जो जाति की राजनीति करते हों!
जो जाति के आधार पर सरपंच से लेकर सांसद, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति चुनते हों!
कौम के नाम पर जिहाद करते हो!
सेवा के नाम पर मतांतरण और राष्ट्रान्तरण की नींव रखते हों!
उनसे अपेक्षा कि मुंह खोलेंगे?
दरअसल यह जाति में जन्म लेने का दोष नहीं, जीवन का मूल्य न समझने का हस्र है।
राष्ट्र से अधिक समाज और समाज से अधिक जाति और जाति से अधिक स्वयं की महत्वाकांक्षा का परिणाम है।
यह एक सामाजिक सरोकार का विषय है कि आप आर्थिक रूप से कमजोर घर में पैदा हुए तो दलित हो गये??
आप तथाकथित जाति में पैदा हो गये तो ऊंच,नीच हो गये?
हम भूल जाते हैं कि जन्म,मरण अपने हाथ में नहीं है!
सूर,कबीर, तुलसी, तिरुवल्लुवर, महावीर, मीरा, कवष यलूष, बाल्मीकि सब की तो जातियां थी।
आखिर उन्हें तो कोई जातिगत आरक्षण नहीं था!!
कर्म के आधार पर ही वे सब पूज्य हैं।
फिर पुरखों ने पुरखों को प्रताड़ित किया इसलिए उनकी संतानें किसी भी मानवीय मूल्यों को रौंदने के अधिकारी हो गये?
भाई! पुरखों को पुरखों से निपटने दो न! वे जहां होंगे निपट लेंगे। उनके नाम पर जो लाभ लेना है लो। पर कुतर्क कर अपने -अपने पुरखों का अपमान न करें।
कहने को हम सबसे आधुनिक युग में जी रहे हैं। और गाली देने को बड़ी उपाधि लेकर अज्ञानी का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं?
कहने को तो यह भी है कि हम अध्यात्म- प्राण राष्ट्र के वैश्विक नागरिक हैं!!
क्या क्षम्य/अक्षम्य के निर्णय के लिए समाज, जाति, देश और राष्ट्र सामर्थ्यवान हो चुका है?
राजनीतिक दृष्टिकोण से मत सोचियेगा।
जीवन मूल्यों का विषय है। जातीय अस्मिता का विषय है। राष्ट्र के 'स्व' का विषय है।
🙏
27/11/25
भोपाल
एक पिता ने,चाहा कि *उसके पुत्र* के विवाह के लिए जब तक कोई *ब्राह्मण* अपनी पुत्री का विवाह प्रस्ताव नहीं देता तब तक, आरक्षण व्यवस्था बनी रहना चाहिए !! इस इच्छा में, ऐसी क्या बात है कि कुछ लोग आग -बबूला हैं ? और, टिप्पणी कार/ पिता माफ़ी मांगने लगा है ? हर मां/पिता अपने बच्चों का विवाह किसी योग्य घर -वर/वधू से करना चाहता है। अतः, ब्राह्मण परिवार की पली बढ़ी बेटी को ससम्मान वधू के रूप में पाने की कामना में कुछ भी बुराई नहीं है। फिर भी, इस इच्छा को आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखने से जोड़ना बेतुका है। ब्राह्मण समाज का संख्या बल इतना नहीं है कि उसमें पले बढ़े बेटे बेटी की , कथित ग़ैर ब्राह्मण समाज के बेटे बेटी से, विवाह करने की इच्छा की पूर्ति हो सके।
ReplyDeleteअतः सभी मां -बाप को से प्रार्थना है कि वे अपने बच्चों को सनातनी संस्कार देने का प्रयत्न करें।तथा, जाति -वर्ण -वर्ग की कैद से मुक्त हों।
विषय उपयुक्त और योग्य वर का है.एक48 में रफ़्तार शारदा कबीर बेदी ने डॉक्टर अंबेडकर से शादी की बात है, क्योंकि योग्य थे। उच्च वर्ण की कन्याएँ भी योग्य वर चाहती है. 1948 कहीं से कोई और दलित योग्य वर भी तक शायद नहीं मिला है.
ReplyDeleteअजा/अजजा का आरक्षण का लाभ पाकर आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग क्रीमी लेयर का विरोध करने तरह तरह के हथकंडे अपना रहे हैं.इस वर्ग के विपन्न लोगों को भ्रामक जानकारी देकर अपना हित साधने में लगे हैं.अजाक्स के पूर्व अध्यक्ष ने तो ऐसी टिप्पणी नहीं की.
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