जल स्वत: ही इसके साथ प्रवाहित होने लगेगा। सच्चा धर्म मनुष्यों की शिक्षाओं से या पुस्तकों के अध्ययन से नहीं आता; यह तो हमारे भीतर स्थित आत्मा को जागृत करने से आता है जिसके परिणामस्वरूप शुद्ध और वीरतापूर्ण कार्य किए जा सकते हैं।

         

2. महर्षि अरविंद : बंगाल के महान क्रांतिकारियों में से एक महर्षि अरविंद देश की आध्यात्मिक क्रां‍ति की पहली चिंगारी थे। उन्हीं के आह्वान पर हजारों बंगाली युवकों ने देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदों को चूम लिया था। सशस्त्र क्रांति के पीछे उनकी ही प्रेरणा थी। अरविंद ने कहा था कि चाहे सरकार क्रांतिकारियों को जेल में बंद करे, फांसी दे या यातनाएं दे, पर हम यह सब सहन करेंगे और यह स्वतंत्रता का आंदोलन कभी रुकेगा नहीं। एक दिन अवश्य आएगा, जब अंग्रेजों को हिन्दुस्तान छोड़कर जाना होगा। यह इत्तेफाक नहीं है कि 15 अगस्त को भारत की आजादी मिली और इसी दिन उनका जन्मदिन मनाया जाता है।

महर्षि अरविंद की अध्यात्म आधारित थी , क्योंकि उन्होंने यह जाना कि आध्यात्मिक उत्थान के बगैर भारत की स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं इसीलिए उन्होंने भारत को आध्यात्मिक रूप से एक करने के लिए भारतीय ज्ञान की पताका विश्‍वभर में फैलाई ताकि भारतीयों में अपने ज्ञान के प्रति गौरव-बोध जाग्रत हो। गौरव-बोध के बगैर आजादी और स्वतंत्रता की अलख जगाना मुश्‍किल था।

 अरबिंदो का मानना था कि योग का मुख्य उद्देश्य अंतर-विकास करना हैं, जिससे कि व्यक्ति स्वयं को जान सकता हैं और मानसिक से ज्यादा आत्म-विकास कर सकता हैं, जिससे आध्यात्मिक शक्ति बढती हैं. श्री अरबिंदो ने एक बार लिखा था कि किसी आध्यत्मिक गुरु की बायोग्राफी लिखना मुश्किल है, क्योंकि उनके जीवन में ज्यादा परिवर्तन बाह्य नहीं बल्कि आंतरिक होते हैं,जिन्हें समझना आसान नहीं होता.

 ऐसा कहा जाता है कि अरविंद जब अलीपुर जेल में थे, तब उन्हें साधना के दौरान भगवान कृष्ण के दर्शन हुए। कृष्ण की प्रेरणा से वे क्रांतिकारी आंदोलन छोड़कर योग और अध्यात्म में रम गए।

 3. एनी बेसेंट : भारतीय राष्ट्रीय जागरण और स्वतन्त्रता अन्द्दोलन   से जुड़ीं 3 विदेशी महिलाएं उल्लेखनीय हैं- सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन और एनी बेसेंट। तीनों में एनी बेसेंट का नाम इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने भारतीय जनमानस को धार्मिक रूप से एक करने और स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था। सिस्टर निवेदिता विवेकानंद के आदर्शों से प्रेरित होकर भारत आईं, लेकिन एनी बेसेंट भारतीय दर्शन एवं हिन्दू धर्म के आकर्षण से थियोसॉफी के प्रसार हेतु भारत आई थीं।

            एनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र था- कर्म। एनी बेसेंट का भी यही विचार था कि राष्ट्र का विकास एवं निर्माण तभी संभव है, जब उस देश के विभिन्न धर्मों, मान्यताओं एवं संस्कृतियों में एकता स्थापित हो। उनका उद्देश्य था हिन्दू समाज एवं उसकी आध्यात्मिकता में आई विकृतियों को दूर करना।

