Saturday, 14 March 2020

रामधारी सिंह ’दिनकर’ : जीवन संघर्ष-पत्रों के बहाने


                रामधारी सिंह दिनकर : जीवन संघर्ष-पत्रों के बहाने
                                                              
रामधारी सिंह दिनकरका जीवन एक कवि का जीवन है। वे राष्ट्रीय अस्मिता के लिए संघर्षशील हैं।

 किसी भी रचनाकार की ओजपूर्ण रचना, उसके बड़े-बड़े अर्जित अलंकरण, उसकी प्रतिष्ठा को देखकर हम कभी भी उसके अंतरंगी नहीं बन पाते। वह हमारा बड़ा आदर्श बन कर खड़ा हो जाता है। कभी वह मसीहा दिखता है तो कभी हम उसे युगपुरुष भी घोषित कर देते हैं। इसमें कोई हर्ज भी नहीं।

 किन्तु आवश्यकता यह समझने कि है कि क्या वह हमारे ही समान एक साधारण मानव मन का स्वामी था ? क्या वह महान रचनाओं के बीच समाज और परिवार के बीच संघर्ष करता रहा ? क्या वह जीवन से सदा उत्साहित ही रहा ? क्या उसके जीवन में कभी निराशा के क्षण भी थे ? ऐसे अनेक प्रश्न हमारे मन में दिनकरजी को पढ़ते हुए खड़े हुए।


पूर्वजों ने कहा है - ’’ मोल करो तलवार की पड़ी रहन दो म्यान’’, फिर हम इतने छिद्रान्वेषी क्यों होना चाहते हैं ?

 ’दिनकरजी के रचनाकार जीवन को उलटते-पलटते संयोगवश उनके साहित्य की निधि उनके द्वारा लिखे गये पत्र हाथ लगे। उनके पढ़ने के बाद मुझे लगा, यह बड़ा महत्वपूर्ण कार्य होगा कि हम पाठकों के सामने दिनकर जी का यह पक्ष भी लाएं, जिससे न केवल रचनाकार को सम्पूर्णता से देखने में सहायता मिले, बल्कि मनुष्य का जीवन व्यक्ति से लेकर समष्टि तक कैसे तैयार होता है, समझने में मदद भी मिलेगी। हमारे चरित्र बल को भी उर्जा मिलेगी और नई पीढ़ी को विषय भी।


सामान्यतः दिनकर जी को तीन तरह से समझा जा सकता है। एक- जिसमें दिनकर जी का सामान्य किन्तु आवश्यक जीवन परिचय। दूसरा- उनकी रचनाओं की जानकारी और उनकी कुछ चर्चित पंक्तियां और तीसरा भाग उनके महत्वपूर्ण पत्र हैं। 

अपने परिचय में दिनकरजी लिखते हैं-
सुनूँ क्यों सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युगधर्म का हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का, प्रलय गांडीव की टंकार हूँ मैं..
दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा की, दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू जग को संभाले, व प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं।।


एक चैलेन्ज दिखता है। सामान्य नद, नालों से नहीं सीधा समुद्र से, जिसकी अनन्तता को लघुतर करते हुए दिनकरयुगधर्म की हुंकार को बड़ा मानते हैं। 

जहां एक ओर प्राकृतिक शक्तियों से अपने को जोड़ते है, वहीं तत्काल युग के गांडीव टंकार को अपने साथ कंपित करते हैं।पर यह परिचय शायद अधूरा रह जाता यदि कवि दलित, उपेक्षित की पीड़ा का साथी अपने को बताने में चूक जाता। अपने अन्दर की प्रलय को भी बताने से नहीं रोक पाते।


यह बोल हैं उस महान हस्ताक्षर रामधारी सिंह दिनकरके जिसका जन्म २३ सितंबर, १९०८ को सिमरिया, मुंगेर, बिहार में हुआ था। रामधारी सिंह का उपनाम दिनकरथा। पिता श्री रवि सिंह एक साधारण किसान थे, तथा इनकी माता मनरूप देवी, विद्यालयीन शिक्षा से वंचित व सामान्य गृहणी होने के बावजूद, जीवट व गंभीर साहसिक महिला थीं। यही दम्पति हमें देता है , एक कालजयी कवि और निबंधकार श्री रामधारी सिंह दिनकरको।


दिनकर जी के पास न केवल इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की उपधियां थी बल्कि वे इन तीनों में एक साथ जीते भी थे। और उनकी अभिव्यक्ति में मां शारदा जिसे वे बार-बार स्मरण करते है कि कृपा भी थी कि वे अपनी बात एक साथ संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू में रख सकते थे। 

दिनकरस्नातक उपाधि के साथ शिक्षक हो गये। बाद में १९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। १९५० से १९५२ तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष तथा बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया। उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने। उनके राजनीतिक जीवन से सभी परिचित ही हैं।

अत: यहां दिनकर जी के जीवन परिचय की सामान्य भूमि में उतरने का कोई कारण नहीं। यहां उनके उन पक्षों को ही उजागर कर रहा हूँ जिनके साथ उनके पत्रों को समझने में सहायता मिलेगी।


 दिनकर में क्षत्रिय का तेज है, तो ब्राह्मण का सात्विक अहं भी। परशुराम की गर्जना है तो कालिदास की कलात्मकता भी। उनकी कुछ पंक्तियों से उनके व्यक्तित्व को समझने का प्रयत्न करें-

रे रोक युधिष्ठर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर।
             पर फिरा हमें गांडीव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर ’’।। (हिमालय से)

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दन्तहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।। ’’ (कुरुक्षेत्र से)

पत्थर सी हों मांसपेशियाँ, लौहदंड भुजबल अभय।
     नस-नस में हो लहर आग की, तभी जवानी पाती जय।। ’’ (रश्मिरथी से)

’’हटो व्योम के मेघ पंथ से, स्वर्ग लूटने हम जाते हैं,
दूध-दूध ओ वत्स तुम्हारा, दूध खोजने हम जाते है।’’

’’सच पूछो तो सर में ही, बसती है दीप्ति विनय की,
   सन्धि वचन संपूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की।’’

’’सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।।’’

’’दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे  दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो  अपनी  धरती तमाम।।  (रश्मिरथी,तृतीय सर्ग, भाग 3)

दिनकरस्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गये।

 वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। हमने ऊपर की पंक्तियों में देखा कि एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति भी यहां देख सकते है- 

दृग बंद हों, तब तुम सुनहले स्वप्न बन आया करो।
अमितांशु निंद्रित प्राण में, प्रसरित करो अपनी प्रभा,
प्रियतम कहूँ मैं और क्या ?

