Sunday, 8 March 2020

काल की परिस्थिति और संघ-निर्माता डॉ हेडगेवार


  काल की परिस्थिति और संघ-निर्माता डॉ हेडगेवार
हेडगेवार कुल नाम मूलत: तैलंग है तो भी वह घराना ऋग्वेदान्तर्गत आश्वालयन सूत्र की शाकल शाखा के महाराष्ट्रीयन तैलंग अर्थात् देशस्थ ब्राह्मणों में से हैं। आन्ध्रप्रदेश के तेलंगाना भाग में कन्दकुर्ती नाम का गाँव इस कुल का मूल स्थान है। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व बलिराम पंत हेडगेवार के पितामह नरहर शास्त्री वहाँ से नागपुर आये और तब से उनकी अगल दो-तीन पीढिय़ाँ नागपुर में ही बीतीं। नागपुर आये हुए हेडगेवार घराने के व्यक्तियों ने थोड़े ही दिनों में अपनी विद्वता के बल पर अच्छी ख्याति अर्जित कर ली। साधारणत: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक इस कुटुम्ब के अच्छे दिन रहे।

किन्तु १८५३ में अंग्रेजी सत्ता की कृष्ण छाया नागपुर पर पड़ते ही अन्य स्थानों की भाँति वहाँ भी वेद-विद्या के दिन ढल गये। उस समय अंग्रेजी विद्या का ही जोर था। महारानी विक्टोरिया उस समय भारत-सम्राज्ञी बनने की तैयारी में थीं, और अफ्रीका की विजय अभी समाप्त नहीं हो पायी थी। किन्तु सुखद बात यह भी थी कि दुनिया में परिवर्तन लाने का प्रारंभ हो चुका था जिसके साथ ही  तिलक (२३ जुलाई,१८५६), विवेकानन्द (१२ जनवरी, १८६३), श्री अरविन्द (१५ अगस्त,१८७२), का जन्म हो चुका था। आइनस्टाइन (१४ मार्च,१८७९) भी दुनिया में आ चुके थे। जूल वैर्न तब भावी युग के अनुसंधान में लगे थे, संसार दो युगों के संधि स्थल पर खड़ा था।

इतिहास के पन्ने कभी-कभी सचेत करते हैं कि नये युग के आविर्भाव से पूर्व तुम्हें कड़ी परीक्षा और विनाश के काल का सामना करना है। परन्तु ऐसा भी लगता है कि इस चेतावनी के पीछे सावधानी ही अधिक रहती है, संभवत: यह होता इसलिए है कि नये अंकुर पहले ही फूट चुके होते हैं, अत: विनाश की (अथवा कहें कि परिष्कार की) शक्तियाँ कमर कस कर मैदान में आ उतरती हैं। जो भी हो यूरोप की गौरवश्री उस समय आकाश चूम रही थी। पश्चिम का पलड़ा भारी लगता था। नागपुर में कैसी परिस्थिति रही इसका चित्र अमरीका में रहने वाले विख्यात क्रांन्तिकारी श्री रामलाल वाजपेयी ने अपने आत्मचरित्र में इस प्रकार खीचा है, ‘एक काबुली पठान लाखों की बस्ती में घुसकर गरीब लोगों को मार कर तथा उनके पैसे लूटकर सुरक्षित लौट सकता है। 
हिस्लौंप कालेज के बगल में सभी गन्दी बस्तियाँ थी। शराब, चरस और गाँजा पीकर जरा-जरा से मुसलमान छोकरे हमें कालेज जाते हुए गाली देते हैं, घेर लेते हैं और हम सब चुपचाप सहन कर कालेज चले जाते हैं। एक अंग्रेज सिपाही अकेला ही नगर में आकर सहस्त्रों लोगों के सामने एकाध गरीब को पीट-पाटकर वापस चला जाता है। हम सब देखते रहते हैं। कोई भी प्रतिकार नहीं करता। अखाड़े में कसरत करने के लिए अगर हम शिक्षित लोग गये तो शेष समाज हमारी ओर घृणा-भरी दृष्टि से देखता है। इस प्रकार के मुर्दा समाज को देखकर क्या करें यह समझ में नहीं आता।क्या देश में आज-कल हो रहे प्रायोजित दंगों को देखकर इससे कुछ सीख ली जा सकती है ?

राष्ट्र का पुनरुत्थान किसके सहारे होता है और किस आधार पर राष्ट्र वैभवशाली एवं अजेय बनते हैं ? भूमि, जनसंख्या, धन, बुद्धिमत्ता और पराक्रम, इन सबसे परिपूर्ण राष्ट्रों के धूल मिलने के उदाहरण इतिहास में उपलब्ध हैं। महान साम्राज्यों के स्वप्र देखने वाले समाज नाम शेष हो गये। मिश्र गये, यूनानी गये तथा बेबिलोनिया का तो कोई नामलेवा भी नहीं बचा। इसलिए ध्यान में आता है कि जिस समाज में देशभक्त, परम्परा के प्रति श्रद्धा और समष्टि जीवन का भाव रहता है और इस भाव को लेकर जिस समाज में महापुरुष पैदा होते हैं, वहीं राष्ट्र कालजयी बनता है। समर्थ रामदास इसे धकापेल का मामला कहते हैं
 पराभव हर समाज और देश की स्वाभाविक क्रिया है किन्तु जब राष्ट्र के अन्दर अपनी संस्कृति को बचाने के लिए समय-समय पर कालजयी पुरुष पैदा होते हैं तो उनके साथ वह राष्ट्र भी कालजयी बनता है। इजरायल इस बात का उदाहरण है कि दो हजार वर्ष तक अपने देश से अलग रहने के बाद भी कैसे आज सत्तर-बहत्तर साल में उन्होंने न केवल अपने सामरिक क्षेत्र में बल्कि भाषा और परम्परा को जीवित रखने के क्षेत्र में सफलता हासिल की। भारत के पास भी बताने को है कि राम और कृष्ण हमारे ऐसे जीवन्त कालजयी दिव्यपुरुष हैं जो न केवल देश के लिए तो दुनिया के लिए अप्रतिम उदाहरण हैं। इन्हीं की जीवन से प्रेरणा लेकर सदैव एक मालिका चलती है। उसी मालिका के रूप में १८८९ में एक महापुरुष पैदा होता है, जिसका नाम है, डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार।

