Saturday, 12 September 2020

राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020, में राजभाषा को अपेक्षित सम्मान मिले

 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020,  में राष्ट्र भाषा को अपेक्षित सम्मान मिले

 

हम सब को स्मरण होगा ही कि ‘भारत’ यह इस देश का प्राचीन नाम है, जिससे हमारी सांस्कृतिक धरोहर प्रतिविम्बित होती है। 

कहने को और नाम है आर्यावर्त, अजनाभ वर्ष, इंडिया आदि-आदि। किन्तु संविधान में दो नाम 'इंडिया' और 'भारत' आ जाने से और अपनी राजभाषा के प्रति उदासीनता के चलते स्वतंत्रता के समय से विदेशों में और विदेशिओं के साथ हमने अपना परिचय 'इंडिया' का दिया।

 कारण अनेक हो सकते हैं। किन्तु जैसे-जैसे हम स्वतंत्र से समर्थ्य भारत की और बढ रहे हैं देश की तरुण स्वाभिमानी पीढ़ी अपने आप से प्रश्न कराती है कि हमारे ही देश के दो नाम क्यों ? और इससे भी कठोर प्रश्न आता ही कि  'इंडिया' नाम   'भारत' से अधिक महत्वपूर्ण क्यों ?

समझें, सांस्कृतिक और साहित्यिक जगत में इस देश की पहचान कभी भी 'इंडिया' की नहीं रही। हम प्रणाम भी करते हैं तो ‘वन्दे भारत मातरम्’, जयतु भारतं, 'भारत वन्दे', 'जय भारत वन्दे' आदि–आदि ही उच्चारित करते हैं। 

भारत को माता कहते हैं। इंडिया की जय या इंडिया माता की जय नहीं बोलते क्यों ? क्योंकि हमने 'माता भूमिः पुत्रो अहम पृथिव्याः' कहा है। हमारा नाता माता और पुत्र का है। और इंडिया बोलने से यह भाव आता है क्या ? तो सहज उत्तर 'न' ही आयेगा।

हम आज भी लाख कोशिश के बाद 'इंडिया' की जगह 'भारत' क्यों नहीं कह और लिख पा रहे हैं ? आप में से अनेक कह सकते है कि 'इंडिया' और 'भारत' कहने से क्या फर्क पड़ता है। और चट शेक्सपियर का उदाहरण दे देंगे

 तो यह केवल फर्क की बात नहीं, अस्मिता की बात है, स्वाभिमान की बात है। फिर आप ने कभी इसके परिणाम समझने की कोशिश की होगी तो ध्यान में आया ही होगा की घर से राजभाषा गायब हो रही है। जिन संस्कारों से संस्कृति की आधार शिला खड़ी है, वह चरमरा रही है।

इस भूमिका को रखने के पीछे आप को कुछ पीछे तक ले जाना था। बात 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' के सुझाव की है। जिसमें 'मातृभाषा' को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने की बात कही गई है। यह मातृभाषा तो लागू हो भी जाएगी, भावनाओं की पूर्ती भी हो जाएगी। किन्तु क्या सपना पूरा होगा ?  

इसे जरा समझे।

संविधान बनाते समय आमुख (प्रिएम्बल) में हमने एक वार 'इंडिया' लिख दिया और वह 'भारत' नाम के न चाहने वाले या यूं कहिये 'इंडिया' कहने में गौरव महसूस करने वालों को हथियार मिला हुआ है। कब सरकार सामर्थ्यवान होगी कब यह बदलाव आएगा, यह तो भविष्य ही बता सकता है।

 किन्तु हम जिस शिक्षा नीति को स्वतंत्र भारत की वास्तविक रूप से पहली नीति कहते हैं और उसे हम दिलो–दिमाग से स्वीकारते हैं उसने हमें समझ से काम लेने का एक अवसर दिया है। यदि हमने इसको हलके में लेकर गवां दिया तो आने वाली पीढ़ी को हम समझा नहीं पाएंगे कि अब तो आप के पास अवसर था आप ने क्यों नहीं किया ? 