 4. स्वामी सहजानंद सरस्वती : स्वामी सहजानंद सरस्वती (मूल नाम नौरंग) का जन्म 22 फरवरी 1889 को उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में महाशिवरात्रि के दिन हुआ और उनका निर्वाण 25 जून 1950 को पटना में हुआ। 'किसान आंदोलन' के जनक स्वामीजी आदिशंकराचार्य संप्रदाय के 'दसनामी संन्यासी' अखाड़े के दंडी संन्यासी थे। 1909 में उन्होंने काशी में दंडी स्वामी अद्वैतानंद से दीक्षा ग्रहण कर दंड प्राप्त किया और दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती बने। काशी में रहते हुए धार्मिक कुरीतियों और बाह्याडंबरों के खिलाफ मोर्चा खोला।  स्वामीजी को मूल रूप से किसान आंदोलन और जमींदारी प्रथा के खिलाफ किए गए उनके कार्यों के लिए जाना जाता है। इस आंदोलन के माध्यम से वे भी भारतमाता को गुलामी से मुक्त कराने के संघर्ष में कूद पड़े। वे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ भी वे अनेक रैलियों में शामिल हुए। आजादी की लड़ाई के दौरान जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो नेताजी ने पूरे देश में 'फॉरवर्ड ब्लॉक' के जरिए हड़ताल करवाई थी। राष्ट्रकवि 'दिनकर' के शब्दों में- 'दलितों का संन्यासी चला गया।'

5.दयानंद सरस्वती : गुलामी से मुक्ति का उपाय संपूर्ण भारतीयों की एक ही सोच हो और वह हो वेदों पर आधारित। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान चिंतक, समाज सुधारक और देशभक्त थे।

आर्य समाज की स्थापना का मूल उद्‍येश्य ही समाज सुधार और देश को गुलामी से मुक्त कराना था। उन्होंने धर्मांतरित हो गए हजारों लोगों को पुन: वैदिक धर्म में लौट आने के लिए प्रेरित किया और वेदों का सच्चा ज्ञान बताया। स्वामीजी जानते थे कि वेदों को छोड़ने के कारण ही भारत की यह दुर्दशा हो चली है इसीलिए उन्होंने वैदिक धर्म की पुन:स्थापना की। उन्होंने मुंबई की काकड़बाड़ी में 7 अप्रैल 1875 में आर्य समाज की स्थापना कर हिन्दुओं में जातिवाद, छुआछूत की समस्या मिटाने का भरपूर प्रयास किया।

6. स्वामी श्रद्धानंद : स्वामी श्रद्धानंद का जन्म 22 फरवरी 1856 को पंजाब के जालंधर में हुआ था स्वामी श्रद्धानंद का मूल नाम मुंशीराम था। वे भारत के महान राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे।

 स्वामी श्रद्धानंद ने देश को अंग्रेजों की दासता से छुटकारा दिलाने और दलितों को उनका अधिकार दिलाने के लिए अनेक कार्य किए। पश्चिमी शिक्षा की जगह उन्होंने वैदिक शिक्षा प्रणाली पर जोर दिया। इनके गुरु स्वामी दयानंद सरस्वती थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर स्वामीजी ने आजादी और वैदिक प्रचार का प्रचंड रूप में आंदोलन खड़ा कर दिया था जिसके चलते गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी।

 धर्म, देश, संस्कृति, शिक्षा और दलितों का उत्थान करने वाले युगधर्मी महापुरुष श्रद्धानंद के विचार आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं। उनके विचारों के अनुसार स्वदेश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा, स्व-शिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, वेदोत्थान, धर्मोत्थान को महत्व दिए जाने की जरूरत है इसीलिए वर्ष 1901 में स्वामी श्रद्धानंद ने अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान 'गुरुकुल' की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में 'गुरुकुल विद्यालय' खोला गया जिसे आज 'गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय' नाम से जाना जाता है।

7. बंगाल में संन्यासियों और फकीरों के अलग-अलग संगठन थे। पहले तो इन दोनों संगठनों ने मिलकर अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया; लेकिन बाद में उन्होंने पृथक्-पृथक् रूप से विरोध किया। संन्यासियों में उल्लेखनीय नाम हैं—मोहन गिरि और भवानी पाठक तथा फकीरों के नेता के रूप में मजनूशाह का नाम प्रसिद्ध है। ये लोग पचास-पचास हजार सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना पर आक्रमण करते थे। अंग्रेजों की कई कोठियाँ इन लोगों ने छीन लीं और कई अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। अंततोगत्वा संन्यासी विद्रोह और फकीर विद्रोह—दोनों ही दबा दिए गए।

