दरअसल तंत्र की धुन में हम मंत्र भूल गये।
भूल गये की मंत्र के बिना तंत्र चल नहीं सकता।
सरकार मंत्र विहीन तंत्र पर चल रही है।
मंत्र के अधिष्ठाता मंत्री तो हैं, पर वे संत्री पर निर्भर हो गये हैं।
इसका परिणाम -
शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाने का अर्थ जीवन की कला से वंचित करना है।
शिक्षा मनुष्य की चेतना को जागृत करती है।
अर्थाधारित शिक्षा पशु (सुविधा भोगी मनुष्य) बनाती है।
ऐसा क्यों हो रहा है?
कारण -
कुटुम्ब बिखर गये।
संवाद बंद हो गये।
प्रवोधन शून्य हो गये।
प्रलोभन साकार हो गये।
इसीलिए रोजगार आधारित शिक्षा से विद्यार्थी बेकार हो गये।
शिक्षा जब आत्मसुखाय, लोकहितार्थ थी तब रोजगार अनुपस्थिति था।
मस्तिष्क ज्ञान के उत्तुंग शिखर को तलाश करता था।
आज मस्तिष्क रोजगार की चिंता में स्किल डेवलपमेंट प्रोग्रामिंग पर है।
निदान -
कुटुम्ब प्रबोधन इसका उपाय है।
नौनिहालों के माता -पिता माने न माने बाप- दादाओं को कान में-
संतोष,तप, त्याग, परोपकार का मंत्र फूंक देना चाहिए।
अवसर आने पर ऋतु (पराशक्ति) उसे पल्लवित करेगी।
रोजगार भी बढे़गा
कुटुम्ब भी बचेगा
स्वाभिमान भी जगेगा
नर नारायण की यात्रा करेगा
भारत + वर्ष के साथ बढ़ेगा
शिक्षा सौभाग्य का आधार गढ़ेगा
अखिल विश्व का हाहाकार हरेगा।
सादर
22/11/25
☑️🙏🙏🌹
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