जिस मूल गलती की और हमारा ध्यान नहीं जा रहा है, वह कितना दूरगामी अपरिणामकारी होगी आज ध्यान में नहीं आ रहा है । 

" अत: हमारा आग्रह है कि ‘चूकि नीति अभी संसद में जा रही है, तो वहां पर एक प्रस्ताव यह आना चाहिए कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020'. में जो संस्थानों / परिषदों / निकायों के नाम (संज्ञाएं) अंग्रेज़ी में आ रहें है और उनका संक्षिप्त रूप भी अंग्रेजी में आ रहा है, उन्हें राजभाषा में रखते हुए अंग्रेजी सहित सभी राष्ट्रीय भाषाओं में यथावत राजभाषा में ही रखा जाए, तथा  उनका संक्षिप्त रूप भी राजभाषा में ही रहे ।"  

इस शिक्षा नीति को वास्तविक रूप से तभी हम "मूल से जुड़े वैश्विक मानव बनाने , क्या से कैसे सोचें की ओर जाने और मातृभाषा आधारित आध्यामिक शिक्षा नीति कह सकते हैं ।"

 नीचे नीति के मूल संस्थाओं  के नाम संक्षिप्त के साथ देखने और समझने के लिए दिए जा रहें है, सूची को देंखे - 

1.  ‘शिक्षा विभाग’  (Education Ministry)

2.  राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच’ (National Educational Technology

3. ‘बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन’ (National Mission on Foundational Literacy and Numeracy)

 4. ‘राष्ट्रीय शोध संसथान’ की जगह 'national research foundation'

5. ‘भारतीय अनुवाद और व्याख्या संस्थान’ (Indian Institute of Translation and Interpretation- IITI)

6. ‘फारसीपाली और प्राकृत के लिये ‘राष्ट्रीय संस्थान (या संस्थनों)’  [National Institute (or Institutes) for Pali, Persian and Prakrit]

7. आँगनवाड़ी / बाल वाटिका / प्री-स्कूल (Pre-School) 

8. ‘प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा’ (Early Childhood Care and Education- ECCE) 

9. ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (National Council of Educational Research and Training- NCERT) द्वारा ‘स्कूली शिक्षा के लिये ‘राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा’ [National Curricular Framework for School Education, (NCFSE)

10. ‘फंडामेंटल लिट्रेसी और न्यूमरेसी’ पर एक नेशनल मिशन‘मिनिस्ट्री ऑफ ह्यूमन रिर्सोस डेवलेपमेंट’   तैयार किया जाएगा। जिसमें स्टूडेंट्स की हेल्थ (शारीरिक और मानसिक ) 

11.‘राष्ट्रीय आकलन केंद्र’ (National Assessment Centre)

12. ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (Artificial Intelligence- AI) 

13. 'नेशनल क्यूरीकुलर एंड पैडेगॉजिकल फ्रेमवर्क फॉर अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन ' (NCPFECCE) 

14. 'अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन क्यूरीकुलम ' (ECCEC)

15. नेशनल प्रोफेशनल स्टैंडर्ड फॉर टीचर्स

16. नेशनल काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (NCTE) 

17. ‘शिक्षकों के लिये राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक’ (National Professional Standards for Teachers- NPST)

18. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ [[National Curriculum Framework for Teacher Education (NCFTE), 

19. राष्ट्रीय शैक्षिक टेक्नोलॉजी फोरम (NTTF)

20. ‘मल्टीपल एंट्री और एग्जिट ऑप्शंस’

21. ‘यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्जाम्स’ के लिए एन.टी.ए यानी ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ एक हाई ‘क्वालिटी कॉमन एप्टीट्यूड टेस्ट’ आयोजित करेगी,  ‘कॉमन एप्टीट्यूड टेस्ट’ के साथ ही ‘स्पेशलाइज्ड कॉमन सब्जेक्ट एग्जाम्स’

22. अपनी ‘एलिजबिलिटी और च्वॉइस’

‘23. परख’ (PARAKH) नामक एक नए ‘राष्ट्रीय आकलन केंद्र’ (National Assessment Centre)

'24. नेशनल कमेटी फॉर द इंटीग्रेशन ऑफ वोकेशनल एजुकेशन ' (NCIVE) का निर्माण करेगी 

25. ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स’