प्रकृति चित्रण में दिनकर आलंकारिक हो उठते हैं और कभी रहस्यमयता और वैश्विक एकात्मता को भी अपने अंदाज में शब्द देते हैं-  
             
किरणों का दिल चीर देख सबमें दिनमणि की लाली रे।
चाहे  जितने फूल खिलें,  पर एक  सभी का माली रे।।

इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्रऔर उर्वशीनामक कृतियों में मिलता है। 

उनकी कविता में आत्मविश्वास, आशावाद, संघर्ष, राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति आदि का ओजपूर्ण विवरण मिलता है। जनमानस में नवीन चेतना उत्पन्न करना ही उनकी कविताओं का प्रमुख उद्देश्य रहा है। उनकी कविताओं की विशेषता यथार्थ कथन, दृढतापूर्वक अपनी आस्था की स्थापना तथा उन बातों को चुनौती देना है, जिन्हें वे राष्ट्र के लिये उपयोगी नहीं समझते थे। उनका आशावादिता का दृष्टिकोण -

वह प्रदीप जो दीख रहा है, झिलमिल दूर नहीं है।
थक कर बैठ गये क्या भाई !   मंजिल दूर नहीं।।

दिनकरजी भारत की अंधकार में खोई आत्मा को ज्योति प्रदान करने के लिये कलम की वह लड़ाई लड़ने को उद्यत थे, जिससे सारे राष्ट्र को जागना था। उनकी रचनाओं के सामाजिक सरोकारों से आन्दोलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। जातिवाद का विरोध करते हुए वे लिखते हैं-

जाति जाति का शोर मचाते केवल कायर क्रूर।
पाते  हैं  सम्मान  तपोबल  से धरती पर शूर...।।

 दूसरी ओर उनका आक्रोश सामाजिक विषमता दूर करने के लिये पृष्ठभूमि भी तैयार करता है-

श्वानों को मिलता दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं।
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर जाड़ों में रात बिताते हैं।।
युवती के लज्जा वसन बेच, जब व्याज चुकाये जाते हैं।
मालिक जब तेल-फुलेलों पर, पानी सा द्रव्य बहाते हैं।।
पापी  महलों का अहंकार, देता  तुझको तब आमंत्रण..।।

दिनकर  विवशता को भी प्रस्तुत करने से नहीं चूकते -

जहाँ  बोलना पाप  वहाँ गीतों में  क्या समझाऊं मैं ?

राष्ट्रीय गौरव पर आहत हो कर दिनकर, उसे अतीत में तलाशते भी दीख पड़ते हैं-

तू पूछ अवध से राम कहाँ  वृंदा बोलो घनश्याम कहाँ।
ओ मगध कहाँ मेरे अशोक वह चंद्रगुप्त बलधाम कहाँ ?

दिनकर जी का अपनी ही शैली में कहा गया एक व्यंग्य देखिये-

भर पानी से बुझाने  आग गाँव की।
चल पड़ी टोलियाँ अमीर उमराव की..।।

उर्वशीको छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है। भूषणके बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि दिनकरजी गैर-हिंदीभाषियों के बीच हिन्दी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे।

 जब दिनकर जी को ज्ञानपीठ से पुरस्कृत किया गया तब हरिवंश राय बच्चन ने कहा कि दिनकरजी को एक नहीं, बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिन्दी-सेवा के लिये अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिये। 


       दिनकर जी ने अनेक पत्र लिखें हैं, किन्तु यहां सन् 1936 से 1972 के बीच लिखे उन कुछ महत्वपूर्ण पत्रों को दिया जा रहा है जो उन्होंने बनारसीदास चतुर्वेदी, आचार्य कपिल, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, रामसागर चौधरी, चन्द्रदेव सिंह, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, और राजेश्वर  सिंह को जो पत्र लिखें हैं।

 पत्रों पर मैं कोई टिप्पणी लिखकर आपके स्वाद को खराब नहीं करना चाहता।  ये पत्र  ऐसे अनमोल शब्द-रत्न हैं जो स्वतः आपको पढ़ते हुए दर्शन, धर्म, अध्यात्म के ऐसे क्षेत्र में ले जाते हैं जो आज की परिस्थिति से आप को जोड़ते हुए आंख बन्द करने को मजबूर कर देंगे।  


 1. बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखा पत्र -
पो.ऑ. लालगंज
मुजफ्फरपुर
६-१-३६
श्रद्धेय चतुर्वेदी जी,
प्रणाम।
आपका ५-१-३६ का कृपा-पत्र आज संध्या को मिला। इस पत्र ने मुझे बहुत कुछ उत्साह दिया है। अपने मित्रों में जरा इमोशनल कहलाता हूँ। इसीलिए लोग मुझे ऐसी बात कहने या ऐसी चीजें दिखाने से डरते हैं जिससे मुझे दुःख होने की संभावना हो। अभी हाल ही, मैं शिवपूजन जी से मिला था। तब तक साप्ताहिक विश्वमित्र में निर्झरिणी की निन्दा छप चुकी थी। शिवपूजन जी ने मुझे वह लेख देखने नहीं दिया। कहने लगे जब लोग तुम्हारी निन्दा खुलकर करने लगें तब तुम समझो कि तुम्हारी लेखनी सफल हुई। अस्तु।

चौदह करोड़ लोगों के द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि लोग किसी व्यक्ति-विशेष की रचना पर साधारणतः खास तौर से आकृष्ट नहीं हो सकते। इस विशाल समुद्र में किसी इंडिविजुअल की कृति एक तिनके से बड़ी नहीं। फिर इसे तो मैं अपना सौभाग्य ही समझता हूँ कि भाव, कुभाव, अनख आलस हूँ’ ’रेणुकाका नाम दस भले लोगों के मुँह पर आ जाता है।

आप विश्वास रखें, आप पूज्यों की कृपा से मुझमें इतनी ताकत जरूर है कि अखबारों में रोज निकलने वाली पंक्तियाँ मुझे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकतीं। कोई प्रशंसा ऐसी नहीं जो मुझे याद रहे, कोई निन्दा ऐसी नहीं जो मुझे उभार दे। नास्ति का परिणाम नास्ति है। कुछ नहीं से कुछ की उत्पत्ति नहीं हो सकती। अगर आज कोई सत्ता है तो वह किसी के मिटाये से नहीं मिटेगी। पदार्थ का अस्तित्व नहीं है तो वह किसी के पैदा करने से पैदा नहीं हो सकता। कीट्स ने एक बार एक मित्र को लिखा था-'If all my poems were burnt the next day they were written and no eye shine upon them, yet I would go on writing and writing.'