 सुख, समाधान और सन्तोष से भरे हुए इस कुटुम्ब में शक सम्वत् १८११ की चैत्र सुदी प्रतिप्रदा को केवल साढ़े तीन घड़ी के शुभ मुहूर्त के वर्ष प्रतिपदा के दिवस प्रात:काल सौभाग्यवती रेवतीबाई को एक और पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। उस दिन रविवार था जो कि प्रचण्ड तेज की राशि भगवान सूर्य का वार है। अंग्रेजी गणना से यह दिन १८८९ ई. की पहली अप्रैल आता है। बालक का नाम केशव रखा गया जो कालान्तर में केशव बलीराम हेडगेवार के नाम से प्रसिद्ध हुए।

बचपन से तिलक के लेखों और शिवाजी के जीवन का उनमें पड़ता प्रभाव उन्हें राष्ट्रप्रेम से भर रहा था। नागपुर में प्रात:काल चलनेवाली तोप, हाथी, घोड़े और चौघड़े के साथ ठाट-बाट के साथ निकलनेवाले भोंसलों की सवारी, ‘सरकारनाम से  महाराज का उल्लेख, महल का राजवाड़ा, पुराने महल की सीमा पर परकोटे के द्वार आदि बातों से केशव के बाल-मन में यह बात घर कर गयी थी कि नागपुर में भोंसलों का राज्य है। 

किन्तु समाचार पत्रों के पढऩे, विद्यालय के शिक्षकों द्वारा शिवचरित्रके अनुषंग से सुने हुए विचारों तथा डॉ. खानखोज, रामलाल वाजपेयी आदि तत्कालीन क्रांतिकारियों की विदित होनेवाली गतिविधियों से इस भ्रम को दूर होते देर नहीं लगी कि यहाँ तो विक्टोरिया का राज्य है।

२२ जून, १८९७ को इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के साठ वर्ष पूरे हो रहे थे। विदेशी सरकार ने यह अवसर फिर से एक बार अपने विजेतापन का डंका विजितों के मन में बजाने के लिए उपयुक्त समझा। झण्डे, पताका, हार, तुर्रे, इत्र तथा स्वाभिमान शून्य भाषणों के साथ ही बच्चों की मिठाई बाँटेने का कार्यक्रम भी इन समारोहों में रखा गया था।

उस अवसर तक बालक केशव की राष्ट्र चित्ति जागृत हो चुकी थी। उन्होंने यह कहकर की यह गुलामी अंकित मिठाई है, इसे खा नहीं सकते और उसे कूड़ेदान में फेंक दिया।यही स्वाभिमान १९०१ ई. में इंग्लैण्ड के बादशाह एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर केशव के विचार अपने मित्रों के आमंत्रण पर चलने के लिए कहने पर प्रकट होता है, ‘विदेशी राजा का राज्यारोहण उत्सव मनाना हमारे लिए लज्जा का विषय है। अत: मैं नहीं चलूँगा।

 नागपुर में सीताबर्डी के किले पर यूनियन जैकदिन-भर फहराता था, केशव के मन में उसे हटाकर भगवा फहराने की इच्छा अपने मित्रों के सामने आयी थी और उसके लिए उन्होंने गुरुजी के घर से सुरंग खोदने का उपक्रम  किया था। केशव उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता गये तब श्री बझे बड़े कौतुक के साथ यह घटना दूसरे लोगों को बताते थे।

वास्तव में केशव के मन में परम्परा के विचार थे। बाल शिवाजी ने , ‘शीश झुके नहीं माता और रामदास ने चिन्ता करता विश्व की कही थी  । योग विद्या के सामर्थ्य से चौदह सौ वर्ष तक जीने वाले किन्तु फिर भी अहंकार से मुक्त नहीं हुए योगी चांगदेव को उपदेश देने का ज्ञान और अधिकार छोटे से ज्ञानदेव में रहता है। किन्तु जब ज्ञानदेव निन्दा से घबराकर कमरे के अन्दर बन्द हो जाता है तो उमर में छोटी बहन मुक्तबाई कहती है रागें भरावें कवणासी। अपाझा ब्रह्म सर्वदेशी। यही बातें बालक हेडगेवार की आदर्श बनीं  

यह वह काल था जब लोकमान्य तिलक ने केसरीके द्वारा जनता के स्वभिमान को जगा कर जो गर्जना की थी उससे राज्यकर्ता भयाकुल हो उठे थे। श्री शिवराम पंत परांजपे के काल में व्यक्त विचारों के फलस्वरूप तरुण-मन में जिस तेज का संचार होता था उससे तो अंग्रेजी राज्य को अपना काल ही सम्मुख नाचता हुआ दिखायी देता था। उसी समय अफ्रीका के बोअर-युद्ध से वापस लौटे हुए डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने अपनी डाक्टरी व्यवसाय के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वरूप के नये कार्यक्रम भी नागपुर में प्रारम्भ किये थे। उन्होंने राष्ट्र-प्रेमी मित्रों को एकत्रित कर विभिन्न प्रकार के विचार जागरण के कार्यक्रमों की योजना बनायी। उनमें लोकमान्य द्वारा प्रवर्तित उत्सव और आन्दोलनों का भी समावेश होता था। अत: ये सभी उत्सव एवं आन्दोलनात्मक कार्यक्रम नागपुर में भी मनाये जाने लगे। अर्थात् नये विचारों की हवा चलने पर उन विचारों का प्रभाव हो रहा था। प्रेरित तरुणों को आस-पास की परिस्थिति की  सम्पूर्णता अवलोकन करने की दृष्टि एवं उसका नियमन करने की सम्यक बुद्धि भी स्वाभाविक तौर पर क्रमश: प्राप्त होती गयी। और केशव के मन में भी यह विचार घर बनाता गया कि राष्ट्रोत्थान के लिए अपने प्रयात्नों की पराकष्ठा करनी चाहिए।

