Monday, 28 October 2024

क्रिया योग

भारत की कामना सम्प्रदायिक आधार पर नहीं जीवमात्र पर आधारित है। इसका प्रकटीकरण योग के बोध से हुआ।

योग शास्त्र में ऐसे सूक्ष्म सिद्धांतों की व्याख्या व स्थापना है जो आज के भौतिक विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी विद्यमान है ।  

इस व्यवहारिक दर्शन का कार्यक्षेत्र भौतिक धरातल से लेकर उच्च आध्यात्मिक लोक तक फैला है। इन  विविध स्तरों से जुड़ी हुई इसकी भिन्न-भिन्न शाखाएं हैं। 

उदाहरण के लिए-  
हठयोग में केवल शारीरिक अभ्यास है । 
मंत्र योग  स्वर से संबंधित है । 
लय योग मानसिक प्रक्रिया है। 
राजयोग मन के भी परे जाकर अध्यात्म की भूमि का संस्पर्श करता है । 
कर्मयोग आध्यात्मिक की आरंभिक तैयारी करता है।  
भक्तियोग ईश्वर के प्रति प्रेम भाव पर आधारित है।
ध्यानयोग में ध्यान की क्रिया का अवलंबन होता है । 
ज्ञानयोग आत्मसाक्षात्कार द्वारा संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेना है । 

आत्मविज्ञान सदा शास्त्रीय होता है और उसका मापदंड उसका सार्वभौम उपयोग होना चाहिए ।

 यह किसी वर्ग अथवा देश का एकाधिकार नहीं हो सकता।  चाहे इस ज्ञान को उद्घाटित करने का श्रेय केवल भारतीय ऋषियों को ही क्यों ना रहा हो।
दो बातें -
एक-  ऋषियों की प्राचीन साधना स्थली कहां थी ? -
उत्तर-  आर्यावर्त । जम्बूद्वीप। भरतखंड। अजनाभवर्ष  में।

दो- दुनिया के इस श्रेष्ठ मार्ग के दर्शन की भूमि और जन को यदि ' अनेकता से युक्त अशुद्ध चेतना' ने ग्रसना प्रारंभ किया (जो सतत है) तो इस विश्व कल्याणकारी दृष्टि का क्या  होगा? 

इसलिए क्या हमें नहीं लगता कि  हमें क्रिया योग द्वारा समान नागरिक आचार संहिता और नागरिकता का समर्थन करना चाहिए।
11/12/2019
खंडवा

साहित्यकार

कविता में रस नहीं। नाटक विदूषक बन गया। उपन्यास न्यास से नाश की ओर बह रहा है। कहानी हानि दे रही है।

आप कहते हैं, पढ़िये! क्या पढूं आप ही सुझाव दें।

 अब तो साहित्यकार अपने ऊपर शोध करवाने प्राध्यापकों को पुराने रिश्तों की याद दिला रहे हैं।

थिसिस जंचने आती है तो अर्द्ध विराम,पूर्ण विराम और वर्तनी देखने में ही समय नष्ट हो रहा है। वाक्य कहां से प्रारंभ है, कहां समाप्त शोधार्थी और गाइड जाने।

ऊपर से शीघ्र रिपोर्ट भेजने का दबाव। ऐसा लगता है थिसिस न होकर रामचरित मानस का पारायण हो गया हो। जिसे चौबीस घंटे में पूरा ही करना है।

मौखिकी आन लाइन हो रही है।न इधर सुनाई देता न उधर।सुनाई देता है तो 'क्षमा करियेगा , सुनाई नहीं देता।' बस।

ऐसे में साहित्यकारों को साधुवाद दूं, निदेशक को, निर्देशक को, गाइड को, शोधार्थी को , शोधकर्ता को या व्यवस्था को।

 उच्च शिक्षा विभाग को दोष देने का कोई कारण नहीं, क्योंकि साहब अभी 'भारतीय ज्ञान परम्परा ' में व्यस्त हैं।

Saturday, 19 October 2024

सम्पादकीय पांचजन्य

 

यह सम्पादकीय पांचजन्य की है। 

 (पांचजन्य से साभार ऐसे फेसबुक मित्रों और  विद्यार्थियों के लिए जिनके पास पांचजन्य नहीं आता या जो आनलाइन नहीं पढ़ पाते। विश्वास है संघ में अवगाहन करने का आनन्द उठा सकेंगे। रा स्वयंसेवक संघ अपने सौ वर्ष पूरा करने जा रहा है। ऐसे में हम सब वैचारिक विमर्श में अपना सहभाग कर सकते हैं। सादर)