मैं रेणुका के दोषों को भलीभाँति जानता हूँ। उसमें कलाविदों को पद-पद पर अनुभवहीनता, इमैच्युरिटी और कहीं-कहीं भाषा सम्बन्धी कमजोरियाँ मिलेंगी। कीट्स के ही शब्दों में- It is a foolish attempt, rather than a deed accomplished.

मैं जो कुछ चाहता हूँ, जो कुछ सोचता हूँ उसे ठीक मनचाहे रूप में अब तक उतार नहीं सका हूँ। इस चेष्टा का एक अस्पष्ट रूप मेरी आँखों के सामने बराबर टँगा रहता है। All the same, no one should be justified in passing a remark of insincerity regarding my feelings. I don't believe in the saying that Renuka contains lines written forcibly- Although at times, my poems have been deprived of the support of my character, I know that they have always come out in spontaneity. More or less, every poem has been a direct enlightenment in my life. 

 रेणुका को लेकर धूम मचा करे लेकिन, मैं अभी तक निश्चित रूप से यह भी नहीं समझ पाया हूँ कि मेरे राजनैतिक कैरियर  का श्रीगणेश हो गया। भगवान मुझ पर कृपा करे कि मैं अभी कुछ दिनों तक और भी सरस्वती के चरणोदक से अपनी मूर्खता धोता रहूँ। हिंन्दुओं को पुनर्जन्म का भी भरोसा रहता है।

बच्चन को मैं एक पत्र लिख चुका हूँ। उसने भी एक पत्र लिखा है। अब रेगुलर करेस्पोंडेंस शुरू करता हूँ। योगी में अवश्य लिखूँगा। लेकिन, बच्चन अपनी प्याला, बुलबुल आदि कविताएँ भेज दे तो मजमून कुछ अधिक दिलचस्प होगा।


मनोरंजन जी से पत्र-व्यवहार करके मैं अपने को सौभाग्यशाली समझूँगा। इधर मुझे ऐसा जान पड़ता है कि शुद्ध भाषा लिखने की ट्रेनिंग मुझे और लेनी चाहिए। भरसक कोशिश कर रहा हूँ। कविताएँ शिवपूजन जी से दिखाकर छपाया करूँगा। आप इस विचार को कैसा समझते हैं ? मेरे विचार से शिवपूजन जी की जैसी चार्टर्ड हिन्दी लिखने वाला विरला ही होगा।


आशा है आप प्रसन्न हैं। अगर मैंने छुट्टी नहीं ली तो दो महीनों तक यहाँ रहने की बात है।
आपका
दिनकर
आवश्यक-
जनवरी के अन्त में मेरे घर में कुछ यज्ञ-प्रयोजन होने वाला है। अतएव मैं भी मुँगेर में रह सकूँगा कि नहीं यह अनिश्चित है। आपके वसन्तोत्सव का क्या हुआ ? मुझे तो मार्च के पहले छुट्टी प्रायः मिल ही नहीं सकती। उसके लगभग प्रोग्राम रखें तो मैं अभी से छुट्टी की कोशिशें करूँ। दिसम्बर का वि. भा. अब तक नहीं मिला है। भारत और अभ्युदय नहीं देखा है। न देखने की इच्छा है। विश्वमित्र वाले दोनों लेख देख चुका हूँ।

विश्वासवाला आपका लेख सुन्दर है। यह विचार कुछ अनन्त की ओर जाने वालों को अप्रासंगिक भले ही लगे लेकिन इसके बिना कवियों का भी उद्धार नहीं है। आज यह राजवाटिका छोड़, चलो कवि वनफूलों की ओर। एमर्सन और क्रोपटकिन को छोड़ कर आप किन्हीं दो तीन अन्य लेखकों और उनकी सुन्दर कृतियों के नाम भेज दें जो आपको पसन्द हों।


आपके जीवन में वसन्त आ रहा है- इस ४४ वें वर्षं में। भगवान करें यह कभी आपको छोड़े नहीं। आप फाल से डरते हैं ? You may have a fall, but a fall on the knee which may end in prayer.
दिनकर

2. आचार्य कपिल के नाम
पटना
प्रिय कपिल जी,
आपका पत्र मिला। प्राचीका अंक भी यथासमय आ गया था। प्राची के विषय में क्या कहूँ ? मुझे तनिक भी आशा नहीं थी कि मुँगेर से आप इतनी अच्छी सामग्री प्रस्तुत कर सकेंगे। प्राचीमें आपने जिस सुरुचि का परिचय दिया है उससे मुझे सात्विक आनन्द हुआ। अब मैं आग्रह करूँगा कि इसका दिनों-दिन विकास कीजिए।


एक दो बातें और हैं जिनकी ओर निर्देश कर देना उचित समझता हूँ। आवरण पर से आप मिट्टी के छोटे माधो को तो हटा ही दें। भीतर संकलन और संपादन में जो गांभीर्य है उसके अनुरूप ऊपर का आवरण सादा ही रहना चाहिए अथवा हलकी रेखाओं में कोई छोटा स्केच रहे तो ठीक है। 

आपका उद्देश्य कदाचित यह है कि शिक्षण-संस्थाओं में जो प्रश्न और समस्याएँ हैं, डटकर उन्हीं पर प्रकाश डाला जाय। यह एक उपयोगी काम है। मगर, स्टैंडर्ड को जरा ऊपर ले जाइये तथा इस प्रकार की समस्याओं पर भी लेख लिखवाइये जैसे -
१. छायावाद का जन्म कब हुआ तथा उसके आदि कवि कौन हैं ?
२. नई कविता हिन्दी की परम्पारा में आई है अथवा आकस्मिक रूप से ?
३. हिन्दी-गद्य के क्षेत्र में उस नेतृत्व को प्रधानता मिलनी चाहिए जो बालकृष्ण भट्ट, बालमुकुन्द गुप्त तथा गुलेरी जी के द्वारा दिया गया अथवा उसे जो रामचन्द्र शुक्ल एवं प्रसाद जी की देन है ?
४. यह बात कहाँ तक ठीक है कि उर्दू में से फारसी-अरबी शब्दों को हटा कर हिन्दी बना ली गई है ?
५. रसवादी आलोचना पद्धति में क्या संशोधन किया जाय कि वह आधुनिक साहित्य की व्याख्या में सफल हो ?
६. रीतिकालीन साहित्य का मूल्यांकन नई समीक्षा की कसौटी पर।
७. भाषा सम्बनन्धी दुष्प्रयोगों पर रोक लगाने के लिए आन्दोलन।