26. ‘एक्सटर्नल कमर्शियल बोर्रोविंग और विदेशी निवेश (एफडीआई)’

27. ‘स्पेशली ऐबल्ड स्टूडेंट्स’

‘28. 360 डिग्री होलिस्टिक रिपोर्ट कार्ड’

29. ‘राष्ट्रीय पुलिस यूनिवर्सिटी और राष्ट्रीय फॉरेंसिक यूनिवर्सिटी’

30. ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ (Academic Bank of Credit) 

31. भारत में जरूरी ‘वोकेशनल नॉलेज’ को ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों तक पहुंचाया जा सके। इसे ‘लोक विद्या’ नाम दिया गया है।

32. भारत उच्च शिक्षा आयोग (Higher Education Commission of India -HECI) 

33. राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामकीय परिषद् (National Higher Education Regulatory Council- NHERC)

34. सामान्य शिक्षा परिषद् का गठन। (General Education Council- GEC)  

35.  वित पोषण- उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद् का गठन।(Higher Education Grants Council-HEGC) 

36.  प्रत्यायन- राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद् (National Accreditation Council- NAC)

37.  देश में आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) के समकक्ष वैश्विक मानकों के ‘बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय’ (Multidisciplinary Education and Research Universities- MERU) की स्थापना की जाएगी।

एक तर्क और आएगा की यह तो विज्ञान की मानक शव्दावली है तो क्या हमारी अपनी राजभाषा की शव्दावली 'संज्ञा ' के लिए भी मानक और उपयोगी नहीं है ? 

हम राजभाषा पखवाड़ा मना कर उसकी वकालत तो करते हैं , किन्तु व्यवहार में ?  

 यहां हिंदी की बात नहीं (अन्यथा भाषाओं की राजनीति होने लगे),  संवैधानिक मुद्दा राजभाषा के अस्तित्व की बात कर रहे हैं। 

ध्यान रखना होगा की पुरानी नीतिओं में जो शब्द आ गए थे उन्हें हम आज भी नहीं बदल पाए और न ही राजभाषा की मर्यादा के अनुरूप कोई नया शब्द प्रचलन में ला पाए, यथा हम UGC / NCERT आदि। UGC की जगह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रयोग में पहले पायदान पर नहीं ला पाये हैं। लेकिन जहाँ चाह है वहां अधूरे शव्दों के साथ ही पर सफल हुए हैं' यथा - 'राजीव गाँधी शिक्षा मिशन'  

सादर

 

प्रो उमेश कुमार सिंह

Umeshksingh58@gmail.com

 

 

 

 

 

  

 

 

  

      

 

Thursday, 10 September 2020

वैश्विक चेतना के राष्ट्र पुरुष स्वामी विवेकानंद

 

वैश्विक चेतना के राष्ट्र पुरुष स्वामी विवेकानंद

(11 सिप्तम्बर,1893 के परिपेक्ष्य में )

प्रो उमेश कुमार सिंह

     स्वामी विवेकानंद भारतीय-दर्शन, अध्यात्म और वैश्विक चेतना के साकार स्वरूप थे। बचपन से ही उनकी वाणी में तेज, हृदय में जिज्ञासाओं का महासागर विद्यमान था। स्वामी जी के आध्यामिक अमृत प्रकाश से आज भी न केवल भारत अपितु संपूर्ण संसार आलोकित हो रहा है। वे एक समाज सुधारक, वैश्विक चेतना के उन्नायक तो थे ही वंचित और दरिद्रनारायण के उपासक भी थे ।   

स्वामी रामकृष्ण परमहंस उन्हें बचपन से ही ध्यानसिद्ध पुरुष कहते थे।’ स्वामी विवेकानन्द ने परतंत्रता के काल में जहाँ देश के निवासियों से रूढ़िवादी विचारों, अंधविश्वासों को छोडने एवं पराधीनता को त्यागने, स्वाभिमान जगाने का आह्वान किया वहीँ विश्व समुदाय से सहिष्णुता और सर्व धर्म समभाव की बात कही और आने वाले समय के लिए चेतावनी के साथ दिशा भी दी।

