Sunday, 21 February 2021

सावरकर

 

 

आत्मज्ञानी  राष्ट्र-ऋषि  सावरकर 

-प्रो उमेश कुमार सिंह

 

भद्रं इच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः

तपो दीक्षां उपसेदुः अग्रे।

ततो राष्ट्र बलं ओजश्च  जातम्।

तदस्मै देवा उपसं नमन्तु।।

“आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के प्रांरभ में जो दीक्षा लेकर तप किया, उससे राष्ट्र निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ। इसलिए सब विबुध इस राष्ट्र के सामने नम्र होकर इसकी सेवा करें।’’

इस परिप्रेक्ष्य में वीर सावरकर को समग्रता से समझना हो तो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को समझना होगा। भारतीय बहुलवादी समाज में सावरकर के विचारों के पक्ष-विपक्ष के अध्ययन के लिए उनके राजनीतिक विचारों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता, चिंतन-पृष्ठभूमि उनकी हिंदू राष्ट्र की अवधारणा, विचार और दर्शन को भी समझना होगा।

ध्यातव्य है कि 19वी और 20वी शताब्दी के भारत में अध्यात्म दर्शन, संस्कृति, विद्या, व्यवसाय और राजनीति के क्षेत्र में श्री रामकृष्ण परमहंस, श्री अरविन्द, स्वमी विवेकानंद , महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, सुरेन्द्रनाथ बेनर्जी, दादाभाई नौरोजी, रास बिहारी बोस, मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, चित्तरंजन दास, डा. केशव बलिराम हेडगेवार, डा. राजेन्द्र प्रसाद और विनायक दामोदर सावरकर जैसी अनेक महापुरुषों की एक ऐसी विराट श्रृंखला ने जन्म लिया, जो  किसी भी समाज में एक साथ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं।

         इन तत्कालीन श्रेष्ठ नायकों के बीच वीर सावरकर की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि उन्हें दर्शन, अध्यात्म, इतिहास, संस्कृति और साहित्य का गहरा अध्ययन था जिसके आधार पर उन्होंने उसकी गहरी विवेचना की।

सावरकर पहले राष्ट्रीय युवा थे जिन्होंने 22 वर्ष की उम्र में विदेशी वस्त्रों की होली, गांधी के विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार से पहले जलाई । वे पहले ऐसे भारतीय भी थे जिन पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा चलाया गया और एंग्लो-सेक्सन लॉ से ब्रिटिश शासन के एजेण्टों ने दो बार का आजीवन कारावास सुनाया और दण्ड दिया।

 लंदन में पढ़ने वाले वे अकेले भारतीय विद्यार्थी थे जिन्हें बैरिस्टर की परीक्षा पास करने के बाद भी उस समय उपाधि इसलिए नहीं दी गई क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश क्राउन के प्रति निष्ठा की शपथ लेने से मना कर दिया था। यह वह शपथ थी जो श्री मोहनदास करमचंद गांधी, श्री जवाहर लाल नेहरू सहित सौ से अधिक भारतीयों ने लंदन में पढ़ाई के बाद बिना किसी हिचक के ली थी और ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी असंदिग्ध निष्ठा की घोषणा के साथ ही राजनीति शुरू की थी,  किन्तु  वीर सावरकर ने ऐसी कोई निष्ठा की शपथ नहीं ली। 

इस प्रकार हम पाते हैं कि उनके राष्ट्रीय राजनैतिक आचरण पर जो अंग्रेजों से समझौता करने का आरोप तथाकथित राजनैतिक लोगों द्वारा लगाया जाता रहा है, वह न केवल राजनैतिक विद्वेष से प्रेरित है,  बल्कि असत्य भी ।

हिंदुत्व के पुरोधा वीर सावरकर का स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान का मूल्यांकन भी अभी तक नहीं किया गया है। जब अंग्रेज अधिकारी रैड का वध करने के कारण1898 में चाफेकर बन्धुओं को फाँसी पर लटका दिया गया था , उसी समय 15 वर्षीय बालक दामोदर विनायक सावरकर ने अपनी कुलदेवी के समक्ष हुतात्माओं को श्रद्धांजलि देते हुए शपथ ली थी कि वे चाफेकर बंधुओं के कार्य को आगे बढ़ाएँगे। इतिहास साक्षी है कि सावरकर जी सतत् रूप से स्वतत्रता संघर्ष करते रहे। उन्होंने मित्र-मेला, अभिनव-भारत, स्वतंत्र भारत-संघ, हिन्दूसभा जैसी अनके संस्थाओं के माध्यम से राष्ट्र एवं लोकहित के अनेक कार्य किए।

