Monday, 28 August 2023

सफल राजनीति किंतु राष्ट्र नीति नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र सिंह जी आप ठीक कह रहे हैं किंतु -

यह सफल राजनीति होगी! किन्तु राष्ट्र नीति नहीं है। 

सत्ता रहेगी। व्यक्तिगत पद प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। किंतु समाज का एक बड़ा तबका जेंडर कोई भी हो जिस तरह प्रलोभी और अकर्मण्य हो रहा है उसका क्या होगा?

समाजिक सम्मान,समानता समरसता के नाम पर आरक्षण के दंश से पीड़ित प्रतिभा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शरण में देश -विदेश में कब तक शरणागत बधुआ मजदूर रहेगी।

आपको स्मरण होगा गरीबी उन्मूलन के समय और 1980 के आसपास से जिस तरह अर्जुन सिंह जी गरीबों के मसीहा बने थे, उसका हश्र क्या हुआ?

बोरा जी आये और उस काल से जो प्रदेश में तुष्टिकरण चला उसने सबसे पहले शिक्षा विभाग की रीढ़ तोड़ दी। बाद में दिग्विजय सिंह की अतिथि,संविदा,कर्मी विदेशी आयातित योजना ने प्रदेश के तंत्र को करप्शन और निठल्ले पन में ऐसा ढकेला। सड़कें, पुलिया तो धूल धूसरित गड्ढे में बदली ही थी, पंचायती राज ने पूरे गांवों को कई धड़ों में बांट दिया। तथाकथित अगड़ी -पिछड़ी सामाजिक संरचना में जबरदस्त खाई बढ़ती गई।

 आज शिवराज सिंह जी को भी सम्हालना कठिन हो रहा है। बल्कि उसी रास्ते पर चलना भी पड़ रहा है।

न चर्च कम हुए न मस्जिद और न ही श्रद्धा के नाम पर गली कूचों में खड़े होते जमीन अतिक्रमण के नाम पर मंदिर! 

ऊपर से करैला और नीम चढ़ा ब्यूरोक्रेट्स! गोविन्द नारायण सिंह के बाद अर्जुन सिंह जी और वीरेंद्र कुमार सकलेचा जी ही दो मुख्यमंत्री रहे जिनके आंख के इशारे से ब्यूरोक्रेट्स नाचते थे। 

मुख्यमंत्री की घोषणाएं विभाग और वित्त विभाग के बीच फुटबॉल बनी हैं। शीर्षस्थ ब्यूरोक्रेट्स का आपसी झगड़ा भी बड़ा कारण है।

एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सारी सरकार घिर गई है। मंत्री अपने सचिवों से परेशान हैं तो ब्यूरोक्रेट्स अपने अधीनस्थ से। 

पहले मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी का फोन कलेक्टर को हड़बड़ा देता था,अब पीएस, एसीएस की बात कलेक्टर मानने बाध्य नहीं तो स्थानीय मंत्री, नेता की कौन सुनता है! सबके अपने-अपने आका जो हैं।

ऐसे में घोषणाओं के वशीकरण से सरकार भले किसी की  बन जाये असरकार दलों को दल-दल में फंसना अपरिहार्य है। 

किसी ने फेसबुक पर लिखा है कि इतनी कैडरवान पार्टियों में मंत्री के लिए 24 कैरेट छोड़िए आठारह कैरेट के 30 चेहरे नहीं मिलते हैं। फिर 200 से ऊपर लाने का नारा किसी तरफ का हो क्या संदेश दे रहा है?