माता-पिता की अकाल मृत्यु पश्चात केशव का घर से सम्बन्ध टूटने लगा। उन्होंने कष्टों के साथ आगे का जीवन निर्वाह करने के संकल्प के साथ अपनी पढ़ाई और देशभक्ति का कार्य जारी रखा। इसमें डॉ. मुंजे का उन्हें भारी सहारा मिला। उनके सोलह वर्ष की उम्र में उनके दिए गये सभाओं में भाषाणों का प्रभाव हो रहा था और इससे प्रभावित होकर डॉ. पाण्डुरंगराव खानखोज के क्रान्तिकारी गुट स्वदेश बान्धवसे भी उनको प्रोत्साहन मिलना प्रारम्भ हो गया। डॉ. खानखोजे केसरीकी अपनी लेखमाला  में कहते हैं, व्याख्यान-माला तथा स्वेदशी-प्रचार के काम में गणू जोशी,  मोरु अभ्यंकर, खरे, बाबूराव सुतार, केशवरावे हेडगेवार बगैरह अनेक तरुण लोग आगे आये। डॉ. खानखोजे ने स्वदेश बान्धवसंगठन की ओर से स्वेदशी वस्तुओं का प्रचार करने के हेतु महाल के रास्तेपर आर्य बान्धव वीथिकाकी स्थापना की गयी थी। ध्यान रहे स्वदेशी आन्दोलन का यह वह समय था जब गाँधी के स्वदेशी आन्दोलन का कहीं अता –पता भी नहीं था ।

केशव के एक बाल मित्र श्री बलवन्तराव मण्डलेकर की स्मृति के अनुसार १९०५-०६ के आस-पास डॉ. मुंजे के यहाँ विभिन्न विद्यालयों के कुछ चुने हुए छात्रों की एक गुप्त बैठक हुई थी। उसमें बमबनाने का तरीका बताया गया था। तथा महाराष्ट्र और बंगाल की परिस्थिति का वर्णन भी किया गया था। इस बैठक में केशवराम हेडगेवार, मण्डलेकर आदि तरुण उपस्थित थे। इसका बड़ा कारण यह भी था कि बंगाल में मुसलमानों को निकट लाने की दृष्टि से अंग्रेज सरकार ने सन् १९०५ ई. की २९ सितम्बर को बंगाल के दो टुकड़े करने का निर्णय किया। यह बात किसी भी देशभक्त को नहीं भा सकती थी। १९ अक्तूबर १९०५ का दिन दुख:-दिवसके रूप में सम्पूर्ण बंगाल में मनाया गया तथा उसमें लाखों व्यक्तियों ने सभा, जुलुस, प्रदर्शन एवं प्रस्ताव के द्वारा सरकार के इस कृत्य का तीव्र विरोध किया। अनेक लोगों ने अनशन व्रत रखा था। यह कार्य युवाओं को नकाफी लगा और परिणामत: तरुणों ने कलकत्ता, ढाँका आदि स्थानों पर सशस्त्र क्रांतिकारी दल का गुप्तरूप से संघटन प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार से जनता का सरकार विरोधी क्षोभ प्रकट होने लगा तथा उसकी प्रखरता दिनोदिन बढ़ती ही गयी। थोड़े ही दिनों में बंग -भंग केवल पूर्व के प्रदेश का ही नहीं, सम्पूर्ण भारत के लिए एक महत्त्व का प्रश्र बन गया। सभी प्रान्तों को एक सूत्र में गूँथने वाली देशभक्ति की सुप्त भावना बंगाल पर अंग्रेजों के इस प्रत्यक्ष आघात से जाग्रत हो गयी तथा उस भावना की दिव्यता को प्रकट करने वाला वन्देमातरम्का मंत्र सम्पूर्ण देश में गूँजने लगा। उस काल में वन्देमातरम् के मंत्र ने जन-मन में कितना परिवर्तन किया था इसका वर्णन करते समय अरविन्द घोष लिखते हैं,  कि वन्देमातरम्यह मंत्र दिया गया तथा एक ही दिन में सम्पूर्ण जनता की देशभक्ति की दीक्षा मिल गयी।

यह मंत्र नागपुर में भी गूँजा। १९०६ में दिसम्बर में स्वदेशी आन्दोल की प्रभावी पृष्ठभूमि में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन हुआ। वहाँ से स्वराज्य, स्वदेशी का नारा गूँजा और बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के सक्रिय आन्दोलन की चतु:सूत्री लेकर लोग अपने अपने प्रांतों में गये। लोकमान्य तिलक लौटते समय नागपुर में रुके। उनके ओजस्वी भाषण का प्रभाव हेडगेवार जैसे तरुणों पर पड़ा। १९०७-०८ आते-आते विजयादशमी की एक घटना केशवराव की उस समय की मन:स्थिति पर अच्छा प्रकाश डालती है। स्वेदशी के प्रचार तथा वन्देमातरम् के प्रसार में उनका मन पूरी तरह  रम गया था। क्रांतिकारक दल के विचारों के कारण उनकी वृत्ति में निर्भयता और वाणी में ओजस्विता भी आना स्वाभाविक ही था। सीमोलंधन का जुलूस निकला। वन्देमातरम्का घोष हुआ, राष्ट्रगीत गाया।

१ दिसम्बर,१९०९ तक उनके परीक्षा परिणाम आ जाने से दि नेशनल कौन्सिल ऑफ ऐजुकेशन (बंगाल) के अघ्यक्ष डॉ. रसबिहारी घोष के हस्ताक्षर युक्त प्रमाण-पत्र मिल चुका था और वे अब अपने सांसारिक जीवन के लिए पर्याप्त शैक्षणिक प्रमाण पत्र भी पा चुके थे। किन्तु नागपुर से सात सौ मील दूर कलकत्ता हेतु वे डॉ. मुंजे का दिया परिचय-पत्र लेकर शिक्षण के साथ विशेषत: क्रांतिकार्य हेतु रवाना हो गये। 
केशव जब कलकत्ता आये तब तक स्वदेशी आन्दोलनबाह्यत: मंद पड़ गया था। १९०८ की अप्रैल में खुदीराम बोस द्वारा बम फेंकने के बाद कुछ दिनों तोबंगाल का वातावरण बहुत गरम हो गया था। स्वातंत्र्यवीर सावरक के शब्दों में, ‘‘उस बम के विस्फोट के साथ ही हिन्दुस्थान की पुरानी राजनीति में स्फोट होरक सशस्त्र क्रांतिगामी नया रक्तरंजित युग उदित हुआ।