उन्होंने गुलामी की मानसिकता से जकडे भारतीयों को बोध कराया की,भारत केवल भूमि नहीं वह हमारी माता है, पवित्र तीर्थ है, सर्वस्व है। भारत वह पुण्यभूमि है, जहाँ मानव प्रकृति एवं अन्तर्जगत् के रहस्यों की जिज्ञासाओं के अंकुर पनपे थे।’’ स्वामी जी का बोध था कि, ‘‘मानवधर्म भारतवर्ष की आत्मा है, इसका सहस्रों शताब्दियों से विकसित चारित्र्य है।’’ उनका देशवासियों से आह्वान था कि ‘‘चिन्तन मनन कर राष्ट्रचेतना जागृत करें तथा आध्यात्मिकता का आधार न छोडें।’’

स्वामी जी बाह्याडम्बर और अंधविश्वास के विरोधी थे। वे कहते थे, ‘‘सीखो, लेकिन अंधानुकरण मत करो। नयी और श्रेष्ठ चीजों के लिए जिज्ञासा लिए संघर्ष करो।’’ वे पाश्चात्य जगत के अमृत को भारत के लिए विष मानते थे। स्वामी जी दुनिया की सभ्यताओं को दो भागों में देखते थे, एक का आधार मानवधर्म, तो दूसरी का सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति मानते थे। वे कहते थे नासतः सत् जायते!’ अर्थात निरस्तित्व में से अस्तित्व का जन्म नहीं हो सकता। जिसका अस्तित्व है, उसका आधार निरस्तित्व नहीं हो सकता। शून्य में से कुछ सम्भव नहीं। यह कार्यकारण सिद्धान्तसर्वशक्तिमान है और देश कालातीत है। इस सिद्धान्त का ज्ञान उतना ही पुराना है, जितनी आर्य जाति। सर्वप्रथम आर्यजाति के पुरातन ऋषि-कवियों ने इसका ज्ञान प्राप्त किया, दार्शनिकों ने इसका प्रतिपादन किया और उसे आधार दिया जिसके ऊपर आज भी सम्पूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी सनातन जीवन का प्रासाद खडा है।

    स्वामी विवेकानन्द 1892 में कन्याकुमारी पहुँचे थे, वहाँ तट पर स्थित देवी शक्ति की वंदना कर समुद्र में तैरते हुए ढाई किलोमीटर दूर समुद्र में विशाल चट्टान पर पहुँचे, उसी चट्टान पर ध्यान लगा, चिंतन मनन में तन्मय हो गए। यहाँ स्वामी जी को दिशा-बोध हुआ, ज्ञान और प्रेरणा मिली। स्वामी विवेकानन्द यहीं से जलयान द्वारा अमरीका (शिकागो) पहुँचे थे, जहाँ उन्होंने विश्व को भारतीय दर्शन और अध्यात्म का सन्देश दे कर अवाक कर दिया था।

पाठक उस महासभा में पहुंचने तक की स्वामी जी के जीवन की गाथा कई वार पढ़ ही चुके होंगे। यहाँ दो बातों के साथ उनके भाषण पर चिंतन करूंगा। वस्तुतः दो जिज्ञासा हमारे पाठकों को होनी स्वाभाविक है कि यह सम्मलेन सितम्बर, 1893 को ही क्यों हुआ था। दूसरा क्या सचमुच में विवेकानंद जी ही ऐसे अकेले वक्ता थे जिनके भाषण में ही केवल ताली बजी थी और वह भी ‘भाईओं और बहनों’ कहने पर।

एक मत यह मानता है की है कोलंबस ने अगस्त, 1492 में अमरीका की खोज की थी, जिसकी याद में वह धर्म-सम्मेलन अपनी तैयारी की पूर्णता के साथ सितम्बर, 1893 मनाया जा रहा था।

स्वामी जी के भाषण को समझने के पहले यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है की यह क्रिस्टोफर कोलम्बस था कौन ? यह एक समुद्री–नाविक लुटेरा, आतंकवादी, उपनिवेशवादी, खोजीयात्री था। इसने अमरीका की चार वार यात्रा की थी। जिसका पूरा खर्च स्पेन की रानी इसाबेला ने उठाया था क्योंकि लूट के हिस्से में रानी का भी हिस्सा था। एक तरह से इसने अमरीका के मूल निवासियों को नष्ट कर इस द्वीप पर स्पेनी उपनिवेशवाद की नीव रखने का कार्य किया था। 