8. कन्हाई लाल दत्त का जन्म जन्माष्टमी की कालीअधेरी रात में अपने मामा के घर चन्दनंनगर में हुआ था, कदाचित इसी से उनका नाम कन्हाई पड़ा हो। यद्यपि उनका आरम्भिक नाम सर्वतोष था। चन्दन नगर तब फ्रांसीसी उपनिवेश   था। वास्तव में तो उनका पैत्रिक घर बंगाल के ही श्री रामपुर  में था। पांच वर्ष बम्बई में रहने के बाद नौ वर्ष की आयु में वह वापस चन्दन नगर आ गये थे और वही उनकी प्रारम्भिक से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हुई। चन्दन नगर के डुप्ले कालेज से उन्होंने स्नातक की परीक्षा दी थी। उसी कालेज के एक प्राध्यापक चारु चन्द्र राय से गहनता के कारण कन्हाई को क्रान्ति पथ का परिचय प्राप्त हुआ था।

इन सब बन्दियो को अलीपुर कारागार में रखा गया था और वही पर इन क्रान्तिकारियो पर अभियोग चलाया गया। इसी कारण इस अभियोग का नाम अलिपुर षड्यंत्र रखा गया था। कन्हाई लाल दत्त के साथ-साथ उसके प्रेरक प्रोफ़ेसर चारु चन्द्र राय भी बन्दी बनाये गये थे। सब पर अभियोग चला किन्तु चारू चन्द्र राय को फ्रांसीसी सरकार की बस्ती का नागरिक होने के कारण रिहा कर दिया गया।इनके जीवन की प्रेरणा अध्यात्म की थी

 9. वासुदेव बलवंत फडके (4 नवम्बर 1845 – 17 फ़रवरी 1883) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे जिन्हें आदि क्रांतिकारी कहा जाता है। वे ब्रिटिश काल में किसानों की दयनीय दशा को देखकर विचलित हो उठे थे। उनका दृढ विश्वास था कि स्वराज ही इस रोग की दवा है। जिनका केवल नाम लेने से युवकों में राष्ट्रभक्ति जागृत हो जाती थी, ऐसे थे वासुदेव बलवंत फडके।

10. महाराष्ट्र के  पूना नगर में दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वासुदेव हरि चाफेकर नाम के तीन सगे भाइयों ने एक संघ की स्थापना की और युवकों को अर्द्ध-सैनिक प्रशिक्षण देकर ब्रिटिश साम्रज्य के विरुद्ध उन्हें तैयार किया। इन लोगों को लोकमान्य का संरक्षण प्राप्त था। इनकी भी प्रेरणा आध्यात्मिक थी

11. श्री बरिन्द्रनाथ घोष श्री अरविन्द, के तीसरे बड़े भाई थे सत्यकथा है कि २७ वर्ष की आयु में एक बार जंगल से गुजरते हुए उनकी मुठभेड़ एक बाघ (रॉयल बेन्गाल टाइगर) से हो गयी। उन्होंने बाघ को अपने हंसिये से मार गिराया था। इस घटना के बाद यतीन्द्रनाथ "बाघा जतीन" नाम से विख्यात हो गए थे।उन्हीं दिनों अंग्रेजों ने बंग-भंग की योजना बनायी। बंगालियों ने इसका विरोध खुल कर किया। यतींद्र नाथ मुखर्जी का नया खून उबलने लगा। उन्होंने साम्राज्यशाही की नौकरी को लात मार कर आन्दोलन की राह पकड़ी। सन् १९१० में एक क्रांतिकारी संगठन में काम करते वक्त यतींद्र नाथ 'हावड़ा षडयंत्र केस' में गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें साल भर की जेल काटनी पड़ी। जेल से मुक्त होने पर वह 'अनुशीलन समिति' के सक्रिय सदस्य बन गए और 'युगान्तर' का कार्य संभालने लगे।

वारींद्र घोष और भूपेन्द्र नाथ दत्त के सहयोग से 1907 में कलकत्ता में अनुशीलन समिति का गठन किया गया जिसका प्रमुख उद्देश्य था - "खून के बदले खून"। 1905 के बंगाल विभाजन ने युवाओं को आंदोलित कर दिया था, जो की अनुशीलन समिति की स्थापना के पीछे एक प्रमुख वजह थी।

एम्.एन. राय के सुझाव पर इसका नाम "अनुशीलन समिति " रखा गया।

 