केशव राव को कलकत्ता में अनुशीलन समितिमें प्रवेश मिला। आनुशीलन समिति के कार्य को जो जानते हैं उन्हें यहाँ कुछ बताने की आवश्यकता नहीं और जो नहीं जानते उन्हें डॉ हेडगेवार की बृहद जीवनी पढनी चाहिए ।  १२ दिसम्बर, १९१४ को दीक्षान्त समारोह हुआ । उसके बाद एक वर्ष के लिए नियम के अनुसार चिकित्सालय में वे तज्ञ डॉक्टरों के मार्गदर्शन में रोग-निदान, चिकित्सा आदि कि व्यवहारिक शिक्षा के लिए रहे। जिसे आज की भाषा में इन्टर्नशिप कहते हैं। अन्तत: ९ जुलाई १९१५ को उनका यह शिक्षाक्रम पूरा हुआ। इस तरह डॉ. हेडगेवार पाँच वर्ष की पढ़ाई पूरी कर १९१६ के आरंभ में  कलकत्ता से वे नागपुर वापस आये। डॉ. हेडगेवार की मानसिकता को ठीक से समझने के लिए श्री अरविन्द का यह कथन स्मरण रखना होगा, जब अपने ऊपर लगाये गये अभियोग के कारण राष्ट्रीय विद्यापीठ के प्राचार्य पद से त्याग-पत्र देते समय उन्होंने कहा था, ‘‘आपको कुछ पुस्तकीय ज्ञान देकर पेट भरने के लिए कोई व्यवसाय करने का मार्ग खुल जाये इस हेतु से हम लोग इस कार्य में उद्यत नहीं हुए। अपितु आप में से मातृभूमि के लिए काम करने वाले तथा कष्ट झेलने वाले सुपुत्र खड़े हों यही हमारी अपेक्षा है।
 १९२० के सामूहिक आन्दोलन के बाद वन्देमातरम् की घोषणा एक सरल बात हो गयी थी। हेडगेवार पर राजद्रोह मुकदमा चलाने का प्रयास हुआ उसके लिए आर्मस्ट्रांग रामपायली आया। उन्हें विद्यालय से निकाला गया। अन्तत: वन्देमातरम्गायन के विरुद्ध रिस्ले सरकुलर निकाला गया। इस सरकुलर के विरुद्ध जगह-जगह प्रदर्शन हुए।

 स्वतंत्रता सेनानीहेडगेवार आर.एस.एस की स्थापना से पहले कांग्रेस के सदस्य हुआ करते थे। ख़िलाफ़त आंदोलन (1919-24) में उनकी भूमिका के कारण उन्हें गिरफ़्तार किया गया और उन्हें एक साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी। किन्तु उसके बाद वे प्रत्यक्ष राजनीति से बाहर आ गये। आज़ादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष रूप से यह उनकी आखिरी भागीदारी थी।

‘डॉ. हेडगेवार चरित्र’ में ना हा. पालकर लिखते है, ‘‘वाल्यकाल से विविध राजनीतिक गतिविधियों में संलग्र, विदेशी राज्य के नाम मात्र से ही जो क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाये इस प्रकार अतीव संवेदनशील एवं उत्कट भावनापूर्ण व्यक्ति डॉ हेडगेवार को प्रचलित राजनीतिक कार्यों से अपना हाथ खींचे बिना मन को हटा लेना तथा सब प्रकार से बुद्धि को जंचनेवाले कार्य के अनुकूल ही अपने मनोभाव को बनाना कितना कठिन हुआ होगा। और इस प्राकर का परिवर्तन अपने अन्दर लाने वाले की विवेकशक्ति कितनी परा कोटि की और सामर्थ्यवान रही होगी, तथा अपने निष्कर्षों एवं तदनुरूप कार्य पर उनकी निष्ठा कितनी अटल होगी इसकी कल्पना करना भी कठिन है। इस प्रकार का कालातीत शक्ति सम्पन्न विवेक एवं कार्यनिष्ठा उनके पवित्र निस्वार्थ एवं राष्ट्रसमर्पित जीवन के कारण ही सम्भव था। यह उनके जीवन का अत्यन्त भव्य एवं अनाकलनीय चमत्कार है।’’
खिलाफत आन्दोलन के रिहाई के ठीक बाद, सनातन परम्परा और संस्कृति के मूल तत्वों और समर्थ रामदास एवं शिवाजी के विचार, कृतित्व और चरित्र से प्रभावित होकर हेडगेवार ने सितंबर, 1925 में आर.एस.एस की स्थापना की। 
इस बात को समझे बिना आज कांग्रेस और वामपंथियों द्वारा यह प्रचारित किया जाना कि अपनी स्थापना के बाद ब्रिटिश शासन के पूरे दौर में यह संगठन न शिर्फ़ उपनिवेशी ताक़तों का आज्ञाकारी बना रहा, बल्कि इसने भारत की आज़ादी के वास्ते किए जाने वाले जन-संघर्षों का हर दौर में विरोध किया’, न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि एक लम्बे वितांडावाद का परिणाम भी है।

Sunday, 23 February 2020

आखिर मुर्दों का भी तो तर्पण होता है

किसी आलेख की प्रतिक्रिया -

 ठीक है, पर विचारणीय यह है कि माता-पिता जब तक बच्चों पर अपनी कुंठित इच्छा थोपते रहेंगे तब तक इस भयावह स्थिति से निपटना कठिन है।

कान्वेंट शिक्षा, तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा का लोभ, क्षमता न रखने वाले छात्रों का प्रवेश, ट्यूशन का विज्ञापन ,प्रवेश से पदोन्नति तक आरक्षण , मुफ्तखोरी की सुरसा मुखी आदत अनेक ऐसे कारण हैं जो समाज को डिप्रेशन की ओर ले जाते हैं।

आप जरा इस ओर भी ध्यान दें कि आज माता-पिता कुछ नैसर्गिक क्षमतावान बच्चों की नकल कर अपने सामान्य बालक को भी कैसे बाजारवादी प्रतियोगिता में उतार रहे हैं। क्या यह मानसिक दबाव शिशु झेल पा रहा है ?

