Saturday, 25 April 2020

हे ब्रह्मांड नायक

हे ब्रह्मांड नायक !

मैं मुखर तुम मौन 
मैं प्रकृति तुम स्वत्व 
मैं बोध तुम विस्तार 
मैं शिष्ट तुम विनीत ।।

मेरा अकेलापन
तुम्हारे अजनवीपन
के साथ
पूरा करना चाहता है-
साक्षर से निरक्षर
नारायण से नर 
अवढरदानी  से कृपण  
सुप्त से उदासीन 
मुदित से प्रफुल्लित 
दुरभि-संधि के क्षितिज की
कालजयी-यायावरी यात्रा।।

मेरी यह प्रार्थना 
तुम्हारे नील निर्वसन आकाश
कुशुम की सुरभि को
अनुभूत करें अपनी संवेदना में।।

हे आशुतोष !
मैं करील नहीं
तुम्हारे चमेली की 
वह बास चाहता हूं
जो रंधों में बस
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को 
निमज्जित कर दे  ।।

मैं अनुगामी हूं 
तुम्हारे उस वृत्त का 
कायदे और करीने का 
जो सौरभमय प्रभा से है भरा।। 

हे चन्द्रमौलि  ! 
मैं चाहता हूं
करना आत्मसात
तुम्हारे रश्मियों से सिंचित
कालजयी पुष्पों के मंद स्मृति मुस्कान को 
और पराग की भांति छिपना निर्हैतुकी संपुट में।।

हे त्रिलोकीनाथ  !
होना चाहता हूं,
मसीहा नहीं, 
आदमी से आदमी 
अक्षम पीढ़ी का सक्षम हस्ताक्षर 
जो अपनी अदम्य जिजीविषा से ला सके
तुम्हारे नित्य अनंत विभूति का अमूल्य अलंकार 
अशेष उत्सर्ग भरा चांद-तारों सा चिरंतन उपहार ।

हे ओंकारेश्वर  !
चाहता हूं
तुम्हारी पश्यन्ति वियावान में 
भटकनेवाली बैखरी का सहारा बन 
निद्राविहीन रात्रि की पीड़ा में पहली तरंग संग 
अनिकेतन की मुरेड़ पर ,जीवन का अभय संदेश शाश्वत -आश्वासन भर दे।।

चाहता हूँ मचलना 
अल्हड़ पहाड़ी और नर्मदा के बीच 
बन एक गहरी स्थिर निर्विकार झील 
जहां तुम अहर्निस नौका खेते हुए 
हजारों-हजारों साम्राज्य के उत्थान-पतन 
स्वागत-विदाई का सुनाते हो संदेश ।

हे योगेश्वर  !
प्रदीप्त करना चाहता हूँ 
युग की शंकालु-स्वार्थी राजनीति में -
नि:स्वार्थ क्रांति  का वैचारिक दावानल
जो भस्म कर दें विराट-ब्रह्मांड में धुसरित
पीड़ा के घूमते तामसिक हवि को !!

हे रचयिता !
खोलना चाहता हूं 
संसृति का यथार्थ जो वह रचती है 
न कि जो क्षद्म आलोचक अपने लाल-
रंग-तूलिका-स्वर से समझते और समझाते है ।।

तुम्हारी संसृति के गह्लवर में 
डूब कर आज झकझोरना चाहता हूँ
उस प्रमादी-प्रतिभावान साहित्यकार को 
जिसके नैसर्गिक मेधा- बीज में- 
अतीत की सामर्थ्य आँखें , वर्तमान का तना 
और भविष्य के फूल-पराग-मधुफल भरे हों। 

हे विश्वम्भर !
स्वस्थ की प्रज्ञा-वेदी पर
समिधा-समर्पित कर 
चाहता हूँ देखना बंद आँखों से 
काल की- "अग्निमयसुपथाराये...
....…...................।।"