उन्हें दो आजन्म कारावासों की सजा हुई थी। 1910 में उन्हें कालापानी की सजा के लिए अण्डमान भेजा गया था।  वहाँ कोल्हू चलाने जैसे श्रम-साध्य कार्य करने  होते थे। स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर भाग लेने के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली थी ।

विनायक दामोदर सावरकर की राष्ट्रीयता की अवधारणा का विश्लेशण उनके उपन्यासों के अध्ययन से किया जा सकता है। इनके सानिध्य में आये भोग-विलासी भी त्यागी बने, उदास-आलसी उद्यमी बने, संकुचित स्वार्थी-परोपकारी बने,जो केवल अपने परिवार में डूबे रहते थे, देश- धर्म के संबंध में सोचने लगे।

तात्पर्य है कि वीर सावरकर ऐसे अद्वितीय स्वतंत्रता प्रेमी थे जिन्होंने कभी भी यूरोक्रिस्चियन सभ्यता और ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा की कोई शपथ नहीं खाई और न कभी उसके लिए कोई कार्य किया। उन्होंने सदा ही भारतीय सभ्यता, हिन्दू संस्कृति और भारत राष्ट्र तथा भारतीय शासन लाने की ही शपथ खाई, उसी के लिए काम किया। 

सामाजिक कुरीतियों सम्बन्धी  उनके विचारों को समझे तो स्पष्ट होता है कि सावरकर जी कितने सजग थे।  उन्होंने पूरी शक्ति के साथ कहा अस्पृष्यता हमारे देश और समाज के मस्तक पर कलंक है। हमारे अपने ही हिन्दू समाज के, धर्म के, राष्ट्र के साथ करोड़ों  हिन्दू बंधु अभी तक इससे अभिशप्त हैं। हम अपने  ही बंधुओं को अस्पृश्य मानते हैं और अपने निकट वैसे ही नहीं आने देते जैसे  कि किसी अब्दुल  रशीद, औरंगजेब अथवा पूर्वी बंगाल में कत्लेआम करने वाले विधर्मी धर्मोन्मत्त व्यक्ति को।

 अन्तर्विरोधों से ग्रसित हिन्दू समाज को सामाजिक समरसता के लिए वे कहते हैं, हिन्दुओं  कुत्ते को छूते हो, सर्प को दूध पिलाते हो, प्रतिदिन चूहे का  खून चूसने वाली बिल्ली के साथ बैठकर एक ही थाली में खाते हो, तो फिर हे हिन्दुओं! अपने ही जैसे इन मनुष्यों को, जो तेरे ही राम और देवताओं के उपासक हैं, अपने ही देश  बान्धवों को छूने में तुम्हें किस बात की शर्म लगती है? त्याग दो यह शर्म ! अपनी इस शर्म पर शर्मिदा होना चाहिए।

सावरकर ने पहला कार्य यह किया कि जातिभेद और जात्याहंकार के विरूद्ध आवाज उठाई। उन्होंने कहा जाति भेद जात्याहंकार हमारे गंगा प्रवाह को विभक्त कर रहा हैं- आज जाति भेद देश हित के लिए अत्यंत घातक है, यह सिद्ध करने के लिए प्रमाणों का अभाव नहीं। एक साधारण सा प्रमाण तो यही  है कि वर्षों से रोटीबंदीऔर बेटी बंदीके सहस्त्रों गडढों में जो अपनी हिन्दू जाति का गंगा-प्रवाह विभक्त हो गया है, उसको वहाँ पड़े-पड़े सड़ा देने वाला कारण भी जाति भेद ही है। अतः यह सर्वथा घातक है और इसका कुछ न कुछ उद्धार तो होना ही चाहिए।

वीर सावरकर जी ने सावधान करते हुए कहा था अछूतपन-ब्राह्मणों से लेकर चाण्डाल तक सारे के सारे हिन्दू समाज की हड्डियों को उनमें प्रवेश कर चूस रहा है और सारा का सारा हिन्दू समाज इस जात्यांहकार गत द्वेष के कारण जातीय कलह प्रबलता से जीर्ण-शीर्ण हो गया है।

