Monday, 22 December 2025

शिक्षा लोक प्रशासन और सामाजिक समन्वय

  • "न राज्यं न च राजासीत् न दण्ड्यो न च दाण्डिकः। धर्मेणैव प्रजा: सर्वा: रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥"।

।। ॐ अद्यतनं पञ्चाङ्गम् ।। 

सृष्टिसंवत् - १९६,०८,५३,१२७
अन्य गणनानुसार - १९५,५८,८५,१२७
अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत नाम सप्तममन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे 
कलिप्रथमचरणे - 
कलियुगाब्द: - ५,१२७
विक्रमसंवत्सर: २,०८२,  सिद्धार्थी
शालिवाहनशक: १,९४७ विश्वासु।               दक्षिणायनम्, हेमन्त-ऋतु: । मास - मार्गशीर्ष/पौष , पक्ष -  शुक्ल , तिथि - द्वितीया , नक्षत्र - चित्रा  , वार: - सोमवार: 
                  …..........
शिक्षा -विद्या -ज्ञान -वेद -परम्परा।

विद्या -'सा विद्या या विमुक्तये।' 
बंधन क्या है? काम,क्रोध,लोभ, मोह।

इनसे विमुक्त कर विद्या क्या देती है -
पुरुषार्थ चतुष्टय -अर्थ,धर्म,काम,मोक्ष।
यही मोक्ष मुक्ति है। सा विद्या या विमुक्तये।
..............

यह भारतीय ज्ञान परम्परा है - 
इसे कैसे प्राप्त करें? शिक्षा से!!

शिक्षा कहां से आती है?
अब फिर स्मरण करें - विद्या -ज्ञान और ज्ञान याने वेद। दुनिया का प्राचीनतम ज्ञान भंडार।

इसे समझने के लिए - शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, व्याकरण, छंद , निरुक्त।
               ...........

(1) शिक्षा - लौकिक और पारलौकिक।शिक्षा किसके लिए तो बात आई भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के उत्थान के लिए।

(2) छंद -जीवन का ऐसा बंधन जो रस की निष्पति करता है। आखिर नीरश जीवन कौन चाहेगा। छंद अर्थात अनुशासन। जीवन का, परिवार का,समाज का, राष्ट्र का। छंद विहीन जीवन का अर्थ है, भटकाव। अकविता।

(3) ज्योतिष -मनुष्य का प्रकृति से परिचय।
ज्योतिष -ग्रह, नक्षत्र,काल, ऋतु,अयन,तिथि का परिचय। 
एक श्लोक - ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु शशि भानु।
पृथ्वी सुगंधा...

(4) व्याकरण -जीवन की केमेस्ट्री। 
स्वर और व्यंजन का संयोग-वियोग।
अ से लेकर ज्ञ तक की केमेस्ट्री।
पंचकोष की यात्रा। व्यक्तित्व निर्माण का मूलाधार।
यहां से प्रारंभ होती है शब्द की यात्रा। परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी।
वैखरी आदर्श बताती है, किन्तु जब हमारी यात्रा उलटी चलती है, अर्थात् वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती तब परा तक पहुंचते हैं। इसे ही पंचकोसी यात्रा कहते हैं। 
जब यह पग -पग अर्थात अक्षर -अक्षर चलने से गुथे चक्रों की यात्रा प्रारंभ हो जाती है, तब बोध की यात्रा प्रारंभ होती है। गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम ओंकार प्रकट होता है।
यह विद्या शिक्षा के आधार पर प्राप्त होती है।
           .............


यह विद्या ऋषियों की तपस्या से अनुभूत सत्य है। इसकी यज्ञ शाला है, अनादि राष्ट्र भारत।

क्या यह हमें ऐसे मिला? तो नहीं।
(अथर्व. १९/४१/१) में आता है। 

(1) प्राचीन काल में लोकमंगल की कामना से ऋषियों ने तपस्या की। तपस्या लोक कल्याण के लिए थी, अत: मनसा, वाचा और कर्मणा थी। अर्थात् मन से काल और परिवेश का चिंतन किया।

(2) परा तथा पश्यन्ति से वचन को साधा और लोक के समक्ष मध्यमा का सहारा लेकर वैखरी के द्वारा न केवल सैद्धांतिक पक्ष रखा, बल्कि उसे कर्म से, व्यवहार से उदाहरण के साथ दिखाया। उनके सतत, गंभीर प्रयत्न और पुरुषार्थ से सनातन राष्ट्र की उत्पति और उसका क्रमिक विकास हुआ।
.........
यह क्यों? 
 (3) ऋषियों की लोकमंगल की उस सद-इच्छा को पुराणकारों ने व्याख्या कर कहा-
‘सर्वेषां मंगलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भागभवेत्।।’ (ग.पु.अ.35.51)।

(4) इस मंगलकारी राष्ट्र भारतवर्ष के सनातन स्वरुप को समझें। बृहस्पति आगम कहता है-
 ‘हिमालयं समारभ्य यावदिंदु सरोवरम् 
   तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्ष्यते।’

(5) विष्णु पुराण कहता है-
‘उत्तरंयत् समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।’ 

(6) इसी मातृभूमि की हम, ब्रह्मदेश, श्याम, इण्डो-चाईना, कंबोज (कंबोडिया), वरुण (बोर्नियो), सुमात्रा तथा तिब्बत आदि इस भरत-भूमि से ऊर्जा प्राप्त करते रहे हैं। यह सभी क्षेत्र अखंड भारतवर्ष के अंग थे?
             ….........…

 फिर क्या हुआ कि वैदिक ऋषिओं की तपस्थली, महाभारत का राष्ट्र, मौर्यकालीन भारतवर्ष कब और कहाँ-कहाँ बिखरता गया? 

(1) 1876-अफगानिस्तान, 1904-नेपाल, 1914-तिब्बत, 1937- ब्रह्मदेश और 1947-पाकिस्तान। क्या हमारे अखंड भारत की संकल्पना में आज भी यह सब देश आते हैं ? 
..................
 इसको दो प्रकार से समझ सकते हैं। 

(2) एक वर्तमान स्वरुप जो हमें १५ अगस्त, १९४७ को प्राप्त हुआ।

(3) दूसरा वह जो १८७६ के पूर्व था। आर्यावर्त, भारतवर्ष, भारत, हिन्दुस्थान फिर अब भारत और इंडिया समनांतर चल रहे हैं ! 
           ............
(1) १८७६ पूर्व के भारतवर्ष में वर्ष है, जो वर्ष अर्थात् स्थान और वर्ष अर्थात् काल का बोधक है।

 तो क्या ये कोरे शब्द थे? 
(2) भारत में जो वर्ष जुड़ा है उसका अर्थ ‘भू-भाग’, काल के साथ अखंड भू-भाग से अलग होता गया। 

(3) नाम बदलता गया - आर्यावर्त-भारतवर्ष से भारत, हिन्दुस्थान से हिन्दुस्तान और भारत से इंडिया बन गया।

(4) दरअसल जबसे हमने अपने वर्ष अर्थात् काल की गणना परार्ध, कल्प, मन्वन्तर और चतुर्युगों की संकल्पना का विस्मरण करते गए, हमारी भौगोलिक सीमा-भूमि-जम्बूद्वीपे, भारतवर्षे, भरतखण्डे, स्थान भी छोटा होता गया।

(5) यह संकल्प मन्त्र ‘स्व’ का बोध था, बोध मिटा और मान-चित्र (मानचित्र) बदल गया ।

(6) भूखंड पृथक होने के बाद भी हमारी सांस्कृतिक चेतना अभी भी वहां से जुड़ीं हैं। इसलिए इस स्वरूप को सांस्कृतिक भारतवर्ष मानते हैं। 

 पीढ़ियों को समझना होगा-
(1)  वर्ष (स्थान) अपने अंदर भूमि, जन का इतिहास, उसके जीवनमूल्य, संस्कृति,परम्परा, काल (समय) के आध्यात्मिक कलेवर को निरन्तरता बनाए चलता है। 

(2) दूसरा, १४, अगस्त १९४७ की भौगोलिक अस्थाई सीमा हमारे सामने है।   
.........
स्मरण रखना होगा- 
(1) यह राष्ट्र जीवंत है, चेतन्य है । ‘राष्ट्र देवो भव’ एक संकल्पित घोषणा है। यह राष्ट्र देवतुल्य है। पवित्र है। ब्रह्मस्वरूप है। ऋषियों के अभिमंत्रित मन्त्रों से ब्रह्माण्डीय सत्ता के प्राण तत्व की जागृत स्वरुप ‘चिति’ है । 
(2) यही ‘चिति’ विश्व के लिए अध्यात्मिक प्रकाश की अधिष्ठात्री है।

(3) इसके नाभि में अमृत तत्व भरा है। ऋषियों ने इसे ‘अजनाभवर्ष’ कहा है। इसलिए यह राष्ट्र ही भौतिक स्वरूप में ‘मातृदेवो भवः’, और सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिक स्वरूप में ‘पितृदेवो भवः’ है। 

(4) यह चराचर के लिए पूज्य है, चेतन है, प्रकाशमान है। इस देवतुल्य राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना दुनिया के पीड़ित, दुखी मानवता को ‘अतिथिदेवो भवः’ के रूप में स्वीकार करती है। 

(5) यह ज्ञान-विज्ञान प्रदाता है। राष्ट्र और हमारा अन्गांगी भाव का सम्बन्ध है ।’ राष्ट्र केवल शासन प्रणाली या भू-भाग नहीं, वह जीवंत, चेतन सत्ता है।

शिक्षा इसका माध्यम है।
........

लोक प्रशासन - 
(1) यह अंग्रेजी का अनुवाद है?
क्या लोक और फोक एक ही है?
लोक भारतीय ज्ञान परम्परा में व्यापक शब्द है।
लोक गीत, लोक परम्परा, लोकाचार, लोक संस्कृति, 

(2) जिसकी रक्षा, सेवा और साधना करना प्रत्येक नागरिक का धर्म है। इसके जीवन मूल्यों से प्रेरित दुनिया आदि काल से इसे धर्मस्वरुप मान कर पूजती आई है।

(3)  यह देवनिर्मित भूमि है। हिमालय में मानसरोवर जैसे क्षेत्र ब्रह्म रन्ध हैं। यह शिव-पार्वती का क्रीड़ा-स्थल और शिव के परिवार का निवास है। यहां भारतवर्ष पीपल, वट, पाकर, रसाल के वृक्षों से आच्छादित साधना का क्षेत्र है। 

(4) जहाँ पीपल के नीचे परमपिता परमेश्वर का ध्यान करते हुए ,उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। पाकर के नीचे यज्ञ-कर्म करतें हैं । आम्र वृक्ष के नीचे संसार के प्राणियों के मंगल कामना का चिंतन किया जाता है।वट के नीचे बैठ कर संसार के जिज्ञासुओं के लिए समाधान दिया जाता है। 

(5) भारतवर्ष निश्चरहीन करने की राम की संकल्पना है। अधर्म के नाश की कृष्ण की घोषणा है। गांधार संकल्पों की भूमि है।

(6) इसमें नचिकेता की ‘मृत्यु विजय’ है, शिवि, दधीचि, नारद, प्रहलाद, ध्रुव का ‘तप’ है, राम का ‘त्याग’ है, हरिश्चन्द्र का ‘वचन’ है, परशुराम का ‘समर्पण’ है, युधिष्ठिर का ‘सत्य’ है, कर्ण का ‘दान’ है, व्यास, भीष्म और कृष्ण का ‘भविष्य का चिंतन’ है ।

(7) यहां शवरी की ‘भक्ति’ है, सावित्री की ‘सेवा’ है, सीता की 'अग्नि परीक्षा' है, अनुसुइया का ‘आशीर्वाद’ है । 
............
इसके लिए भारतीय चैतन्य सत्ता को समझना होगा ।

(1)  इसलिए स्मरण रखना होगा, भारत बिना 'वर्ष' के अधूरा है। 

 (2) राम ने अपने युग में जन सहयोग से आर्यावर्त को निश्चरहीन किया । कृष्ण ने महाभारत में धर्म की स्थापना की। तब आज का करनीय क्या है? 

(3) राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाना है ! विश्व गुरु का अस्तित्व बोध कराना!! अतीत का वैभाव पुनर्जीवित करना है!!! 

(4) उत्तर सीधा है, अपने से, परिवार से,समाज के साथ मिलकर पञ्च परिवर्तन लाना है, वन्देमातरम् गाना। यही बोध सम्पूर्ण समाज के अंदर ऋषियों की दैवी आकाँक्षाओं की पूर्ति के हेतु हैं।

क्या यह यक्ष प्रश्न हैं? युधिष्ठिर की भूमिका में खड़े होकर देखना होगा ।
...........

 'परावर्तन' सामाजिक सरोकार की एक ऐसी दृष्टि है, जो मूल से निकले दिशा बदल चुके, पंथों को दुलराती, सहलाती और आत्मीयता से आच्छादित कर 'स्वत्व' का बोध कराती है।

* 'परावर्तन' एक राष्ट्रीय संकल्पना है, जिसमें पंथ, वर्ग, जाति, लिंग, भाषा, भूषा और क्षेत्र का सप्तरंगी इंद्रधनुष बनता है, जो अ-राष्ट्रीय तत्वों, विभेदक नीतियों और विध्वंसकारी संभावनाओं का समूलाग्र उच्चाटन करती है।

* परावर्तन वह व्याप्ति है, जो वैश्विक क्षितिज को स्पर्श करती , उषा की भगवा आभा बिखेरते हुए, प्रचंड भास्कर का सर्वकष मार्ग प्रशस्त कर आहत, अतृप्त, आकांक्षी मनुष्यता को संध्या और रात्रि की गहनतम होती संम्भावनाओं से निकाल कर, अर्काय स्वरूप को प्रदीप्त करने, राकापति के मधु की वर्षा के साथ औषधीय विरेचन का कार्य करती है।

* 'परावर्तन' वह आध्यात्मिक अंत: सलिला है, जो अन्नमय कोष (भु:भुव स्व की यात्रा को) प्राण मय कोष के वाहन में प्रतिस्थापित कर मन और उसकी सारथी इंद्रियों का शिथिलीकरण कर वि-ज्ञान की किरणों से उन्हें उर्ध्वमुखी बना , चेतना की प्रार्थनाओं और आहुतियों की समिधा 'चिति' में स्वाहा करती आनन्द मय कोष, रसो वै स: का बोध कराती है। 

* यह द्वय का परावर्तन है। परिवर्तन के कारण मूल से बिखरी और विखंडित होती आकांक्षाओं का शीतलीकरण है।

* परावर्तन नैसर्गिक है, परिवर्तन सुनियोजित /आकस्मिक योजना /घटना है।  

* परिवर्तन में संम्भावनाओं का द्वंद्व है , तो परावर्तन में विकृतिकरण की संम्भावनाओं की इति है।
..........

सनातन की आभा में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व की चेतना को भारतीय चिति में व्याप्तीकरण (अध्या त्मीकरण) की प्रक्रिय
है।


* यह केवल सिंदूर की नहीं, तो हल्दी, दूर्वा, कुमकुम से सजी वह अभिमंत्रित थाली है, जो वसुंधरा के भाल पर तिलक करने उद्यत है।

* सन्नद्ध है, मंगलकारी सुप्रभात के उषा -भगवा - प्रणाम को। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020 मध्यप्रदेश में लागू हुए तीन वर्ष पूरे हो गए हैं। नीति को लागू करने में अग्रणी राज्य होने के कारण इसके अच्छे परिणाम लाने में भी इसकी महती भूमिका अपेक्षित है । 

आज उच्च शिक्षा में वाद की जगह दुराग्रह पूर्ण जल्प 'डिबेट कॉम्पटीशन चल रहा है। परिणाम शिक्षा नीति "वादे वादे जायते तत्व बोध": की जगह "वादे वादे कंठशोष:" आ रहा है।

इतना भी होता तो कुछ गुंजाइश निकलती किंतु यह उससे भी आगे सेक्युलरिस्ट और कम्युनिज्म का वितंडा वाद है, जो स्वतंत्रता के बाद से आज तक कुछ सार्थक तो दे नहीं पाये, बस वितंडा कर भारत, हिंदू, धर्म, सनातन, संस्कृति, परम्परा के सार्थक दृष्टि कोण का खंडन ही करते रहे। यह एक तरह का राष्ट्र के साथ छल है।

अतः कुछ सार्थक चाहिए तो 'वाद' के आधार पर तथ्यों के साथ चीजों को समझना होगा ।

 किसी भी देश की ज्ञान परम्परा उस देश का दर्पण हुआ करती है । ज्ञान परम्परा के माध्यम से उस देश की अतीत से वर्तमान तक की यात्रा से आज की पीढ़ी अवगत होती है। ज्ञान परम्परा के माध्यम से ही देश का तत्त्वचिंतन, संस्कृति, सभ्यता अभिव्यक्त होती हैं।

भारत और उसकी पहचान तथ्यों के आधार पर मार्कट्वेन के शब्दों में -"भारत उपासना पंथों की भूमि, मानव जाति का पालना, भाषा की जन्मभूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दादी तथा परम्परा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सृजनशील सामग्री है , उसका भंडार अकेले भारत में है।

 किन्तु कुचक्रों , जल्पों और वितंडा वाद के आधार पर ( मैक्समूलर अपनी पत्नी को साफ-साफ) लिखता है कि "वेद का मेरा यह अनुवाद उत्तर काल में भारत के भाग्य पर दूर तक प्रभाव डालेगा। यह उनके धर्म का मूल है और विगत तीन हजार वर्षों से उत्पन्न आस्थाओं को जड़मूल से उखाड़ने का उपाय है ।"

 श्री एन. के. मजूमदार को मृत्यु से एक वर्ष पूर्व लिखे पत्र में, प्रो. मैक्समूलर लिखता है " मैं हिन्दू धर्म को शुद्ध बनाकर ईसाइयत के पास लाने का प्रयास कर रहा हूँ । आप या केशवचन्द्र सरीखे लोग प्रकट तौर पर ईसाइयत को स्वीकार क्यों नहीं करते ?... नदी पर पुल तैयार है। केवल तुम लोगों को चलकर आना बाकी है। पुल के उस पार लोग स्वागत के लिए आपकी राह देख रहे हैं ।" विचार करें यूरो सेंट्रिक शिक्षा कैसे हमारे घरों में ' कान्वेंट ' के रास्ते आ रही है?