उमेश कुमार सिंह
२५/०४/२०२०

Friday, 24 April 2020

परदेश

छूटी  सोंधी मांटी परदेशी मजदूर हो गया।
गांव का नन्हकू शहर आ मजबूर हो गया।।

सरहदे केवल अमीरों ने ही नहीं लांघी हैं।
ना-समझ का लांघना-असल कसूर हो गया।। 

अपनों से हाथ फैलाना समझा अपमान था।
परायों में जा गुरूर कितना मजबूर हो गया।।

दाना चुगने घर छोड़ कर उड़ा था परिंदा।
जाहिल-पंजों में तड़पने मजबूर हो गया।।

ऊंजाला लाने शहर निकला था बटोही ।
बाट-दामन में अंधियारा भरपूर हो गया।।

बड़ी हया से घूरा था जिस दरख्त-छांव को। 
हंसी पगडंडी, वही गांव आज दूर हो गया

उमेश कुमार सिंह
२३/०४/२०

Wednesday, 15 April 2020

प्रार्थना

🕉🕉👏👏🕉🕉

काली रात
अदृश्य हाथो से
बुन रही है
मकड़ी-सा मृत्यु-जाल।।

बाराह- मुंह 
श्वेत-श्याम-देशों से 
लाया गया 
पीड़ा-प्रवंचना -पहाड़ का
आत्मघाती-सूत-लाल ।।

शहादती-इबादत ने ! 
चोर मुद्रा में
धर्म-निरपेक्षता का
मुखौटा /बुर्का पहन
अस्थिर-अराजक -खंद में
 देश को दिया डाल ।

भूख-हड़ताल से 
यमराज-भैंस की 
विद्रूप दस्तकारी ने
अमावस की रात
अपने ही घर
बुन दिया ग्रहण जाल ।।

गहन-तमस-गुफाओं में
निर्द्वन्द्व- निर्भय -चेतना का 
अरुण-शुभ्र- प्रकाश भर !!
हो सके मुक्त विश्व
अज्ञात भय- विषाद से
ब्रम्हांड में जय नाद हो
हे भुवनेश्वर ! 
 हे महाकाल!!

प्रो.उमेश कुमार सिंह
(16/04/2020)
भोपाल

Monday, 13 April 2020

प्रणाम प्रेरणा पुरुष को

हे दिव्यात्मा ! 
जब तक मैं तुम्हारे पास 
करता जाने का प्रयत्न
तुम्हारे भव्य मूर्ति पर 
चढ़ चुकी थीं 
अनेक मालाएं।

मैं तो परिचित था
तुम्हारी उस उपेक्षित बस्ती से
जहां संघर्ष था
धनी-निर्धन का
श्रम की अनथक साधना से 
मिट रहा था यह भेद सीढ़ी- दर -सीढ़ी।

किंतु शब्द रहित पदचापों के साथ
न जाने कब तुम्हें छू कर
धन-बली-पशु ने
अस्पृश्य बना
एक माला चढ़ा दिया ?

मैं लगता तुम्हारे गले 
तोड़ता उपेक्षित के कवच को
खोलता अस्पृश्यता की अर्गला को
पाता प्राणों से प्राणों की
महक
न जाने अमूर्त-धूर्त सत्ता ने
कब चढ़ा कर दलित की माला
खड़ी कर दी अभेद्य दीवार!! 

दलित की इस सीढ़ी ने
दिए
तुम्हें अनेकों सर्वनाम
संसद- भवन से लेकर 
हर चौराहे पर 
तुम्हें खड़ा कर दिया अकेले,
उस बस्ती से पृथक
जहां तुम्हारी देही का अस्तित्व था।।

आज उसी दलित के नाम पर
तुम्हारे कंधे का सहारा लेकर
न जाने कितने रंगों ने तुम्हारे बहुरंगी
व्यक्तित्व को बांध दिया नीले रंग की एक स्वार्थी माला में!!

बांध दिया तुम्हारे 
समुद्र के ,
अग्नि के ,
आकाश के,
जल के ,
असीम नीलिमा को।।

स्मरण दिलाता था जो
राम-कृष्ण-बुद्ध के नीले
विराट-आनन की अक्षत-आभा को।।

भ्रमित हो गयीं 
वे उपेक्षित बस्तियां
निर्धन समाज 
आज दलित की आत्मघाती सत्ता-संवेदना में।।

मेरे नायक
तुम कहां हो
मुझे नहीं ज्ञात 
पर विश्वास है समय के साथ
तुम फिर से आकर एक वार
इस दलित के सत्ता कवच को अवश्य उतार फेकोगे!!!