तथ्य यह भी है कि विवेकानंद जिस समय शिकागो गए थे उस वक्त अमेरिका गृहयुद्ध जैसी स्थिति से जूझ रहा था और तथाकथित वैज्ञानिक प्रगति ने धार्मिक मान्यताओं की जड़ों को हिला दिया था। ऐसे में अमेरिकी लोग एक ऐसे दर्शन की प्रतीक्षा में थे जो उन्हें इस संकट से मुक्ति दिलाए। यह सम्मलेन उनकी इस प्रयोजनीयता की और भी संकेत करता है, जिसे विवेकानंद ने अपने विचारों से उनकी इच्छा की पूर्ति के लिए आशा की किरण दिखाई।

स्पष्ट है यह ईसाईयों का धार्मिक विजयोत्सव था जो संसार भर को सन्देश देना था। उन्हें यह विश्वास था की दुनिया से आमंत्रित कोई भी वक्ता ईसाईयों के धार्मिक तर्कों का न तो खंडन करेगा और न ही उनके धर्म के वक्ताओं के सामने टिक सकेगा। इसीलिये यह कहना की स्वामी जी के ही भाषण पर ताली बजी थी, ठीक नहीं होगा। आप विचार करें क्या किसी भी देश का श्रोता ऐसा होगा जो अपने धर्म के वक्ताओं के लिए ताली नहीं बजाएगा ? तो फिर सत्य क्या है?

सत्य यही है की स्वामी विवेकानंद जी के उद्वोधन में ताली बजी थी और काफी देर तक बजी थी। इसके दो कारण समझना होगा। पहला- भाषण के दिन तक स्वामी जी की ख्याति वहां के लोगों तक पहुँच चुकी थी कि भारत से कोई ऐसा परिव्राजक आया है जिसके विद्वता का प्रमाण-पत्र ही उसका इस सभा के लिये आमंत्रण था। दूसरा स्वामी जी का युवा-साधना से तपा चेहरा और भेषभूषा। क्योंकि स्वामी जी के पहले भी भारत से गए हुए वक्ताओं और अन्य ने भी ‘सिस्टर एंड ब्रदर’ कहा था। तो यह ताली स्वामी जी के संबोधन के साथ उनके सरल युवा संन्यासी का व्यक्तित्व और उनकी उनके सभा में पहुँचने के पहले की ख्याति थी, जिसे आप सब जानते ही हैं।

वैसे तो उस सभा के बाद स्वामी जी के बहुत से सम्बोधन हुए थे जो बड़े प्रभावी भी थे, किन्तु उनका यह संबोधन ही क्यों इतना लोकप्रिय हुआ समझना आवश्यक है। स्वामी जी के इस ऐतिहासिक संबोधन (11 सितंबर, 1893) को     अपनी टिप्पणी के साथ यहाँ रख रहा हूँ -

अमेरिकावासी बहनो तथा भाइयों,

 आपने जिस सौहार्द्र और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं।

यह संबोधन जितना आत्मीय था उतना ही स्वामी जी का व्यक्तिगत न होकर सम्पूर्ण भारत की और से था। स्वामी जी ‘हम लोगों’ शब्द का प्रयोग ऐसे ही नहीं कर रहे हैं। वे यहाँ ‘मैं’ भी कह सकते थे। यह पुलकित ह्रदय की वह अभिव्यक्ति थी जो तालियों के लिए सभा में उपस्थित जनों को मजबूर करती है। स्वामी जी यहाँ तीन तरह से ‘धन्यवाद’ व्यक्त कर रहे हैं। पहला ‘संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा’ की ओर से, दूसरा- ‘धर्मों की माता’ की ओर से, तीसरा- ‘सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं’ की ओर से।