संघ कार्य एक कठिन साधना

रा. स्व.संघ भारतीय समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने और उसे जाग्रत करने की दिशा में कार्यरत है। संघ के स्वयंसेवक आज समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय हैं, फिर चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, व्यापार हो या सामाजिक सेवा।

राष्ट्र सेवक की अवधारणा में निहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा एक अनूठा उदाहरण है, जो व्यक्ति की आकांक्षा से जन्म लेकर सामाजिक जागरूकता और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनी है। संघ कार्य केवल संगठनात्मक कामकाज तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहन और कठिन साधना है।

संघ कार्य और विचार, सत्य पर आधारित हैं। किसी के विरोध अथवा द्वेष पर नहीं। संघ को समझना आसान भी है और असंभव भी। आप श्रद्धा, भक्तिभाव और पवित्र मन से जिज्ञासा लेकर आएंगे तो संघ को समझना आसान है, लेकिन यदि मन में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह रखकर अथवा किसी उद्देश्य को लेकर आएंगे तो संघ समझ में नहीं आएगा।

संघ को सुनकर, पढ़कर समझना टेढ़ी खीर है। संगठन का बनना, चलना और इतने लंबे समय तक अपने ध्येय और स्वभाव को शाश्वत तौर पर साधे रहना कोई सामान्य बात नहीं है। यह सामान्य सांगठनिक क्रियाकलाप नहीं, बल्कि साधना की-सी स्थिति है। अन्य कोई संभवत: इस लंबी साधना में जड़ हो जाता, किन्तु यह अनूठी कार्यपद्धति है, जिसने संघ को चिरजीवंत बनाए रखा है।

संघ की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर के महाल इलाके में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। डॉ. हेडगेवार ने अपने गहन चिंतन और राष्ट्र के प्रति समर्पित दृष्टिकोण से यह महसूस किया कि हिंदू समाज में फैले विभाजन और कमजोरी को दूर किए बिना राष्ट्र का पुनरुत्थान कर पाना संभव नहीं है। स्थानीय लोगों ने जब पहले-पहल इसे देखा तो उन्हें यह एक साधारण व्यायामशाला ही प्रतीत हुई। लोगों को लगा भी कि डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ने के बाद केशव जीने यह क्या किया है? किन्तु संघ स्थापना का उद्देश्य केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त समाज का निर्माण करना था।

संघ की शुरुआत बड़े-बड़े लोगों की जगह छोटे-छोटे बाल स्वयंसेवकों के साथ हुई। सामाजिक एकता, सद्भाव और राष्ट्रभक्ति की भावना जाग्रत करने की संघ की यह दुरूह, संघर्षपूर्ण और दृढ़ संकल्पित यात्रा सतत जारी है।

आज जब संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है तो सामाजिक परिवर्तन के इस वैचारिक सांगठनिक अभियान की विस्तृत यात्रा के आयामों को समझना बेहद आवश्यक है।

पाञ्चजन्यके पन्ने सदा ही संघ के अनूठेपन को आत्मीयता और तथ्यों के साथ समाज के सामने रखने का प्रामाणिक स्रोत रहे हैं। आने वाले पूरे वर्ष में संघ से जुड़ी बौद्धिक जिज्ञासा को शांत करने के लिए इस विषय में अधिकतम जानकारी देने का हमारा प्रयास रहेगा।

स्वतंत्रता संग्राम में रा. स्व. संघ की भूमिका को लेकर कई तरह की भ्रांतियां फैलाई गईं। संघ के आलोचक कभी नहीं चाहते कि स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की भूमिका कभी समग्रता से देश और समाज के सामने आए या इस विषय में तथ्यों पर कभी खुलकर चर्चा हो, लेकिन तथ्य यह है कि डॉ. हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया था। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो बार जेल भी भेजा। एक बार 1921 में और फिर 1930 में।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब देश का विभाजन हुआ तो यह बेहद संघर्षपूर्ण समय था। उस समय संघ के स्वयंसेवकों ने लाखों लोगों की जान बचाई। शरणार्थियों की सहायता करने के लिए संघ ने करीब 3,000 राहत शिविर स्थापित किए थे। संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया था। गोवा मुक्ति संग्राम और भाग्यनगर सत्याग्रह भी स्वतंत्रता आंदोलन में संघ के योगदान को इंगित करने वाले महत्वपूर्ण अध्याय हैं।