त्राण का अपेक्षित समाज
उस दिन हो सकता है
अपने विशाल सनातनी-हिन्दु समाज में एकात्म ।।

सूख सकती हैं 
तुम्हारे व्यक्तित्व में
थोपी गई
डाली गई
गले में
दलित , अस्पृश्यता
की क्षद्म मालाएं।।

प्रतीक्षा के साथ 
हे महामानव!!
तुम्हें  कोटि-कोटि अभिनन्दन .....


(14/04/2020
भोपाल)

Thursday, 26 March 2020

मानवता को बचाना होगा

देश के नासमझ समझदारी की बातें करने लगे हैं !!

किंतु मेंढक हैं जो मेंढ़की से कूप में ही टर्रा रहें हैं।

तुलसी बाबा ने ठीक ही कहा है, मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहि बिरंचि सम।

वामियों /कम्युनिस्टों  ने मूर्खता की हद तक कैसी गांठ बांध रखी है ? देश का नेतृत्व दुनिया को दिशा दे रहा है और आपको व्यंजना सूझ रही है।
तुलसी ने ठीक ही कहा है -चलय जोंक जल बक्र गति ज्यदपि सलिल समान। !!

 सहृदयों !!? को अपने अहंकारी बौद्धिक चमरासन से उतर कर नायक पर विश्वास करना ही होगा। नान्या: पंथा: ।

अब समझ आ जाना चाहिए कि भारत- देश कोई जड़ वस्तुओं का पिटारा नहीं। वह मनुष्यता की खान है ,जिसे नर रूपी नारायण की सेवा कर बचाना होगा। अन्यथा विश्व नष्ट होगा।

नसमझों,मानवता-घातियो के बारे में आसक्ति और मोह पालने का , उनके बारे में शोक करने का अवसर नहीं है।

जरा श्री कृष्ण की बात को गौर करें-
"द्रोणंच भीष्मंच जयद्रथंच
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् 
मया हस्तांस्त्व जहि मां व्यथिष्ठा
युध्यस्य जेतासि रणे सपत्नान्।।

Tuesday, 24 March 2020

आह्वान

प्रधानमंत्री जी जिस समय  देश भर में तीन हप्ते के लाक डाउन की अपील कर रहे थे, मुझे महाभारत की एक कहानी स्मरण आ रही थी।

 ' महाभारत युद्ध में अपने पिता द्रोणाचार्य के मारे जाने पर अश्वत्थामा क्रोध से भर गया।

उसने  पांडव सेना पर  "नारायण अस्त्र" छोड़ दिया। जिसका कोई भी प्रतिकार नहीं कर सकता था।

नारायणास्र की विशेषता यह थी कि वह ऐसे लोगों पर प्रहार करता था जो अपने को शक्तिशाली तो मानते ही थे,  युद्ध की इच्छा भी करते थे।

उस समय श्रीकृष्ण ने सेना को अपने- अपने  अस्त्र- शस्त्र  छोड़ कर, चुपचाप हाथ जोड़कर खड़े रहने का आदेश दिया और कहा मन में भी युद्ध करने का विचार भी न लाएं। 

नारायण अस्त्र धीरे धीरे अपना समय समाप्त होने पर शांत हो गया। इस तरह पांडव सेना की रक्षा हो गयी।

कथा में नारायणास्त्र का भाव प्राकृतिक शक्तियों से लगाना है। यदि कोरोना को प्राकृतिक आपदा माने तो क्या हम हाथ बांध कर घर के अन्दर बैठे रहें?

उत्तर - हां , के अतिरिक्त कुछ हो नहीं सकता। हाथ जोड़कर खड़े होने का अर्थ है परिस्थिति के सामने अपने नेतृत्व पर पूरा विश्वास रखना। प्रधानमंत्री जी ने कहा, 'नान्या: पंथा'। दूसरा कोई रास्ता नहीं।

कुछ प्रश्न जो मीडिया में उठ रहे हैं या हमारे मन में आ रहे हैं ,उन प्रश्नों के समाधान भी सोशल मीडिया के माध्यम से  समय -समय पर शासन की ओर से आयेंगे। 

ध्यान यह रखना होगा कि हमारी आंखों के सामने कोई भूखा न मरे। अपने को सुरक्षित रखते हुए, शासन के निर्देशों का कठोर पालन करते हुए, हम भूखों की कैसे मदद करें यह विचार करना होगा।

कोरोना अपनी समयावधि पूरी करके शांत हो जाएगा और श्रीकृष्ण  का  उपाय भी व्यर्थ नहीं जाएगा ।