शारीरिक विकास का अवसर नहीं। मानसिक विकास हुआ नहीं और उसे हमने सीधे बौद्धिक प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया। भला हो माता-पिता को आध्यात्मिक शिक्षा से कुछ यश,धन,मान नहीं दिख रहा अन्यथा वे उसे सीधे वानप्रस्थाश्रम में भेज देते।

उच्च शिक्षा का अर्थ मात्र रोजगार की शिक्षा रह गया है। पूरी उच्च शिक्षा जो पहला काम करती है वह है , मातृभाषा से पृथक कर देना। चिकित्सक अंग्रेजी में दबाई का पर्चा लिखता है तो हम आज मांग कर रहे हैं कि हिंदी या उसकी मातृभाषा में पर्चा लिखें जायें। अंग्रेजी की ड्राइंग और कानूनी निर्णय भी गैर-अंग्रेजी में हों मांग है। 

वैसे भी जिस देश में शिक्षा समाज के सहयोग से चलती थी वहां अब विश्व बैंक से ऋण लेकर घी पीने की आदत जो पड़ चुकी है। 

समझेगा कौन?हमारा कान्वेंट का बेटा, मेडिकल स्टोरवाला, सब इंजीनियर,कमीशन के ठेकेदार ? ब्यूरोक्रेट्स,  जिनके मानस में अंग्रेजी के अलावा सभी हीनता-ग्रंथि पैदा करते हैं। क्या देशभर के इंजीनियरिंग, और चिकित्सा शिक्षा में मातृभाषा भी पाठ्यक्रम की सामग्री है ? 

सुधार की कोशिश होनी चाहिए पर कहां से? घर से ? दुकान से?मिल- फैक्ट्री के सी ई ओ से? ब्यूरोक्रेट्स से ?

अभी कुछ दिन पहले सेकेट्रिएट में बैठा था। एक कुर्ताधारी सज्जन मुख्यमंत्री जी का हवाला देकर अधिकारी को अपना विषय हिंदी में रख रहे थे,तो अधिकारी दनादन अंग्रेजी में।

साफ था कुर्ताधारी का चेहरा जेठालाल (तारक मेहता..) की याद दिला रहा था और अधिकारी उसे नानसेंस समझ गर्व का अनुभव कर रहे थे।

जब सज्जन चले गये तो मैंने पूरे वार्ता के दृश्य पर अधिकारी महोदय की प्रतिक्रिया चाही । उत्तर अपेक्षित था ,गंवारों से रोज पाला पड़ता है, इन्हें चार अक्षर अंग्रेजी नहीं आती ? कौन पूछेगा कि, अंग्रेज के पुछल्ले तुम तो उस भले मानुष से उसकी भाषा में बात रख कर पशुता का परिचय देते । पशु और खग समूह और व्यक्तिगत स्तर पर भी एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं। किंतु हम जो सभ्य ठहरे?? 

किंतु गला काट सफलता के इस दौर में चरितार्थता की बात ही कौन सुनता ? गांधी जी हर  चौराहे, शिक्षा के प्रांगण में, कार्यालयों में बैठ कर अस्तेय का अभ्यास देख रहे हैं , तो सरदार देश की सबसे ऊंची जगह से बिखंडन पर तुले टुकड़े-टुकड़े गैंग को । अन्य महान आत्माओं ने तो शक्ति का रूप धारण कर  सत्य का रास्ता छोड़ असत्य की सड़क ही बना ली ??

मुझे कलाम साहब का 2020 स्मरण हो आया। कभी देश में पंचवर्षीय योजना विकास का आधार थी। बाद में अब 30 से 50 वर्ष आगे की योजना बन रही है। कमीशन में शाग-भाजी की उपज चाहिए , परिणाम में इमली का फल!!

दुश्यंत कुमार की ग़ज़ल सुनकर अच्छा लगता है ,पर संग्रहालय ?? देश में भावनात्मक नारे अच्छे लगते हैं ,पर व्यवहार में !! हमारा अल्लाह,ईसा, महावीर, बुद्धा, रावण,रहीम। अच्छा होता यह सब मिलकर देश को एक रख सकते? 

कल एक चैनल पर बहस चल रही थी। एक पक्ष कह रहा था ,हिन्द से भारत में सब हिन्दू तो दूसरा कह रहा था हम हिन्दू नहीं कट्टर मुसलमान हैं। जब पूछा गया कि आपकी सांतवीं पीढ़ी कौन थी ? तो बहस छोड़कर चले गए।

उदारता एक पक्ष से नहीं चलती । दोनों पक्ष समभावी चाहिए। प्रश्न है ,यह वातावरण कौन तैयार करेगा ? विद्यालयीन सरकारी रोजगारी शिक्षा, कान्वेंट शिक्षा, मदरसे की शिक्षा ,जुम्में की नवाज, रविवार की प्रार्थना या यज्ञ परम्परा !!

चलो अपने से बाहर सोचने की फुर्सत मिलेगी तो इस पर भी गौर करेंगे।

 वैसे देश चलाने वाले ठेकेदार हैं,ब्यूरोक्रेट्स हैं, उद्योगपति हैं, दलाल हैं तो फिर आम जन की आवश्यकता क्या है ? फिर भी बीच-बीच में 'हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा', का नारा लगाने में कोई हर्ज नहीं। 'निरर्थक बहस भी तो' बिना फल की इच्छा का महत कार्य है। आखिर साहित्यकार कर ही क्या सकता है !! और करे भी क्यों जब घर बैठे पुरस्कार और राशि प्राप्त हो जाये?? फिर हम पुरस्कार वापस भी तो नहीं कर सकते । न जाने कौन नाराज हो जाये। आखिर हमें समय के साथ जो चलना है। क्योंकि मुर्दों का भी तो यहां तर्पण होता है।

Wednesday, 19 February 2020

कबीर और गांधी

आज फेसबुक में एक किताब देखी । "उत्तर कबीर नंगा फकीर"।

मेरा मानना है कि न तो कबीर उत्तर थे न ही गांधी नंगा थे। 
कबीर तो चौराहे पर खड़े सब की खैर मांग रहे थे और गांधी सब को कपडे़ की अहमियत बता रहे थे !!
 अपरिग्रह और सहानुभूति ही गांधी की लंगोटी है ,नंगा नहीं।

वैसे भी फगीर नंगा नहीं होता ।वह दुनिया को अपने मुठ्ठी में रखता है। जब-जब मुठ्ठी खोलता है कबीर की खैरात बटती है।

नंगा होने का गीता का निहतार्थ है कि "यह शरीर ही आत्मा का वस्त्र है जिसे अनासक्त भाव से पहना है ,जो जलेगा किन्तु उस कपड़े को पहननेवाला नहीं जलेगा।

कबीर तो उस चादर को 'जस की तस रख देने की बात करता है।' वह चतुर्दिग सजग है। वह काल और दिशा बोध को समझता भी है और उससे परे चौराहे पर खड़ा हो कर हर आने जानेवाले को सजग करता है 'हम न मरिहैं मरिहैं संसारा।' कबीर की नजर में यसी कपड़ा है।

 विचार करें कबीर को आप काल के खंड और दिशा में कैसे बांध सकते है ?