1954 में संघ के स्वयंसेवकों ने दादरा और नगर हवेली को पुर्तगाली शासन से मुक्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संघ के कार्यकर्ताओं ने देश की स्वतंत्रता के बाद भी सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। 1952 में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना हुई, जो अब भारत के 52,000 गांवों में जनजातीय समुदायों के कल्याण के लिए कार्य कर रहा है।

क्षणिक राजनीति में समाज उलझे और लड़खड़ाए, इसकी बजाय राष्ट्रहित के दीर्घकालिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना संघ की कार्य और विचार पद्धति का स्वभाव है। उदाहरण के लिए, संघ ने अनुच्छेद-370 को हटाने की मांग 1950 के दशक से ही उठाई थी, जिसकी परिणति 2019 में इसके उन्मूलन के साथ हुई।

ऐसा कौन-सा सकारात्मक कार्य है जिसे संघ के स्वयंसेवक नहीं कर रहे हैं? समाज और जीवन के विविध क्षेत्रों में स्वयंसेवकों और संघ प्रेरित संगठनों ने निष्ठा, कर्मठता और संस्कारित शैली के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

संघ का आनुषांगिक संगठन विद्या भारती आज देशभर में 20,000 से अधिक विद्यालयों का संचालन करता है। इन विद्यालयों में करीब 35 लाख छात्रों को शिक्षा दी जा रही है। संघ प्रेरणा से स्थापित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) आज दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन है, जो 4,500 से अधिक नगरों, ग्रामों और कस्बों में सक्रिय है।

1983 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने अनुसूचित जातियों के उत्थान और सामाजिक समरसता के लिए समरसता मंच की स्थापना की थी। यह मंच जातिगत भेदभाव को समाप्त करने और समाज के सभी वर्गों के बीच समानता की भावना को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है। विहिप के प्रयासों से देशभर में कई धार्मिक और सामाजिक सुधार हुए हैं, जिनका उद्देश्य हिंदू समाज को एकजुट करना और इसके विभिन्न वर्गों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।

संघ ने कन्वर्जन को रोकने और जनजातीय समुदाय की पारंपरिक पहचान को अक्षुण्ण रखने के गहन प्रयास किए हैं। इसके परिणामस्वरूप ही कई राज्यों में कन्वर्जन विरोधी कानून पारित हुए हैं। संघ प्रेरित हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) 156 देशों में कार्यरत है, जो वैश्विक स्तर पर हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनाने का कार्य कर रहा है। संघ देश के भीतर और बाहर कई संकटों में राहत कार्य करता रहा है। किसी भी तरह की आपदा के दौरान संघ के स्वयंसेवक हमेशा सबसे पहले राहत पहुंचाने वाले होते हैं। फिर चाहे वह ओडिशा में आया सुपर साइक्लोन हो, भुज में आया भूकंप हो या चेन्नै में आई बाढ़।

संघ का कार्य केवल सामाजिक सेवा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा देना भी है। राम जन्मभूमि आंदोलन संघ के सबसे महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक रहा है, जिसका परिणाम आज अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के रूप में दिखाई दे रहा है। संघ स्वदेशीविचारधारा को भी प्रोत्साहित करने का कार्य करता है जो मेक इन इंडियाऔरवोकल फॉर लोकलजैसे अभियानों में प्रतिबिंबित होती है।

रा.स्व.संघ भारतीय समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने और उसे जाग्रत करने की दिशा में कार्यरत है। संघ के स्वयंसेवक आज समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय हैं, चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, व्यापार हो या सामाजिक सेवा। संघ ने यह प्रमाणित किया है कि जब समाज की सुप्त शक्तियों को जगाया जाता है, तो राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

 

 

Monday, 23 September 2024

प्रस्थान त्रयी

 

                          प्रस्थान त्रयी

 उपनिषद, गीता तथा ब्रह्म-सूत्र को मिलाकर प्रस्थान त्रयी कहा जाता है।जिनमें प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों का तात्त्विक विवेचन है। ये  वेदान्त के तीन मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं। इनमें उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, भगवद्गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्रों को न्याय प्रस्थान कहते हैं।