 इस बंद का हमारे देश के सोशल मीडिया -निठल्ले- बुद्धिजीवी विरोध भी करेंगे। किंतु हम  बिना विवाद के अपना कर्तव्य निर्वहन करेंगे।

कल वर्ष प्रतिपदा है। सनातन कालगणना का नववर्ष प्रारंभ । कल प्रतिपदा को रा.स्व.संघ के निर्माता पूज्य डा.हेडगेवार जी का जन्मदिन भी है। 

हम इस दिन इस महापुरुष के प्रति प्रणाम के माध्यम से कृतज्ञता अर्पित करते हैं, जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्र के लिए जीकर विश्व का मार्गदर्शन करने वाला संघ जैसा सांस्कृतिक संगठन दिया। परिणाम हमारे सामने है।  

सनातन भारतीय परम्परा हमें 'अमृतस्य पुत्रा:' का बोध कराती है। हम जीतेंगे। संकल्प लें हम जीतेंगे। देश जीतेंगा। विश्व का कल्याण होगा।

नववर्ष की पुनः बधाई। शुभकामनाएं।
🙏

Tuesday, 17 March 2020

राजनीति और आज

सरसरि सम सब कर हित होई

कल एक कहानी सुनी , जिसमें गंगा से किसी ने पूछा आपके बारे में कहा जाता है कि आप सबका मैल अर्थात् पापियों का पाप धो देती हैं। फिर आप इस मेल को,  इस पाप को कहां ले जाती हैं? 

गंगा ने कहा यह मैल मैं  सागर में डाल देती हूं । पूछने वाला सागर के पास गया , सागर से पूछा,  गंगा जो मैल समुद्र में डाल देती है , उसे आप क्या करते हैं? सागर ने कहा , मैं बादलों को दे देता हूं। वह बादलों के पास गया। बादल ने कहा मैं उन सारे पापों को वर्षा के रूप में उन्हीं सारे पापियों के आंचल  में डाल देता हूं।

मैंने अभी कुछ दिन पहले अपने ब्लॉग में लिखा था कि राजनीति सुरसरि है। हमारे विद्वान ने टिप्पणी की,  विषय सामाजिक है, सामयिक है , गांव में इसकी चर्चा कर रहा हूं , पर मैं नहीं जानता राजनीति सुरसरि कैसे  है? कल जब मैं यह कहानी सुना,  मेरे सामने अनायास उनका प्रश्न अपने समाधान के साथ आ गया।

राजनीति सुरसरि है , इसके अवगाहन के लिए एक से एक बढ़कर पापी तथा एक से एक बढ़कर तपस्वी और कालजयी मनीष आते रहे हैं। 

प्रश्न पाप और पापियों का तथा सुरसरि के तारणहार का नहीं है । प्रश्न है सुरसरि के अवगाह्न करने के बाद राजनीति के भाव -पुरुष कितने हुए और कितने हो पाएंगे?

 राजनीति मैं अर्जन नहीं है । वहां पर विसर्जन है। विसर्जन अपनी कामनाओं का। बलवती बाहुबली बनने का, सत्ता की भूख का।

 इसलिए राजनीति का भाव -पुरुष वही  हो सकता है जिसने संपूर्ण विसर्जन के बाद किसी प्रकार के अर्जन की अपेक्षा न करते हुए समाज का सर्जन करता है। 

कहा जाता है कि बड़ी तपस्या के बाद राजाओं ने राज्य स्थापित किए , उनमें से कई राजाओं ने बड़ी उदारता और सहिष्णुता के साथ , सेवा भाव से राज्य के स्थापना स्वरूप को लोक सापेक्ष बनाने, उस  सुरसरि को पाने अंशुमानी संघर्ष किया।

राजनीति में राजा डूबे अधिक है, तरे कम हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि राजनीति पर सुर -सरिता होने का प्रश्न उठाया जाए। 

इसके लिए समझना होगा साहित्य का प्रसिद्ध ग्रंथ गीत- गोविंद।  सामान्यतः उसे  घोर श्रृंगार का काव्य कहा जाता है , जबकि वस्तुस्थिति यह है कि वह गहरे अध्यात्म का काव्य है। राजनीति भी गहरी सेवा का कार्य है, सत्ता सुख भोग का नहीं।