 ईसाइयत के विषय में गांधी जी की ही तरह वीर सावरकर को भी गहरी जानकारी थी। गांधी जी ने विविध ईसाई पंथों के बीच शताब्दियों चले खूनी संघर्ष का कोई जिक्र नहीं किया यद्यपि उन्हें उस तथ्य की जानकारी थी, तथापि वीर सावरकर ने उस तथ्य को भली-भांति प्रस्तुत किया। इसी प्रकार कितनी तरह के छल-बल से ‘‘कन्वर्जन’’ का कारोबार चलाया जा रहा है,  इसका भी प्रामाणिक दृष्टांतों सहित विवरण उन्होंने प्रस्तुत किया। आज भी इन तथ्यों से भारतीय समाज उचित प्रेरणा ले सकता है। यदि हमारे विद्वान लोग अपने ही समाज को तथ्य तक न बतायें तो फिर उनकी विद्वत्ता तो समाज में भ्रम ही पैदा करने वाली सिद्ध होगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि सावरकर जी केवल प्रखर राष्ट्रीय विचारक ही नहीं तो एक समाज सुधारक एवं भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं रूढ़िवादिता के विरोधी थे।

       वे ऐसे महान साहित्यकार थे जिन्होंने अपनी स्मृति के बल पर अडंमान की कालकोठरी में कीलों, कांटों और नाखूनों से दीवारों पर लिखकर तथा भारतीय सहबंदियों को उनके अंश कंठस्थ कराकर देशवासियों तक पहुँचाया। वीर सावरकर एक अत्यंत उत्कृष्ट राष्ट्रीय कवि हैं। मराठी में लिखी राष्ट्रभक्ति से भरपूर उनकी कविताएँ आज भी पाठकों को रोमांचित कर देती हैं। उनके उपन्यास जहाँ हिन्दू समाज और भारतीयों के भीतर आत्मगौरव का संचार करने में समर्थ हैं, वहीं जाति-भेद और अस्पृश्यता के विरुद्ध उनकी लेखनी आग उगलती है, वैसा तेजस्वी लेखन इस विषय पर गांधी जी का भी नहीं है।

       एक लेखक के रूप में वीर सावरकर ने भारतीय इतिहास का भी सार-संक्षेप बहुत ही रोचक और प्रभावशाली ढंग से जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है। 

‘भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ" का जैसा लेखन उन्होंने किया है, वैसा किसी भी अन्य भारतीय लेखक ने आधुनिक युग में नहीं किया है। वीर सावरकर की भाषा ओज और भावों से भरी हुई है।

सावरकर का कुंडलिनी कृपाण युक्त भगवा ध्वज ज्ञानस्वरूप् प्रकाश के आगे धरने से ज्ञान-चक्षुओं की दिखाने वाले अभ्युदय तथा निःश्रेयस् के चिंह प्रकट करता है। स्वतत्रंता प्राप्ति के बाद सावरकर कहते हैं कि मैं अपने घर में 15 अगस्त को दोनों ध्वज फहराता हूँ जिसमें एक होता है स्वतंत्रता का प्रतीक संविधानधृत तिरंगा और दूसरा परंपरा एवं संस्कृति का संवाहक, निःश्रेयस् और अभ्युदय का प्रतीक ऊँकार युक्त कुण्डलिनी कृपाणांकित गेरूआ ध्वज।’

11 मई 1952 को एक भाषण में सावरकर जी कहते हैं- आज का धर्म-अब अपना साध्य स्वाधीनता-संपादन नहीं, स्वाधीनता-संरक्षण है, राष्ट्र-संवर्धन है। अब निर्बन्ध-तुच्छता नहीं, निर्बन्धशीलता  विध्वंसक नहीं रचनात्मक प्रवृति यह हमारा राष्ट्र-धर्म है। “ 

सावरकर का यह कथन देश को आज एक ऐसा संदेश है जो सभी पूजापंथियों, मतावलम्बियों के एकता के साथ देश की प्रगति में जुटने को कहता हैं।

       अत्यधिक अस्वस्थ हो जाने पर अंदमान से तो मुक्त किया गया, पर रत्नागिरि में स्थानबद्ध रखा गया। समरसत्ता, लोकजागरण, धर्मशुद्धि, पतितपावन मंदिर की स्थापना, सहभोज आदि कार्यक्रमों करते हुए साहित्य साधना करते रहे। इस अवधि में चार नाटक- 1. संन्यस्त खड्ग, 2. उःश्राप, 3. बोधिवृक्ष तथा 4. उत्तरक्रिया  लिखा। 

सावरकर जी का मानना था कि, कला के बढ़ते वैज्ञानिक ज्ञान में यदि हमारा आज का ज्ञान गलत और अहितकारक सिद्ध हो तो  वह बाधक न बने। सावरकर अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में सशस्त्र क्रांतिकारी एवं उत्तरार्द्ध में दूरदर्शी राजनीतिज्ञ रहे 

अद्भुत जिजीविषा अप्रतिम देशभक्ति, प्रखर वक्तृत्व, अनुपमेय साहस, दुर्धर सघंर्ष, विज्ञाननिष्ठ उनकी पहचान है। 