1923 में वह पान्दुचेरी   चले गए जहाँ उनके बड़े भाई श्री अरविन्द   ने प्रसिद्ध "श्री औरोविंद आश्रम " बनाया था। श्री अरविन्द ने उन्हें आध्यात्म और साधना के प्रति प्रेरित किया जबकि श्री ठाकुर अनुकुलचंद उनके गुरु थे। इन्होने ही अपने अनुयायियों द्वारा बारीन्द्र की सकुशल रिहाई में मदद की थी। 1929 में 'बारिन' दोबारा कलकत्ता आये और पत्रकारिता शुरू कर दी। 1933 में उन्होंने "द डान ऑफ इण्डिया (The Dawn of India) नामक अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र शुरू किया। वह "द स्टेट्समैन से जुड़े रहे और 1950 में वह बांगला दैनिक बसुमती   के संपादक हो गए। 18 अप्रैल 1959 को इस महान सेनानी का देहान्त हो गया। वारींद्र घोष ने 1905 में क्रांति से सम्बंधित "भवानी मंदिर " नामक पहली किताब लिखी ! इसमें "आनंद मठ " का भाव था और क्रांतिकारियों को सन्देश दिया गया था की वह स्वाधीनता पाने तक सन्यासी का जीवन बिताएं!

  

 

 

 

Monday, 2 August 2021

 

मा रामदत्त जी सह सरकार्यवाह रा स्व संघ,  आयुक्त महोदय, विभाग के सभी अधिकारी और प्यारे विद्यार्थी।

 

प्रसन्नता की बात है कि स्वामी विवेकानन्द कॅरियर मार्गदर्शन योजना द्वारा विद्यार्थियों के लिए निरन्तर आयोजन किये जा रहे हैं। चाहे वे उनके प्लेसमेंट के लिए प्रशिक्षण के कार्यक्रम हो या उनके व्यक्तित्व निर्माण में प्रश्नमंच, कवितापाठ, निबंध प्रतियोगिताएँ हों  या इस तरह के बौद्धिक आयोजन।

 

उच्च शिक्षा विभाग अपने विद्यार्थियों को दो प्रकार से तैयार करता है।

 

एक तो मा प्रधानमंत्री जी की संकल्प की पूर्ति हेतु आत्मनिर्भर भारत और मा मुख्यमंत्री जी के आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश को ध्यान में रख कर विद्यार्थियों के कॅरियर के लिए राजगोर, स्वरोजगार और स्टार्टअप की चिंता करते हुए उनके स्किल उन्नयन के लिए विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण का आयोजन।

 

 इसी तारतम्य में हमने निर्णय किया है कि मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य होगा जो अपने स्नातक अंतिम वर्ष के प्रत्येक विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देकर एक ऐसा प्रमाण-पत्र दे कर भेजेगा जिससे उन्हें अपने पैर पर खड़े होने का अवसर प्राप्त हो।

 

दूसरा एक भारत, समर्थ्य भारत और राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के मद्देनज़र सभी विद्यार्थियों के मानसिक, बौद्धिक और आध्यत्मिक विकास की चिंता कर उन्हें अपने मूल स्वत्वों से जोडक़र, भारतीय संस्कृति, परम्परा का ज्ञान कराते हुए उनके व्यक्तित्व के विकास का प्रयत्न करता है।

 

 

स्वामी विवेकानन्द योजना का यह आज का यह कार्यक्रम उसी दिशा में एक कदम है। इस तरह के बौद्धिक कार्यक्रम प्रतिमाह किए जायेंगे तथा उनको यूटयूब और फेसबुक में लाइव किया जायेगा जिससे अधिकाधिक लाभान्वित हो सकें।

 

मुझे प्रसन्नता है कि आज के इस कार्यक्रम में लगभग चालीस हजार से अधिक विद्यार्थी और उनके शिक्षक दोनों प्लेटफार्मों के माध्यम से जुड़े हैं।

 

हम सब के लिए संतोष और आनन्द का विषय है कि आज के कार्यक्रम में मा रामदत्त जी का हम सब को गंभीर मार्गदर्शी उद्वोधन प्राप्त होगा जो हमारे व्यक्तित्व के निखार में पाथेय सिद्ध होगा। आदरणीय का आभार एवं आप सब को शुभकामनाएँ।

 

Wednesday, 28 July 2021

भारत

भारत जमीन का एक टुकड़ा भर नहीं है। जाग्रत देव है जिसके आध्यात्मिक सूत्र की परिधि द्वादश ज्योतिर्लिंगों, चार शंकर पीठों, इक्यावन शक्ति पीठों, इक्कीस गणपति क्षेत्र और इक्कीस सौर सिद्ध स्थलों को छूती है।