एनी बेसेण्ट का भारत की राष्ट्रीयता और उसकी ज्ञान परम्परा पर कालजयी दृष्टांत भी समझना होगा- "विश्व के विभिन्न महान धर्मों एवं पंथों के अपने चालीस वर्षों से अधिक के अध्ययन के आधार पर मैं कह सकती हूँ कि मुझे हिन्दू धर्म जितना सम्पूर्ण, विज्ञानसम्मत, दार्शनिक और आध्यात्मिक दिखा उतना कोई दूसरा धर्म नहीं दिखा। जितना अधिक आप इसे जानते हैं उतना ही अधिक आप इससे प्यार करने लगते हैं और जितना अधिक आप इसे समझते हैं उतनी ही गहराई से आप इसका महत्त्व समझने लगते हैं।"

 उन्होंने आगे कहा- "इस विषय में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि बिना हिन्दुत्व के भारत का कोई भविष्य ही नहीं है। जिसमें भारत की जड़ें गहरी जमी हुई हैं और यदि उस भूमि से उसे उखाड़ा गया तो भारत वैसे ही सूख जायेगा जैसे कोई वृक्ष भूमि से उखड़ने पर सुख जाता है। समय के साथ हर कोई वैसे ही चला जायेगा जैसे यह आया था किन्तु एक बार हिन्दुत्व को हटा दीजिए तो उसके बाद भारत का क्या बचता है ? भारत का इतिहास, उसका साहित्य, उसकी कला, उसके स्मारक सब में हिन्दुत्व आद्योपांत भरा पड़ा है। ... "यदि हिन्दू ही हिन्दु को नहीं बनाये रखेंगे तो इसको कौन बचायेगा ?" 

 इस परिस्थिति के पीछे का कुचक्र - 
प्रख्यात जर्मन विद्वान् शोपन हॉवर ने लिखा -" उपनिषद् सर्वोच्च मानव बुद्धि की उपज हैं। यह मेरे जीवन के लिए शान्ति का आश्वासन रहा है और जो मेरी मृत्यु के बाद तक बना रहेगा।"
हमबोल्ट गीता को संसार की गम्भीरतम और उच्चतम वस्तु मानते थे। 

 विद्वानों के यह कथन स्वाभाविक थे, परन्तु जैसे-जैसे भारत, भारतीयता और हिन्दू धर्म का अधिक प्रचार होने लगा वैसे-वैसे ईसाई धर्म प्रचारकों और पादरियों के कान खड़े हो गये। उन्हें लगने लगा कि यदि संस्कृत वाङ्मय का इसी प्रकार प्रचार चला तो सृष्टि का निर्माण 4004 ईसा पूर्व हुआ तथा बाइबिल में व्यक्त विचार ही सर्वश्रेष्ठ विचार हैं,' ये धारणाएँ ध्वस्त हो जायेंगी। 

अतः उन्होंने अनेक लोग तैयार किये जो भारतीय ज्ञान परम्परा उसकी प्राचीनता, श्रेष्ठता और गहनता को अप्रमाणिक और अवास्तविक बताएं। 

वर्ष 1921 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने भाषण में कहा था- "ऐसा नहीं है, अंग्रेजों का यह एक सर्वकष आक्रमण है, जो हमारे समाज को, उसके मानस को, उसकी 'आत्मा को मूल से परिवर्तित कर देगा और इसका मुकाबला करने के लिए अगर आप तीर कमान लेकर उसके पीछे छोड़ेंगे तो यह रूप बदलता जाएगा।" 

समाधान के रुप में पूर्वजों का मत है - " भारत अपनी आत्मा का साक्षात्कार करे । उस आत्मा की अभिव्यक्ति 'Philosphical label' नहीं, रचनाओं, जीवन मूल्यों, दैनंदिन जीवन की अभिव्यक्ति के अंदर अभिव्यक्त हो।

अत: भारतीय ज्ञान परम्परा को आज के पाठ्यक्रम में लाना कितना आवश्यक है, हम समझ सकते हैं । आज भी शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में एक बड़ा तंत्र भारत में इसी दिशा में काम कर रहा है। 

 सार यह कि शिक्षा, संस्कृति के ऊपर की धूल हटे और भारत भारत केन्द्रित ज्ञान परम्परा को भारतीय वांग्मय के आधार पर लागू हो।

 इसमें आदर्श पारिवारिक जीवन के मानकों और ज्वलंत घटनाओं को रखा जाना चाहिए। एक -दो कक्षा के विद्यार्थी और अभिभावकों को एक कालांश में (अधिकतम 80-से100)बुलाया जाये। बदल बदल कर नित्य एक दो कालांश हो सकते हैं। 

 इसका कोई निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं हो किंतु समाज में अच्छे परिवारों के अनुभव कथन, आध्यात्मिक वातावरण, पारिवारिक सदस्यों के आपस में साथ उठने बैठने जैसे विषय हों। बातचीत का स्वरूप हो। आदर्श पारिवारिक वातावरण जैसा ही इस कालांश का स्वरूप हो। 

बैठक सरस्वती वंदना, वैदिक मंत्रों से प्रारंभ हो और समापन राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान से हो।

अतिथि नाम का कोई प्राणी न हो। फूल -माला, स्वागत न हो। स्थानीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, राजनेता भी अभिभावक के रूप में ही सम्मिलित हो। 

अभिभावकों के अनुभव कथन हों। इससे जो गीता -रामायण, रामचरित मानस या अन्य भाषा भाषियों के लिए उनकी भाषा के सद्ग्रंथों को पाठ्यक्रम में रखने का उद्यम किया जा रहा है उसकी भी पूर्ति चर्चा और उदाहरणों के माध्यम से हो।

एक तरफा ज्ञान न परोसा जाये। पारिवारिक जीवन के व्यवहारिक पक्षों पर सरस और सार्थक चर्चा भारतीय ज्ञान परम्परा के आधार पर भी हो सकती है।

इसमें विद्यार्थियों के परफार्मेंस पर चर्चा न हो।

अंत में उपस्थित किसी ऐसे व्यक्ति का अनुभव कथन हो जो भले ही बड़ा ज्ञानी -विज्ञानी न हो किंतु अपने जीवन में वह कुछ सार्थक प्रयास कर रहा हो। वह किसान,व्यापारी , कर्मचारी, सफाई वाला या संत भी हो सकता है।

सद्ग्रंथों को बोध कथाओं के रूप में शिक्षक अपने पाठ्यसामग्री में सम्मिलित कर पढ़ायेंगे तो उन्हें अलग से प्रश्न पत्र,परीक्षा आदि नहीं बनाने -करने होंगे, इस पर कैसे वातावरण बनाया जाये बातचीत हो।

इससे शासन में विराजमान माननीयों को भी गीता, गंगा,गौ को पाठ्यक्रम में जोड़ने की रोज घोषणा नहीं करनी पड़ेगी। और शासन को रिपोर्टिंग से बचा जा सकेगा। प्राचार्यों -शिक्षकों की वेतन बृद्धि भी नहीं रुकेगा और ऐसे अधिकारियों से भी निजात मिलेगी जिनका नितांत मशीनकरण हो चुका है।

भारतीय ज्ञान परम्परा और व्यक्तित्व विकास तथा चरित्र निर्माण में पाठ्यक्रम की नहीं शासन, प्रशासन,शिक्षक और अभिभावकों को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से बताना होगा। यह आचरण का विषय है न कि वेबीनार और सेमीनार का।

इसके स्थानीय आधार पर स्वरूप भिन्न हो सकते हैं किन्तु केन्द्र में सामाजिक सरोकारों और आध्यात्मिक वातावरण से जुड़ा सुचिता पूर्ण राष्ट्रीय परिवार हो।
सादर
जीवन निर्माण में श्रीमद्भगवत गीता में तीन प्रकार के तप बताए गये हैं-

 १. शरीर तप (गीता- १७/१४) - जीवन श्रेष्ठ होने का अर्थ है श्रेष्ठ आचरण- नसरुद्दीन एक राज्य का शासक था। परन्तु वह अवकाश के समय टोपियां बनाना था उससे जो धन प्राप्त होता था उसी से अपना खर्च चलाता था ।

 नसरुद्दीन की पत्नी स्वयं खाना बनाया करती थी । एक बार खाना बनाते समय उनका हाथ जल गया। वह सोचने लगी कि एक शासक की पत्नी होते हुए भी उसे एक नौकर तक उपलब्ध नहीं ।

 उन्होंने अपने पति से कहा, ‘आप इतने बड़े राज्य के शासक हैं, क्या आप हमारे लिये भोजन पकाने वाले एक नौकर का भी प्रबन्ध नहीं कर सकते ?’

 नसरुद्दीन ने उत्तर दिया - ‘‘भाग्यवान! नौकर रखा जा सकता है, बशर्ते कि हम अपने सिद्धान्तों से डिग जाएं ।  

राज्य, धन, वैभव तो प्रजा का है । हम तो उसके रक्षक मात्र हैं । उसका उपयोग अपने लिए करें, यह तो बेईमानी होगी। बात पत्नी को समझ में आ गई।’’

२. मानस तप (गीता -१७/१६)- सूर्य का प्रकाश लेकर दो किरणें चलीं। एक कीचड़ में गिरी तो दूसरी पास उग रहे कमल के फूल पर गिरी। जो फूल पर गिरी वह दूसरी से बोली - ‘देखो ! जरा दूर रहना। मुझे छूकर कहीं अपवित्र न कर देना।’

 कीचड़ वाली किरण यह सुनकर हँसी और बोली - ‘बहन! जिस सूर्य का प्रकाश हम दोनों ले कर चलीं हैं, उसे सारे संसार में अपना प्रकाश भेजने में संकोच नहीं तो ये आपस में मतभेद कैसा ? 

और फिर यदि हम ही इस कीचड़ को नहीं सुखायेगी तो पुष्प को उपयोगी खाद कैसे मिल सकेगी ?’

 यह सुन दूसरी किरण अपने दंभ पर लज्जित हो गई। 

३. वाणी तप (गीता-१७/१५)- व्यास जी ने गणेश जी से महाभारत लिखवाया। महाभारत पूरा हुआ तो व्यास जी ने गणेश जी से पूछा,‘महाभाग! मैंने २४ लाख शब्द बोलकर लिखाए, लेकिन आश्चर्य है इस बीच में आप एक शब्द भी नहीं बोले। सर्वथा मौन रहे?

 गणेश जी ने उत्तर दिया ‘बादरायण ! बड़े कार्य सम्पन्न करने हेतु शक्ति की आवश्यकता होती है और शक्ति का आधार संयम है। संयम ही समस्त सिद्धियों का प्रदाता है। वाणी का संयम न रख सका होता तो आपका ग्रंथ तैयार कैसे होता। यह वाणी का तप है।
 

वैदिक काल से लेकर आज तक जो भी सद्साहित्य हमारे सामने आता है, उसका उद्देश्य लोक कल्याण है । ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र है -

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्
देवा भागं यथा पूर्वे संजाना उपासते ।।
      हम सद्भाव में चलें, एक स्वर में बोलें; अपने मन एक मत रहें; ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन देवताओं ने बलिदान का अपना हिस्सा साझा किया था।

समानो मंत्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्
समानं मंत्रमभिमंत्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ।।
     हमारा उद्देश्य एक ही हो; क्या हम सब एक मन के हो सकते हैं? ऐसी एकता बनाने के लिए मैं एक सामान्य प्रार्थना करता हूँ।

समानि व आकूति: समाना हृदयानि व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।

              हमारा उद्देश्य एक हो, हमारी भावनाएँ सुसंगत हो। हमारा विचार संयोजन हो। जैसे इस विश्व के, ब्रह्मांड के विभिन्न सिद्धांतों और क्रियाकलापों में तारात्मयता और एकता है ॥ ऋग्वेद 8.49.4

              विचार करें , यह प्रार्थना अपने को सीधे विश्व से जोड़ती है । यह कौन सी संस्कृति है ? वैदिक संस्कृति, सनातन संस्कृति , हिन्दू संस्कृति । जहाँ अपने लिए नहीं सम्पूर्ण जीवमात्र के लिए है प्रार्थना है ?

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

               “सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

              यह शान्ति कैसे मिले तो, हे परमपिता! मझे असत से सत की ओर ले चल। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल। मृत्यु से अमृत की ओर ले चल। 

ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।

              यह प्रार्थना कौन कर रहा है - "वयं राष्ट्रांग्भूता” जो यह मानता है कि हम इस राष्ट्र के अंगभूत घटक हैं ।

 यह राष्ट्र क्या है? तो कहा गया ‘राजते दीप्यते प्रकाशते शोभते इति राष्ट्रम्’ जो स्वयं देदीप्यमान हो वह राष्ट्र है । 

राष्ट्र का आधार क्या है ? जो कुछ भी भौतिक है वह राष्ट्र का आधार नहीं है क्योंकि राष्ट्र एक आध्यात्मिक इकाई है। 

इस आध्यात्मिक सिद्धांत को दो वस्तुएं निर्माण कराती हैं , इनमें से एक अतीत में होती है, जिसे हम स्मृतियों की विरासत और दूसरी वर्तमान में वास्तविक समझौता अर्थात् साथ रहने की इच्छा, साझी विरासत से अधिकाधिक लाभ उठाने का संकल्प।

 जैसे मनुष्य का शरीर धारण कर लेने से हर व्यक्ति मनुष्य नहीं बन जाता उसे बनने या बनाने में एक लम्बा समय लगता है, उसी तरह राष्ट्र उक्त दोनों शर्तों पर जीने वाले लोगों के प्ररिश्रम, बलिदान और निष्ठा के लम्बे अतीत का फल होता है । 

राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा, एक धर्म अथवा आर्थिक हितों वाले एक समुदाय की आवश्यकता नहीं होती । इसके लिए एक भावना, संवेदनशीलता, एक जीवन मूल्य की आवश्यकता होती है ।

            उदाहरण के लिए चौथाई सदी पहले तक यू.एस.एस.आर.में लातीविया, जार्जिया, कजाकिस्तान, आर्मेनिया, उज्बेकिस्तान आदि कई राष्ट्र शामिल थे।युगोस्लाविया में भी एक से अधिक राष्ट्र थे।

भारत आदिकाल से एक राष्ट्र है, इसमें बहुत से राजा थे , सिकंदर के आक्रमण के समय नंद साम्राज्य के साथ ही यहां बहुत से गणतंत्र थे।

 भगवान बुद्ध का जन्म एक गणतंत्र में ही हुआ था। नर्मदा के उत्तर में राजा हर्षवर्धन का राज्य था और दक्षिण में पुलकेशिन का। किन्तु भारतवर्ष का भू-भाग वृहत्तर और सांस्कृतिक था।


 राज्य एक राजनीतिक इकाई है जो कानून से चलती है। 

कानून प्रभावकारी हो, इसके लिए राजा को शक्ति की आवश्यकता होती है। 

यहूदियों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ दिया गया था, और 1800 साल तक वे विभिन्न देशों में रहे ,पर वे कभी नहीं भूले कि फिलस्तीन उनकी मातृभूमि है। 



दूसरी शर्त है साझा इतिहास।आखिरकार इतिहास अतीत में घटी घटनाएं ही तो होती हैं। इन घटनाओं में से कुछ के प्रति गर्व की अनुभूति होती है और कुछ लज्जा का कारण बनती हैं। इतिहास की घटनाओं के प्रति खुशी और पीड़ा की एक जैसी भावनाओं वाले एक राष्ट्र बनाते हैं।

 तीसरी और सबसे महत्त्व पूर्ण शर्त है एक सामान जीवनमूल्य-प्रणाली में आस्था।

यही मूल्य प्रणाली संस्कृति कहलाती है। दुनिया के सभी राष्ट्र ये तीनों शर्तें पूरी करते हैं ।

 हमारे देश में ही इन शर्तों को लेकर विवाद हैं।

भारत माता की जय और वंदे मातरम् का नारा लगाने में गर्व महसूस करने वाले कौन लोग हैं? राम, कृष्ण, चाणक्य, विक्रमादित्य, राणा प्रताप और शिवाजी तक अपना इतिहास मानने वाले कौन लोग हैं? 

वे कौन हैं जिनकी साझी मूल्य प्रणाली है?

 इस मूल्य प्रणाली का एक मुख्य सिद्धांत है विश्वासों और धर्मों की बहुलता में विश्वास करना। सारी दुनिया इन लोगों को हिंदू के रूप में जानती है।इसलिए यह हिंदू राष्ट्र है।

 इसका इस बात से कुछ लेनादेना नहीं है कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक; आप मूर्तिपूजा में विश्वास करते हैं या नहीं, आप वेदों को मानते हैं अथवा किसी अन्य धार्मिक ग्रंथ को।

हमारे संविधान निर्माता इस बात को समझते थे।इसीलिए संविधान की धारा 25 में कहा गया है कि ‘हिंदू शब्द में सिख, जैन और बौद्ध धर्मावलाम्बियों का भी समावेश है.’ ।

यह ईसाइयत और इस्लाम को मानने वालों पर लागू क्यों नहीं होना चाहिए?