ये कुछ मोटे विषय हैं जो याद आ रहे हैं। इनके समानान्तर और भी समस्याएँ होंगी। सोचने पर आप खुद एक अम्बार लगा दीजियेगा। मैं तो १२ मई तक कुछ नहीं भेजूँगा। हाँ, उसके बाद कुछ न कुछ अवश्य  भेजूँगा, खातिर जमा रखिये। आपके और काम भी इसी छुट्टी में होंगे। छुट्टियों में आप कहाँ रहेंगे ?


आगामी ३ मई को हमारे यहाँ परिषद का वार्षिकोत्सव है। हजारी प्रसाद जी और द्विज जी आ रहे हैं। निबन्ध-प्रतियोगिता और वाद-विवाद प्रतियोगिता २ मई को है। आपके यहाँ से भी निबन्धं और वक्ता आने चाहिए। निबन्ध का विषय है, ’हिन्दी  में नई समीक्षा का जन्म और विकास’, वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय है, ‘State Vs Civil liberty या ऐसा ही और कुछ। शेष कुशल है।
आपका
दिनकर

3. आचार्य कपिल के नाम -2

प्रिय कपिल जी,
हम लोगों के परम प्रिय विद्वान श्री कामेश्वर शर्मा (राष्ट्रवाणी) का एक लेख कहीं निकला है जिसकी कतरन आप की सूचना के लिए भेज रहा हूँ। जरा गौर से देख जाइये।


कामेश्वर फूलें, फलें और बढ़ें, यह मेरी कामना पहले भी थी और अब भी है। उन्हें मैं यह भी छूट देता हूँ कि वे दिनकर काव्य के विरोधी के रूप में अपना विकास करें और उन्हें बुरा न लगे तो मेरे साथ एक थाली में बैठकर भोजन भी करें। मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी। किन्तु उन्हें और प्रत्येक लेखक को चाहिये कि वस्तुस्थिति को देखकर बोले और लिखे जिससे किसी की पद मर्यादा को अनुचित जर्ब नहीं पहुँचे। पटने में एक साहित्यिक षड्यंत्र चल रहा है जिसका केंन्द्र यह कल्पित बात है कि दिनकर बिहार के सभी साहित्यिकों का बाधक है और कुछ लोगों के खिलाफ तो उसकी फौज खड़ी रहती है। 

जब उमा मुझ पर आक्रमण करें, बेनीपुरी मुझ पर चोट करें, प्रदीप मेरे विरुद्ध लेख छापे और कामेश्वर मेरे विरुद्ध लिखें तब लोग न जाने किसे मेरी फौज का आदमी समझते हैं ? मुझे लगता है, कामेश्वर जी इस भ्रम में हैं कि दिनकर का विरोध करने से निष्पक्ष आलोचक के रूप में वे पूजे जायेंगे। सो इसे तो मैं घोर भ्रम समझता हूँ और जिस निर्णय पर मैं १५ वर्षों के बाद पहुँचा हूँ उस पर वे भी कभी न कभी आयेंगे ही। प्रयत्नपूर्वक उनसे मिलकर उन्हें आप समझा देंगे कि प्रभात जी महाराज के साथ एक साँस में वे मेरा नाम न लें। कुरुक्षेत्र के विरुद्ध वे चाहें तो एक लेखमाला आरम्भ कर दें जिसके लिए स्थान मैं राष्ट्रवाणी में ही दिलवा दूँगा। मगर, ईश्वर के नाम पर वे भाषा में शिष्टंता लायें और कोई ऐसा काम न करें जिससे उन्हें बाद को चलकर लज्जित होना पड़े।


उन्हें मैंने आत्मी्य समझा है, इसीलिए ये बातें लिख रहा हूँ। प्रेमी भी परस्पर एक दूसरे की आलोचना कर सकते हैं, किन्तु, ऐसी भाषा में नहीं जिससे जग हँसाई हो। मैंने जीवन-भर में किसी आलोचक के लिए कोई पत्र नहीं लिखा था। यह पहला पत्र है। साहित्य में विचार स्वातंत्र्य रहना चाहिए, मगर, गाली-गलौज या मुँह-चिढ़ाना विचार स्वातंत्र्य नहीं है। खैर, कामेश्वर अभी-अभी अंडा तोड़ कर निकला है इसलिए बहकना तो स्वाभाविक है। और जब सभी लोग अपने विकास के लिए दिनकर को लतियाना आवश्यक मानते हैं तो वही क्यों बाज आए ? आखिर, पटने के साहित्यिकों में निर्भीक कहलाने का गौरव तो उसे मिलेगा ही। शेष कुशल है।


आलोचक महाराज इन दिनों घर पर हैं। वे सम्भवतः ३ या ४ को मुँगेर आयेंगे और ५ फरवरी को पटना।
आपका
दिनकर
मुजफ्फरपुर
२५.४.५१


4. लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम
पटना
९-११-५८
मान्यवर जयप्रकाश जी!
प्रणाम।
मानवीय गुणों पर जोर देते हुए आपने अभी हाल में जो बयान दिया है उसकी कतरन मैंने पास रख ली है और उसे कई बार पढ़ गया हूँ। अजब संयोग की बात है कि जब आपका बयान निकला, मैं धर्म और विज्ञान पर एक निबन्ध लिख रहा था जो ४० पेज तक गया है, मगर, अभी कुछ अधूरा है।

 बयान पढ़कर मुझे लगा कि आप जिस चीज को इतनी अच्छी भाषा में और इतनी सुस्पष्टता के साथ कह रहे हैं, मेरी असमर्थ भाषा भी उसी के आस-पास चक्कर काट रही है। इस बयान पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया है, यह भी मुझे मालूम है। लेकिन, हर बड़े काम की राह में लोक-मत कुछ बाधक बनकर आता है और उसकी उपेक्षा किए बिना ये काम किए नहीं जा सकते। 

वर्तमान सभ्यता अनेक रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ी है, लेकिन, मुझे अब पूरा सन्देह हो रहा है कि वह खुद एक प्रकार की रूढ़ि में जा फँसी है, जिसका उपयुक्त भाषा के अभाव में, मैं बुद्धि की रूढ़िनाम देता हूँ। अगर मनुष्य को विकसित होना है तो उसे इस रूढ़ि से भी निकलना होगा।

बर्ट्रेण्डर रसल ने लिखा है कि आदमी में तीन प्रवृत्तियाँ होती हैं, instinct to live, instinct to think and instinct to feel. 