ब्रह्मसूत्र के रचयिता बादरायण हैं । इसे वेदान्त सूत्र, उत्तर-मीमांसा सूत्र, शारीरिक सूत्र और भिक्षु सूत्र आदि के नाम से भी जाना जाता है । 

प्राचीन काल में भारतवर्ष में जब कोई गुरु अथवा आचार्य अपने मत का प्रतिपादन एवं उसकी प्रतिष्ठा करना चाहता था तो उसके लिये सर्वप्रथम वह इन तीनों पर भाष्य लिखता था। 

आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माधवाचार्य और निम्बकाचार्य आदि बड़े-बड़े आचार्यों ने ऐसा करके ही अपने मत का प्रतिपादन किया।

Friday, 20 September 2024

कालेज आफ पी एम एक्सीलेंस

पहली सूची पर हमने आपत्ति की थी। अब सुधर कर आई है, देखते हैं क्या हुआ?

प्रश्न यह है कि क्या इस सूची में मंत्रालय और संचालनालय और बड़े शहरों की संस्थाओं में बैठे दस हजार एजीपी के प्राध्यापकों ने अपना नाम दिया है, यदि नहीं तो क्यों? उनके पास प्रशासनिक अनुभव है, फिर हिचकिचाहट क्यों?

जो सूची बनी है उनका साक्षात्कार कौन लेगा?

क्या मंत्रालय, संचालनालय या एडी और एक्सीलेंस महाविद्यालयों में बैठे विद्वान?

साक्षात्कार के मापदंड क्या होंगे?
क्या इसमें सेवा निवृत्त नियमित प्राचार्यों को नहीं रखना चाहिए?

प्रश्न बहुत हैं, उत्तर केवल अच्छे भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति को समझने वाले प्राचार्य हों।

कुछ अपेक्षाएं -

निडर हों, नियमों के जानकार हों, जिससे उच्च अधिकारियों के  नियम विरुद्ध मौखिक आदेश पर चिन्हित पार्टियों को सरकारी सप्लाई का काम न दें।

जनभागीदारी  अध्यक्ष के नियम विरुद्ध आदेश की अवहेलना नियम के तहत कर सके।

विद्यार्थियों से आंख मिलाकर बात कर सके। शिक्षकों पर नैतिक प्रभाव बनाने में सक्षम हों।

 परीक्षा में सुचिता के लिए प्रतिबद्ध हों।

क्रय विक्रय का ज्ञान हो, जिससे उनकी अक्षमता के कारण रूसा -वर्ल्ड बैंक को अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कर जैम से क्रय न करना पड़े, भ्रष्टाचार रुके।

 बाबू या लैब तकनीकीशियन और कम्प्यूटर सहायक के ऊपर निर्भर न हों।

ईमेल करना, पढ़ना आता हो। हिन्दी और अंग्रेजी टाइपिंग आती हो।

पढ़ने -पढ़ाने में रुचि हो, सप्ताह में दो क्लास सामान्य ज्ञान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर ले सके।

शोध का जानकार हो। शोध की अलग अलग प्रवृत्ति पर कार्य करा सके।

गुणात्मक और वैश्विक मापदंडों पर महाविद्यालय में शोध पत्र -पत्रिका निकालने, पंजीकृत कराने की क्षमता हो।

शिक्षक प्रशिक्षण ( विषयवार) कराने की दृष्टि हो।

अभिभावकों और शिक्षक -विद्यार्थियों के बीच सेतु बन सके।

विद्यार्थियों को ग्राम विकास के प्रकल्पों से जोड़ सके।

रोजगार के अवसर दें सके।

शेष शुभ। 

…....................

कुछ सुझाव आपसे भी अपेक्षित हैं।

त्वरित सुझाव आये हैं -

जिनसे परहेज करें -
१_ऐसे प्राध्यापकों का साक्षात्कार नहीं कराया जाना चाहिए जिसने आज़ तक किराये का राशि रू 14 लाख जमा नहीं किया है..!

२- जो लोग नियम विरुद्ध लोगो को जनभागीदारी समिति से बिना विज्ञापन और मेरिट लिस्ट के नियुक्ति दिया और स्थायी कर्मी किया है..!

३- उन लोगों का साक्षात्कार नहीं लेना चाहिए जो पीएचडी करने शोध केंद्र गये ही नही...!

४- जो लोग क्रय नियम के  विरुद्ध खरीदी किया है...!