इसको एक विद्वान के संस्मरण से समझें -

"सत्रह साल तक मैं एक ईसाई कॉलेज में पढ़ाता था।1957 में एक वरिष्ठ ईसाई प्राध्यापक ने मुझसे पूछा क्या वे आर.एस.एस के सदस्य बन सकते हैं?

 मेरे हां कहने पर उन्होंने सवाल किया,‘इसके लिए मुझे क्या करना होगा?’ मैंने उत्तर दिया,‘आपको न चर्च छोड़ना पड़ेगा, न बाइबिल में विश्वास आप ईसा मसीह में अपनी आस्था भी बनाये रख सकते हैं।पर आपको अन्य विश्वासों, धर्मों की वैधता को भी स्वीकारना होगा।’ इसपर उन्होंने कहा ‘मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता। यदि मैं यह स्वीकारता हूं तो अपने धर्म का प्रसार नहीं कर पाऊंगा।’ इस पर मैंने कहा- ‘तब आप आरएसएस के सदस्य नहीं बन सकते।’ ‘हिंदू’ के बारे में हमारी समझ में जो भ्रम है, वह हिंदूवाद को एक पंथ मानने के कारण है। यह धर्म नहीं है। "

साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोक कल्याण के कार्यों के लिए सदैव प्ररेणा देने का कार्य करता रहा है। प्रत्येक देश का साहित्य अपने देश की भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों से जुड़ा होता है ।भाषा के बिना यदि संस्कृति सर्मथहीन है तो संस्कृति के आभाव में भाषा अंधी।

 संस्कृति के पूरक तत्व भाषा के साथ-साथ देश के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, ज्ञान-विज्ञान, परम्परागत अनुभव, कला-प्रेम, जीवन यापन के भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र उसकी उदारता, सहिष्णुता और समस्त वसुधा को एक कुटुंब मानने में है । भारतीय संस्कृति गिरि शिखरों की भाँति उदात्त, गंगा की भांति निरंतर प्रवाहमान , समुद्र की तरह विशाल है।

 वह विधा-अविधा, श्रेय और प्रेय, अभ्युदय और निह्श्रेयस, द्यावा-पृथिवी सभी को आत्मसात करती हुई विश्व को ज्योतिर्मय करती आ रही है। 'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।' सभी दिशाओं से शुभ विचार मेरी ओर आएँ।

सोहन लाल द्विवेदी कहते हैं -

पर्वत कहता शीश उठाकर , तुम भी ऊंचे बन जाओं ।

सागर कहता लहराकर , मन में गहराई लाओ ।

पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ों , कितना ही हो सर पर भार।

नभ कहता है फैलो इतना , ढंक लो तुम सारा संसार। (सोहनलाल द्विवेदी )

  भारतीय ज्ञान परंपरा

इसकी आवश्यकता क्यों ?

भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सैद्धांतिक आधार

भारतीय ज्ञान परमपरा कैसे लागू हो
इसकी आवश्यकता क्यों ?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020 मध्यप्रदेश में लागू हुए दो वर्ष पूरे हो गए है। नीति को लागू करने में अग्रणी राज्य होने के कारन हमारी महती भूमिका है । कर्नाटक ने सरकार बदलते ही नीति को ठन्डे वस्ते पर डालने की घोषणा कर दी । हम आगे बढ़ गए हैं । 
ध्यान में आता है कि जब चीजें धुंधली रहती हैं तो चिन्तन की जरूरत पड़ती है। ऐसा कहते हैं कि जहाँ भी चेतना हैं, वहाँ यथास्थिति नहीं रहती और यथास्थिति नहीं रहती है तो उतार भी रहते हैं और चढ़ाव भी रहते हैं। इसलिए जब संक्रमण काल पैदा होते हैं, तब उसमें से निकलने के लिए चिन्तनशील लोगों के बीच में चिन्तन होना, यह भारत की एकदा नैमिषारण्ये की परम्परा रही है।

 न्यायदर्शन किसी सत्य पर पहुँचने के लिए चार प्रकार बताता है- पहला वाद । वाद में आदमी कोई पूर्वाग्रह, दुराग्रह लिए बिना अगर कोई उचित बात है और अपनी धारणा गलत है तो उसे छोड़ेगा, उचित को स्वीकार करेगा। इस मानसिकता से जो संवाद होता है, उससे अन्त में सत्य की प्राप्ति होती है। इसलिए कहा गया है कि “वादे वादे जायते तत्वबोधः ।"

 ये दृष्टिकोण नहीं रहा तो फिर कहते हैं कि "वादे वादे जायते कंठशोषः " अर्थात् गला सूखता है, उससे निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता है। 

एक दूसरा प्रकार है, उसे 'जल्प' कहते हैं । आजकल की भाषा में 'डिबेट कम्पटीशन' । व्यक्ति एक निश्चित आग्रह लेकर खड़ा होता है और अपनी बात का मंडन करना और सामने वाले की बात सही है तो भी खंडन करना, एक प्रवृत्ति रहती है। 

तीसरा कहते हैं 'वितंडा' अपने देश में जितने भी इष्ट हैं, 'सेकुलरिष्ट, कम्युनिष्ट' ये सब इस विधा के विशेषज्ञ हैं। वितंडा का कहना था कि मेरा मत कुछ नहीं है। मैंने तय किया है कि सामने वाला कुछ भी कहें, जिसमें 'हिन्दू, भारत, सनातन' आदि बात हो तो बस एक ही काम है उसका खंडन करना । 

'वितंडा' का एक नया प्रकार भी आजकल चला है । मैं कुछ कहना चाहता हूँ, मेरा भाव कुछ है, लेकिन संदर्भ से काट कर बात कहेंगे तो उल्टा अर्थ निकल जाएगा, इसे 'छल' कहा गया। 

लेकिन पूर्वजों ने कहा है कि अगर सार्थक कुछ प्राप्त करना है तो 'वाद' की पद्धति ठीक है। पूर्वाग्रहों, दुराग्रहों से मुक्त होकर उचित का स्वीकार, अनुचित का अस्वीकार। 

एक दूसरी बात- किसी भी देश की ज्ञान परम्परा उस देश का दर्पण हुआ करती है । ज्ञान परम्परा के माध्यम से उस देश की अतीत से वर्तमान तक की यात्रा से आज की पीढ़ी अवगत होती है। ज्ञान परम्परा के माध्यम से ही देश का तत्त्वचिंतन, संस्कृति, सभ्यता अभिव्यक्त होती हैं।

भारत दुनिया का प्राचीनतम राष्ट्र है। माना जाता है की मानव जाति के इतिहास ने जब आँखें खोलीं तो उसने भारत को एक सुसंस्कृत, सबल, समृद्ध राष्ट्र के रूप में देखा । मानव जाति ने बीते समय में शांति, समन्वय, सौहार्द और एकात्मता का संदेश यहीं से प्राप्त किया। 

भारत की इस भूमिका के कारण मार्कट्वेन जैसे लेखक को लिखना पड़ा "भारत उपासना पंथों की भूमि, मानव जाति का पालना, भाषा की जन्मभूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दादी तथा परम्परा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सृजनशील सामग्री है , उसका भंडार अकेले भारत में है।

 किन्तु प्रो. मैक्समूलर जो इन पाश्चात्य संस्कृत पण्डितों के मुर्धन्य माने जाते हैं, उन्होंने तो अपनी पत्नी को साफ-साफ लिखा है कि "वेद का मेरा यह अनुवाद उत्तर काल में भारत के भाग्य पर दूर तक प्रभाव डालेगा। यह उनके धर्म का मूल है और विगत तीन हजार वर्षों से उत्पन्न आस्थाओं को जड़मूल से उखाड़ने का उपाय है ।

 श्री एन. के. मजूमदार को मृत्यु से एक वर्ष पूर्व लिखे पत्र में, प्रो. मैक्समूलर लिखते हैं " मैं हिन्दू धर्म को शुद्ध बनाकर ईसाइयत के पास लाने का प्रयास कर रहा हूँ । आप या केशवचन्द्र सरीखे लोग प्रकट तौर पर ईसाइयत को स्वीकार क्यों नहीं करते ?... नदी पर पुल तैयार है। केवल तुम लोगों को चलकर आना बाकी है। पुल के उस पार लोग स्वागत के लिए आपकी राह देख रहे हैं 

काफी वर्षों पूर्व महामना मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के अवसर पर डॉ. एनी बेसेण्ट द्वारा व्यक्त विचार भारतीय राष्ट्रीयता और उसकी ज्ञान परम्परा का एक कालजयी दृष्टांत है।

डॉ. एनी बेसेण्ट मूलतः आयरिश महिला थी ।  

हिन्दू धर्म से प्रभावित हुई तथा उन्होंने अपना नाम योगिनी राधाबाई रखा। उसी योगिनी राधाबाई द्वारा स्थापित थियोसोफीकल सोसायटी के सम्पर्क में एनी बेसेण्ट आयी । 

 एनी बेसेण्ट ने चेतावनी देते हुए कहा था , "विश्व के विभिन्न महान धर्मों एवं पंथों के अपने चालीस वर्षों से अधिक के अध्ययन के आधार पर मैं कह सकती हूँ कि मुझे हिन्दू धर्म जितना सम्पूर्ण, विज्ञानसम्मत, दार्शनिक और आध्यात्मिक दिखा उतना कोई दूसरा धर्म नहीं दिखा। जितना अधिक आप इसे जानते हैं उतना ही अधिक आप इससे प्यार करने लगते हैं और जितना अधिक आप इसे समझते हैं उतनी ही गहराई से आप इसका महत्त्व समझने लगते हैं।

 उन्होंने आगे कहा- "इस विषय में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि बिना हिन्दुत्व के भारत का कोई भविष्य ही नहीं है। जिसमें भारत की जड़ें गहरी जमी हुई हैं और यदि उस भूमि से उसे उखाड़ा गया तो भारत वैसे ही सूख जायेगा जैसे कोई वृक्ष भूमि से उखड़ने पर सुख जाता है। समय के साथ हर कोई वैसे ही चला जायेगा जैसे यह आया था किन्तु एक बार हिन्दुत्व को हटा दीजिए तो उसके बाद भारत का क्या बचता है ? भारत का इतिहास, उसका साहित्य, उसकी कला, उसके स्मारक सब में हिन्दुत्व आद्योपांत भरा पड़ा है।'

अपना वक्तव्य समाप्त करते हुए उन्होंने कहा- "यदि हिन्दू ही हिन्दु को नहीं बनाये रखेंगे तो इसको कौन बचायेगा ? यदि भारत के अपने बच्चे है इससे जुड़े न रहे तो फिर इसकी रक्षा कौन करेगा ? स्वयं भारत ही भारत के बचा सकता है तथा भारत और हिन्दुत्व एक ही हैं।

प्रश्न उठता है कि डॉ. एनी बेसेण्ट को यह कहने की आवश्यकता क्यों पड़ी कि अगर हिन्दु ही हिन्दुत्व को नहीं बचायेगा, भारत के बच्चे ही उससे नहीं जुड़े रहेंगे तो उसकी रक्षा कौन करेगा ? ये प्रश्न बताते हैं कि जिस हिन्दुत्व के कारण दुनिया में हमारे देश का अस्तित्त्व व पहचान है उसका समाज में धीरे-धीरे विस्मरण हो रहा था और यह प्रक्रिया आज तक जारी है। इस दृष्टि से ये प्रश्न जितने उस समय प्रासंगिक थे उससे कहीं अधिक उनकी प्रासंगिकता आज के समय में भी है।

यह परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई, इसे समझने के लिए थोड़ा गहराई से विचार करना पड़ेगा। यह सब एकाएक नहीं हुआ अपितु यह चालाक अंग्रेजों के भारतीय समाज पर राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक सर्वव्यापी आक्रमण की स्वाभाविक परिणति है।

 प्रख्यात जर्मन विद्वान् शोपन हॉवर ने लिखा -उपनिषद् सर्वोच्च मानव बुद्धि की उपज हैं। यह मेरे जीवन के लिए शान्ति का आश्वासन रहा है और जो मेरी मृत्यु के बाद तक बना रहेगा।

 हमबोल्ट गीता को संसार की गम्भीरतम और उच्चतम वस्तु मानते थे। 

इन विद्वानों के यह कथन स्वाभाविक थे, परन्तु जैसे-जैसे भारत, भारतीयता और हिन्दू धर्म का अधिक प्रचार होने लगा वैसे-वैसे ईसाई धर्म प्रचारकों और पादरियों के कान खड़े हो गये। उन्हें लगने लगा कि यदि संस्कृत वाङ्मय का इसी प्रकार प्रचार चला तो सृष्टि का निर्माण 4004 ईसा पूर्व हुआ तथा बाइबिल में व्यक्त विचार ही सर्वश्रेष्ठ विचार हैं,' ये धारणाएँ ध्वस्त हो जायेंगी। 

अतः उन्होंने अनेक लोग तैयार किये जो भारतीय ज्ञान परम्परा उसकी प्राचीनता, श्रेष्ठता और गहनता को अप्रमाणिक और अवास्तविक बताएं।

इन लोगों के मन में भारतीय साहित्य का भय कितना था इसका परिचय फ्रेडरिक वॉडमेर ने इन शब्दों में दिया था, “बाइबिल के रक्षक इतने भयभीत हो गये हैं कि उन्हें ऐसा लगने लगा है कि संस्कृत का वर्चस्व बाबेल की मीनार गिरा देगा (दि लूम ऑफ लैंग्वेज न्यूयार्क १६४४ - पृ० १७४) ।

दूसरी ओर हजार वर्षों से सेमेटिक मजहबों का, आर्थिक, राजनैतिक विचारधाराओं का, जो सतत आक्रमण चला उन आक्रमणों के परिणामस्वरूप यहाँ के समाज को यहाँ की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक रचनाओं को तोड़ने- मरोड़ने और अपने अनुकूल ढालने का जो प्रयत्न दीर्घकाल में हुआ।

 हम भारत को जगत गुरु बनाना चाहते हैं किन्तु पहले भारत क्या है समझ लें।

 भारत क्या है । अगर मूल में दृष्टि नहीं रही तो पुरानी कहावत है कि 'गणपति बनाने चले थे और बंदर बन गया।’ गालिब ने कहा है कि "उम्र भर गालिब भूल यही करता रहा, कि धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा"। 

आज जहाँ पर धूल जमी है, उसको हटाने की जरूरत है। इसलिए आवश्यक है कि चेहरे की धूल हटे और भारत उसकी ज्ञान परम्परा हमारे सामने असली स्वरुप में आये ?

वर्ष 1921 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने भाषण में कहा था- "ऐसा नहीं है, अंग्रेजों का यह एक सर्वकष आक्रमण है, जो हमारे समाज को, उसके मानस को, उसकी 'आत्मा को मूल से परिवर्तित कर देगा और इसका मुकाबला करने के लिए अगर आप तीर कमान लेकर उसके पीछे छोड़ेंगे तो यह रूप बदलता जाएगा।" 

यहाँ टैगोर जी बड़ी महत्वपूर्ण बात कहते हैं, "आज यह आपको अँग्रेज के रूप में दिखाई देता है, कल किसी और रूप में दिखाई देगा, परसों किसी भारतीय के रूप में भी दिखाई दे सकता है।" 

इसलिए उन्होंने इसका उपाय भी बताया कि "अपनी आत्मा का साक्षात्कार । भारत अपनी आत्मा को समझकर उस आत्मा की अभिव्यक्ति 'Pahilosphical label' नहीं, रचनाओं, जीवन मूल्यों, दैनंदिन जीवन की अभिव्यक्ति के अंदर जब तक नहीं करेगा, तब तक सफलता नहीं मिलेगी और जितना यह होता जाएगा, उतना अपने आप ये जो उपनिवेशवाद के जितने भी दुष्परिणाम हैं, उन सबसे मुक्ति संभव है।" 

अत: भारतीय ज्ञान परम्परा को आज के पाठ्यक्रम में लाना कितना आवश्यकत है हम समझ सकते हैं ।

………………………………….