जहां तक गांधी की बात है गांधी तो विचारों के ही राजा थे।वे ऐसे धनी फकीर थे जिनकी पूंजी को भारत और उसकी आती जाती सत्ताएं तो खा ही रहे हैं दुनिया भी उसे प्रसाद के रूप में प्राप्त करने लालायित है।

Friday, 17 January 2020

नर्मदा तीन



(तीन)
विशाल नगरी महिष्मती

               रणछोड़ मंदिर से बाहर आने पर कुछ दूर पर दिखाई देते हैं विशाल नगरी के अवशेष। दूर दूर तक फैले खण्डहर को घेरे एक ठोस चहारदीवारी दिखाई देती है। इसको जोडऩे वाली बारह-चौदह फिट चौड़ी सडक़ बताती है कि यहाँ अतीत में किसी महापराक्रमी महाराजा का प्रासाद रहा होगा। निश्चित ही यहाँ इसकी विशाल सीढिय़ाँ इसमें से गुजरने वालों की वैभव गाथा छिपाये हुए है। आश्चर्य यह होता है कि माँ नर्मदा के इस द्वीप पर कब किसने इतना विशाल राजमहल बनाया होगा। किसी तत्वदर्शी पुरुष के संस्मरण से ज्ञात हुआ कि यह नगरी कभी राजा मुचकुंद की थी। और कभी यह प्रासाद सदा वेदमंत्रों की ध्वनि और अश्वमेघ यज्ञ के उत्सवों की ध्वनि से मुखरित रहा होगा। कालांतर में मान्धाता-वंशजों की शूर-वीरता का स्वर्णयुग समाप्त हो गया। 

इसके बाद हैहय वंशीय राजा माहिष्मत ने युद्ध द्वारा इस नगरी पर अधिकार कर लिया। उनके नाम पर यह माहिष्मती कहलाया। आज उसी महल को चारों ओर से बबूल और जंगली कटीले पौधे तथा नीम ने कब्जा कर रखा है। कभी यह नगरी दुर्गम और अजेय हुआ करती थी। महाराज मुचकुंद इस नगरी के आदि प्रतिष्ठाता भले ही रहे हों, मगर इस नगरी की गौरवगाथा को, तमाम हिन्दुस्तान में हैहय-राज, महापराक्रमी, शूरवीर दिग्विजयी सम्राट कार्तवीर्यार्जुन के शासनकाल ने गगनचुम्बी ऊँचाईयों तक पहुँचा दिया गया था। माहिष्माती की शोभा की कथा घर-घर में फै ल गई थी। सम्राट कार्तवीर्यार्जुन की शूरता का वर्णन जितना भी किया जाए, कम है। वह देव-तुल्यों के विजेता दैत्यराज रावण को परास्त कर ही नहीं शांत हुए और दक्षिण में भारत सागर तक के विस्तीर्ण इलाके पर अपनी विजय-पताका फहरायी थी।

महाभारत में वेदव्यास उनके बारे में कहते हैं- अनूपपतिर्वीर: कार्तवीर्य: (वनपर्व/९७/१९)महाभारत के सुप्रसिद्ध टीकाकार श्री नीलकंठ ने इस अनूपपतिशब्द की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है समुद्रप्रायदेशस्य राजाअर्थात् जो समुद्र तट तक फैले समस्त देशों के राजा हैं। महाक्षत्रप रुद्रदमन की जूनागढ़ प्रशस्ति (शिलालिपि) में कार्तवीर्यार्जुन को अनूपनिवृत्की उपाधि से विभूषि किया गया है। पाश्चातय विद्वान पर्जिटर ने अपने ग्रंथ में तथा कनिंघम ने नर्मदा-मध्य इस पहाड़ी द्वीप के इस नगर को माहिष्मती कहा है। वे और ज्यादा यह भी कहते हैं कि मध्यप्रदेश के निमाड़ जिले के खांडव (सम्भवत: वर्तमान खण्डवा) नामक तहसील के बीच नर्मदा द्वीप के एक गाँव का नाम है, माहिष्मती।

1165 की बात है महाराज भरत सिंह ने युद्ध में विजय प्राप्त करके मान्धाता ओंकारेश्वर पर कब्जा कर लिया था। महाकवि कालदास रचित रघुवंशको पढऩे से भी पता चलता है कि नर्मदा अथवा रेवा नदी के किनारे अनगिनत, प्रासादों से सुसज्जित एक अत्यंत समृद्धशाली नगरी हुआ करती थी, जिसे माहिष्मती कहते थे। महाकवि कालिदास ने अपनी अनुपम रचना में राजकुमारी इन्दुमती के स्वयंवर सभा का एक अलौकिक वर्णन किया है । ‘इस स्वयंवर सभा की प्रधान द्वारपालिका राजकुमारी इन्दुमती के संग-संग चल कर सभा में आमंत्रित विवाहेच्छुक विभिन्न राजा-महाराजाओं का परिचय उसे देती हुई आगे चलती है, और जब वह इस प्रकार  महाराज कार्तवीर्यार्जुन के वंशज महाराज प्रतीप के निकट पहुँचती है, तब वह उनका परिचय इन्दुमती से इस प्रकार कराती है,
               ‘‘अस्यांकलक्ष्मीर्भव दीर्घबाहोर्माहिष्मतीवप्रनितम्बकांचीम्।
               प्रासादजालैर्जलवेणिरम्याम्, रेवां यदि प्रेक्षितुमस्ति काम:’’।। (रघुवंश,६ / ४३)
 अर्थात् महाराज प्रतीप की राजधानी माहिष्मती नगरी का प्राचीर (चाहारदीवारी) मानो सुन्दरी के नितंम्ब में मेखला के समान सुशोभित हैं। यदि आपकी इच्छा कभी हुई कि आप उनके प्रासाद के झरोखों से रेवा नदी की मनमोहक जलधारा का दर्शन करें तो फिर आप इन दीर्घबाहु नृपति को अपना बर चुनें।