वे ऐसे प्रथम भारतीय लेखक थे जिनकी पुस्तकें छपने से पहले ही इंग्लैण्ड और फ्रांस की सरकारों ने जब्त घोषित की। उन्होंने लगभग 80 लेख लिपि-शुद्धि पर लिखे। संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती और अंग्रेजी के साहित्य का उनका अध्ययन विराट था। सावरकर जी एवं उनके साहित्य का मूल्यांकन इसी दृष्टि से किये जाने की आगे भी आवश्यकता है।

जिस योग की चर्चा आज दुनिया भर के देशों में हो रही है, विश्व योग दिवस मनाया जा रहा है, उस समय उसके बारे में उनका मानना था कि योग ऐसा विषय है जिसमें कोई धर्म आड़े नहीं आता। सावरकर जी से कोई योग के बारे में पूंछता तो कहते, “योग यह चर्चा का विषय नहीं है, यह स्वंय करके अनुभव लेने का शास्त्र है।” योग साधना के बल पर ही उन्होंने कहा था “मृत्यु ! तुम आ रही हो तो आओ ! कौन डरता है तुमसे।”

 इस प्रकार स्पष्ट है कि वे एक अच्छे प्रेरणादायक कवि, समाज सुधारक, इतिहासकार, वैज्ञानिक दृष्टि से युक्त, सीधी एवं सरल भाषा में अपने विचार रखने वाले प्रखर वक्ता, पत्रकार,  भाषाविद्, विद्वान, अनुवादक, प्रकाशक, कुशल, संगठनकर्ता, कर्मयोगी एवं  महायोगी थे। 

वीर सावरकर का साहित्य सब तरह से प्रेरणादायक और अध्ययन तथा अनुशीलन के योग्य है। कह सकते हैं कि सावरकर जी बहुभाषा-पंडित थे, तब भी उनका प्रभुत्व तथा उन्हें  संस्कृत से अनुराग था। कालिदास और भवभूति उनके प्रिय कवि थे। रघुवंश  और कुमारसम्भव उनकी जिहृा पर सदा नर्तन करते रहते थे। उनका प्रिय स्वतंत्रता-स्तोत्र -

जयो ऽस्तु ते श्रीमहन्मड्गले शिवास्पदे शुभदे।

स्वतंत्रते भगवति ! त्वामहं यषेयुतां वन्दे।। - जो आकाशवाणी से प्रसारित होता था । 

हिन्दू की परिभाषा भी सावरकर ने संस्कृत में रची, जो आज काफी  प्रसिद्धि प्राप्त है-

‘‘आ-सिंधु सिंधु पर्यन्ता यस्य भारत-भूमिका।

पितृ भुः पुण्यभूश्चेवस वै हिन्दुरिति स्मृतः

            सावरकर लिखते हैं- संस्कृत भाषा चिरकाल तक हमारी जाति की अनमोल धरोहर बनकर स्थित रहेगी। कारण, हमारे लोगों की मूलभूत एकता उसके द्वारा दृढ़  नींव पर खड़ी हुई है। हमारा जीवन उसने सम्पन्न किया। हमारी आकांक्षाएँ उसने उदात्त बनाई और हमारे जीवन स्त्रोत निर्मल किया।’’

लाल बहादूर शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने के पश्चात् अक्टूबर 1964 से मासिक रू. 300 मानदेय रखा ।खण्डित स्वराज्य प्राप्ति का वीर सावरकर को हमेशा दुःख रहा । 10 नवम्बर, 1957 को 1857 के प्रथम स्वतत्रंता संग्राम के शताब्दी समारोह में नई दिल्ली में सावरकर जी मुख्य वक्ता थे। 8 अक्टूबर, 1959 में उन्हें पुणे विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट् की मानद उपाधि दी गई तथा सितम्बर, 1966 से तीव्र ज्वर से लगातार पीड़ित रहने के कारण अस्वस्थतावश मृत्यु पर्यन्त उपवास का व्रत धारण करते हुए दिनांक 26 फरवरी, 1966 को प्रातः 10 बजे मुम्बई में यह युगांतकारी व्यक्तित्व इस संसार से चल बसा।  

       कुछ श्रद्धांजलियाँ उनके जीवन की विराटता को दिखाता है- सावरकर मेरे जीवन के प्रथम क्रांतिकारी आदर्श थे, जिन्होंने हमें भरपूर प्रोत्साहित किया। - श्री राजगोपालचारी