ये मैं अपनी भाषा में रख रहा हूँ। Feel शायद उसने नहीं कहा है। इस प्रवृत्ति का नाम उसने spirit की प्रवृत्ति दिया है। इन तीनों में समन्वय हुए बिना मनुष्य का दोषहीन विकास नहीं हो सकता। रसल और हक्सले के अलाव, मैंने । Aleis Carel dh Man: The Unknown नामक किताब में भी यही देखा कि वैज्ञानिक सभ्यता गलत दिशा की ओर जा रही है और मैं मान गया हूँ कि करेल का कहना बिल्कुल ठीक है। 

एक धारा है जो सबको बहाए लिए जा रही है। जरूरत है उन पुरुषों की जो इस बहाव में बहने से इनकार कर दें। आपने अपना पाँव जमा लेने का इरादा किया है, इसलिए, मैं आपका सादर अभिनन्दन करता हूँ। युद्ध-काव्यम के विषय में भी आपका सुझाव बेनीपुरी से मिला ही होगा।
आपका
दिनकर


5. रामसागर चौधरी के नाम-
११, केनिंग लेन, नई दिल्ली
४-३-६१
प्रिय श्री रामसागर चौधरी,
सच ही, मैं आपको नहीं जानता तब भी आपका २८-२-६१ का पत्र पढ़ दुःखी हुआ। 

यह लज्जा की बात है कि बिहार के युवक इतनी छोटी बातों में आ पड़े। मैं जातिवादी नहीं हूँ। तब भी अनेक बार लोगों ने मेरे विरुद्ध प्रचार किया है और जैसा आपने लिखा है, वे अब ऐसी गन्दी बातें बोलते हैं। लेकिन, तब मैं जातिवादी नहीं बनूँगा। 

अगर आप भूमिहार-वंश में जनमे या मैं जनमा तो यह काम हमने अपनी इच्छा से तो नहीं किया, उसी प्रकार जो लोग दूसरी जातियों में जनमते हैं, उनका भी अपने जन्म पर अधिकार नहीं होता। हमारे वश की बात यह है कि भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें। अपनी जाति का आदमी अच्छा और दूसरी जाति का बुरा होता है, यह सिद्धान्त मान कर चलनेवाला आदमी छोटे मिजाज का आदमी होता है। आप-लोग यानी सभी जातियों के नौजवान-इस छोटेपन से बचिये। 

प्रजातन्त्र का नियम है कि जो नेता चुना जाता है, सभी वर्गों के लोग उससे न्याय की आशा करते हैं। कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूल कर गुणवान के आदर में एक हों। याद रखिये कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता। वह बहुतों के समर्थन से चलता है। यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजनिक जीवन गल जायेगा।


आप सोचेंगे, यह उपदेश मैं आपको क्यों दे रहा हूँ ? किन्तु, आपने पूछा, इसलिए, आप ही को लिख भी रहा हूँ। आज आप पीड़ित हैं, अपने को आप दुःखी समझते हैं। आपके विरुद्ध जिनका द्वेष उभरा है, कल उनका क्या भाव था ? शायद अपने को वे उपेक्षित अनुभव करते थे। इसलिए, स्वाभाविक है कि उनका असन्तोष व्यक्त हो रहा है। और उपाय भी क्या था? इसलिए, आपको धीरज रखने को कहता हूँ, उच्चता पर आरूढ़ रहने को कहता हूँ ।


जाति नाम का शोषण करके मौज मारनेवाले चन्द लोग, जो कुछ करते हैं उसकी कुत्सा उस जाति-भर को झेलनी पड़ती है, यह आप-लोग समझ रहे हैं ? यही शिक्षा कल उन्हें भी मिलेगी जो आप को केवल इसलिए डस रहे हैं कि आप भूमिहार हैं। तो इससे निकलने का मार्ग कौन-सा है ? केवल एक मार्ग है। नियमपूर्वक अपनी जाति के लोगों को श्रेष्ठ और अन्य जातिवालों को अधम मत समझिये। और यह धर्म उस समय तो और भी चमक सकता है जब आदमी आँच की कसौटी पर हो।
आपका
दिनकर


6. चन्द्रदेव सिंह के नाम -
आर्यकुमार रोड, पटना-४
१३-४-६३

प्रियवर,
कविता मिली। पढ़कर बड़ा मजा आया। मुझे आपने जो गालियाँ दी होंगी, उन्हें मैंने नहीं देखा, न आज से पहले यह बात मुझे मालूम थी। लेकिन अच्छा हुआ कि आपने स्वयं अपना मार्जन कर लिया। यह शुद्ध हदय का लक्षण है, यह इस बात का संकेत है कि आप वैयक्तिक मालिन्य से ऊपर रहना चाहते हैं। 

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चरित्र ही प्रधान है।
परशुराम की प्रतीक्षासे दो प्रकार के लोग बहुत नाराज हैं। एक वे जो यह समझते हैं कि चीनी-आक्रमण के विरुद्ध जगनेवाला क्रोध जल्दी शांत हो जाए, नहीं तो यह क्रोध देश की प्रगतिशील प्रवृत्तियों के विरुद्ध पड़ेगा। दूसरे वे लोग जो यह समझते हैं कि युद्ध का जवाब युद्ध से न देने की भावना यदि बढ़ी तो वह गांधी-धर्म के प्रतिकूल जायगी।


मेरे जानते दोनों-के-दोनों गलती पर हैं। भारत साम्यवादी हो जाए तब भी चीन से उसकी खटपट चलती रहेगी जैसे रूस के साथ चल रही है। 