कार्तिक महीनें में मान्धाता में यहाँ सालाना मेला लगा करता था। उन दिनों लगभग पच्चीस तीस हजार यात्री यहाँ आया करते थे। हर साल उसी अवसर पर इस नरबलि का प्रंबन्ध रहता था। सन् 1824 में मांधाता अंग्रेजों के अधीन आ गया। तब से अंग्रेजों ने सदियों से चली आ रही पहाड़ की चोटी पर भैरव के सामने कूदकर मरने की इस नरबलि प्रथा को समाप्त किया। मान्धाता के राजा लोग भीलालाजाति से थे। दरअसल ये लोग राजपूतों के चौहान वंश के राजा भरत सिंह के वंशज थे। 1165 में इन्होंने मान्धाता को भीलों के कब्जे से छीन लिया। कहा जाता है कि  वहाँ के पुजारी दरिद्रनाथ गोसाई के बुलावे पर एक दिन राजा भरत सिंह चौहान आये और भीलों के सरदार माथू भील की हत्या कर उसकी कन्या से शादी कर ली तब से इन्ही के वंशज भीलालाकहलाए।

               सांची में पाए गए अनुशासन लिपि में भी माहिष्मती का वर्णन मिलता है। माहिष्मती से साँची का स्तूप देखने सैकड़ों लोग आया करत थे। अनुशासन लिपि के प्रणेता परमार राजा देवपाल के बारे में अनुशासन लिपि कहती है कि जब तेरहवीं शताब्दी में राजा देवपाल माहिष्मती में निवास कर रहे थे, तब उन्होंने ओंकार पहाड़ की चोटियों पर अनेक नए शिवमंदिरों का निर्माण करवाया और अनेक पुराने मंदिरों का पुनर्निमाण भी। इसके बाद नर्मदा में स्नान करने के बाद इन मंदिरों का दान करवाया दिया।

               तात्पर्य यह कि मान्धाता, मुचकुंद, कार्तवीर्यार्जुन, प्रतीप आदि से लेकर तेरहवीं शती के परमार राज देवपाल तक के इतने प्रबल पराक्रमी सम्राटों की राजधानी होने के नाते माहिष्मती का राजमहल और उसका दुर्ग किस मात्रा में चौंकानेवाले बेशुमार धन-दौलत और ऐश्वर्य का अधिकारी रहा होगा, आज के इस खंडहर को देख कर इसका सही अंदाजा लगाना कभी मुमकिन नहीं है। हलांकि आज के माहिष्मती के निवासियों की संख्या एक हजार से ज्यादा नहीं होगी मगर एक जमाने में जिन पराक्रमी वीरों के अधीन आसमुद्रहिमाचल का यह सारा इलाका रहा करता था, उनकी राजधानी और राजमहल किस शानों-शौकत और तगड़ी सुरक्षा के दौर से गुजर रहे थे क्या इसका अंदाजा लगाना  बहुत मुश्किल है?

narmada 2


(दो)

दैत्यराज बलि के पुत्र वाणासुर और उनकी कन्या ऊषा

               द्वारिकाधीश श्री कृष्ण के पोते अनिरुद्ध महाराज वाण की कन्या राजकुमारी ऊषा दोनों आपस में प्रेम करने लगे थे। यह बात जब महाराज वाण को पता चली तो वे बिना माता-पिता की आज्ञा के प्रेम को स्वीकार नहीं कर सके और उन्होंने दोनों को चेताया। किन्तु अनिरुद्ध ऊषा का अपहरण कर ले जाना चाहते थे। इस पर युद्ध हुआ और राजा वाण ने अनिरुद्ध को पकड़ कर कारागार में डाल दिया। अपने प्रिय पोते को छुड़ाने कृष्ण ने वाण को संदेश भेजा किन्तु उससे अनुकूल उत्तर न प्राप्त होने पर कृष्ण ने वाण से युद्ध किया और वाणासुर को पराजित कर ऊषा और अनिरुद्ध को लेकर द्वारिका आ गये।

               किन्तु यहाँ एक विशेष घटना यह घटी कि सम्भवत: कृष्ण अपनी आयु मर्यादा के कारण भविष्य में अब किसी भी प्रकार का युद्ध नहीं करना चाहते थे। अत: युद्ध पश्चात कृष्ण नर्मदा तट पर स्थित वाणासुर के क्षेत्र से वापस जाते समय पर्वत शिखर पर अपने युद्ध-वेश का सदा के लिए त्याग कर, युद्धनीति से मुक्त हो माँ नर्मदा की आराधना की और यहीं से उनका नाम रणछोड़ जीपड़ा। इसी स्मृति में कालान्तर में यहाँ श्रीकृष्ण का मंदिर और मूर्ति भी स्थापित की गई।

               वाणासुर पराजित हुआ किन्तु वह न केवल पराक्रमी योद्धा था बल्कि परम शिवभक्त भी था। उसने भी इस घटना के बाद संसार से मोह भंग कर शिव की उत्कट आराधना की और शिव ने प्रसन्न होकर अपने नाम में एक पर्याय वाण भी बना लिया। इस तरह अपने भक्त की आराधना से प्रसन्न शिव ने वाणासुर को यह वरदान भी दिया कि तुम अनन्त काल तक इस नर्मदा में रह कर वाणलिंग का स्वरूप धारण कर धावणी कुंड से वाणलिंग के रूप में प्रकट होते रहोगे। इसी धावड़ी कुंड पर वाण राजा का यज्ञकुंड और तपस्या स्थल है। इस बारे में स्वयं महादेव का कहना है-
स्वयं संस्त्रवते लिंगं गिरितो नर्मदाजले।
पुरा    वाणासुरेणाहं प्रार्थितो नर्मदातटे।
अविवसं   गिरौ तत्र लिंगरूपी महेश्वर।
वाणलिंगमपि ख्यातमतोऽर्थाज्जगतीतले।