राजनीति को ठीक से समझना है तो पंडित विद्यानिवास मिश्र के दो निबंध पढ़ने चाहिए।  पहला है, ' बसंत का नाम ही उत्कंठा है ', और दूसरा है 'बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं'।

यह दोनों निबंध  केवल विद्यानिवास जी के मन:स्थितियों का चित्रण नहीं करते बल्कि समूचे समाज के अंतरण को हमारे सामने प्रतिबिंबित करते हैं।

 वे लिखते हैं , " बसंत आ गया' क्योंकि मैं उत्कंठित हो उठा। यकायक निरुद्देश अनमना हो उठना, ऐसे अनुभव करना कि कोई बुला रहा है, कौन, यह भी पता नहीं; पर जो बुला रहा है, बहुत अपना है। वह कहां बुला रहा है, अभी पता नहीं। स्मृतियों के गलियारे में बुला रहा है, जहां कुछ दिखता है, कुछ नहीं दिखता। बस, सिलहटी आकृति  दिखती है। पता नहीं किन्हीं अमराइयों में बुला रहा है, जहां साथ- साथ दो दिशाओं से वसंती तन-  मन आए और खो गए, जो जैसा आया वैसा नहीं रहा; बड़ा दुर्निवार आमंत्रण है वसंत का।"

जरा इन शब्दों को गुने- 'स्मृति के गलियारे' और 'जो जैसा आया वैसा नहीं रहा'!

अब जरा विचार करें हजारों साल की परकीय शासन व्यवस्था के बाद हमने स्वतंत्रता प्राप्त की। केसरिया बाना सजा वीर का श्रृंगार किया। लगा, हमारे त्रेता के राम और द्वापर के कृष्ण राष्ट्र-पुरुष के रूप में, भाव -पुरुष के रूप में हमें पुनः प्राप्त हो गये हैं । 

परंतु देखते - देखते 70 / 72 वर्षों में हमने अपने राजनीति के मूल भाव को खोया है। वे मूल भाव थे ,हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में 'मनुष्य की पीछे की आंख ' अर्थात् अपने अतीत के स्वाभिमान की स्मृति और कबीर का 'जस की तस चदरिया' रख देने की संकल्प-वृत्ति। 

विषय को गांधी के शब्दों में भी समझें,  हिंद स्वराज में लिखते हैं " ऐसा कहने में शायद ढिठाई का बोध  हो, लेकिन मुझे तो पक्का विश्वास है कि इसमें जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खींची है, वैसा स्वराज पाने की मेरी निजी कोशिश जरूर चल रही है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आज मेरी सामूहिक प्रवृत्ति का ध्येय तो हिंदुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक पार्लियामेंट्री ढंग का स्वराज पाना है।"

आज की तस्वीर को देखकर क्या हम गांधी के उसी पार्लियामेंट्री स्वराज की तस्वीर देख रहे हैं और क्या हम अपने भाव पुरुष को आत्मसात कर पा रहे हैं ?  एक चिंतन का विषय है।

हमारे एक मित्र बड़े भावुक हो कहने लगे , भाई! राजनीति को क्या हो गया। विधायक इधर से उधर (मैं यहां जिन शब्दों को उन्होंने ने कहा, नहीं लिख रहा हूं,पर आप समझ गये होंगे)। 

मैने कहा, बंधु ! राजनीति में जब नियामक तत्व नीति के विधायक तत्वों को ओझल करने लगते हैं तब सामान्य रूप से पीढ़ियों से आ रही परंपरा, दर्शन , अध्यात्म की हमारी दृष्टि राजनीति से ओझल होने लगती हैं। संवेदना मरती है , मनुष्यता तड़फड़ाती है। 

संभवत हम उसी कालखंड से गुजर रहे हैं। एक विद्वान की टिप्पणी और भी बड़ी महत्वपूर्ण थी जिसका उल्लेख यहां कर रहा हूं ।वे लिखते हैं , राजनीति भले हीं हमारा भविष्य तय करती हो परंतु मनुष्यता को भुलवाती चली जाती है , इसलिए आज आवश्यक है ज्यादा से ज्यादा मनुष्यता के निर्माण की जो राम, कृष्ण से लेकर बुद्ध और गांधी तक चाहते थे।
शेष पाठकों पर। 
राजनीति राखत सुरत्राता।