          श्री सावरकर एक पुरानी पीढ़ी के महान क्रांतिकारी थे। उन्होंने परतंत्रता की शासन व्यवस्था से मुक्ति के लिये विस्मयजनक मार्गों का अवलम्बन किया था। राष्ट्र स्वतंत्रता व्यवस्था के लिये उन्होंने  अनंत यातनाएँ झेली थीं , उनका जीवन-चरित्र नयी पीढ़ी के लियेे आदर्श हैं।- पूर्व महामहिम राष्ट्रपति स्वः डॉ. राधाकृष्णन

          सावरकर समकालीन भारत की एक महान विभूति थे और उनका नाम साहस और देश भक्ति का पर्याय है। वे एक आदर्श क्रांतिकारी के सांचे में ढले थे और अनगिनत लोगों ने उनके जीवन से प्रेरणा ली। -पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री इंदिरा गांधी

          सवरकर एक महान देश भक्त और भारतमाता के यशस्वी पुत्र थे। यदि भारत के लोग सावरकर को भारतीय इतिहास में एक  महत्वपूर्ण स्थान नहीं देते, तो यह देश के प्रति उनकी कृतघ्नता  होगी।  -श्री मोहम्मद करीम छागला 

          वीर बहुत हुए, होगें  भी बहुत, लेकिन इनके समान नहीं, इस उक्ति को यर्थात् से सिद्ध करने वाले थे नर-शार्दुल अर्थात् वीर सावरकर।’- श्री बाला साहेब देवरस

          अफसोस की बात है कि लोग पढ़ते नहीं हैं और सुनी-सुनाई बातों पर बहस करना शुरू कर देते हैं। सावरकर बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। सालों तक उन्होंने अंदमान में कालापानी की सजा काटी। उन्हें  कोल्हू का बैल बनाया गया;  कोई एक दिन भी वैसी सजा काट कर दिखाये तो फिर मैं उसे मानूं। - श्री वंसत साठे, पूर्व केन्द्रीय मंत्री

          वास्तव में सावरकर मात्र एक व्यक्ति विशेष  का नाम नहीं है। वह एक तप है, तेज है तलवार है, त्याग है, तपस्या है और साहस, संकल्प, संघर्ष, संगठन, साधना और साथ ही सहनशीलता और सृजन हैं । - स्वः श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री

        यह सावकार की मेधा ही है जिसके कारण किसी सदन के सांसद  न होते हुए भी आज सावरकर जी को हम भारत की संसद भवन में देख सकते हैं । देश उनका कृतज्ञ है।

 

 

डॉ उमेश कुमार सिंह

निदेशक

स्वामी विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन योजना

मध्यप्रदेश शासन , भोपाल

 

 

 

 

Friday, 4 December 2020

बायोडाटा
डॉ उमेश कुमार सिंह
एम.ए.,पी-एच.डी.
जन्म तिथि - 01.08.58
जन्म स्थान - रीवा म.प्र.

( मूल पद: प्राध्यापक-  हिन्दी, उच्च शिक्षा विभाग, म. प्र. एवं 36 वर्ष का अध्यापन अनुभव।)

सम्प्रति: निदेशक, स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन योजना, मध्य प्रदेश शासन।

सदस्य:

 (i) Resource persons, NAAC,Bengaluru

 (ii) member, NCZCC, Prayagraj (संस्कृति मंत्रालय,भारत सरकार)

 (iii) Linguistic society of India, pune.

 (Iv)  Word Association  for vadic studies, inc(waves)  

 (v)  भारतीय हिन्दी परिषद , प्रयागराज

पूर्व पदस्थापनाएं तथा प्रशासनिक अनुभव:-

1-     डायरेक्टर, म.प्र.हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, म.प्र.

2-     निदेशक, साहित्य अकादमी, संस्कृति विभाग, म.प्र.शासन

3-     ओ एस.डी. मंत्रालय, उच्च शिक्षा विभाग म.प्र. शासन

4-     ओ. एस.डी. संचालनालय, उच्च शिक्षा विभाग म.प्र. शासन

5-     उपसचिव उच्च शिक्षा विभाग म.प्र. शासन

6-     प्रभारी विश्व विद्यालय समन्वय प्रकोष्ठ, उच्च शिक्षा विभाग, म.प्र. शासन

7-     स्टेट लाइजन आफीसर , राष्ट्रीय सेवा योजना म.प्र.