अभी महेश्वर जाना हुआ तो पता चला कि कोई बड़ा बाँध बना है जिसके सीमा में वह धावड़ी कुंड आ गया है और माँ नर्मदा की धाराएँ वहाँ नहीं पहुँच पाने से कुंड से वाणलिंग नहीं निकलते। यह जान प्राकृतिक घटनाओं से खिलवाड़ करते स्वार्थी योजनाओं के कर्ताधर्ता और अस्थाविहीन विज्ञान वेत्ताओं के प्रति मन क्षुभित हो गया।
नर्मदे हर।

narmada 1


नमामि देवि नर्मदे
माँ नर्मदा प्रसंग
(एक)
नम: शिवा। शिवाय नम:
वाण लिंगं महाभाग संसारात् त्राहिमां प्रभो। नास्ते चोग्ररूपाय नमस्ते व्यक्तयोनये।।
संसारकारिणे तुभ्यं नमस्ते सूक्ष्मरूप धृक। प्रमत्ताय महेन्द्राय कालरूपाय वै नम:।।
दहनाय नमस्तुभ्यं नमस्ते योगकारिणे। भोगिनां भोगकत्र्रे च मोक्षदात्रे नमो नम:।।
नम: कामांगनाशय नम:  कल्मषहारिणे। नमो विश्वप्रदात्रे च नमो विश्वस्वरूपिणे।।
परमात्मस्वरूपाय लिंगमूलात्काय च । सर्वेश्वराय सर्वाय  शिवाय निर्गुणाय च ।।

हर नर्मदे। नर्मदाय नम:
अध्यात्म की चित्शक्ति जो सर्वात्ममय शैवी छटा। अधिदैवमय कल्पांत में मुनि ने लिखी दैवी घटा।
अधिभूत में अद्भुत यही श्री नर्मदा भू  पर  बहीं ।  है तीर्थजननि ! आज भी त्रैविद्य  दर्शन दे रहीं।।
                             
इयं   माहेश्वरी  गंगा   महेश्वरतनुद्भवा।  प्रोक्ता  दक्षिण  गंगेति भारतस्य  युधिष्ठिर।।
जाह्नवी वैष्णवी गंगा ब्रह्मी गंगा सरस्वती। इयं माहेश्वरी गंगा रेवा नास्त्यत्र संशय:।। (नर्मदा माँ का स्वरूप: युधिष्ठिर के सम्मुख महामुनि मार्कण्डेय जी)
अर्थात् हे युधिष्ठिर! महेश्वर के दैवी शरीर से उत्पन्न होने के कारण नर्मदा को माहेश्वरी गंगा कहते हैं। आज मध्यप्रदेश के जिस क्षेत्र से नर्मदा प्रवाहित हो रही हैं, वह क्षेत्र इन्द्रप्रस्थ से (आधुनिक दिल्ली) से दक्षिण में अवस्थित है, इस कारण से महामुनि मार्कण्डेय ने नर्मदा को दक्षिण गंगा के नाम से पुकारा है।  गंगा जी भगवान विष्णु  के चरण-कमलों से उत्पन्न हुई हैं इसलिये वह वैष्णवी गंगा कहलाती हैं, ब्रह्मा की पत्नी के नामानुसार सरस्वती ब्रह्मी गंगा कहलाती हैं, वैसे ही महेश्वर के तेजोद्दीप अंग से नर्मदा जी की उत्पत्ति हुई है इसलिये वह नि:संदेह माहेश्वरी गंगा य शंकरी गंगा कहला सकती हैं।

यथा हि पुरुषे देवस्त्रैमूर्तित्वमुपाश्रित:। ब्रह्माविष्णुमहेशख्यं न भेदस्तत्र वै यथा।

अर्थात् जिस प्रकार एक ही परमपुरुष परमेश्वर, तीन देवताओं की मूर्तियों में बँट कर तीन देवता -ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर बन जाते हैं, उसी प्रकार यह बात भी याद रखनी चाहिये कि उन तीनों के स्वभावस्वरूप में उनमें कोई आपसी भेद नहीं होता है। वैसे ही इन तीन देव नदियों में भी भेदभाव नहीं करना चाहिये, क्योंकि नद्यस्त्रिस्त्रस्त्रिदेवता:देव भी तीन हैं और उनके अनुग्रह से उनकी नदियाँ भी तीन हैं, यथा सरस्वती, गंगा और नर्मदा। इनमें नर्मदा माता की महिमा सबसे ज्यादा है-

त्रिभि: सारस्वतं पुण्यं सप्ताहेन तु यामुनम्। सद्य: पुनाति गांगेयं दर्शनादेव नर्मदा।।
अर्थात् सरस्वती नदी के जल में तीन दिन स्नान करने से, यमुना के जल में एक सप्ताह स्नान करने से एवं गंगा जल में तुरंत स्नान करने से, एक आदमी पवित्र हो जाता है, परंतु नर्मदा जल में स्नान करने के पहले, केवल दर्शन हो जाने पर ही मनुष्य फौरन पाप और ताप से मुक्त हो जाता है।

नर्मदा माता की दूसरी विशेषता है कि-
 गंगा कनखले पुण्या कुरुक्षेत्रे सरस्वती। ग्रामे व यदिवारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा।।
अर्थात् गंगा की पवित्रता की महिमा हरिद्वार के कंखल में अधिक अनुभूत होती है क्योंकि इस स्थल पर दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया था, सरस्वती नदी के किनारे विभिन्न जगहों पर वेदज्ञ ऋषियों ने यज्ञ किया था, इसके बावजूद भी कुरुक्षेत्र में, चूंकि भगवान श्री कृष्ण ने, अर्जुन को विश्वरूप दर्शन कराया था और वहीं पर एक बार महावीर भीष्म के वाणों की बौछार से पस्त अर्जुन को, भीष्म के द्वारा निक्षिप्त ब्रह्मास्त्र से अर्थात् साक्षात् मृत्यु से बचाने के लिये, श्री कृष्ण को सुदर्शन चक्र धारण करना पड़ा था, जिससे उनकी  भगवद्-सत्ता प्रकट हो गई थी, तो इन्हीं सब कारणों से कुरुक्षेत्र में सरस्वती की महिमा अधिक बढ़ गई थी। परन्तु नर्मदा, चाहे वह जहाँ कहीं से भी क्यों न गुजरे-गाँव हो चाहे जंगल-उनका जल सब जगह समान रूप से महान है-वह हर जगह पर समान रूप से पतितोद्धरिणी हैं।