Sunday, 16 July 2023

कठोपनिषद

 

कठोपनिषद

सामवेदीय शाखा का उपनिषद है । “ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥  ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥” यह उपनिषद आत्म-विषयक आख्यायिका से आरम्भ होता है । प्रमुख रूप से यम नचिकेता के प्रश्न प्रतिप्रश्न के रुप में है । नचिकेता के पिता , ऋषि अरुण के पुत्र उद्दालक लौकिक कीर्ति की इच्छा से विश्वजित (अर्थात विश्व को जीतने का) याग का अनुष्ठान करते हैं । याजक अपनी समग्र सम्पत्ति का दान कर दे यह इस यज्ञ की प्रमुख विधि है । इस विधि का अनुसरण करते हुए उसने अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दी । उसके पास कुछ पीतोदक, जग्धतृण, दुग्धदोहा, निरिन्द्रिय और दुर्बल गाएँ  थीं । नचिकेता ने पिता से कहा, इस प्रकार के दान से तो आपका याग सफल न होगा न आपकी आत्मा का अभ्युदय होगा । संवाद में वह कहता है की आपमें सचमुच दान की भावना है तो मुझे दान कीजिये, "कहिये मुझे किसको दान में देने को तैयार हैं" - कस्मै मा दास्यसि ? पिता ने पुत्र की बात अनसुनी कर दी ; समझा नादान बालक है। जब नचिकेता ने देखा की उसका पिता उद्दालक उसकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा है तो उसी प्रश्न को कई बार दोहराया - "मुझे किसे दोगे" ? तब क्रोधित होकर पिता ने कहा - तुझे मृत्यु को दान में देता हूँ (मृत्यवे त्वा ददामि)। यह सुन नचिकेता मृत्यु अर्थात यमाचार्य के पास गया और उनसे तीन वर मांगें  - पहला वर पिता का स्नेह मांगा। दूसरा अग्नि विद्या जानने के बारे में था। तीसरा वर मृत्यु रहस्य और आत्मज्ञान को लेकर था। इसी सवाद को लेकर यह उपनिषद सामने आता है ।

प्रश्नोपनिषद

 

 प्रश्नोपनिषद

: इस उपनिषद् के प्रवक्ता आचार्यपिप्पलाद थे जो कदाचित् पीपल के गोदे खाकर जीते थे। सुकेशा, सत्यकाम, सौर्यायणि गार्ग्य, कौसल्य, भार्गव और कबंधी, इन छह ब्रह्मजिज्ञासुओं ने इनसे ब्रह्मनिरूपण की अभ्यर्थना करने के उपरांत उसे हृदयंगम करने की पात्रता के लिये आचार्य के आदेश पर वर्ष पर्यंत ब्रह्मचर्य पूर्वक तपस्या करके पृथक्-पृथक् एक एक प्रश्न किया । इसके प्रथम तीन प्रश्न अपरा विद्या विषयक तथा शेष परा विद्या संबंधी हैं। प्रथम प्रश्न में प्रजापति सेसृष्टि की उत्पत्ति, द्वितीय प्रश्न में प्राण के स्वरूप , तीसरे प्रश्न में प्राण की उत्पत्ति तथा स्थिति का निरूपण किया गया है । पिप्पलाद ने चौथे प्रश्न में बताया की  स्वप्नावस्था में श्रोत्रादि इंद्रियों के मन मे लय हो जाने पर प्राण जाग्रत रहता है तथा सुषुप्ति अवस्था में मन का आत्मा में लय हो जाता है । वही द्रष्टा, श्रोता, मंता, विज्ञाता इत्यादि है जो अक्षर ब्रह्म का सोपाधिक स्वरूप है। इसका ज्ञान होने पर मनुष्य स्वयं सर्वज्ञ, सर्वस्वरूप, परम अक्षर हो जाता है । पाँचवे प्रश्न में बताया कि ओंकार में ब्रह्म की एकनिष्ठ उपासना एवं ॐ का एकनिष्ठ उपासक परात्पर पुरुष का साक्षात्कार करता है । अंतिम छठे प्रश्न में आचार्य पिप्पलाद ने दिखाया है कि इसी शरीर के हृदय पुंडरीकांक्ष में सोलहकलात्मक पुरुष का वास है । ब्रह्म की इच्छा, एवं उसी से प्राण, उससे श्रद्धा, आकाश, वाय, तेज, जल, पृथिवी, इंद्रियाँ, मन और अन्न, अन्न से वीर्य, तप, मंत्र, कर्म, लोक और नाम उत्पन्न हुए हैं जो उसकी सोलह कलाएँ और सोपाधिक स्वरूप हैं।