     भारतीय ज्ञान परंपरा के सैद्धांतिक आधार

आज भारत एक कोरी स्लेट नहीं है। आज़ हजारों-हजारों वर्षों से ऋषियों की तपस्या, अनुभूतियों से निकले दार्शनिक सिद्धांत, उसके आधार पर बने जीवन मूल्य, सामाजिक, आर्थिक रचनाएँ और अस्तित्व के जो विभिन्न पहलू हैं उनकी वनवासी ,गिरिवासी,नगर -ग्राम की श्रेष्ठ परम्परा है।

हमारा राष्ट्र क्या है? राष्ट्र की संकल्पना क्या है? उपनिवेशवाद से बनी हुई मानसिकता क्या है? उसके परिवर्तन के तरीके क्या है ? नवउदारवाद और भूमंडलीकरण के जो परिणाम हो रहे हैं, उनका समाधान क्या है? यह भारतीय ज्ञान परम्परा में ही मिलती है।

भारतीय ज्ञान परम्परा में शब्दों का बहुत महत्व है। जैसे कि 'राष्ट्र और नेशन' एक नहीं हैं । शब्द अपने पीछे एक परम्परा, एक इतिहास और एक विश्व दृष्टि लिए होता है। 

पश्चिम के साम्राज्य मजबूत हुए, नेशन वहाँ का प्रबल हुआ तो दुनिया में गए। दुनिया का क्या अनुभव है? जहाँ गए वहाँ के समाजों को जड़मूल से समाप्त किया। चाहे वह अमेरिका हो, आस्ट्रेलिया हो, अफ्रीका हो, कोई भी देश हो, वहाँ के जो कुछ संसाधन थे, उनका शोषण किया। अगर वहाँ के समाज को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते थे, तो जितना तोड़-मरोड़ और विकृत कर सकते थे, वैसा किया। यह एक कहानी है।

भारत के लोग भी एक समय में दुनिया में चारों ओर गए, उनका का अनुभव है ? कौन्डीन्य से लेकर और बाद के कालखंड में जो यहाँ के लोग बाहर गए, तो जो समाज जहाँ था, वहाँ से उसको ऊपर उठाया, उन्हें खेती सिखाई, कपड़ा पहनना सिखाया, संस्कार दिए, जीवनमूल्य दिए, उनकी अपनी विशेषता को रखते हुए उत्थान के प्रयत्न किए, ये दो अनुभव दुनिया ने प्रत्यक्ष देखे हैं।

इसलिए सन् 1893 में जब विवेकानंद जी अमेरिका गए थे, तो उन्होंने विश्व धर्मसभा में कहा था कि "मैं वहाँ से आया हूँ, जिसने इस दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी प्रताड़ित हुआ तो उसको शरण दी ।

जब यहूदियों के मंदिर जला दिए गए, उनको विस्थापित किया गया तो हमारे यहाँ शरण मिली, जब अग्नि पूजक पारसियों को इस्लाम के आक्रमण के बाद खदेड़ा गया, तो उनको शरण दी ।"

 वर्ष 1948 में जब इजराइल बना तो उसके बाद इजराइली काउंसलेट ने एक पुस्तक निकाली 'इंडियन ज्यू' उसकी प्रस्तावना में उन्होंने कहा कि दुनिया के यहूदियों को आह्वान किया गया कि अपने देश को बनाने के लिए आप आइए, तो 104 देशों से 1.5 मिलियन यहूदी आये हर जगह से आए हुए हूदियों की एक ही कहानी थी कि जहाँ वे रहे वहीं उन्हें सताया गया, प्रताड़ित किया गया। उन्हें दोयम नागरिक का दर्जा दिया गया, केवल एक अपवाद है, भारत। जहाँ इस दीर्घकाल के अंदर उन्हें प्रताड़ित नहीं किया गया, सताया नहीं गया। उनके साथ सम्मान का व्यवहार हुआ, यह कैसे संभव हुआ?

जब हम कहते हैं कि राष्ट्र प्रबल करना है तो इस मूल बात को ध्यान में रखना पड़ेगा। हमारे यहाँ जो राष्ट्र की संकल्पना निकली उसकी मूल बात, जिसे वेद का मंत्र कहता है कि- भदमियन्ति ऋषयः स्वर्विदस्तपोदीक्षामुपनिषेदु । ततो राष्ट्र बलमोजश्च जातं तदस्मैदेवा उपसंनयन्तु। अर्थात् जो चिन्तनशील थे, जिन्होंने तपस्या की, अनुभूति की, उन्होंने कल्याण की इच्छा से की हमारे समाज का कल्याण हमारे लोगों का कल्याण नहीं, सारी दुनिया का कल्याण हो; उस इच्छा से उन्होंने उग्र तप किया और उस सब में से, उनके उस कल्याण के चिन्तन, लगातार प्रयत्न और तपस्या में से एक तेजस्वी राष्ट्र की उत्पत्ति हुई।  

दूसरी एक बात उसमें आई कि यह भाव उत्पन्न क्यों हुआ? तो उन्होंने एक अनुभव था 'सभी ईश्वरमय हैं, यह एक आधारभूत अवधारणा रही। 

तब उसमें से तीसरी बात निकली कि जो Diversity है, विविधताएँ हैं, वह क्या है? आजकल एक शब्द चलता है, 'विविधता में एकता, भारत की विशेषता', हम भी बार-बार बोलते हैं। 

 हमारे दृष्टाओं ने यह नहीं कहा है, उन्होंने कहा, "एक ही अनेक हुआ है, इसलिए एकता है।" इसलिए वेद का मंत्र है, जिसमें दीर्घतमस ऋषि कहते हैं-'इन्द्रं, मित्रम्, वरुणं,अग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो मरुतमान।''एकम सत्, विप्राः बहुधा वदति।' 'इन्द्रमयमं मातरिश्वानामाहू।'

सत्य एक है विद्वान लोग उसे भिन्न-भिन्न रूपों में कहते हैं । और एक ही अगर विविध हुआ है तो एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। एक-दूसरे से ऊँचा-नीचा नहीं है , एक-दूसरे से द्वेष नहीं है। इस संकल्पना में से समन्वय, सामंजस्य, सहयोग उत्पन्न होता है। 

भारतीय ज्ञान परम्परा में इसको केवल Philosphical नहीं रखा। ऋषियों ने यह राष्ट्र जीवन ऐसा बनाया जहाँ ये विविधताएँ मिल-जुलकर रहें और सबका उत्थान हो। इसलिए वेदमंत्र में कहा गया-'जनं विभ्रति बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथ्वीयथौकसम् । सहस्त्र धारा दविणस्य में दुहाँ धुवेव धेनुरनपरकान्ती ।।'अर्थात् विविध प्रकार की भाषाएँ बोलने वाले, विभिन्न प्रकार के धर्मों को मानने वाले रहें कैसे? जैसे एक घर में लोग रहते हैं, उसी तरह से सबको रखने वाली यह जो पृथ्वी है, वह गाय जैसे सबके लिए दूध देती है, वैसे ही धरती, सहस्रधारा से सबको दे। 

इसको व्यवहार में लाने के लिए जो अवधारणा दी, वह सभी स्तरों पर परिवार भाव का मॉडल है। इसलिए जो हमारा ढाँचा बनाया वह केवल Philosophical नहीं था। उन्होंने उसे systematic प्रस्तुत किया।

 इसलिए अथर्ववेद के अंदर व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक की जो सामाजिक यात्रा है, उसका वर्णन अथर्ववेद का एक मंत्र करता है, जिसमें वह कहता है,

 'सा उत्क्रामत सा गार्हपत्ये न्यक्रामात'

 अर्थात वह तत्व व्यक्ति से परिवार तक उत्क्रमित हुआ। सबसे पहले परिवार संस्था आई, फिर परिवार संस्था विकसित हुई। कई परिवार मिले, 

तो 'सा उत्क्रामत सा आहवनिए न्यक्रामत' फिर यज्ञ संस्था आई, फिर ये संस्था आगे बढ़ी 'सा उत्क्रामत, सासभायाम न्यक्रामत' फिर ग्राम सभाएँ बनीं, 
फिर कई ग्रामों के समूह बने तो 'सा उत्क्रामत सा मंत्रणे न्यक्रामत' तो जनपद प्रकार की व्यवस्था आई और वे भी आपस में जुड़े और ऊपर की रचना आई राज्यों की। 

फिर कहा कि 'Formation of government' कई हो सकती है। इसलिए पुष्पांजलि के मंत्र में वर्णन आता है, जब कहते हैं-'

स्वस्ति श्री साम्राज्यम्, भोज्यम्, स्वाराज्यम्,वैराज्यम् । पारमेष्ठ्यमराज्यम्, महाराज्यम् समन्तपर्यायीस्याद सार्वभौमः सार्वायुषः आंताद आपरथिति पृथ्वी समुद्र पर्यन्तः एक राष्ट्र इति ।'

इस प्रकार विविध राज्यों के प्रकार बताने के बाद कहा कि पृथ्वी से समुद्र पर्यन्त एक राष्ट्र है। इस प्रकार व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक परिवार कल्पना आगे बढ़ते- बढ़ते समूचे जगत को अपने में समाहित करती है और ऋषि कहता है 'वासुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात् सारी वसुधा एक परिवार है।

  "प्रश्न यह है कि इसके लिए आज के समय में क्या हो सकता है ? इसलिए आज पहली जरूरत है कि यह भारत है, जो आज भी कहीं न कहीं जीवित हैं, उसके चिन्तक, विचारक अपनी-अपनी जगहों पर टूटी हुई कड़ियों को खोजकर संकलित करें।" 

इस देश में अनेक भाषाएँ, प्रांत रहे और हर प्रांत हर घर के अंदर पद्धति थी कि भोजन के समय पहली रोटी बनेगी और एकलौता बेटा भी भूखा है तो माँ कहती थी, यह तेरे लिए नहीं है, यह गाय के लिए रखी गई है। देश के अन्दर कहीं भी चले जाइए यह Philosophical नहीं था। हर घर के अंदर पानी का पात्र आँगते थे कि कोई पक्षी प्यासा हो तो उसे जल मिलना चाहिए। आजकल बड़ी चर्चा चलती है विश्व एकता की, लेकिन आजकल आदमी को पानी की बोतल खरीदनी पड़ती है। पीने के लिए वह पंछी की चिन्ता करते थे, पशु के पानी की व्यवस्था करते थे। सुबह माताएँ उठती थी तो अनाज छत पर डालती थी कि कोई भूखा पंछी हो तो उसे भोजन मिलना चाहिए। भोजन के लिए बैठते थे तो कहते थे कि घर के बाहर आकर पाँच बार आवाज लगाओं कि कहीं कोई भूखा तो नहीं है। इसलिए भूखे को की जरूरत नहीं पड़ी। पहले हमारे यहाँ, कहीं भी पहुँच जाएँ भोजन का समय हुआ तो उसको भोजन मिलेगा। 

यह एकात्मता जीवन में थी। शोषण नहीं होना चाहिए, इसके लिए कानून नहीं बनाया गया, मनुष्य की चेतना को इतना उदात्त किया, जो पूरे भारत में दिखाई देगा।

 पहले पद्धति थी कि अनाज लेने जाएँ तो दुकानदार तौलने के बाद से ऊपर से दस बीस दाने डालता था। ऊपर से क्यों? क्योंकि कहीं गलती से आपको कम न मिल गया हो। दूध देने वाला आता था तो पूरा दूध देने के बाद में थोड़ा सा डालता था, कहीं आपको कम न मिल गया हो।

 रिक्शे की कतार लगती हुई है, कोई कहता है कि भैया नंबर पीछे है मेरा लेकिन सुबह से एक भी ग्राह नहीं मिला। दस लोग अपना अधिकार छोड़कर उसकी बोहनी करते थे। सारे भारत में यह पद्धति थी।

  हमारे यहाँ का जो दर्शन था वह शब्दों से आचरण में व्यक्त हुआ। 'अब्राहिमक वर्ल्ड ब्यू' के अंदर में मनुष्य मरने के बाद कयामत तक उसको पड़े रहना और कयामत तक उसको रहना है इसलिए उसको सजा-धजाकर कौफीन में रखकर फिर शब्द प्रयोग करें कि कि 'may you live in peace' तुम शांति के साथ इसमें रहो।

 हमारे यहाँ पर तो मरने के बाद देर नहीं है, तुरंत ही कुछ न कुछ होना है। इसलिए स्वर्गवासी, बैकुंठवासी, कैलासवासी, सद्गति, देवाज्ञा झाली तरह-तरह के शब्द प्रयोग देखेंगे। पुनर्जन्म का सिद्धांत है।

 यहाँ तो कबड्डी के खेल में भी मरता है और जीता है, मरता है और जीता है। एक देश की विविधता के बीच भी उन्होंने कैसे एकता की होगी। 

 फिर यहाँ की सामाजिक रचनाएँ, धर्मपाल जी ने अंग्रेजों के आने के समय तक इस देश में मद्रास प्रेसीडेंसी के अंदर, बंगाल प्रेसीडेंसी में, पंजाब प्रेसीडेंसी के अंदर, मुम्बई प्रेसीडेंसी के अंदर हजारों हजार ऐसे गाँवों का वर्णन किया है जो आत्मनिर्भर थे। 

जहाँ अकाल के समय की व्यवस्थाएँ थीं और एक दृष्टि से अपने गाँव की सब प्रकार की जो आवश्यकताएँ हैं जैसे- सुरक्षा की। इन सबकी व्यवस्था वह गाँव स्वयं करता था और अपने से ऊपर की जो इकाई है उसके लिए व्यवस्था करता था।

 भारत ने अपने उस चिंतन के आधार पर दैनंदिन व्यवहार के अंदर एक-एक इकाई को रखते हुए एक रचना विकसित की है, आज आवश्यकता इस बात की है, क्योंकि वह बहुत खराब हो चुकी है। इसको बदलने की प्रक्रिया के जो उपकरण हैं, जो विचार हैं, जो मूल्य हैं, उनके प्रचलन की आवश्यकता है। 

 इसी के साथ-साथ आज सारी बातों के अंदर एक और विषय आता है कि विभिन्न प्रकार की जो अस्मिताएँ हैं, उनमें टकराहट है। जैसे ही किसी की अस्मिता ऊपर होती है तो हमें लगता है कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और समाज की एकता पर खतरा है। हमारे यहाँ पर संस्कृत में तीन शब्द हैं; एक अस्तित्व, दूसरा है, अस्मिता और तीसरा है, अहंकार अस्तित्व तो आवश्यक है। 

व्यक्ति हो, परिवार हो, समाज हो, राष्ट्र हो, विश्व हो, हरेक का अस्तित्व है, उसकी रक्षा होनी चाहिए। इसी के साथ-साथ हरेक की अपनी यूनिकनेस है, विशेषता है, जिसे उसकी अस्मिता कहते हैं। तो अस्मिता की रक्षा होनी चाहिए, लेकिन यह अस्मिता एकता और अखंडता को खतरा न बने, इस हेतु हमारे पूर्वजों ने कहा हरेक के अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा करते हुए अपने से ऊपर की अस्मिता को प्रमुखता देने से इसका समाधान होगा। 

व्यक्ति की अस्मिता रखते हुए परिवार अस्मिता प्रमुखता इसी तरह क्रमशः कुल, जाति, सम्प्रदाय, अस्मितायें रखते संपूर्ण समाज राष्ट्र की अस्मिता प्रमुखता के भाव जागरण से समाधान होगा। मेरी अपनी संप्रदाय की अस्मिता, जाति की अस्मिता, मेरे समूह की अस्मिता, व्यक्ति की अस्मिता वह तो रहे, इस अस्मिता के साथ अगर 'ईगो' जुड़ जाता है तो जैसे ही 'ईगो' जुड़ता है वैसे ही बड़ा-छोटा, ऊँचा-नीचा यह सब भाव उत्पन्न होते हैं। 

अस्मिताएँ बुरी नहीं हैं, अस्मिताओं के साथ जब जाति का अहंकार, संप्रदाय का अहंकार, व्यक्ति का अहंकार उत्पन्न होता है तो वह खतरे का कारण बनता है। 

आज यह प्रश्न खड़ा है कि विविध प्रकार की अस्मिताएँ देश में हमको दिखाई दे रही हैं जैसे जाट आंदोलन है, मराठा आंदोलन है, पाटीदार आंदोलन है, गुर्जर आंदोलन है, लिंगायत का है और उसके प्रतिक्रिया के अंदर फिर दलित अस्मिता की बात चलती है। 

हर एक की अस्मिता रहना चाहिए, लेकिन अस्मिता अहंकार में बदलकर एकता का खतरा न बने और इस नाते से राष्ट्रीय अस्मिता के साथ इसका तालमेल है।

 उनके प्रश्न हल हों, उनकी कुछ बातें हल हों, लेकिन उन सबके अंदर एक भाव हो कि कुल मिलाकर हम एक बड़ी अस्मिता के हिस्से हैं। 

भारतीय परम्परा में यह जो एक मार्ग हमारे पूर्वजों ने दिया था और यह केवल शब्दों में नहीं दिया था, तो हजारों साल से भारत इतनी भाषाएँ, इतने समूह, इतना सब कुछ लेते हुए जिया है। 

 एक घटना आती है कि मार्गेट थेचर जब यूके की प्रधानमंत्री थी और सोवित रूस के विखंडन का समय था, गोवचेव के समय वह रूस गयीं थी। लौटकर आई तो एक डिनर के अंदर उस समय कुलदीप नैय्यर, इंग्लैंड में भारत के हाई कमिश्नर थे, तो नैय्यर ने थेचर से पूछा कि "आपकी यात्रा कैसी रही ?" थेचर ने कहा कि " गोर्बाचेव बहुत निराश और उदास थे कि जो एथनिक ग्रुप हैं हमारे यहाँ पर अलग-अलग हैं। यह Ethnic identity की इतनी अधिक टकराइट हो रही है कि मुझे लगता है रूस टूट जाएगा, रूस बिखर रहा है, ऐसे चिंतित है।" तो नैय्यर ने थेचर से पूछा कि "तो आपने क्या कहा?" तो थेचर ने जो जवाब दिया बड़ा विचार करने लायम है। थेचर ने कहा कि मैंने गोर्वाचेव को कहा कि "इस समय तुम अपने मित्र भारत से सलाह क्यों नहीं लेते हो, जो इतने हजारों साल से इतनी भाषाएँ, इतने संप्रदाय, इतनी जातियाँ, इतने राज्य इन सबको लेकर जी रहा है।" 

रूस ने 15 अस्मिताओं की Identity प्रबल हुई। वह 15 टुकड़ों में बँट गया। ब्रिटेन भारत छोड़कर गया तो जो 656 राज्य थे, जो संधि से जुड़े थे, उनको छूट दे दिया गया था कि आपकी मर्जी हो तो पाकिस्तान में जाओ, आपकी मर्जी है तो भारत में जाओ। आपकी मर्जी है स्वतंत्र हो जाओ और वह सब राज्य भारत में एक हो गये। कैसे एक हो गये ? यह केवल सरदार पटेल का नेतृत्व था इसलिए नहीं हुआ। यह समाज जीवन की हजारों स
 
 

(यह जिज्ञासा समाधान स्नातक एवं परा स्नातक के साथ शोध क्षेत्र में लगे विद्यार्थियों के लिए है . यह दर्शन, साहित्य, मनोविज्ञान, धर्म शास्त्र , योग एवं भाषा के विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी है . शिक्षक भी लाभ उठा सकते हैं . इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करना चाहिए - सादर )

ब्रहम जिज्ञासा

1. जिज्ञासा- ॐ क्या है ?