मैंने इस आयोजन के बारे में कहा था की यह ईसाइयत के विजय का उत्सव था। स्वामी जी ने यहाँ उनके अंहकार को पहले चरण में ही यह कहकर तोड़ दिया कि मैं संसार के सबसे प्राचीन संन्यासी परम्परा का प्रतिनिधि हूँ अर्थात आप हमसे प्राचीन नहीं। दूसरा, हिन्दू धर्म ही दुनिया के सभी धर्मो की माता है। तीसरा, भारत में जो आप लोग धरमों के अनेक सम्प्रदाय देखते हैं वे सभी हिन्दुओं के ही हैं। अब आप ही बताइये इस नवीन अकल्पनीय व्याख्या से कौन रोमांचित नहीं होगा और कई-कई मिनट तक ताली आखिर क्यों नहीं बजेगी ?

     मैं इस मंच पर बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रसारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सभी धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धत्तम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस दिन उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने महान जरथ्रुष्ट्र जाति के अवशेष अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है।

समझें प्राची के लोग सुदूर देश में किस बात का प्रचार करते है तो उसे ‘सहिष्णुता’ कहते हैं। आखिर यह बात क्यों कही तो हम जानते है की जिस अमरीका की खोज का यह उत्सव था उसमे करोडो अश्वेत लोगों की हत्या की जा चुकी थी और यह श्वेत गर्वोंन्ति जाति अत्यंत ही कट्टर थी जिसने यहुदियों के विशुद्धत्तम मंदिर को तोडा था, और वे निर्वासित कर दिए गए थे (‘उसी वर्ष शरण ली थी, जिस दिन उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से’)। यहाँ दो बातें कि हम केवल सहिष्णुता ही नहीं रखते तो सभी धर्मो का सामान आदर भी करते हैं।

हमारे पाठकों को याद होगा कुछ वर्ष पहले भारत में (मुंबई में) ईसाईयों के धर्म गुरु पोप का आगमन हुआ था, तब उनसे किसी पत्रकार ने पूछा था की आप सभी धर्मों पर विश्वास करते हैं कि नहीं ? तो पोप ने क्या कहा ? जो कहा था उसे  सुनकर स्वामी जी के उस समय के व्याखान की प्रासंगिकता आप को ख्याल में आएगी। पॉप ने कहा, ‘हम अपने ब्रांड का साबुन बेचने आये है।‘ तात्पर्य यह की सिकागो में प्रकारंतर से स्वामी जी कह रहे थे कि जिस धर्म पर तुम्हें अहंकार है, वह हिन्दू धर्म और उसकी सहिष्णुता के सामने कुछ भी नहीं।

वे आगे एकात्मता की बात समझाते हुए कहते हैं की- भाइयो, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं, जिसकी आवृत्ति मैं अपने बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृत्ति मेरे देश में प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं-

“रुचिनां वैचिर्त्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम।

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव च॥“

अर्थात जैसे विभिन्न नदियां भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।

स्वामी जी निर्भीकता और वेदांत की विश्वसनीयता का अद्भुत सन्देश बड़ी ही सद्भावना के साथ समझाते हैं कि तुम्हारा इस सभा को करने का कोई भी उदेश्य रहा हो किन्तु यह सर्वश्रेठ तो है ही, गीता के अद्भुत उपदेश को ही समझा रहा  है कि ईश्वर एक है - यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ सम्मेलनों में से एक है, स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा है-

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तास्तंथैव भजाम्यहम।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

 -जो कोई मेरी ओर आता है , चाहे किसी प्रकार से हो , मैं उसको प्राप्त होता हूं। लोग भिन्न-भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

अब आगे देखें दुनियां में चल क्या रहा था? धर्म का नहीं सांप्रदायिक हठधर्मिता और उनकी पीढ़ी–दर–पीढ़ी वन्शधर धर्मान्धता। एक तो स्वामी जी यह बताते हैं कि तुम धर्मांध हो, दूसरा तुमने मानवता को कलंकित किया है; तुम्हारे क्रूर क्रिया से सम्पूर्ण दुनिया में निराशा है। अर्थात तुम्हारा दुनिया पर शासन दंभ और क्रूरता का है।      साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता, इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारंबार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं।