मुण्डकोपनिषद् :

 

मुण्डकोपनिषद् : मुंडकोपनिषद् दो-दो खंडों के तीन मुंडकों में, अथर्ववेद के मंत्रभाग के अंतर्गत आता है। इसमें पदार्थ और ब्रह्म-विद्या का विवेचन है, आत्मा-परमात्मा की तुलना और समता का भी वर्णन है। इसके मंत्र सत्यमेव जयते ना अनृतम का प्रथम भाग, यानि सत्ममेव जयते भारत के राष्ट्रचिह्न का भाग है । इस उपनिषत् में ऋषि अंगिरा और  शिष्य शौनक के संवाद हैं । इसमें 21, 21 और 22 के तीन मुंडकों में 64 मंत्र हैं ।

माण्डूक्योपनिषद्:

 

  माण्डूक्योपनिषद्: 

इस उपनिषद में कहा गया है कि विश्व में,  भूत-भविष्यत् - वर्तमान कालों में तथा इनके परे भी जो नित्य तत्त्व सर्वत्र व्याप्त है वह ॐ है । यह सब ब्रह्म है और यह आत्मा भी ब्रह्म है।  इसमें आत्मा कि अभिव्यक्ति की - जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय चार अवस्थाएँ बताई गई हैं । (ब्रह्म) के भेद का प्रपंच नहीं है और केवल अद्वैत शिव ही शिव रह जाता है ।

तैत्तरीयोपनिषद

 तैत्तरीयोपनिषद

तैत्तिरीयोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली इन तीन खंडों में विभक्त है - कुल ५३ मंत्र हैं, जो ४० अनुवाकों में व्यवस्थित है । उपनिषद का आरंभ ब्रह्मविद्या के सारभूत 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्‌' मंत्र से होता है । ब्रह्म का लक्षण सत्य, ज्ञान और अनंत स्वरूप बतलाकर उसे मन और वाणी से परे अचिंत्य कहा गया है । इस उपनिषद् के मत से ब्रह्म से ही नामरूपात्मक सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और उसी के आधार से उसकी स्थिति है तथा उसी में वह अंत में विलीन हो जाती है।

ऐतरेयोपनिषद्:

 ऐतरेयोपनिषद्:

इस उपनिषद् में तीन अध्याय हैं । उनमें से पहले अध्याय में तीन खण्ड हैं तथा दूसरे और तीसरे अध्यायोंमें केवल एक-एक खण्ड हैं । प्रथम अध्याय में बतालाया है कि सृष्टि के आरम्भ में केवल एक आत्मा ही था, उसने लोक-रचना के लिये ईक्षण (विचार) किया और केवल सकल्प से अम्भ, मरीचि और मर तीन लोकोंकी रचना की । उनके लिये लोकपालो की रचना किया । परमात्मा की आज्ञा से उसके भिन्न-भिन्न अवयवों में वाक्, प्राण, चक्षु आदि स्थति हो गये। फिर अन्नकी रचना की गयी। देवताओं ने उसे वाणी प्राण चक्षु एवं श्रोत्रादि भिन्न-भिन्न कारणों से ग्रहण करना चाहा; परन्तु वे इसमें सफल न हुए । अन्त में उन्होंने उसे अपान द्वार ग्रहण कर लिया। इस प्रकार यह सारी सृष्टि हो जानेपर परमात्मा ने विचार किया कि अब मुझे भी इसमें प्रवेश करना चाहिये; क्योंकि मेरे बिना यह सारा प्रपंच अकिंचित्कर ही है। अतः वह उस पुरुष की मूर्द्धसीमा को विदीर्णकर उसके द्वारा उसमें प्रवेश किया कर गया । इस प्रकार ईक्षण से लेकर परमात्मा के प्रवेशपर्यन्त जो सृष्टिक्रम बतलाया गया है ।