समाधान - ॐ ब्रह्मदेवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्यप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ (मुण्डको१.१.१)


ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानंभूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङकार एव यच्चान्यत् त्रिकालतीतं तदप्योङकार एव ॥(माण्डूक्य-१)



  ॐ - यह अविनाशी शब्द ही इस दृश्यमान ब्रह्माण्ड का सम्पूर्ण स्वरूप है। इसकी व्याख्या इस प्रकार है- क्या हो गया है, क्या हो रहा है, क्या होगा, यह सब वास्तव में ॐ है । जो समय की इन तीन अवस्थाओं से परे है, वह भी, वास्तव में, ॐ है। ॐ यह पमेश्वर का नाम वेदोक्त जितने भी मन्त्र है, उनमें सर्वश्रेष्ट मन्त्र कहा गया है । यह ईश्वर स्वरुप है । ‘ॐकार’नाम है, परमेश्वर नामी है ।


2. जिज्ञासा- ॐ में श्रध्दा-भक्ति कैसे हो ?

समाधान - ॐ परमब्रह्म परमात्मा का नाम होने से (प्रणव ‘ॐ’उसका वाचक होने से ) स्वयं साक्षात् परमब्रह्म ही है । यह प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला जगत ही ॐ है । ॐ यह अनुकृति अर्थात् अनुमोदक सूचक है ।


3. जिज्ञासा- ‘परा से लेकर बैखरी’ तक की यात्रा क्या है ?

 समाधान - उपनिषद का ऋषि ‘परा से लेकर बैखरी’ तक की यात्रा पूर्ण कर आत्मोघटन करता है कि विश्व में भूत, भविष्य और वर्तमान में तथा इसके परे भी जो नित्य तत्व सर्वत्र व्याप्त है, वह ॐ है । यह सब ब्रह्म है और यह आत्मा भी ब्रह्म है । यहीं से नाद की वह यात्रा प्रारंभ होती है जहाँ ब्रह्म के भेद का प्रपंच नहीं होता और केवल अद्वैत शिव (ॐ) ही रह जाता है। 

4. जिज्ञासा - गायत्री मन्त्र में तीन व्याव्हृतियाँ ?

 समाधान - गायत्री मन्त्र में तीन व्याव्हृतियाँ जिनका प्रथम रूप - भू:, भुवः, स्वः और चौथी व्याहृति ‘मह:’ आती है । ऋषियों का मत है कि यही ‘मह:’ ब्रह्म है । ‘भू:’ यह पृथ्वीलोक है तो भुवः’ यह अन्तरिक्ष लोक और ‘स्वः’ यह स्वर्गलोक है । ‘मह:’ यह सूर्यलोक है । अर्थात् ‘भू:, भुवः, स्वः’ यह तीनों व्याव्हृतियाँ परमेश्वर के विराट शरीर रुपी इस ब्रह्माण्ड को बताने वाली हैं, तो ‘मह:’ यह चौथी व्याव्हृति परमेश्वर के आत्मस्वरूप है ।

दूसरा रूप - ‘भू:’ यह व्याहृति अग्नि का नाम होने से मानों ‘अग्नि’ ही है । यह ज्योतिस्वरूप है । ‘भुवः’ यह वायु स्वरुप है । वायु देवता त्वक-इन्द्रिय स्पर्श को प्रकाशित करनेवाली ज्योति और त्वचा भी समझना चाहिए । ‘स्वः’ यह सूर्य है । सूर्य चक्षु -इन्द्रिय का अधिष्ठाता देवता है । ‘मह:’ यह मानो चन्द्रमा है और चन्द्रमा मन का देवता है । ‘मन’ के कारण ही सभी इन्द्रिया क्रियाशील रहती हैं, अत: ‘मन’ ही प्रधान है ।

 तीसरा स्वरुप - भू: ऋग्वेद , भुवः सामवेद, स्वःअजुर्वेद और मह: यह ब्रह्म है । चौथा - भू: प्राण, भुवःअपान, स्वः व्यान और मह अन्नं है । अन्न में ही सभी प्राण महिमायुक्त होते हैं, अत: ‘मह:’ ही ब्रह्म स्वरुप प्राण है ।

5. जिज्ञासा - ‘ब्रह्मरन्ध्र’ क्या है ?

समाधान - ह्रदय के भीतर जो अंगुष्ठ मात्र परिणाम वाला आकाश है, उसी में विशुद्ध प्रकाश स्वरुप अविनाशी मनोमय अंतर्यामी पर पुरुष पमेश्वर विराजमान हैं, वहीं उनका साक्षात्कार होता है । मनुष्यों के मुख में तालुओं के बीचोबीच जो एक ‘थन के आकार का मांस -पिंड लटकता है, जिसे बोलचाल की भाषा में ‘घंटी’ कहते हैं उसके आगे केशों का मूलस्थान ‘ब्रह्मरन्ध्र’ है ।



6. जिज्ञासा- ‘सुषुम्ना’ क्या है ?

समाधान- ह्रदय देश से निकलकर घंटी के भीतर से होती हुई दोनों कपालों को भेद कर जो नाड़ी गई हुई है वह सुषुम्ना नाम से प्रसिद्ध है , उसे परमेश्वर प्राप्ति का द्वार कहा जाता है ।



7. जिज्ञासा -पदार्थ के कितने भाग यहाँ सामने आते हैं?

समाधान- पदार्थ के दो भाग यहाँ सामने आते हैं, प्रथम में आधिभौतिक पदार्थों को लोक, ज्योति और स्थूल पदार्थ माना जाता है तथा दूसरे भाग में प्राण करण और धातु का वर्णन आता है।



8. जिज्ञासा - लोक की आधिभौतिक दिशाएं कितनी हैं ?

समाधान - लोक की आधिभौतिक दिशाएं- पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक, पूर्व-पश्चिम दिशाएँ आदि तथा आग्नेय, नैरित्य आदि अवांतर दिशाएं हैं ।


9. जिज्ञासा - लोक की आधिभौतिक ज्योतियाँ कितनी हैं ?

समाधान - अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र यह ज्योतियों की आधिभौतिक पंक्ति हैं ।



10. जिज्ञासा - भौतिक स्थूल शरीर जड़ पदार्थों की आधिभौतिक पंक्तियाँ कितनी हैं ?

समाधान - जल, औषधियां, वनस्पतियाँ,आकाश और पांच भौतिक स्थूल शरीर जड़ पदार्थों की आधिभौतिक पंक्तियाँ हैं ।


11. जिज्ञासा - प्राणों की पंक्ति कितनी हैं ?

समाधान - प्राण, अपान, उदान, सामान और व्यान प्राणों की पंक्ति हैं ।


12. जिज्ञासा - करण समुदाय की पंक्ति कितनी हैं ?

समाधान - नेत्र, कान, मन, वाणी और त्वचा करण समुदाय की पंक्ति है ।



13. जिज्ञासा - शरीरगत धातुओं की पंक्ति कितनी हैं ?

समाधान - चर्म, मांस, नाडी, हड्डी और मज्जा शरीरगत धातुओं की पंक्ति हैं ।



14. जिज्ञासा - आधिभौतिक और आध्यात्मिक विकास में लोक ,ज्योति , स्थूल पदार्थों का आपस में क्या समबन्ध है ?

समाधान - इनके सम्बन्ध को सारिणी इस प्रकार समझा जा सकता है -

(1)आधिभौतिक ‘लोक’ सम्बन्धी पंक्ति से चौथी प्राण- (प्राण, अपान, उदान, सामान और व्यान) समुदाय रूप आध्यात्मिक पंक्ति का सम्बन्ध है । 

(2) ‘ज्योति’ विषयक आधिभौतिक पंक्ति से पांचवीं करन -(नेत्र, कान, मन, वाणी और त्वचा) समुदाय रूप आध्यात्मिक पंक्ति का सम्बन्ध है ।

(3) ‘स्थूल’ पदार्थों की आधिभौतिक पंक्ति का छ्ठी शरीरगत धातुओं -(चर्म, मांस, नाडी, हड्डी और मज्जा) से सम्बन्ध है क्योंकि ओषधि और वनस्पतियाँ अन्न से ही मांस-मज्जा आदि की पुष्टि और वृद्धि करती हैं ।



15. जिज्ञासा - तपश्चर्या क्या है ?

समाधान - ॐ उच्चारण के साथ सत्य भाषण और सत्यभाव पूर्वक कार्य करने को ही तपश्चर्या कहलाती है । पुरुशिष्ट पुत्र तपोनित्य ने तपश्चर्या को ही सर्व श्रेष्ठ माना गया है । मुद्गल पुत्र नाक का कहना है, धर्मशास्त्रों का अध्यन-अध्यापन ही तप है । त्रिशंकु का कहना है की अंत:करण में भावना करना भी परमात्मा की प्राप्त का साधन है ।



16. जिज्ञासा - आचारण क्या है ?

समाधान - “ सत्यंवद । धर्मं चर । स्वध्यायान्मा प्रमद: ।” इसी में “मातृदेवो भाव । पितृदेवो भाव । आचार्य देवो भव।” की भी बात कही है । यही भाव लेकर जीवन का निर्वाह करना सत्याचरण है ऐसा शास्त्रों का मत है ।