और उस दिन के भाषण के अंत में देखिये एक भारतीय संन्यासी किस तरह आतताइयों के मंच से उन्हीं को चेतावनी दे रहा है - यदि ये वीभत्स दानवी नहीं होतीं, तो मानव समाज आज की अवस्था से कही अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया है, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टाध्वनि हुई है, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाली सभी उत्पीड़नों का, तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होनेवाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्युनिनाद सिद्ध हो।

अब आप समझ गए होंगे की स्वामी जी को वह स्थान अन्य धर्मावलम्बियों और भारत के विभिन्न मत-पंथ के अनुयायिओं के बीच क्यों मिला होगा, जिसे तालियों की गडगडाहट ने ही स्वागत नहीं किया बल्कि घंटा ध्वनि के निनाद ने किस तरह सनातन धर्म (हिंदुत्व) का निनाद किया की बस अब यह अन्याय, क्रूरता, अत्याचार दुनिया में नहीं चलेगा ।

  अंत में स्वामी जी की शिष्य परम्परा से भी इस यात्रा को समझ लें। विवेकानंद के भक्त अदीश्वरानंद ने लिखा है कि विवेकानंद ने अपने विचारों से अमेरिकी लोगों के दिल को छुआ। उन्होंने अपनी जादुई भाषण शैली, रूहानी आवाज और क्रांतिकारी विचारों से अमेरिका के आध्यात्मिक विकास पर गहरी छाप छोड़ी। विवेकानंद ने अमेरिका और इंग्लैंड जैसी महाशक्तियों को अध्यात्म का पाठ पढ़ाकर विश्व-गुरु के रूप में अपनी पहचान बनाई और अपने गुरु परमहंस की भविष्यवाणी को सही साबित किया।

     अदीश्वरानंद के मुताबिक विवेकानंद भारत के प्रतिनिधि के रूप में अमेरिका जाने वाले पहले हिन्दू भिक्षु थे। उनका संदेश वेदान्त का सन्देश था। उनका मानना था कि वेदांत ही भविष्य में मानवता का धर्म होगा। धार्मिक सौहार्द्र वेदान्त का सार है। उन्होंने लिखा है कि विवेकानंद ने सभी लोगों को अपने-अपने धर्म की डोर को मजबूती से थामने की शिक्षा दी।

आइये, संन्यासी के उस उद्वोधन को आत्मसात करें।

 

 

 

 

 

Tuesday, 8 September 2020

भूल गये वह याद करेंगे 
बिसर गये संवाद करेंगे 

सुबह सबेरे आज कहे थे
दूपहरी कुछ बात करेंगे ।
विगत वर्ष से सुलग रही ,
पूर्णाहुति की बात करेंगे ।

अश्विन  आओ  यज्ञ करेंगे
पितर ऋणों को मुक्त करेंगे 
आश्वासन  की  वेला बीती
सत्य-सृजन अनुराग भरेंगे ।।

शुभ्र-सुनहली धूप दिखाकर 
दुनिया दूषित डाल हिलाकर 
इमली की शाख़ों पर बादल 
मुख-प्रसन्न खामोश फिरेंगे ।।

उमेश कुमार सिंह 

०७/०९/२०२०

ग़ज़ल

ग़ज़ल
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क्या हुआ उठ गए कुछ नाम चेहरा याद रहेगा ।
दिल से दी जिसने दुआ  चेहरा तेरा याद रहेगा ।।

खुलकर खेल  निज़ाम है तेरा कोई बात नहीं ।
अक्स आँखों में है गहरा चेहरा तेरा याद रहेगा ।।

उड़ी थी छूने आकाश निरद्वन्द नन्हीं सी पतंग।
शौक ने काटे सपने 'वंजारा' रंग तेरा याद रहेगा। 

माना था बजीर-चाल हिफ़ाज़त है पैदल की।
लुट-पिट गये भले हम सेहरा तेरा याद रहेगा ।।

नए हुकूमत की बदरंग पोषाक कब बदलेगी ।
ख़ामोश हूँ सल्तनत पर पहरा तेरा याद रहेगा ।।

उलझे-अटके कितने अरमा उग आयेंगे रेत में। 
'टायगर' था  निज़ाम में वादा तेरा याद रहेगा ।।

-उमेश 
०८/०९/१९