परन्तु दुर्योग, सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का विभाजन पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन है।  संसार में ईसाईयों, मुसलमानों और बौद्धों की कई जमीनें हैं। (ईसाइयों और बौद्धों के पास तो उज्जवल भविष्य भी है।) हिन्दुओं की एक ही जमीन है भारत और वह भी कलहग्रस्त, संशयग्रस्त, आपदात्रस्त। 

समस्या के एक सूत्र को समझें कि सागरमाथा गौरीशंकर कैसे एवरेस्ट बन जाता है और वर्णनातीत क्षमताओं वाले महाकवि कालिदास भारत के शेक्सपियर, महान योद्धा समुद्रगुप्त भारत का नेपोलियन बोनापार्ट। 

भारत शब्द दो ढंग से बन सकता है –
१. भरत + अण् = भारत
     (भरत की सन्तति)
२. भा: + रत = भारत
     (प्रकाश में रत)
इन दोनों में प्रथम मौलिक है।

प्रकारान्तर से ही सही हर सनातन धर्मावलम्बी भारत के भौगोलिक विस्तार को अपने दैनिक संकल्प में याद करता है।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे 
श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरने जंबुद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे.... 

वायु पुराण कहता है:-
सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। 
(वायु 31-37, 38)

अग्नि,वायु एवं विष्णु पुराण में समानार्थी श्लोक है :-
उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारतं नाम, भारती यत्र संतति।।

बृहस्पति आगम का कथन है :-
हिमालयं समारम्भ्य यावद् इन्दु सरोवरम।
तं देव निर्मित देशं, हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।

महर्षि पाणिनि के अष्टाध्यायी में वर्णित भारत और प्रान्तों के भूगोल से यहाँ केवल चार जनपदों की ही बात करते हैं।
(१.) कपिशी या कापिशी या कपिशा (वर्तमान नाम बेग्राम काबुल से लगभग पचास मील उत्तर)
(२ .) कापिशी से और भी उत्तर में कम्बोज जनपद था, इस समय दक्षिण एशिया का पामीर पठार है । 
(३.) मद्र जनपद-तक्षशिला के दक्षिण-पूर्व में मद्र जनपद  था, जिसकी राजधानी शाकल (वर्त्तमान में स्यालकोट) थी ।
(४.) त्रिगर्त देशः- वर्त्तमान पंजाब का उत्तर-पूर्वी भाग जो चम्बा से कांगडा तक फैला हुआ है, प्राचीन त्रिगर्त देश था । इसका नाम त्रिगर्त इसलिए पडा, क्योंकि यह तीन नदियों की घाटियों में बसा हुआ था, ये तीन नदियाँ थीं--सतलुज, व्यास और रावी । 

सन् 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग कि.मी. था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग कि.मी. है। जबकि पड़ोसी 9 देशों का क्षेत्रफल 50 लाख वर्ग कि.मी. बनता है।

शैव फिर प्रकृतिपूजक फिर बौद्ध और फिर विधर्मी बनी हमारी पश्चिमी भूमि! 26 मई, 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट स्थापित किया गया। 

उधर मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बडे राज्यों को संगठित कर पृथ्वी नारायण शाह नेपाल नाम से एक राज्य का सुगठन कर चुके थे। अंग्रेज ने विचारपूर्वक 1904 में वर्तमान के बिहार स्थित सुगौली नामक स्थान पर उस समय के पहाड़ी राजाओं के नरेश से संधी कर नेपाल को एक स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान कर अपना रेजीडेंट बैठा दिया। महाराजा त्रिभुवन सिंह ने 1953 में भारतीय सरकार को निवेदन किया था कि आप नेपाल को अन्य राज्यों की तरह भारत में मिलाएं। 

1955 में रूस द्वारा दो बार वीटो का उपयोग कर यह कहने के बावजूद कि नेपाल तो भारत का ही अंग है, पं. नेहरू ने पुरजोर वकालत कर नेपाल को स्वतन्त्र देश के रूप में यू.एन.ओ. में मान्यता दिलवाई। 

म्यांमार भूटान, श्रीलंका तिब्बत बिछड़े सभी बारी बारी!