और गांधी-धर्म को भी मैं एक दूसरे रूप में समझता हूँ। गांधीजी कहते थे, कायरता सबसे बुरी चीज है, उनके बहुत-से शिष्य ऐसे हैं, जो केवल यह मानते हैं कि अहिंसा सबसे अच्छी चीज है। लेकिन जो कायर भी नहीं है और अहिंसक भी नहीं, वह क्या करे ? इस सवाल का जवाब गांधी जी के पास था, लेकिन सर्वोदयवालों के पास नहीं है। इसीलिए उनमें से कुछ लोग मुझे हिंसावादी मानकर मेरी निन्दा करते हैं।


पिछले १५ वर्षों में देश कहाँ-से-कहाँ पहुँचा है, यह बात मेरे प्रसंग में भी देखी जा सकती है। १९४६ में कुरुक्षेत्रनिकला था। उसी में यह पंक्ति थी जिनको सहारा नहीं भुज के प्रताप का है, बैठते भरोसा किए वे ही आत्मबल का।

लेकिन कुरुक्षेत्र पर द्वेष के उतने तीखे बाण नहीं बरसे थे जितने परशुराम पर बरस रहे हैं। २७ साल की अहिंसा-साधना का नतीजा यह निकला कि छह लाख हिन्दू और मुसलमान पाप की तलवार से काटे गये। 

यदि देश की निर्वीर्यता नहीं टूटी, तो वह कितना बलिदान लेगी, यह कवि और चिन्तक समझ सकते हैं। बाकी लोगों की समझ में यह बात तब आयेगी जब दुर्घटना घटित हो चुकेगी। कितना लिखूँ ? केवल आपको धन्यवाद देता हूँ। आप बड़े अच्छे हैं।
आपका
दिनकर
राजेन्द्रनगर, पटना
१२-६-७२

7. चन्द्रदेव सिंह के नाम -2

प्रिय चन्द्रदेव,
तुम्हारी बड़ी कृपा है कि नैनीताल में तुम्हें मेरी याद आयी। हिन्दी-ग्रन्थ-अकादमी के चेयरमैनशिप का ऑफर सरकार की ओर से आया था। तुम जानते हो कि उस पद पर अभी सुधांशु जी काम कर रहे हैं। वे रुग्ण तो हैं ही, अभी भारी विपत्ति में भी हैं। अपने पद पर वे बने रहें तो उससे उन्हें थोड़ा ढाढ़स रहेगा। यही सब सोच कर मैंने ऑफर को स्वीकार नहीं किया। 

वैसे काम की मुझे जरूरत है। माथे पर अनाथ पोते-पोतियों का बोझ है जो मुझे अब क्षण भर को भी निश्चिन्त होने नहीं देता।


क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता है। हम जिस समाज में जी रहे हैं, उसके प्रोप्रायटर राजनीतिज्ञ हैं, मैनेजर अफसर हैं, बुद्धिजीवी मजदूर हैं। बूढ़ा मजदूर भर-पेट मजदूरी नहीं कमा सकता, वही हाल मेरा है।


सरस्वती और लक्ष्मी के बैर को बुझाने की कोशिश मैं जीवन-भर करता रहा, लेकिन वह बैर बुझा नहीं। अभी तो वह जरा तेज ही हो गया है। भावुकता में विलाप की बातें लिख गया, क्षमा करना।
भगवान तुम्हें सुखी रखें।
तुम्हारा
दिनकर

8. आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के नाम -
साउथ एवेन्यू लेन, नई दिल्ली
२१-८-६५
श्रद्धेय वाजपेयी जी,
आपका पत्र मिला। आपका यह पितृ-स्नेह बलदायक होगा। आपने जो बातें बतलायी हैं, उनमें से अधिकांश पर आरूढ़ हूँ - यहाँ तक कि अब ब्रह्मचर्य में भी ढील नहीं है। किन्तु, असली बीमारी मेरे मन में बसी हुई है और वह परिवार को लेकर है। 

दुर्भाग्यवश, मेरे बड़े लड़के ने परिवार का ध्वंस कर दिया, रजिस्ट्री से बँटवारा कर लिया और अब बतलाता है कि उसके पास जीविका नहीं है। मैंने राय दी कि जो घर तुम्हें हिस्से में मिला है उसे किराये पर उठा दो और खुद किराये में रहो। मेरे पास जो भी सम्पत्ति थी, दोनों भाइयों के बीच बँट गयी। मेरे पास न घर है, न कारबार। पटने में किराये के मकान में रहता हूँ। सम्पत्ति के नाम पर एक मोटर कार है जो पटने में है।


राहुल जी की दुर्दशा उनकी पत्नी ने की। नवीन जी को मृत्यु के मुख में उनकी पत्नी ने ढकेला। बेनीपुरी की दुर्दशा उसके पुत्र ने की और मुझे भी दुर्दशा में मेरा बेटा ही डाले हुए है। जो कहीं भी मार नहीं खाता, वह सन्तान के हाथ मारा जाता है। तब भी मानता हूँ कि भगवान मेरे बेटे को कल्याण करें।


भागलपुर में हालत बहुत खराब थी। दिल्ली में ज्यादा आराम है। तब भी दिमाग के भीतर खंजर घूमता रहता है। बड़ी मुश्किल से उसे रोक पाता हूँ। मैं जीवन में चारों-ओर से घिर गया हूँ। मृत्यु और वैराग्य के अतिरिक्त तीसरा दरवाजा दिखायी नहीं देता है। दुःख भूलने को ही वाइसचान्सेलरी की ओर गया था। दुःख भूलने को ही दिल्ली आ गया हूँ। किन्तु, संसार-त्याग के बिना मुझे मानसिक शान्ति अब शायद नहीं मिलेगी। 

आपके उपदेशों पर अमल करने की कोशिश करूँगा।
आपका
दिनकर


9. राजेश्वर राव को लिखा पत्र:काव्य रूप में  -
, सफदरजंग लेन, नई दिल्ली
२३.३.७१
प्रियवर,
 बुढ़ापे की मुसीबत को जानते हो ?
 उस दर्द को पहचानते हो
 जो बुढ़ापे के सीने में उठता है ?
 बुढ़ापे की मुसीबत बुढ़ापा नहीं,
 जवानी है।
 यह भी एक अबूझ कहानी है
 कि शरीर बूढ़ा होने पर भी
 मन नहीं मरता है।
 जिन रंगीनियों में जवानी गुजरी है,
 बुढ़ापा ऊँघता-ऊँघता भी
 उन्हें याद करता है।
आपका
  दिनकर