क्रमशः 3
अमृत महोत्सव अर्थात् पञ्च कोष का जागरण
प्रो उमेश कुमार सिंह 
आलेख के परिप्रेक्ष्य दो हैं, पहला- ‘स्वाधीनता का अमृत महोत्सव’ और दूसरा ‘भारत का समुज्ज्वल भविष्य की संकल्पना’ । ‘अमृत महोत्सव’! किसका ? स्वाधीनता का ! शास्त्र कहते हैं, ‘वयम अमृतस्य पुत्राः’। फिर अमृत पुत्र को ‘अमृत महोत्सव’ मनाने का कारण ? सहज रूप से आप और हम समझ सकते हैं कि भारत की राजकीय सत्ता वर्षों तक पराधीन रही ? कुछ का मानना है कि हम स्वतंत्र हुए अर्थात् अपने तंत्र के आधार पर राज्य सत्ता का संचालन होगा ? इसे दो प्रकार से समझना होगा, एक- हम स्वाधीनता और स्वतन्त्रता को 75 साल पहले प्राप्त किये । ठीक बात है किन्तु क्या यह केवल इतना ही है ? तो उत्तर हाँ और न दोनों में ही आयेगा । हाँ, इसलिए की देश के सामान्य जन को यह बोध कराना कि हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं ? दूसरा अर्थ थोड़ा गहरा है । हम अमृत महोत्सव मना रहे है ? हम यानि कौन ? जो अमृत हैं ? इसका सीधा अर्थ है, हमको हमारा परिचय कराने वाला कार्यक्रम ? इसलिए यह महोत्सव है अन्यथा स्वतंत्रता किसी भी राष्ट्र के बाह्य संचालन की एक प्रक्रिया का अंग है । जब कोई राजकीय सत्ता स्वदेशी, लोकोन्मुखी होती है तो वह अपनी परम्परा के आधार पर सता का संचालन कराती है और जो भी परकीय सता होती है वह अपने परम्परा के आधार पर पर सत्ता का संचालन करती है । परिणाम जन गण उससे धीरे-धीरे उसी के अनुसार चलने का आदी हो जाता है । पराधीन मानसिकता को अपने स्वत्वों के आधार पर जन गण को स्मरण कराना ‘अमृत महोत्वव’ है । अर्थात् हमी को हमारा परिचय कराना । किन्तु इसके विरोधाभाष को भी समझना होगा । एक और जन गण स्वधीनता का अमृत महोत्सव की बात करता है वहीं तंत्र ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ की बात कराता है, क्या आजादी भारतीय चेतना अपने ‘स्व’ का, ‘अमरता’ का बोध करा सकता है ?
     फिर भी यह सत्य है कि भारत सरकार की पहल से ‘स्वाधीनता / आजादी के अमृत महोत्सव’ को कुछ ऐसा स्वरुप प्राप्त हुआ जो न केवल भारत के जन मन को आंदोलित किया, बल्कि करोड़ों प्रवासी, अप्रवासी और विदेशी नागरिकों के मन में भारत की एक ऐसी प्रतिमा खाड़ी हुई जो उनके मानस और नजरिये को भी बदला है । किसी भी देश के लिए यह गौरव का विषय है, किन्तु अंतिम पड़ाव नहीं, संतुष्टि का कारण भी नहीं ।
इस महोत्सव में प्रधानमंत्री जी ने चार बातें- जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुशंधान स्मरण दिलाई । लाल बहादुर शास्त्री से प्रारम्भ होकर अटल बिहारी बाजपाई तक बात आई, किन्तु अब उनका केवल दुहराव नहीं हुआ तो उसमें अनुसंधान को जोड़कर उसको धरती में दिखाया भी गया । सियाचिन में जाकर देश के सेना के साथ प्रधानमंत्री का राष्ट्रीय पर्वों में न केवल सहभाग करना, बल्कि पड़ोसी देशों की बदनीयति से पौरुषता के साथ निपटने की खुली छूट देना बड़ा कार्य हुआ है । 
भारत सदा से कृषि प्रधान देश रहा है किन्तु इसी कृषि प्रधान देश ने आकाल का काल भी देखा है, तो अमरीका के लाल गेहूं को भी खाया है । वही भारत आज विदेशों को गेहूँ के साथ अनेक कृषि उत्पाद भेज रहा है । सचमुच में देश अन्नदाता बन कर उभरा है ।
हम विज्ञान में नासा से भागी दारी कर रहे हैं, तो अनुसंधान में करोना काल के प्राणदाता भी बने हैं । कई देशों की सेटेलाइट को ही लांच नहीं किया है तो इस्रायल और अन्य देशों से तकनीक लेकर अपनी स्वदेशी तकनीक विकसित करने में सफलता भी पाई है । इस वर्ष के गणतंत्र दिवस पर सौर्य स्मारक पर स्वदेशी तोपों की सलामी आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है । तात्पर्य यह की जय जवान से लेकर जय अनुसंधान की सार्थक यात्रा ने स्वाधीनता के ‘अमृत महोत्सव’ को न केवल सार्थक किया है, बल्कि स्वतंत्रता से सुराज की यात्रा का मार्ग भी प्रशस्त किया है ।     
तब यहीं से दूसरा परिप्रेक्ष्य ‘भारत के समुज्ज्वल भविष्य की संकल्पना’ प्रारम्भ होता है । इसके लिए भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पञ्च प्रण को ठीक से समझना होगा । क्या हैं पञ्च प्रण - (1) भारत को विकसित देश बनाना (2) जीवन से गुलामी का अंश मिटाना (3) अपनी विरासत पर गर्व (4) एकता और एकजुटता (5) नागरिकता का पालन । 
आइये इन पञ्च प्रणों को संकल्पना के साथ समझने का प्रयास करें कि इन संकल्पनाओं के अंदर ‘भारत का समुज्ज्वल भविष्य कैसा होगा ? इस अमृत महोत्सव में स्वतन्त्रता के काल से ही नहीं तो पिछले हजार वर्षों के अतीत पर व्यापक विचार-मंथन हुआ है । कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी हमारे सामने आए हैं । 
(1) भारत को विकसित देश बनाना - आज भारत का राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक परिदृश्य परिवर्तित स्वरुप में खड़ा है । प्रशासनिक तंत्र, सुरक्षा, शिक्षा, इतिहास, स्वास्थ्य, उद्योग, सबके लिए दृष्टि तय हुई है । भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप ढांचा खड़ा हुआ है । देश की एक दिशा निश्चित हुई है । देश की उपलब्धियां और चुनौतियां सभी हमारे सामने आई हैं । एक राष्ट्र ने स्वतंत्र होते ही विभाजन की हिंसा का दंश और सीमा पर आक्रमण का सामना किया । फिर भी पचहत्तर वर्षों में राष्ट्र ने लोकतंत्र को ही मजबूत नहीं किया बल्कि भारत के जन गण के सामर्थ्य और इच्छाशक्ति से अपने को एकता के सूत्र में बांधा । पिछला दशक भारत के लिए अनेक उपलब्धियों से भरपूर रहा है । चाहे वह भारत के नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं- स्वास्थ्य, आवास, पेय जल और वित्तीय संसाधन उपलब्ध करने का विषय हो या भारत के नियमों, कानूनों की बात हो । भारत की मेधा शक्ति ने कोरोना समय में सबसे सस्ती और सबसे सुरक्षित वैक्सीन का निर्माण किया। जिसने पूरे विश्व की सहायता की और करोड़ों जीवन की रक्षा की । आज भारतीय अर्थ व्यवस्था तमाम संकटों के बाद भी आगे बढ़ रही है, मगर भारत की बढ़ी आबादी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इसे और तेजी से प्रगति करनी होगी । इसके लिए आवश्यक है कि हम भारतीय सूक्ष्म लघु उद्योगों और उपक्रमों को बढ़ावा दें । इसके बिना हम भारत की रोजगार की अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाएंगे । 
भारत सही मायने में तभी सशक्त होगा, जब भारत स्वावलंबी होगा । भारत की स्वाधीनता को जब आज ७५ वर्ष पूरे हो रहे हैं तो यह आवश्यक है कि हम विचार करें कि क्या भारत के नीति प्रतिष्ठान, वर्तमान के भारत की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप हैं । अगर वह नहीं हैं तो उसमे परिवर्तन कैसे हो सकता है, इस पर भी विचार की आवश्यकता है । आज हम बहुत सी ऐसी व्यवस्था देखते हैं, जिसमें एक साधारण आदमी अपने को असहज और असमर्थ पाता है, चाहे वह आज की न्यायिक व्यवस्था हो या राजनीतिक व्यवस्था । ये एक साधारण आदमी की पहुंच में सहजता और सुलभता से कैसे पहुंचे, इस पर विचार करने की आवश्यकता है । 
भारत वैश्विक चुनौतियों का सामना तभी कर सकता है, जब उसकी आंतरिक व्यवस्था मजबूत हो । आंतरिक व्यवस्था न केवल आर्थिक और सुरक्षा की है बल्कि इसके लिए सामाजिक सशक्तिकरण और समरसता एक चुनौती है। अब तक भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा उपकरण आयातक देश था । यह देश के बजट पर बड़ा बोझ तो था ही, उसमें हमारी महत्वपूर्ण रक्षा जरूरतों को विदेशी शक्तियों द्वारा नियंत्रित करने का जोखिम भी निहित था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में रक्षा उपकरणों के निर्माण को पूरी तरह देश की जिम्मेदारी बनाने का फैसला लिया गया । यह पहल ही आत्मनिर्भर भारत की नीति और भविष्य के भारत के समुज्ज्वल भविष्य का संकेत है । रक्षा सम्बन्धी उपकरण के साथ औषधियों, उन्नत कृषि उपकरणों का निर्माण अब मेक-इन-इंडिया का केंद्र बिंदु बन गया है । इसे मेक-क, मेक-क क और मेक-क क क श्रेणी में बांटा गया है । दूसरी श्रेणी के तहत परियोजनाओं का वित्त पोषण रक्षा उपकरणों के नए उभरते घरेलू विनिर्माण उद्योग द्वारा किया जा रहा है। इस श्रेणी की परियोजनाएं प्रोटोटाइप, स्पेयर पार्ट्स, राडार प्रणाली, इंस्ट्रूमेंटेशन पार्ट्स और संबद्ध घटकों से संबंधित हैं। इसके तहत सरकार ने निजी उद्योगों को रक्षा प्रणालियों के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया है । इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के साथ डीपीएसयू को रक्षा वस्तुओं के स्थानीय निर्माण में भाग लेने के इच्छुक स्थानीय एमएसएमई, स्टार्ट-अप के साथ संवाद करने की अनुमति देने के लिए भी एक प्रणाली बनाई गई है । 
समझना होगा की सरकार की आठ वर्ष की रक्षा आधुनिकीकरण की नीति ने न केवल सेना और रक्षा क्षेत्र की प्रकृति को बदला है बल्कि पडोसी देश के साथ दुनिया के सबल राष्ट्रों के बीच अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराई है जो भविष्य के भारत , शसक्त भारत का उद्घोष है । नौसेना को स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत से आधुनिक बनाया गया है । फरवरी 2015 में भारत सरकार ने विशाखापत्तनम में शिप बिल्डिंग सेंटर में छह परमाणु पनडुब्बियों के स्वदेशी निर्माण को मंजूरी दी। भारत का परमाणु शक्ति संपन्न बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (एसएसबीएन) कार्यक्रम डीआरडीओ, परमाणु ऊर्जा विभाग और भारतीय नौसेना के प्रबंधन व संचालन के अधीन चल रहा है । वर्तमान में, भारत फ्रांस के नौसेना समूह के साथ साझेदारी में मुंबई में सरकारी स्वामित्व वाली मझगांव डॉक लिमिटेड में 6 नई स्कॉर्पीन-श्रेणी की पनडुब्बियों का निर्माण कर रहा है । वायु सेना की दक्षता बढ़ाने के लिए सरकार ने सुखोई लड़ाकू विमानों को उन्नत किया है और फ्रांस से चौथी पीढ़ी के राफेल लड़ाकू विमान खरीदे हैं। इनके अतिरिक्त रुद्र अटैक हेलिकॉप्टर, ध्रुव यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, एमआई 17वी ट्रांसपोर्ट हेलिकॉप्टर और कामोव केए-226टी लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर मौजूदा सरकार की कुछ प्रमुख उपलब्धियां रही हैं। एचएएल और वैमानिकी विकास एजेंसी (एडीए) संयुक्त रूप से उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान का विकास कर रहे हैं। यह एक स्वदेशी सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैन ऐरे राडार और सुपरक्रू क्षमता वाला एकल सीट और ट्विन-इंजन स्टील्थ आल-वेदर मल्टीरोल फाइटर विमान होगा। विचारणीय है की आज भारत राष्ट्रीय दृष्टि के करान बेहतर रक्षा परियोजनाओं को लागू करने में सक्षम हुआ है। फिर भी भारत को अभी भी अमेरिका, चीन और रूस के आयुध विकास को शान्ति का सन्देश देने दुर्गम किन्तु असम्भव नहीं ऐसा मार्ग तय करना है । सशक्त भारत, समर्थ भारत और अजेय भारत के लिए यही संकल्प सूत्र है ।
(2) जीवन से गुलामी का अंश मिटाना - प्रायः गुलामी का सम्बन्ध हम स्वतन्त्रता से जोड़कर देखते है किन्तु यह तात्कालिक सम्बन्ध है । बाह्य वातावरण का प्रभाव है । हमारे शिक्षा और संस्कारों के सन्देश के विस्मरण का प्रभाव है । भारत सदा से बाह्य और आभ्यांतर दोनों प्रकार से जीवन को प्रकाशित करता रहा है । इसलिए यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आधार पर गुलामी को समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि संघर्ष के पदचिन्ह नगरों, ग्रामों, जंगलों, पहाड़ों व तटीय क्षेत्रों में हर जगह मिलते हैं। चाहे संथाल का विद्रोह हो या दक्षिण के वीरों का सशस्त्र संघर्ष । सभी संघर्षों में एक ही भाव मिलेगा स्वतन्त्रता । सभी लोग किसी भी कीमत पर स्वाधीनता चाहते थे और वो यह स्वाधीनता केवल अपने लिए ही नहीं, अपितु अपने समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए चाहते थे। यह भारतवासियों का सामर्थ्य और इच्छाशक्ति ही थी, जिसने १९४७ के बाद लगातार भारत के छूटे हुए हिस्से गोवा, दादरा एवं नगर हवेली, हैदराबाद और पुड्डुचेरी को फिर भारत भूमि में मिलाने का प्रयास जारी रखा और अंत में नागरिक प्रयासों से लक्ष्य की प्राप्ति की। और यह प्रयत्न आगे भी जरी रहेगा क्योंकि भारत की प्राकृत अखंड मंडलाकार है ।  
प्रश्न यह आता है कि जब हमने राजकीय स्वायतत्ता प्राप्त कर ली तो गुलामी से मुक्ति की बात फिर क्यों ? इसके लिए भारत को समझना होगा । जिस तरह दुनिया के अन्य आर्थिक रूप से संपन्न देशों की नागरिकों की मानसिकता से हमारी सम्पनता की मानसिकता अलग है, उसी प्रकार राजनीतिक गुलामी से मुक्ति के अतिरिक्त भी एक गुलामी से बाहर आने की हमारी सोच है । भारत पञ्च कोष के आधार पर जीता है । इसलिए इसे ठीक से समझाने की आवश्यकता है । राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के अन्दर यह सन्देश छिपा है । हमारा आह्वान है -‘कृण्वन्तो विश्‍वमार्यम् - (ऋग्वेद ९।६३।५) सारे संसार के मनुष्यों को श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव वाले बनाओ । जय और विजय से आगे अजेय का संदेश । मानसिक गुलामी से बाहर आने का सन्देश । उपनिषदों का सन्देश । आर्यावर्त का सन्देश। युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः।शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥ ज्ञानियों के चरण-चिह्नों का अनुगमन करते हुए मैं निरन्तर ध्यान के द्वारा तुम दोनों का अनादि ब्रह्म में विलयन करता हूँ । महिमामय एकं प्रभु अपने आप को अभिव्यक्त करें! अमृत आनन्द के पुत्र मेरी बात सुनेंवे भी जो दिव्य धाम में निवास करते हैं, का सन्देश । ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का सन्देश । ‘अहम् ब्रह्म’ का सन्देश । अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् । यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं । उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है, का सन्देश । ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का सन्देश । 
इसलिए समझना होगा भारत का भविष्य हजार, दश हजार के संघर्ष के परिणामों को लेकर नहीं जीता। भारत स्वायत प्रकाश में जीता है । और यही बोध हमें हमारी गुलाम मानसिकता से बाहर ला सकता है और इसके लिए सनातन शिक्षा को प्रकाश में लाना होगा । प्राणमय संकल्पना से मनोमय संकल्पना की और बढ़ाना होगा। समझान होगा विज्ञानमय कोष के अन्दर ज्ञान पहले से उपस्थित है जिसे पहचाना है, क्योकि भारत का समुज्ज्वल भविष्य आनंदमय कोष में बसता है । इसे ही रामराज्य, स्वराज्य और सुराज कहते हैं । इसलिए शिक्षा जो विद्या का एक उपांग है के साथ पूरी ज्ञान परम्परा जिसके अंदर शौर्य परम्परा है, संत परमपरा, भक्ति परम्परा है , तप है , तेज है, पराक्रम है , ओज है , सहिष्णुता है को ठीक से जन गण के मानस में उतार कर गुलामी से बाहर लाना होगा । भारत का भविष्य भारत के सुषुम्ना में है और इसे साधने के लिए इड़ा और पिंगला की निरंतरता कायम रखनी होगी । स्पष्ट है स्वाधीनता की गारंटी निर्भयता में है, स्व केंद्रित है । इसलिए भविष्य में भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक सभी विभाजनों के परे जाकर भारत के जनमानस को भारत के ज्ञान परम्परा का बोध कराना होगा । इसके लिए किसी एक क्षेत्र में स्थिर रहने से काम नहीं चलेगा तो मूलाधार से लेकर सहस्त्रधार की यात्रा करनी ही होगी । यदि भारत को भारत बनाए रखना है तो चिरातन किन्तु नित्य नूतन इतिहास को स्मरण रखना होगा , नान्यः पन्था ।  
(3) अपनी विरासत पर गर्व - भारत की विरासत भारत की परम्परा में है । उसके राष्ट्रीयत्व में, धर्म में, संस्कृति में है । और इन सबका प्राणतत्व अध्यात्म है जिसका बोध सभी में एक ही ब्रह्म है । समझना होगा धर्म में, संस्कृति में विचलन तभी आता है जब उसकी नाभि का अमृत अध्यात्म काल के श्याह पक्ष में ,अन्धकार में, अज्ञानता से आच्छादित हो जाता है । विरासत मिटती, हटती नहीं कभी-कभी विलुप्त होती है, तब हम हीनता बोध से भर जाते हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ने योग का परिचय कराते हुए विरासत को सामने रखा - इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (गीता 4-1) ( मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था, विवस्वान ने यह उपदेश अपने पुत्र मनुष्यों के जन्म-दाता मनु को दिया और मनु ने यह उपदेश अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को दिया।) एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ (4/2) (हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त इस विज्ञान सहित ज्ञान को राज-ऋषियों ने बिधि-पूर्वक समझा, किन्तु समय के प्रभाव से वह परम-श्रेष्ठ विज्ञान सहित ज्ञान इस संसार से प्राय: छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो गया। )  
हमारे पास राम और रामायण हैं । समय चक्र घूमता है, साधना के तरीके बदलते हैं किन्तु तत्व शास्वत है, लक्ष्य स्पष्ट है, भारत की गौरव पताका विश्व में लहराना । भारत के अध्यात्मिकता को समझाने के लिए सांस्कृतिक परम्परा की उदात्त विरासत को याद रखना होगा। स्मरण रखना होगा राम-लक्षमण, कृष्ण -बलराम के विरोधी सहस्तित्व को । उग्रता, अधीरता और क्रोध के समन्वय को । भारत के समुज्ज्वल भविष्य को देखने के लिए राम -रावन युध्य , महाभारत युद्ध के साथ 1959 में कम्युनिस्ट चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा और दलाईलामा के निष्कासन, 1962 में भारत पर चीन के हमले, और 1971 के बांग्लादेश के अस्तित्व को । एक और बात की और ध्यान खीचना चाहता हूँ , हमें नारद की पत्रकारिता से लेकर आज की पत्रकारिता की विरासत को भी समझना होगा । बाल्मीक के साथ कालिदास को श्रीराम जन्मभूमि,काशी -मथुरा और कश्मीर को, जिनके अन्दर भारत के विरासत के मूल तत्व तथा भविष्य के सन्देश छिपे हैं। 
  भविष्य के सत्य का संधान करना है तो एक पूरी राष्ट्रीय और पर राष्ट्रीय, पंथीय, साहित्यिक और इतिहासकारों की इस विराटता को - चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, आचार्य कृपलानी, डॉ. भगवान दास, डॉ. संपूर्णानंद, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, राममनोहर लोहिया, मीनू मसानी, प्रख्यात वामपंथी विचारक मानवेंद्रनाथ राय, विनोबा भावे को, डॉ. ईश्वरी प्रसाद, जदुनाथ सरकार, राधाकुमुद मुखर्जी, रमेशचंद्र मजूमदार, आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव, सतीश चंद्र मित्तल जैसे ख्यातिलब्ध इतिहासकारों ने अपने आलेखों से पाञ्चजन्य को समृद्ध किया और पाठकों की दृष्टि को दिशा दी। न्यायविदों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मेहरचंद महाजन, ननी पालकीवाला, वी.एम. तारकुण्डे, सुभाष कश्यप ने विधि की दृष्टि से विभिन्न विषयों पर दृष्टि दी। पाणिनि, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, भाषाविद् डॉ. नगेंद्र, नाटककार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, उपन्यासकार अमृतलाल नागर, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, डॉ. महीप सिंह, डॉ. रामकुमार भ्रमर, मनहर चौहान, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, महादेवी वर्मा, भवानीप्रसाद मिश्र, सोहनलाल द्विवेदी, नरेंद्र कोहली इत्यादि साहित्यकारों ने न केवल साहित्य पर, बल्कि अपनी विरासत पर विमर्श किया। इसी तरह कंप्यूटर विज्ञानी विजय पाण्डुरंग भटकर, अंतरिक्ष विज्ञानी कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन और रसायन विज्ञानी रघुनाथ अनंत माशेलकर का लेखकीय अवदान भी भारत के अभिलेखागार की थाती हैं । साहित्यकारों में हिंदी के पाणिनि कहे जाने वाले वैयाकरण आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, भाषाविद् डॉ. नगेंद्र, नाटककार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, उपन्यासकार अमृतलाल नागर, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, डॉ. महीप सिंह, डॉ. रामकुमार भ्रमर, मनहर चौहान, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, महादेवी वर्मा, भवानीप्रसाद मिश्र, सोहनलाल द्विवेदी, नरेंद्र कोहली इत्यादि साहित्यकारों ने न केवल साहित्य पर, बल्कि समाज के अन्य विषयों पर भी अपनी स्थापना रखी। इसी तरह शीर्ष वैज्ञानिकों कंप्यूटर विज्ञानी विजय पाण्डुरंग भटकर, अंतरिक्ष विज्ञानी कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन और रसायन विज्ञानी रघुनाथ अनंत माशेलकर का लेखकीय अवदान भी पाञ्चजन्य अभिलेखागार की थाती है ।
  (4) एकता और एकजुटता - किसी भी सभ्य, सुसंस्कृत और कालजई राष्ट्र न केवल पंचमहाभूतों की एकता, योग के समत्व की आवश्यकता होती है बल्कि उसे अपने राष्ट्र की एकता और अखण्डता की भी रक्षा करनी होती है और उसके लिए न केवल वैचारिक एकता आवश्यक है बल्कि समाजगत पांचजन्य के बोध की,’वयम पंचाधिकं शतं’ भी आवश्यकता है । हमें सुरक्षित भविष्य के लिए मुंबई में 26/11 के हमले को स्मरण रखना होगा जिसने न सिर्फ भारत को, बल्कि पूरी मानवता को हिला दिया था । एकता और एकजुटता को बनायेंगे किन्तु शर्त याद रखते हुए की ‘न भूलेंगे, न माफ करेंगे’ । आजादी के अमृत महोत्सव के बाद भविष्य की एकता के लिए तीन चेहरे सामने रखने होंगे - पहला आजादी की लड़ाई के समय का , दूसरा वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक उत्थान के लिए और तीसरा चेहरा समाज सुधार और रूढ़ियों व कुरीतियों का विरोध करने के लिए । आजादी का अमृत महोत्सव तीनों को महाभाव को जोड़ता है ।  
वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के समय में एकता और एकजुटता के लिए पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है । दिग्गज तकनीकी कंपनियां तकनीक की आड़ में कुछ भी करें, कोई उसके विरुद्ध बोलने का साहस नहीं करता। हमें दो पत्रिकाएँ स्मरण होनी चाहिएं - एक ‘क्रॉस रोड्स’, जो वामपंथी विचार से प्रेरित थी, मद्रास से निकलती थी । दूसरी ‘आर्गेनाइजर’। हमें आपातकाल भी याद रखना होगा । आजाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर जिस तरह की वकालत हमारे प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की है, वह अपने आप में बेमिसाल है ।आज देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर फिर से एक बहस छिड़ी है । उसके भविष्य को भी तलाशना होगा । समरसता के लिए काम करने होंगे और प्रयास इन सभी बातों के बाद भी, भारतीय समाज और एक राष्ट्र के रूप में हमें कई आंतरिक और बाह्य संकटों का न केवल सामना करना है, अपितु उसका समाधान भी ढूंढना है । भारत को अभी भी समरसता के लिए और प्रयास करने होंगे क्योंकि समाज जितना समरस होगा, उतना सशक्त होगा । इसलिए इस पर और भी कार्य करने की आवश्यकता है । इसमें राजनीती की सुचिता और ब्यूरोक्रेसी की मानसिकता को भी बदलना होगा।  
 (5) नागरिकता का पालन - नागरिकता एक विशेष सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय या मानवी की एक नागरिक होने की अवस्था है।
सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत के तहत नागरिकता की अवस्था में अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों शामिल होते हैं। सक्रिय नागरिकता" का दर्शन अर्थात् नागरिकों को सभी नागरिकों के जीवन में सुधार करने के लिए आर्थिक सहभागिता, सार्वजनिक, स्वयंसेवी कार्य और इसी प्रकार के प्रयासों के माध्यम से अपने समुदाय को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य आता है। इस दिशा में, कुछ देशों में स्कूल नागरिकता शिक्षा उपलब्ध करते हैं । वर्जीनिया लिएरी (1999) के द्वारा नागरिकता को "अधिकारों के एक समुच्चय-के रूप में परिभाषित किया गया है- उनके अनुसार नागरिकता की अवस्था में प्राथमिक रूप से सामुदायिक जीवन में राजनैतिक भागीदारी, मतदान का अधिकार, समुदाय से विशेष संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार और दायित्व शामिल हैं।
बाजारवाद ने नागरिकता को प्रभावित किया है । अमेजॉन जैसे अनेक संस्थानों द्वारा बाजार में छल करने के तौर-तरीकों ने सामान्य जीवन को प्रभावित किया है । इसी तरह संविधान, कोलेजियम व्यवस्था, कन्वर्जन जैसे मुद्दों पर जागरूकता लाकर नागरिक कर्तव्यों पर भविष्य आधारित बहस की आवश्यकता है ।
सारांश यह की जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुसंधान से लेकर पञ्च प्रण पर ही भारत का भविष्य टिका है । प्रकृति में हम दो प्रकार के तत्वों से घिरे हैं, एक है बहुमूल्य और दूसरा अमूल्य । बहुमूल्य शब्द अर्थशास्त्र से आता है । वे वस्तुएं जो कम हैं, उनकी कीमत अधिक है । यह आवश्यक नहीं कि वह वस्तु सबके लिए जरूरी हो । ऐसा भी नहीं कि इसके बिना काम नहीं चल सकता । लेकिन जिन्हें यह चाहिए, उनके लिए पर्याप्त नहीं है- जैसे सोना, चांदी, हीरा आदि । इसे प्राप्त करना किसी भी राष्ट्र का भौतिक विकास है क्योंकि यह सबके नागरिक अधिकार के अंतर्गत भी आता है । दूसरा अमूल्य। अमूल्य वह है जो प्राणिमात्र के कल्याण के लिए चाहिए, और जिसका कोई विकल्प नहीं है, जैसे हवा, पानी, आकाश । इनका कोई मूल्य नहीं है। ये अमूल्य हैं, क्योंकि इनके बिना जीवन नहीं हो सकता ।
  साहित्यकार को समय के साथ इन दोनों मूल्य और अमूल्य पर चर्चा करना चाहिए किन्तु इन दोनों से अधिक एक तीसरा भी है जो मूल्य से परे है और वह हैं मनुष्य होने का अर्थ । यह सम्पूर्ण विश्व को कोई सिखा सकता है तो केवल और केवल भारतवर्ष । इसलिए यदि भारतवर्ष का स्वत्व, मूल्यबोध, सांस्कृतिक परम्परा, धर्म -दर्शन और अध्यात्म का ‘ओरा’ कायम रहा तो दुनिया में ईश्व
भारतीय ज्ञान परम्परा और भारतीय शोर्य परम्परा दोनों में बारीक अंतर है। शौर्य परम्परा काल सापेक्ष है। इतिहास का हिस्सा है। जबकि इतिहास स्वयं ज्ञान परम्परा का एक सामने लाया गया लेखा जोखा है। लेखा जोखा में हासियां और पाई हैं। पुनर्विचार की गुंजाइश है। 
ज्ञान विज्ञान का मूल है जो प्रमाण है,प्रत्यक्ष है, अनुभूत है। इतिहास प्रमाण मांगता है,अपरोक्ष है,अनुभूति की गाथा है।
इसलिए देखना होगा भारतीय ज्ञान परम्परा जिसकी मांग राष्ट्रीय शिक्षा नीति करती है,वह क्या है? ज्ञान विद्या का बहिरंग है। प्रकटीकरण है। शिक्षा, व्याकरण,निरुक्त,छंद और ज्योतिष विद्या के उपांग और ज्ञान के घटक है।
भारत वर्ष अपनी सम्पूर्णता में वर्ष के साथ आता है। वह स्थान और समय है। इसलिए वैज्ञानिक शब्दों में स्पेस और टाइम है। स्पेस जितनी गति से चलकर स्थिर दिखाई देता है, समय उतना ही स्थिर रह कर गतिशील दिखाई देता है। यही कारण है कि समय चक्राकार दिखाई देता है। जरा चक्र की कल्पना करें,वह स्थिर है,अपने चाक की नोक पर है किन्तु उसका बाहृय रूप गतिशील है। उस गतिशीलता का केन्द्र विज्ञान है जबकि उसकी स्थिरता का आधार ज्ञान है। ज्ञान गुणवत्ता के साथ,चलित होने से विज्ञान हो गया। वस्तुत: वह विद्या के उपांग का बहिरंग है।
ठीक इसी प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परम्परा विद्या आधारित है। उसमें साहित्य, संगीत,कला और विज्ञान मिलकर उसके सांस्कृतिक स्वरूप को गढ़ते हैं, जिसमें संस्कृति,जीवन मूल्य , धर्म, मत,पंथ आदि तीलियां हैं।उस चाक की वह घुमावदार पट्टी जो उसे वर्तुलाकार, अखंड मंडलाकार बनाती है,वह अध्यात्म है। भारतीय ज्ञान परम्परा में भारत और भारतवर्ष दो स्वरूप हमारे सामने आते हैं। वर्ष के बिना भारत को समझाना संभव नहीं।.  
भारतीय ज्ञान परम्परा में माना जाता है कि " विद्यार्थी आचार्य पारायण होना चाहिए, आचार्य विद्यार्थी पारायण होना चाहिए, दोनों ज्ञान पारायण होना चाहिए और ज्ञान सेवा पारायण होना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का आग्रह शिक्षक- शिक्षण पर है। यह नीति सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी है इसलिए इसका विस्तार जन गण मन तक ही नहीं तो उसके कर्तित्व, व्यक्तित्व, अर्थात् मन,बुद्धि,वाणी और हृदय तक होनी चाहिए। अर्थात् प्रत्येक विद्यार्थी का व्यक्तिगत जीवन सामाजिक जीवन बने और उसकी जीवन दृष्टि भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि बनें।