५- ऐसे लोग जो नियम विरुद्ध सेल्फ फाइनेंस के अतिथि विद्वानों का पैसा डकार गए...

६- जिस कालेज में बिना प्रैक्टिकल के परीक्षा कराया...? उस कालेज के प्राचार्य और शिक्षकों का साक्षात्कार कराने से प्रधानमंत्री कॉलेज आफ एक्सीलेंस और बर्बाद होगा....!

७- एक कक्षा में 300 छात्र छात्राओं का  फर्जी उपस्थिति सत्यापन करने वाले प्राध्यापक और प्राचार्य का साक्षात्कार नहीं कराना चाहिए अन्यथा प्रधानमंत्री कॉलेज आफ एक्सीलेंस का नाम बदनाम होगा..?

दिल्ली और भाजपा का भविष्य

दिल्ली और भाजपा का भविष्य 
 
 * दिल्ली में आतिशी जी का राज क्या भाजपा के लिए संजीवनी सिद्ध होगा।
* दिल्ली विधानसभा चुनाव तक वे दिल्ली की मुख्यमंत्री रहेंगी।
* उनकी प्राथमिकता और कमजोरी-
# केजरीवाल की लोकप्रियता बनाये रखना होगा।
# अरविन्द केजरीवाल के निर्देशों का पालन करना।
# विधायकों और मंत्रियों को अपने निर्देशों को पालन करने को राजी करना।
# पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच केजरीवाल को धुरी बनाये रखना।
# एल जी के साथ टकराव को बचाना।
*  देखना होगा आतिशी का मुख्यमंत्री के रूप में सफर दिल्ली वासियों और आगामी विधानसभा के लिए कितना सहायक होगा!
….....

भाजपा के लिए -
*  वर्ष 1996 में मदन लाल खुराना ने  उनका नाम जैन हवाला कांड में आने से दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया था।
* तब उन्होंने भी लगभग वही कहा था जो अब केजरीवाल कह रहे हैं। खुराना ने कहा था कि वे कोर्ट से आरोपमुक्त होने के बाद फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे।
* पार्टी की तत्कालीन गुटबाजी ने ऐसा नहीं होने दिया और प्रयोग का जो दौर चला, भाजपा को दिल्ली राज्य की सत्ता से आज तक दूर रखा।
* यहीं से भाजपा का ग्राफ नीचे जाना प्रारंभ हुआ जो आज भी नहीं सुधर रहा है।
* बाद में साहिब सिंह वर्मा की जगह सुषमा स्वराज के नाम पर पार्टी में सहमति बनी थी।
*  सुषमा स्वराज दिल्ली की 12 अक्तूबर, 1998 से लेकर 3 दिसंबर, 1998 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं।

* वे  इस छोटे से कार्यकाल में दिल्ली के लिए कोई परिणाम मूलक काम नहीं कर सकीं।

करणीय -

* भाजपा को यदि आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतना है तो पुराने प्रयोग की समीक्षा कर काम करना होगा।
* दिल्ली के सातों सांसद, केन्द्र सरकार के बजनदार मंत्री, संगठन के प्रभावी छत्रपों को समन्वय बनाना होगा।
* सेवा बस्तियों से लेकर लुटियन ज़ोन तक साधना होगा। कठिन लेकिन असाध्य नहीं है। बस पन्ना प्रमुखों तक को सक्रिय करना होगा।
* प्रवक्ताओं की ऐसी टीम हर वार्ड तक तैयार करनी होगी जो रोज टीवी डिवैट, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम और x पर तथ्यों के साथ सक्रिय रहें।
* वैचारिक परिवार को साध कर तालमेल बनाना होगा।

कांग्रेस -
# रजिया सुल्तान के शासन के सात सौ साल से भी अधिक समय बाद, सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित 1998 में दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं। 
 
# शीला दीक्षित ने लगातार 15 वर्षों तक दिल्ली पर सरकार चलाई।  किसी भी दल के लिए दिल्ली में लंबा कार्यकाल माना जाता है।
….................