   सारांश यह कि उनके काव्य और जीवन पर यहां संक्षेप में प्रकाश डाला गया है किन्तु उनके पत्रों के निष्कर्ष शोधकर्ता / शिक्षको और पाठकों के लिए छोड़ दिया गया है क्योंकि वे पत्र व्याख्या के लिये नहीं, सन्दर्भ के लिए भी नहीं, बल्कि जीवन के निर्माण का संदेश हैं।

सन्दर्भ: दिनकर जी का साहित्य।
सम्पर्क-
21-22 शुभालय विलास
बरखेड़ा -पठानी, भोपाल
umeshksingh58@gmail.com
9425600161

  

Wednesday, 11 March 2020

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Sunday, 8 March 2020

काल की परिस्थिति और संघ-निर्माता डॉ हेडगेवार


  काल की परिस्थिति और संघ-निर्माता डॉ हेडगेवार
हेडगेवार कुल नाम मूलत: तैलंग है तो भी वह घराना ऋग्वेदान्तर्गत आश्वालयन सूत्र की शाकल शाखा के महाराष्ट्रीयन तैलंग अर्थात् देशस्थ ब्राह्मणों में से हैं। आन्ध्रप्रदेश के तेलंगाना भाग में कन्दकुर्ती नाम का गाँव इस कुल का मूल स्थान है। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व बलिराम पंत हेडगेवार के पितामह नरहर शास्त्री वहाँ से नागपुर आये और तब से उनकी अगल दो-तीन पीढिय़ाँ नागपुर में ही बीतीं। नागपुर आये हुए हेडगेवार घराने के व्यक्तियों ने थोड़े ही दिनों में अपनी विद्वता के बल पर अच्छी ख्याति अर्जित कर ली। साधारणत: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक इस कुटुम्ब के अच्छे दिन रहे।

किन्तु १८५३ में अंग्रेजी सत्ता की कृष्ण छाया नागपुर पर पड़ते ही अन्य स्थानों की भाँति वहाँ भी वेद-विद्या के दिन ढल गये। उस समय अंग्रेजी विद्या का ही जोर था। महारानी विक्टोरिया उस समय भारत-सम्राज्ञी बनने की तैयारी में थीं, और अफ्रीका की विजय अभी समाप्त नहीं हो पायी थी। किन्तु सुखद बात यह भी थी कि दुनिया में परिवर्तन लाने का प्रारंभ हो चुका था जिसके साथ ही  तिलक (२३ जुलाई,१८५६), विवेकानन्द (१२ जनवरी, १८६३), श्री अरविन्द (१५ अगस्त,१८७२), का जन्म हो चुका था। आइनस्टाइन (१४ मार्च,१८७९) भी दुनिया में आ चुके थे। जूल वैर्न तब भावी युग के अनुसंधान में लगे थे, संसार दो युगों के संधि स्थल पर खड़ा था।

इतिहास के पन्ने कभी-कभी सचेत करते हैं कि नये युग के आविर्भाव से पूर्व तुम्हें कड़ी परीक्षा और विनाश के काल का सामना करना है। परन्तु ऐसा भी लगता है कि इस चेतावनी के पीछे सावधानी ही अधिक रहती है, संभवत: यह होता इसलिए है कि नये अंकुर पहले ही फूट चुके होते हैं, अत: विनाश की (अथवा कहें कि परिष्कार की) शक्तियाँ कमर कस कर मैदान में आ उतरती हैं। जो भी हो यूरोप की गौरवश्री उस समय आकाश चूम रही थी। पश्चिम का पलड़ा भारी लगता था। नागपुर में कैसी परिस्थिति रही इसका चित्र अमरीका में रहने वाले विख्यात क्रांन्तिकारी श्री रामलाल वाजपेयी ने अपने आत्मचरित्र में इस प्रकार खीचा है, ‘एक काबुली पठान लाखों की बस्ती में घुसकर गरीब लोगों को मार कर तथा उनके पैसे लूटकर सुरक्षित लौट सकता है। 
हिस्लौंप कालेज के बगल में सभी गन्दी बस्तियाँ थी। शराब, चरस और गाँजा पीकर जरा-जरा से मुसलमान छोकरे हमें कालेज जाते हुए गाली देते हैं, घेर लेते हैं और हम सब चुपचाप सहन कर कालेज चले जाते हैं। एक अंग्रेज सिपाही अकेला ही नगर में आकर सहस्त्रों लोगों के सामने एकाध गरीब को पीट-पाटकर वापस चला जाता है। हम सब देखते रहते हैं। कोई भी प्रतिकार नहीं करता। अखाड़े में कसरत करने के लिए अगर हम शिक्षित लोग गये तो शेष समाज हमारी ओर घृणा-भरी दृष्टि से देखता है। इस प्रकार के मुर्दा समाज को देखकर क्या करें यह समझ में नहीं आता।क्या देश में आज-कल हो रहे प्रायोजित दंगों को देखकर इससे कुछ सीख ली जा सकती है ?

राष्ट्र का पुनरुत्थान किसके सहारे होता है और किस आधार पर राष्ट्र वैभवशाली एवं अजेय बनते हैं ? भूमि, जनसंख्या, धन, बुद्धिमत्ता और पराक्रम, इन सबसे परिपूर्ण राष्ट्रों के धूल मिलने के उदाहरण इतिहास में उपलब्ध हैं। महान साम्राज्यों के स्वप्र देखने वाले समाज नाम शेष हो गये। मिश्र गये, यूनानी गये तथा बेबिलोनिया का तो कोई नामलेवा भी नहीं बचा। इसलिए ध्यान में आता है कि जिस समाज में देशभक्त, परम्परा के प्रति श्रद्धा और समष्टि जीवन का भाव रहता है और इस भाव को लेकर जिस समाज में महापुरुष पैदा होते हैं, वहीं राष्ट्र कालजयी बनता है। समर्थ रामदास इसे धकापेल का मामला कहते हैं
 पराभव हर समाज और देश की स्वाभाविक क्रिया है किन्तु जब राष्ट्र के अन्दर अपनी संस्कृति को बचाने के लिए समय-समय पर कालजयी पुरुष पैदा होते हैं तो उनके साथ वह राष्ट्र भी कालजयी बनता है। इजरायल इस बात का उदाहरण है कि दो हजार वर्ष तक अपने देश से अलग रहने के बाद भी कैसे आज सत्तर-बहत्तर साल में उन्होंने न केवल अपने सामरिक क्षेत्र में बल्कि भाषा और परम्परा को जीवित रखने के क्षेत्र में सफलता हासिल की। भारत के पास भी बताने को है कि राम और कृष्ण हमारे ऐसे जीवन्त कालजयी दिव्यपुरुष हैं जो न केवल देश के लिए तो दुनिया के लिए अप्रतिम उदाहरण हैं। इन्हीं की जीवन से प्रेरणा लेकर सदैव एक मालिका चलती है। उसी मालिका के रूप में १८८९ में एक महापुरुष पैदा होता है, जिसका नाम है, डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार।