इसके लिए भारतीय ज्ञान परम्परा आधारित शिक्षा के दो विधायक पहलू हैं। शिक्षा का आधारभूत ढांचा सम्पूर्णता के साथ खड़ा हो। दूसरा बड़ा मनुष्य खड़ा हो।

इसके लिए भी दो पहलू सामने आते हैं-अभ्युदय और नि:श्रेयस। 

 विचार करें तो कहा गया " सा विद्या या विमुक्तये। और इसका आधार वाक्य आया-" अध्यात्म विद्या विद्यानाम" अब केवल अध्यात्म विद्या कह देने से बात समझ आती नहीं, तो स्पष्ट किया कि अध्यात्म अधिभूत और अधिदैव है। और एकात्म विज्ञान , आत्म ज्ञान, आत्मविद्या और व्यवहारिक अध्यात्म जो जीवन दृष्टि के साथ सामने आता है।

यह भी समझना होगा कि भारत का धर्म और भारत का धर्म समाज क्या है। भारत का संविधान और भारत के धर्म में कितना सामान्य है। धर्म और रिलीजन,धर्म की शिक्षा और धर्म तथा योग का क्या सम्बन्ध है।धर्म के क्या कुछ लक्षण भी हैं।

आर्यदृष्टि और हिन्दू दृष्टि एक है या अन्तर है। क्या वर्तमान संविधान वर्तमान की स्मृति है। भारत माता और धरती माता दो शब्द हैं या एक ही अभिव्यक्ति है। 

दूसरा पक्ष है कि युग परिवर्तन हुआ है तो क्या भारत का समाज शास्त्र भी बदला है। 
स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्ष बाद मेरा गांव कहां है। क्या वंचित और बाल्मीकि इस देश के आंदोलन के कल पुर्जे बन गये हैं। क्या इस्लाम और ईसाइयत हिंदू संगठन के लिए प्राणतत्व हैं। क्या भारत का भविष्य जाति और वर्ण की राजनीति पर बढ़ेगा। क्या हमें समाज की युगानुकूल रचना नहीं करनी होगी। क्या भारतीय कुटुंब व्यवस्था और परिवार व्यवस्था एक ही है।

प्राचीन हिन्दू माताएं क्या आज महिला विमर्श का आधार नहीं हो सकती। छूटती परम्पराओं को क्या शिक्षा फिर से मिला पायेगी।

क्या इसके लिए भारतीय शिक्षा के मूल तत्वों को फिर स्थापित नहीं करना होगा।लोक शिक्षा की यात्रा क्या कुटुंब शिक्षा से ही प्रारंभ होगी। 

अठारहवीं सताब्दी तक की गुरुकुल परम्परा आज के विश्वविद्यालय प्राप्त कर सकेंगे। कुलपति कुलगुरु कब बनेंगे।

अनुसंधान किसके लिए विनाश या विकास के लिए। ज्ञान, ज्ञानार्जन और ज्ञानार्जन प्रक्रिया क्या हो।शिक्षा का समग्र विकास हो या शिक्षा से समग्र विकास हो। शिक्षा के भारतीय करण का आधार पश्चिम से आयेगा या भारतीय शिक्षा के भारतीय करण से। उसके लिए क्या वेदकालीन शिक्षा अपरिहार्य है।

अर्थ और शिक्षा के शास्त्र का समन्वय होना चाहिए या केवल शिक्षा संस्थाओं का पर्वोत्सव हो।

इसलिए मित्रों इतने प्रश्नों के बीच दो बातें विचारणीय हैं- एक, भारत के सार्वजनिक शिक्षा का स्वरूप कैसा हो और इस वैश्विक संकट में भारतीय शिक्षा की भूमिका क्या हो?

ऐसे में समझना अपरिहार्य होगा कि हिन्दुत्व, राष्ट्रीयत्व और भारतीयत्व एक ही हैं।

तभी समझा जा सकता है कि भारत का अर्थशास्त्र भी आध्यात्मिक है तो राजनीति शास्त्र भी।

तभी वेद,गौ,यज्ञ, प्रकृति, ब्रह्माण्ड, सृष्टि और पृथ्वी की ऐतिहासिकता और एकात्मकता का बोध सम्भव है

और यह प्रारंभ होता है सृष्टि कथा से और समाप्त होता है पंचभूत ।


आत्मनिर्भर भारत और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020


 ‘सा विद्या या विमुक्तये’। (वही वास्तविक विद्या है जो, मोक्ष दिलाने में सहायक हो।) विद्या के लिए कहा जाता है की प्राणियों के बाह्य अर्थों का प्रकाश करनेवाली तथा नाना प्रकार से उपकार करनेवाली अनेक विद्याएँ हैं। परन्तु परम पुरुषार्थ को प्रकाशित करनेवाली, परमार्थ को दिखलाने वाली तथा परम उपकारिणी विद्या उपनिषद है। जिससे तत्व जिज्ञासु पुरुषों को परम शान्ति प्राप्त होती है, वह परमार्थ कहलाता है। क्लेशग्रस्त जीवों के समस्त क्लेशों का जिससे निवारण हो, वह परम उपकार कहलाता है।

गीता में श्रीकृष्ण ने कहा ‘अध्यात्म विद्या विद्यानाम’। मैं विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ। मुण्डक उपनिषद कहता है, ‘अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।’ अर्थात ‘परा विद्या वह है, जिससे उस अविनाशी ब्रह्म का ज्ञान होता है।’ इस तरह संक्षेप में समझे की विद्या को श्रुतियों में ‘मोक्षदायिनी विद्या, अध्यात्मविद्या तथा पराविद्या आदि नामों से कहा गया है।

अब जरा आत्मनिर्भर भारत को समझें। इसके दो शब्दों पर विचार करें- एक ‘आत्म’ जो आत्मा की पहचान कराता है। पहले आत्मा के स्वरुप की बात करते हैं। शांडिल्य के तत्वज्ञान में ‘आत्मा’ का वर्णन अर्थपूर्ण एवं निश्चयात्मक शब्दों में किया गया है, एवं उसके ‘महत्तम’ एवं ‘लघुतम’ ऐसे दो स्वरुप का वर्णन आता है। इनमे से ‘महत्तम’ आत्मा अनन्त एवं सारे विश्व का व्यापन करनेवाला कहा गया है। एवं ‘लघुतम’ आत्मा अणुस्वरूपी वर्णन किया गया है। आत्मा का नकारात्मक वर्णन करनेवाले याज्ञवल्क्य के तत्वज्ञान से शांडिल्य के इस तत्वज्ञान की तुलना सर्वदा की जाती है। इन दोनों तत्वज्ञानो की ज्ञान पद्यति विभिन्न होते हुए भी, उन दोनों में प्रणीत आत्मा के संबधित तत्वज्ञान एक ही प्रतीत होता है।

शांडिल्य के अनुसार, मानवीय जीवन का अंतिम ध्येय मृत्यु के पश्चात् आत्मन में विलीन होना बताया गया है। शंकराचार्य विरचित ‘ब्रम्ह्सूत्र भाष्य’ में शांडिल्य के तत्वज्ञान का निर्देश ‘शांडिल्यविद्या’ के नाम से किया गया है।

‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ और आत्मनिर्भर भारत का क्या सम्बन्ध है ? इसके लिए स्वामी विवेकानंद को समझना होगा। स्वामी विवेकानंद जी कहते थे. ‘are you own yourself’ अर्थात क्या आप ‘स्व’ में हैं ? समझना होगा कि ‘स्व’ से ही सारे सूत्र जुड़े हैं, चाहे वे स्वाबलंबन के हों या स्वस्थता के या स्वदेशी के। दूसरे शब्दों में क्या हम अपने संस्कृति परंपरा , स्वभाषा, भूषा,भेषज,भजन,भोजन में ‘स्व’ हैं ? दूसरा ‘स्व’ जो हमारे ‘अस्तित्व’ का बोध कराता है। तो क्या हम अपने देश, समाज, राष्ट्र में रहते हैं या देश, समाज, राष्ट्र हमारे अन्दर जीता है ? तो क्या हम आत्मनिर्भर भारत में है ? यदि नहीं तो हम कैसे आत्मनिर्भर हो सकते है ?