साहित्यिक विदेश यात्राएँ :
1.      विश्व हिंदी सम्मेलन न्यूयार्क (मध्य प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि)

2.      विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस (भारत सरकार के प्रतिनिधि)

स्थाई निवास – 21-22 शुभालय विलास,बरखेड़ा-पठानी, भोपाल (मध्यप्रदेश) पिन- 462022
मेल-आईडी- umeshksingh58@gmail.com

मोबाइल-
9425600181
7389814071

Friday, 13 November 2020

शिक्षक और विद्यार्थी (भाग-दो)

 

 

(भाग-दो)

      स्मरण रखना होगा कि शिक्षक और विद्यार्थी जिस समाज से आते हैं उस समाज के लोगों का भी मन भयानक रूप से चंचल है। उनके सुख का केन्द्र अपने से बाहर है और इसीलिए वे सुख की तलाश में इधर उधर भागते हैं। इतना ही नहीं उनके सुख का केन्द्र अपने अन्दर से निकल कर या तो बाजार, सिनेमाघरों, डांस थियेटरों, क्लवों में या फिर चर्च में, प्रवचनों में, भाषणों में जाते हैं, कहने का अर्थ यह कि लक्ष्य विहीन सुख की तलाश में जहां इच्छा हुई, उधर ही दौड़े जाते हैं। तब एक ही सिद्धांत काम करता है- ‘‘प्रवाह के विपरीत चिंतन करने का कष्ट क्यों करें? मन को क्यों स्थिर करें ? अपनी इस मानसिक प्रवृत्ति के कारण पूरा भटका जन अधिकाधिक बहिर्मुखी बनता जाता है और अज्ञान के पाश में उलझ जाता है।’’

     आज के अधिकांश युवा भी सोचते हैं कि- जब हम ऐसे ही सुख पाते हैं तो मन को विचार करके कष्ट क्यों देना? क्यों न प्रचलित द्रव्यों का सेवन कर निद्रा जैसी मोहक स्थिति में मन को डाल दें, रोचक दिवास्वप्र में मग्र रहें? सोचना या विचार करना तो युवावस्था को वांछित नहीं है।प्रौढ़ और तनिक इस मोह जाल से निकले लोग मस्जिद, गिरिजाघर, देवालय जाते हैं, और विचारहीन अस्पष्ट निरा भौतिक रूप से दिए जानेवाले प्रवचनों को सुनते हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि से शून्य हैं। अर्थहीन हैं। 

शिक्षक का धर्म है कि वह इस वातावरण को बदले और आध्यात्मिक जीवन का प्रवाह शिक्षा संस्थानों के परिसर में प्रवाहित करे। यही शिक्षा की नीति होनी चाहिए। शिक्षा नीति का भौतिक लक्ष्य अपने प्रवेशित विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना तो है, किन्तु उससे अधिक महत्वपूर्ण उसे स्वरोजगार और रोजगार युक्त बनाना भी है। आज इस दिशा में यदि आत्मनिर्भर भारत और आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश की योजना एक आकार ग्रहण कर रही है तो उसका मूलाधार हमारे शिक्षा संस्थान, शिक्षक और शिक्षार्थी ही हैं। इन्हें ही ऊपर उठाना आज का युगधर्म है।

यदि हम कहीं तनिक भी इस पतनोन्मुख वातावरण को ऊपर उठाने में, बदलने में अपने को असमर्थ पाते हो, तो विचार कर स्वयं को ही ऊपर उठाना होगा। क्योंकि जब हम समाज को जिसमें हम स्वयं शामिल हैं, तो पाते हैं कि यह मानव-पशु धन, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान को लेकर कितना दुखी है? परिणाम ये उस समाज को भी दुखी करते दिखाई पड़ते हैं, जिनको जीवन निर्वाह हेतु रोटी, कपड़ा और मकान की ही आवश्यकता है।

हमारे मटमैले विचार कम्पन पूरे परिवेश को दूषित और विषाक्त करते हैं।  विकृत विचारों को परिसर पर, सडक़ों पर चलने वाले चेहरों पर देखा जा सकता है। कैसी घोर सांसारिकता और विकृति दिखायी देती है। पुते चेहरेवाले हाड़माँस के पुतले और पुतलियाँ, अपने भडक़ीले भाषा और भूषा से केवल यौन विकार-रस को ही तो प्रवाहित करते हैं? यदि हम थोड़ा अन्तर्मुखी हो जाएं, हमारी संवेदनशीलता तनिक प्रबल हो जाए, तो हम देखेगे कि यह सब कितना भद्रता से रहित है। इसलिए आज शिक्षा के परिसर इतने अरुचिकर मालुम पड़ते हैं ।

सामान्यत: आज शिक्षा परिसरों के चर्चा के तीन विषय होते हैं: एक, राजनीति का दूषित पक्ष, दूसर- पैसा कमाने के संसाधन-जुगाड़ और तीसरा, यौन चर्चा। इसकी प्रतिछाया हमारे फिल्मों, नाटकों, उपन्यासों और गीत-संगीत में होती हुई धीरे-धीरे हमारे मस्तिष्क में ऐसी छा जाती है कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर पाते और जीवन के सामाजिक पक्ष में जैसे ही प्रवेश करते हैं, हमारी यह मानसिकता शरद के कोहरे की तरह हमारी सामाजिक प्रज्ञा को ढकने लगती है।