बाक्स -
*  केजरीवाल का भविष्य क्या-  बोरा जी - अर्जुन सिंह जी का सिद्ध होगा ?
या खुराना -वर्मा -सुषमा स्वराज का।
* फिर भी क्या अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक रूप से ख़ारिज किया जा सकता है?
* क्या आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा या कांग्रेस के लिए  आम आदमी पार्टी (आप) को चुनौती देना आसान होगा?
* यह भी सत्य है कि इस बार 
 दिल्ली विधानसभा में काबिज होने के लिए कांग्रेस और भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंकेंगी। 
* भाजपा नेतृत्व यह नहीं भूल सकता कि वह  दिल्ली की सत्ता से  1998 से बाहर है। 
* लंगड़ी कांग्रेस और भ्रष्टाचार के दल-दल में फंसीं आप से भाजपा कैसे दिल्ली छीनती है,यह भविष्य के गर्त और भाजपा और संघ परिवार की एक जुटता पर निर्भर करती है।
* यह भी सत्य है कि भाजपा को इससे अच्छा अवसर आगे मिलेगा भी की नहीं?

Friday, 23 August 2024

नकल के दोषी अतिथि विद्वानों की सेवा समाप्त!!

नकल के दोषी अतिथि विद्वानों की सेवा समाप्त!!

पत्रिका के पृष्ठ 7 पर यह खबर छपी है। शायद शासन का यह निर्णय शासन की नज़र में सही हो सकता है,पर यह व्यवस्था को लेकर उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश शासन पर गंभीर प्रश्न चिन्ह है।

विभिन्न परिक्षाओं में उच्चतम न्यायालय से लेकर सभी राज्य एवं केन्द्र सरकारें चिंतित हैं। 
फिर उच्च शिक्षा विभाग की व्यवस्था कौन देखेगा?

मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा विभाग से लेकर सभी विश्वविद्यालयों को ज्ञात है कि सामूहिक नकल कहां कहां होती है या हो सकती है। फिर भी जैसा कि समाचार पत्र में छपा है,एक अतिथि विद्वान को आपने केन्द्राध्यक्ष बना दिया? क्यों?

एक तरफ अतिथि विद्वानों को आप नियमित योग्य नहीं मानते! लगातार 1990 से इस व्यवस्था को चालू कर रखा है। जो अतिथि विद्वान छह महीने,साल भर की भी एक जगह पर नौकरी नहीं कर सकता (फालेन आउट होता है,या घर बैठा दिया जाता है) उसे परीक्षा का केन्द्राध्यक्ष? क्या परीक्षा का एक्ट अनुमति देता है?

अतिथि विद्वान की निष्ठा, समर्पण सब होने के बाद भी वह विद्यार्थी से लेकर शिक्षक और शासन तक की नज़र में गैर/अनपेक्षित है!

यह घटना केवल भिंड में ही नहीं है, प्रदेश के अनेक महाविद्यालय हैं जहां नियमित प्राचार्य और प्राध्यापक न होने से पूरे महाविद्यालय की व्यवस्था या तो चपरासी,लैब तकनीकीशियन सम्हाल रहे हैं या अतिथि विद्वान। 

हर जिले और संभाग के महाविद्यालयों में नियमित और अतिरिक्त प्राध्यापक बिना वर्क लोड के बैठे हैं, क्यों? क्या इन्हें ऐसे स्थानों पर नहीं पदस्थ करना चाहिए? क्या नर्सिंग की तरह इसमें भी उच्चतम न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा है?

कुकुरमुत्ते (जो आज स्वादिष्ट और हाइजीनिक भोजन की श्रेणी में आता है) की तरह बिना अपेक्षित आधार भूत संरचना और शिक्षकों के निजी से लेकर शासन तक के महाविद्यालय और विश्वविद्यालय चल रहे हैं, हर वर्ष नये खुल रहे हैं,उन पर अंकुश कब लगेगा? परीक्षा और पढ़ाई दोनों को इतना कैजुअल कैसे ले सकते हैं?

चरमराती व्यवस्था नौनिहालों का भविष्य बिगाड़ रही है। ऐसे स्थानों से मैरिट प्राप्त विद्यार्थी कहा संतुलन बिगाड़ रहे हैं ,कौन देखेगा?

अभी तक पीएम एक्सीलेंस की व्यवस्था बनाने में सरकार को पसीना छूट रहा है,तो सामान्य महाविद्यालयों का क्या होगा,?

अतिथि विद्वानों को हटाने और उनके सामूहिक नकल में भागीदारी (यदि है तो) के स्थानीय शिक्षा माफियाओं और उच्च शिक्षा के विश्वविद्यालयों में बैठे कुलपतियों, कुलसचिवों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
 क्या यह परीक्षा के आर्डिनेंस का उल्लंघन नहीं है?
24/8/24
भोपाल