दूसरा शब्द है, भारत अर्थात ‘ज्ञान में रत’। ‘प्रकाश में लीन।‘ भारत का एक नाम ‘अजनाभ वर्ष‘ भी है। अर्थात विश्व का नाभि केंद्र। न केवल भौगोलिक दृष्टि से बल्कि सम्पूर्ण विश्व की नाभि जहाँ से सभी को ‘आत्म प्रकाश’ प्राप्त होता है। और इसे सम्पूर्ण दुनिया अध्यात्म प्रधान देश कहती है। और हम हैं, इसे हम प्रत्येक भारतवासी को जन्मजात संस्कारों से बताया जाता है ।

इन संस्कारों को पाते कहाँ से है तो एक लोक , दूसरा वेद से। तो जब हम स्व की बात कर रहे होते हैं तो वहां भाषा भी आती है । तो लोक को समझने के लिए मातृभाषा चाहिए तो वेद को समझने को संस्कृत भाषा चाहिए । क्योंकि संस्कृत भारतीय सभ्यता और संस्कृति का यथार्थ दर्पण है। अनेक सृजनात्मक युगों को प्राप्त कर भारत ने जो अपनी प्रगति की यात्रा की है उसे वाणी देनेवाला विपुल ज्ञान भंडार साहित्य के रूप में वेदों से लेकर अद्यतन संस्कृत ग्रंथों में भरे पड़े हैं।

प सोच रहें होंगे ‘आत्मनिर्भर भारत और शिक्षानीति -2020’ से इसका क्या लेना देना है, बेकार को पाठकों को ज्ञान बता रहें हैं। जी हाँ, ठीक समझें हैं। ज्ञान ही की बात कर रहे हैं। जरा समझे कैसे? तो पहली बात कुछ संस्कृति और संस्कृत प्रेमी कह रहें है की इस नीति में संस्कृत कहाँ है ? तो कई लोगों ने कहाँ संस्कृत भाषा को उसी श्रेणी में रख दिया जिस में अरबी को रखा है। चौकिये नहीं ऐसा इसलिए हुआ की मातृभाषा को प्राथमिक शिक्षा में पढ़ने की जब बात आई तो नीति बनाने वाले यह भूल गए की जिस तरह मदरसों में अरबी की पढाई होती है उसी तरह संस्कृत भी। जबकि संस्कृत विद्यालयों में और वेदपाठी ब्राह्मणों के घरों में न केवल मातृभाषा के रूप बोली जाती है बल्कि सम्पूर्ण भारतीय वांग्मय की धात्री भी है। 

इसी तरह दूसरे लोग यह पूछने के पहले की संस्कृत पढ़कर कौन सा रोजगार मिलेगा , भूल जाते हैं कि लाखों लोंगो को संस्कृत ज्ञान के ही कारण ज्योतिष में, कर्मकांड में, रीति-रिवाजों में, पूजा पाठों में लाखों से करोडो रूपये मिलते हैं । शिक्षकीय पद और सामाजिक प्रतिष्ठा अलग से।

और सबसे बड़ी बात यह कि धरती से जुड़े जिस विश्व मानव बनाने की कल्पना शिक्षा नीति में की गई है उसके सम्पूर्ण सूत्र तो संस्कृत भाषा में ही हैं। यह मैं नहीं कह रहा हूँ तो उन नीति विरोधियों को भी समझना चाहिए की यह बात और कौन–कौन कह रहें हैं । 

पंडित जवाहर लाल नेहरू का कथन है, “ संस्कृत भाषा और साहित्य भारत की सर्वोत्तम विरासत है। यह शानदार विरासत है और जब तक यह कायम रहेगी और हमारे लोगों के जीवन को प्रभावित करती रहेगी, तब तक भारत की मौलिक प्रतिभा जीवंत बनी रहेगी।”

कोई दो सौ वर्ष पहले विलियम जोन्स ने कहा था, “संस्कृत ग्रीक की अपेक्षा अधिक पूर्ण, लैटिन की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल और इनमें प्रत्येक से अधिक उत्कृष्ट, परिष्कृत और सुंदर है।” इसलिए आत्म निर्भर भारत में संस्कृत भाषा की दोहरी भूमिका है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ' एक आत्मनिर्भर भारत के निर्माण' का वादा किया है। यह 'आत्मनिर्भर भारत अभियान', उनकी ही नहीं तो देश के प्रत्येक भारतवासी की महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसका उद्देश्य सिर्फ़ कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों से लड़ना नहीं, बल्कि भविष्य के नए भारत का र्निर्माण करना है। तभी तो वे कहते हैं, "अब एक नई प्राण शक्ति, नई संकल्प शक्ति के साथ हमें आगे बढ़ना है।"

इसका सूत्र क्या है ? तो सूत्र मिलाता है ‘शिक्षा और संस्कृति से। इसलिये प्रारंभ में ही समझ लेना चाहिए की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘शिक्षा तथा संस्कृति’ का सम्बन्ध क्या है। 

वस्तुत: भारत में 'स्वदेशी' एक विचार के रूप में देखा जाता है, जो भारत की न केवल संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था का आर्थिक मॉडल रहा बल्कि स्वभाषा ही में सम्पूर्ण भारतीय ज्ञानसंपदा का स्रोत है।

 किन्तु पी.एम. मोदी ने अपने भाषण में कहीं भी 'स्वदेशी' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। परन्तु आत्म-निर्भर भारत बनाने का पीएम मोदी का विचार मातृभाषा से ही प्रारंभ होता है। 

  प्रधानमंत्री जी की चिंता है, सब का विकास। पंडित दीनदयाल जी जिसे अन्त्योदय कहते हैं। और विकास की गंगा विद्यालयों से ही बहती है’ इसलिए अठारह वर्ष तक के लिए सत् प्रतिशत की बात आई है । यदि उनकी चिंता है की हमारा कच्चा माल विदेश जाता है और दूने-तिगुने दाम में हम पक्का मॉल विदेशों से खरीदते है। हमारे पास कृषि है, जल है, वायुमंडल है, जनसँख्या है, ऊर्जा के स्रोत हैं तो फिर हम स्वद्शी का सहारा लेकर ‘आत्मनिर्भर’ क्यों नहीं बन सकते ? अर्थात संसाधनों का दोहन करते हुए, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करते हुए, मानविकी का सही उपयोग कर हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ बन सकते हैं। इसलिए जब हम ‘आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी’ की बात करते हैं तो उसके अंदर सर्वांगीण विकास, सतत विकास, अनवरत विकास आदि की और जाते हैं। ठीक उसी तरह हमारी प्रतिभाएं भी पलायन न करें चाहे शिक्षा लेने की बात हो या शिक्षा प्राप्त कर रोजगार, उद्यौग और नौकरी की बात हो।

इसलिए समझाना होगा आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य प्रमुख रूप से देश के समस्त नगरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति (रोटी, कपड़ा, मकान की गारंटी), राष्ट्रीय सुरक्षा, एकात्मता और अखंडता, के साथ एक ‘आत्म निर्भर भारत’ का निर्माण करना है।

 कोरोना महामारी से आई आर्थिक मंदी और अंतरराष्ट्रीय स्थितियों को देखते हुए समय की मांग है कि हम हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने।

शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में वैदिक ज्ञान परम्परा को स्वभाषा से प्राप्त कर देश का आत्मविश्वास बढना है। आर्थिक व सैन्य रूप से जिस दिन देश आत्मनिर्भर हो जाएगा उस दिन दुनिया भारत का लोहा मानना प्रारंभ कर देगी। कुछ पड़ोसी भी अपनी नापाक हरकत बंद कर देंगे। इसलिए आत्मनिर्भरता ही हम भारतीयों का एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए। और शिक्षा इसमें क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सकती है।

  भारतीय संस्कृति के मूल्यों का संरक्षण हो, गुलामी की मानसिकता से मुक्ति हो, स्वरोजगार की ओर युवाओं का ध्यान जाएँ। अत: सुचिता के साथ धर्म आधारित आर्थिक संरचना का आधार खड़ा करना, देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर उपयोग करना, राष्ट्र का सर्वान्गीण विकास करना होगा । इसका निहितार्थ यह भी है कि सभी वर्गों को सामान विकास का अवसर उपलब्ध कराना, भौतिक ऊर्जा से लेकर भारतीय ज्ञान संपदा का युगानुकूल विकास करना , इसमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति कैसे और कितना कारगर होगी यही हमारे चिन्तन का विषय होना चाहिए।

शिक्षा के माध्यम से आत्म निर्भर भारत बनाने के लिए आवश्यक है की हम स्वभाषा, स्वभूषा, स्वभोजन, स्वभेषज, स्वशिक्षा, स्वरीति-रिवाज, स्वरोजगार, जैविक कृषि, लघु उद्योग आदि पर बल दें।

आत्मनिर्भर भारत के परिणाम क्या होंगे ? यह दो प्रकार से हमारे सामने आता है। भौतिक विकास, सबको रोटी, कपड़ा, मकान, सभी के स्वस्थ्य की चिंता, निरोगी काय। सभी को शिक्षा और चौथा, हर हाथ को काम। दूसरा आत्मनिर्भर भारत का महत्वपूर्ण पहलू है विश्व की ही नहीं तो जीवमात्र की चिंता। मानवता की चिंता। इसलिए मनुष्य का सम्पूर्ण विकास– शरीर, मन, बुधि से आत्मा के बोध तक की यात्रा, और यह यात्रा चार पुरुषार्थों- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के साथ करनी है। यह आत्मनिर्भरता पश्चिम के व्यक्ति आधारित विकास से नहीं तो एकात्मता आधारित विकास से प्राप्त करनी है। 



इसलिए समझना होगा कि आत्मनिर्भर भारत के अर्थ हैं – भारतीय संस्कृति का संरक्षण, समाज में न्यासी के रूप में जीने की अवधारणा, पूजीवाद और समाजवाद का निषेध, आर्थिक लोकतंत्र, अनावश्यक भारी उद्योगीकरण का निषेध, विकेन्द्रित नीति। आज भारत एक बार फिर 'आत्म-निर्भर' बनने के लिए भीतर की ओर देख रहा है।

भारत के लिए पीएम मोदी के दृष्टिकोण में आत्मनिर्भरता ना तो बहिष्करण है और ना ही अलगाववादी रवैया। यह अपनी दक्षता में एक तरह की गुणात्मक विस्तार का प्रयत्न है। इसके अतिरिक्त दुनिया के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करते हुए दुनिया की मदद करना, जो भारत की ‘वसुधैव’ सस्कृति के अनुरूप है, यह सरकार करने जा रही है। 



इसीलिए शिक्षा के क्षेत्र में पहली वार भारत के बहार के सामर्थ्य विश्वविद्यालयों को आने को कहा गया है। कोरोना महामारी के बाद आर्थिक राष्ट्रबोध के साथ जागरण सभी देशों में आएगा। वैसे भी "हम तो वर्षों से आत्म-निर्भरता और स्वदेशी मॉडल की वकालत कर रहे हैं। अब हमें लोकल चीज़ों को लेकर वोकल होना है।“ यानी भारतीयों को स्थानीय चीज़ों के बारे में ज़्यादा बात करनी चाहिए, खुलकर बात करनी चाहिए। यही विश्व गुरु बनाने का रास्ता है। जिसे वंकिमचंद ने, “तुम दुर्गा दसप्रहरण धारणीम” कहा है।

प्रो उमेश कुमार सिंह

umeshksingh58@gmail.com



--------------------------------------------------------------------------------


पूरा श्लोक: "न राज्यं न च राजासीत् न दण्ड्यो न च दाण्डिकः। धर्मेणैव प्रजा: सर्वा: रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥"।
अर्थ: न कोई राज्य था, न राजा था, न कोई दंड था और न ही दंड देने वाला था। सभी प्रजाएँ केवल धर्म के अनुसार ही एक-दूसरे की रक्षा करती थीं।
 

Friday, 12 December 2025

शिक्षा के प्रयोग में एक कदम और

शिक्षा के प्रयोग में एक कदम और 

मध्यप्रदेश में -

* दरअसल राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के मध्यप्रदेश में दो वर्ष पूरे हो गये हैं। 

* फिर भी प्रदेश में अभी एन ई पी , न्यू शिक्षा नीति!! के बाहर नहीं आ पाई। 

*  यह अलग बात है कि इसको गले उतारने में दो वर्ष में छोटे-बड़े हजारों सेमीनार, वेबीनार हो चुके हैं।

* ख़र्च की बात 'गूंगे का गुड़' जाने। 

* बता दें प्रदेश में अभी बहुत बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शिक्षक,  दोनों इसे राष्ट्रीय नहीं,न्यू ही बोलते हैं। 

                 ............

भारत सरकार का अगला कदम -

* तब भारत सरकार ने बहु प्रतीक्षित 'शिक्षा का (शायद एकल नियामक) सिंगल रेगुलेटर' बिल कैबिनेट में पास कर दिया।

* 'विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण '

* यूजीसी, एआईसीटीई,और एनसीटीई जैसे बड़े नदों के साथ अनेक नालों का अधीक्षण!

* पहले यह 'हायर एजूकेशनल कमीशन आफ इंडिया ' प्रस्तावित था।
      ...............

* यह बदला नाम पंच परिवर्तन के 'स्व' भाषा का प्रत्यक्ष परिणाम है।

* इंडिया की जगह 'भारत' का स्वत्व बोध है।

# विश्वास है प्रदेश सरकार 'इंडिया' और अंग्रेजी के भाषाई प्रभाव को संतुलित कर मातृभाषा को बढ़ावा देगा।

* शायद पीएम,सीएम राइज और एक्सीलेंस से मुक्ति मिले!
     ................

* चिकित्सा शिक्षा और विधि शिक्षा इसके बाहर होंगे।
* तर्क साफ है, 'विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण' को विधि -निषेध और बीमारी की अवस्था यदि प्राप्त होती है तो चिकित्सा की आवश्यकता होगी।

* विधि लाल और हरी बत्ती दिखायेगा तो चिकित्सा रोग का निदान करेगा। 

** और यह काम बाहर रहकर अनासक्त भाव से ही किया जा सकता है!!

     .….......

# देखना यह होगा कि मध्यप्रदेश में यह किस प्रकार सामने आयेगा, क्योंकि यहां चिकित्सा और विधि को उनके पृथक केन्द्रीय (विधि) और राज्य (चिकित्सा) विश्वविद्यालय होने के वावजूद दोनों को परम्परा विश्वविद्यालय में भी चलाने की योजना चल रही है।

...........

* इसके तीन काम बताये गये हैं -नियमन, मान्यता और पेशेवर मानकों का निर्धारण।

* शायद प्रदेश के विनियामक आयोग और फीस नियामक आयोग भी इससे प्रभावित हों? मध्यप्रदेश में भी यह आयोग किसी नये स्वरूप में आये।

* शिक्षा में 'पेशेवर मानक' शिक्षा को उद्योग मानकर चला रहे प्रतिष्ठानों को फिर से पेशे में फलने -फूलने का अवसर देगा या पेशा बंद कर शिक्षा को पुनर्जीवित करने का ....।

.........

* 2034 से 47 तक इंतजार करना होगा। शायद आज का अठारह साल का मस्तिष्क (युवा -युवती) तब तक 'याचि देही,याचि डोला' की सिद्धि प्राप्त कर सकें।

* मराठी के 'देही' शब्द का संस्कृत में 'आत्मा' भी अर्थ होता है। इसलिए हम जैसों को भी पुनर्जन्म में विश्वास रख कर इस 'डोला' में न सही उस 'डोला' से देखने का अवसर मिलेगा ही।
.............
 करणीय -

* दो वर्ष के ज़मीनी अनुभवों के आधार पर शिक्षण व्यवस्था में सुधार हो।

* निजी महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में सरकार का नियंत्रण हो। ताकि शिक्षा व्यवसाय बनने से बच सके।

* प्रदेश में निजी विश्वविद्यालय खोलने पर रोक लगे और खुले हुए महाविद्यालयों/ विश्वविद्यालयों के गुणवत्ता के लिए - शिक्षक नियुक्ति, परीक्षा परिणाम और डिग्री पर अंकुश लगे।

* शोध क्षेत्र पर घिसी- पिटी शोध व्यवस्था में बदलाव हो। शोधग्रंथ आनलाइन होने के बाद ही उपाधि दी जाये।

* टास्क फ़ोर्स सक्रिय हो और रूसा विश्वबैंक की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण और प्रभावी परिणाम के लिए निर्धारित स्वीकृति पदों पर अपेक्षित अधिकारियों की पदस्थापना हो।

@ नोट -
 * यद्यपि मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा मुख्यमंत्री जी के रुचि का विषय है और देश के अन्य राज्यों की तुलना में राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 को लेकर आगे भी बढ़ रहा है, तथापि देखना चाहिए कि परिणाम भी अपेक्षित मिले।

* शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत  - अभाविप, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, शिक्षण मंडल जैसे आधा दर्जन संगठन भी शिक्षा में गुणवत्ता आये इस दिशा में प्रयत्नशील हैं। 

* सरकार उनके सुझावों को समय पर मान कर काम करे तो राजीव गांधी विश्वविद्यालय, ह्वीआईटी जैसे अन्य संस्थानों की दुर्गति न हो और आये दिन कुलगुरु न तो स्तीफा दें और न ही हेतराम की बखरी में जायें। 

 कृपया इसे आलोचना समझें, निन्दा नहीं।
सादर

पंच परिवर्तन के मूल बिंदु

जो पांच बातें हमने कही है पंच परिवर्तन में वह समाज के आचरण में आमूलाग्र बदल लाने वाली बातें हैं।
सामाजिक समरसता- करना क्या है,सब जाति वर्ग के सब पंथ प्रांत के सब भाषा भाषी इसमें हमारे मित्र और हमारे कुटुम्ब के मित्र होने चाहिए। मंदिर पानी, श्मशान सब हिंदुओं का एक हो। यह देखना है। अपने कुटुम्ब में कुटुम्ब प्रबोधन का मंगल संबाद।
ऐसा हमारे घर में अपनी माता बहने, पत्नी भाभियां सबसे लेकर, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सब करेंगे। ऐसा एक घर अपना खड़ा हो गया तो पड़ोसी उसका अनुकरण करेंगे।उनको भी हम बुला कर दिखायेंगे। कुटुम्ब का यह वातावरण आज सब को चाहिए।हम करेंगे 2026 की विजयादशमी के बाद समाज ले जायेंगे।
दूसरा -पर्यावरण, पानी बचाओ,पेंड़ लगाओ, प्लास्टिक हटाओ। 
* ऐसे ही स्वदेशी का आचरण घर के अंदर भाषा, भूषा, भजन,भवन,भ्रमण भोजन अपना चाहिए।वह परकीय नहीं चाहिए। हमारे घर के अंदर हम क्यों अंग्रेजी बोलेंगे? हमारी मातृभाषा बोलेंगे।
* और नागरिक नियमों का पालन करना। 
ये पांच पंच परिवर्तन के नाते अपने जीवन में लाना और अपने जीवन में सौ प्रतिशत तो एकदम आने वाली नहीं है लेकिन हमारा प्रयास शुरू है और एक एक कदम आगे डाल रहे हैं। और यह जब हो जाये तो समाज को बताना कि ये करो।
.....….....
1925की विजयादशमी से 2026की विजयादशमी तक हम इस उपलक्ष्य में कुछ योजनाएं लेकर काम करने वाले हैं।सौ साल से चला हुआ अपना कार्य है। इसलिए दीर्घ अनुभव के आधार पर उसकी एक निश्चित कार्य पद्धति हो गई।जो पुराने लोग हैं,उस कार्य पद्धति में प्रशिक्षित हुए हैं।