 स्पष्ट है वायुमण्डल बदलने के कारण शिक्षक और विद्यार्थी दोनों की सोच बदल गई है। यह उसी तरह होती है, जैसे इस कोरोना काल में प्रभावित के सम्पर्क में आते ही हमारा जीवन संकट में आ फँसता है, इपीडेमिक आता है। तब वह वायुमण्डल राष्ट्रनिर्माण के हित में न होकर या यू कहिए कि शिक्षा के लक्ष्य की पूर्ति न करके जीवनमूल्यों को निरन्तर क्षतिग्रस्त करता है।

इसलिए आवश्यक है कि मन को सतत ध्येय की ओर लक्षित कर सदा विचार का एक अखण्ड प्रवाह बनाये रखना चाहिए। किन्तु ध्येय है क्या? शिक्षा का लक्ष्य आत्मनो मोक्षार्थ जगत् हिताय च।यह सबसे अधिक श्रमसाध्य है किन्तु बहुत महत्व का है। यह लक्ष्य घनीभूत होकर जब निरामय, परिपूर्ण और निरतंर अखण्ड और अबाध गति से प्रवाहित होता है, तब ही हमारा शिक्षक और विद्यार्थी न केवल अपनी चेतना को विकसित कर पाता है, बल्कि इस समाज को भी भौतिकता में आसक्ति रहित ‘तेन तक्त्येन भुंजिथा:’, जीवन जीते हुए सुखी बनाने का वातावरण देता है। ऐसे चेतनायुक्त मानस को तैयार करने का कार्य भारतीय ऋषि परम्परा से हमें प्राप्त होता रहा है, जिसे हमने जीवन का मोक्ष कहा है।

इसीलिए व्यक्ति की चेतना का विकास हो, हर व्यक्ति अपनी अन्त:प्रेरणा के अनुसार अंतिम आनन्द का अनुभव करे, इस सुविधा के विकास के लिए हमारे विश्वविद्यालय और महाविद्यालय हैं। बस आज अन्तर इतना है कि इन्हें अपनी प्राचीन जीवन पद्धति तथा जीवनश्रेणी के अनुसार आज के युगधर्म पर आधारित बनाना होगा। जिसका सूत्र यदि बुद्ध का अप्प दीपो भवहै, तो चलो जलाएं दीप वहाँ जहाँ अभी भी अँधेरा है, आज का युगबोध है।

इस युगबोध की पूर्ति हेतु मनुष्यता की महान दृष्टि ‘धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगेने लक्ष्य बताया है कि प्रभावायाहि भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम्इसी से सर्वे भवन्तु सुखिन:अर्थात् सम्पूर्ण विश्व अखण्ड सुख को प्राप्त होगा। इसलिए मनुस्मृति कहती है कि जरा अपने base of operation को स्मरण रखें- एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:। आइये इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दीपावली के प्रकाश पर्व से अपनी चेतना को आलोकित करें।

सादर 

Tuesday, 10 November 2020

’स्वामी विवेकानन्द कॅरियर मार्गदर्शन योजना’

 

स्वामी विवेकानन्द कॅरियर मार्गदर्शन योजना मध्यप्रेदश के मा. मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह जी की महत्वाकांक्षी योजना है, जो प्रदेश की उच्च शिक्षा, स्कूल शिक्षा मे और तकनीकी शिक्षा अन्तर्गत पालीटेकनीक महाविद्यालयों और आई.टी. आई. में 2005-06 से प्रारंभ है। इस योजना का नोडल उच्च शिक्षा विभाग है  

पिछली नाथ सरकार में यह योजना उच्च शिक्षा में भी शिथिल हो गई थी और स्कूल तथा  तकनीकी में तो बंद ही पडी थी।

जिसे इस सरकार के आने तथा मा मंत्री उच्च शिक्षा, डॉ मोहन जी यादव के निर्देशन तथा मार्गदर्शन् में न केवल उच्च शिक्षा विभाग में सक्रियता से योजना लागू कर दी गई है, बल्कि स्कूल और तकनीकी शिक्षा विभाग में भी कैलेण्डर जारी कर कार्ययोजना प्रारंभ कर दी गई है।

आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के इंडीकेटर- 4 का  स्वामी विवेकानन्द कॅरियर मार्गदर्शन योजनाको नोडल बनाया गया है, जिसके लिए अभी तक की स्थिति और कार्ययोजना इस प्रकार है-

आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश सूचकांक - 4

लक्ष्य- माह सितम्बर 2020 तक प्रदेश के दो सौ शासकीय महाविद्यालयों में रोजगार और स्वरोजगार (पी एण्ड ई) प्रकोष्ठ की स्थापना करना है।   

लक्ष्य प्राप्ति हेतु करणीय बिन्दु: 1- प्रदेश के ऐसे 200 शासकीय महाविद्यालयों का चयन जिनसे शासकीय महाविद्यालयों में पढने वाले 75 प्रतिशत विद्यार्थी समाहित हो जायें।

2- उक्त महाविद्यालयों में योजना संचालन हेतु पचास जिला केन्द्रों पर एक-एक ऐसे कुशल प्राध्यापक का नोडल अधिकारी के रूप में चयन करना जो पूर्णकालिक रूप से सूचकांक- 4 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य करेगा।

3- प्लेसमेंट के लिए देश भर की बडी कम्पनियों, संस्थानों, उद्योगिक घरानों से एम.ओ.यू. करना है, जो प्लेसमेंट दे सकें। प्रदेश के कुछ महाविद्यालयों ने जैसे (शासकीय मानकुंवर बाई महाविद्यालय जबलपुर द्वारा) देश की बडी कम्पनियों से ट्रेनिंग प्रारंभ भी करा दी है।

4- अधिकतम विद्यार्थियों को रोजगार एवं स्वरोजगार तथा शासकीय, अशासकीय सेवा हेतु तैयार करने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम को संचालित करना।

विगत सत्र में अल्पावधि रोजगार प्रशिक्षण से 328 प्रशिक्षण के माध्यम से 27919 विद्यार्थियों को लाभान्वित किया गया है।

गत वर्ष इन प्रशिक्षणों के माध्यम से 7728 विद्यार्थियों को रोजगार प्राप्त हुए। इसे बढाकर रोजगार और स्वरोजगार तथा शासकीय, अशासकीय संस्थानों में लगभग 50 हजार का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसे समय-समय पर समीक्षा कर पुनः निर्धारित किया जाता रहेगा।

इस वर्ष रोजगार प्रशिक्षण की संख्या बढा कर 200 महाविद्यालयों का लक्ष्य लेकर प्रत्येक महाविद्यालय के 500 विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य है जिसके कारण लगभग एक लाख विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया जा सकेगा।

मध्यप्रेदश के बघेली, बुन्देली, मालवी और निवाडी के कृषि, लघु-कुटीर उद्योगों को ध्यान में रख कर ‘लोकल फार वोकल’ अन्तर्गत प्रशिक्षण तथा स्वरोजगार और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जा रहे हैं

‘लोकल फार वोकल’ अन्तर्गत इस वर्ष प्रदेश के कई शासकीय महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को रक्षाबन्धन के अवसर पर रक्षासूत्र बनाने का तथा अभी दीपावली को देखते हुए दीप निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया है। जिसमें हजारों की संख्या में छात्र-छा़त्राओं ने दीपक निर्माण किए हैं।

आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश सूचकांक-4 लक्ष्य प्राप्ति हेतु समय का निर्धारण:

1- दो सौ महाविद्यालयों का चयन कर लिया गया है।

2- 30 नवम्बर, 2020 तक पचास जिलों में नोडल बना दिए जायेंगे।

3- प्लेसमेंट के लिए दे श भर की बडी कम्पनियों, संस्थानों, उद्योगिक घरानों से एम ओ यू  नवम्बर और दिसम्बर तक पूर्ण कर लिया जायेगा।

4- स्किल डेवलपमेंट और ट्रेनिंग प्रोग्राम दिसम्बर से अप्रेल तक किया जायेगा।

 

इस तरह से रोजगार निर्माण की प्रक्रिया में महाविद्यालयों को अधिकाधिक सक्रिय कर स्वामी विवेकानन्द कॅरियर मार्गदर्शन योजना के माध्यम से शासकीय, अशासकीय संस्थानों में  रोजगार और स्वरोजगार की प्रक्रिया के लक्ष्य को प्रभावी स्वरूप दिया जा सकेगा। जिससे आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के इंडीकेटर -4 के लक्ष्य को प्राप्त करते हुए इसे सतत रूप से संचालन हेतु प्रभावी किया जा सके।

भविष्य में स्वा विवेकानन्द कॅरियर मार्गदर्शन योजना को प्रदेश के सभी शासकीय, अशासकीय विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं में लागू कर सभी विद्यार्थियों का डाटावेस रखा जायेगा।

डॉ उमेश कुमार सिंह

निदेशक

स्वामी विवेकानन्द कॅरियर मार्गदर्शन योजना मध्यप्रदे शासन

 

 

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