फिर एक दिन कहा गया कि भारत अब आजाद हो रहा है लेकिन हमारी जमीन बंटेगी और इसे कैसे बांटना है यह अंग्रेज बहादुर और मुसलमान तय करेंगे। काहे की आजादी अंकल!
क्रमशः 

डॉ. मधुसूदन उपाध्याय 
२७/०७/१८
लखनऊ

Friday, 23 July 2021

soofi

 इस्लाम धर्म- इस्लाम धर्म में शरा और वेशरा दो प्रकार की कोटियाँ है। शरा सनातनी और बेशरा मस्तमौला फकीर थे। ये कभी कभार पीर-पैग़म्बर के चमत्कारपूर्ण करिश्मों का आश्रय लिया करते हैं। ये  अपने क्रिया कलापों में इस्लाम के मूल सिद्वांतों की भी उपेक्षा कर देते थे। इनका एक समुदाय ‘मजजूब’ नाम से प्रसिद्व हैं, जिनके अनुयायी न तो रोजा-नमाज को मानते हैं न पैगबंर के प्रति आस्थावान हैं। बेशरा साधक ‘मलावती’ कहलाते हैं, जो खुदा के कृपापात्र समझे जाते हैं। बेशरा संप्रदाय के अंतर्गत मदारी, मलंग, कलंदरी, रसूलशाही, लालशाह बाजि या,मूसा सुहागिया आदि कई उपसंप्रदाय हैं । इनकी अपनी-अपनी विशेषाताएँ हैं।

भारतीय सूफी बेशरा के अंतर्गत आते है। जो इस्लाम के अनुयायी होकर भी सनातनपंथी मुसलमानों से सब समय सर्वत्र मेल नहीं खाते। ऐसे संप्रदायों में पाँच मुख्य हैं: चिश्ती, कादिरी, सूहरवर्दी, नक्षबंदी और शत्तारी। चिश्ती संप्रदाय के दो उपसंप्रदाय हैं-साबिरी और निजामी। फिर निजामी की दो शाखाएं हैं-हिशमी और हाजशाही। इसी प्रकार कादिरी संप्रदाय की दो शाखाएं हैं -बहाबिया और रजाकिया। इनकी भी प्रशाखाएं हैं-मुकीम शाही और नौशाही। नौशाही के प्रवर्तक हाजी मुहम्मद बतलाये जाते है। इनके चार शिष्यों में से दो के नाम पर शाखाएं ‘पाक रहमानी’ और ‘सचयारी’ के रूप में प्रसिद्ध हुई। इसी प्रकार के सरशाही और बेनवा जैसे दो अन्य संप्रदाय भी है। पंजाब के ऐसे  ही संप्रदायों में हुसेनशाही और मियांखेल संप्रदायों के नाम लिये जाते हैं। सुहरवदी संप्रदाय के अंतर्गत जलाली, मखदूमी, मीरनशाही, दीलाशाही, इस्माइलशाही आदि कई शाखाएं हैं। नक्षबंदी सूफियों को सनातनी मुसलमानों में बहुत सम्मान प्राप्त हैं। औरंगजेब इन्हीं का मुरीद था। इन्हें संगीत व नृत्य के अतिरिक्त पीरपूजा, समाधिपूजा और दीपदान जैसी पद्धति स्वीकार्य नहीं है। शत्तारी संप्रदाय वाले कादिरी संप्रदाय वालों की तरह वस्त्र धारण करते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जो बाल नहीं रचाते और धर्मिक पाबंदियों के प्रति उदासीन रहते है। जो हो, सूफी-सम्प्रदाय भी भक्ति-आदोंलन के प्रभाव से अछूता न रह सका और उसकी भक्ति प्रेमाभक्ति के साँचे में ढ़लने लगी थी। 

केरल का शास्तपूजक संप्रदाय बंगाल के धर्म-ठाकुर, सहजिया, बाउल, सत्यपीर, कर्ताभाजा आदि संप्रदाय; उड़ीसा का पंचसखा संप्रदाय; महारष्ट्र के वारकरी और महानुभाव-संप्रदाय भक्ति आंदोलन की ही उपज है। जिनके अनुयायियों द्वारा भक्तिकाव्य की रचना हुई और इस प्रकार भक्ति साहित्य का विपुल भंडार समृद्ध हुआ। इस प्राकर कुल मिलाकर कुछ-कुछ प्रभाव हर संम्प्रदाय का उस समय था।