 सुख, समाधान और सन्तोष से भरे हुए इस कुटुम्ब में शक सम्वत् १८११ की चैत्र सुदी प्रतिप्रदा को केवल साढ़े तीन घड़ी के शुभ मुहूर्त के वर्ष प्रतिपदा के दिवस प्रात:काल सौभाग्यवती रेवतीबाई को एक और पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। उस दिन रविवार था जो कि प्रचण्ड तेज की राशि भगवान सूर्य का वार है। अंग्रेजी गणना से यह दिन १८८९ ई. की पहली अप्रैल आता है। बालक का नाम केशव रखा गया जो कालान्तर में केशव बलीराम हेडगेवार के नाम से प्रसिद्ध हुए।

बचपन से तिलक के लेखों और शिवाजी के जीवन का उनमें पड़ता प्रभाव उन्हें राष्ट्रप्रेम से भर रहा था। नागपुर में प्रात:काल चलनेवाली तोप, हाथी, घोड़े और चौघड़े के साथ ठाट-बाट के साथ निकलनेवाले भोंसलों की सवारी, ‘सरकारनाम से  महाराज का उल्लेख, महल का राजवाड़ा, पुराने महल की सीमा पर परकोटे के द्वार आदि बातों से केशव के बाल-मन में यह बात घर कर गयी थी कि नागपुर में भोंसलों का राज्य है। 

किन्तु समाचार पत्रों के पढऩे, विद्यालय के शिक्षकों द्वारा शिवचरित्रके अनुषंग से सुने हुए विचारों तथा डॉ. खानखोज, रामलाल वाजपेयी आदि तत्कालीन क्रांतिकारियों की विदित होनेवाली गतिविधियों से इस भ्रम को दूर होते देर नहीं लगी कि यहाँ तो विक्टोरिया का राज्य है।

२२ जून, १८९७ को इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के साठ वर्ष पूरे हो रहे थे। विदेशी सरकार ने यह अवसर फिर से एक बार अपने विजेतापन का डंका विजितों के मन में बजाने के लिए उपयुक्त समझा। झण्डे, पताका, हार, तुर्रे, इत्र तथा स्वाभिमान शून्य भाषणों के साथ ही बच्चों की मिठाई बाँटेने का कार्यक्रम भी इन समारोहों में रखा गया था।

उस अवसर तक बालक केशव की राष्ट्र चित्ति जागृत हो चुकी थी। उन्होंने यह कहकर की यह गुलामी अंकित मिठाई है, इसे खा नहीं सकते और उसे कूड़ेदान में फेंक दिया।यही स्वाभिमान १९०१ ई. में इंग्लैण्ड के बादशाह एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर केशव के विचार अपने मित्रों के आमंत्रण पर चलने के लिए कहने पर प्रकट होता है, ‘विदेशी राजा का राज्यारोहण उत्सव मनाना हमारे लिए लज्जा का विषय है। अत: मैं नहीं चलूँगा।

 नागपुर में सीताबर्डी के किले पर यूनियन जैकदिन-भर फहराता था, केशव के मन में उसे हटाकर भगवा फहराने की इच्छा अपने मित्रों के सामने आयी थी और उसके लिए उन्होंने गुरुजी के घर से सुरंग खोदने का उपक्रम  किया था। केशव उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता गये तब श्री बझे बड़े कौतुक के साथ यह घटना दूसरे लोगों को बताते थे।

वास्तव में केशव के मन में परम्परा के विचार थे। बाल शिवाजी ने , ‘शीश झुके नहीं माता और रामदास ने चिन्ता करता विश्व की कही थी  । योग विद्या के सामर्थ्य से चौदह सौ वर्ष तक जीने वाले किन्तु फिर भी अहंकार से मुक्त नहीं हुए योगी चांगदेव को उपदेश देने का ज्ञान और अधिकार छोटे से ज्ञानदेव में रहता है। किन्तु जब ज्ञानदेव निन्दा से घबराकर कमरे के अन्दर बन्द हो जाता है तो उमर में छोटी बहन मुक्तबाई कहती है रागें भरावें कवणासी। अपाझा ब्रह्म सर्वदेशी। यही बातें बालक हेडगेवार की आदर्श बनीं  

यह वह काल था जब लोकमान्य तिलक ने केसरीके द्वारा जनता के स्वभिमान को जगा कर जो गर्जना की थी उससे राज्यकर्ता भयाकुल हो उठे थे। श्री शिवराम पंत परांजपे के काल में व्यक्त विचारों के फलस्वरूप तरुण-मन में जिस तेज का संचार होता था उससे तो अंग्रेजी राज्य को अपना काल ही सम्मुख नाचता हुआ दिखायी देता था। उसी समय अफ्रीका के बोअर-युद्ध से वापस लौटे हुए डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने अपनी डाक्टरी व्यवसाय के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वरूप के नये कार्यक्रम भी नागपुर में प्रारम्भ किये थे। उन्होंने राष्ट्र-प्रेमी मित्रों को एकत्रित कर विभिन्न प्रकार के विचार जागरण के कार्यक्रमों की योजना बनायी। उनमें लोकमान्य द्वारा प्रवर्तित उत्सव और आन्दोलनों का भी समावेश होता था। अत: ये सभी उत्सव एवं आन्दोलनात्मक कार्यक्रम नागपुर में भी मनाये जाने लगे। अर्थात् नये विचारों की हवा चलने पर उन विचारों का प्रभाव हो रहा था। प्रेरित तरुणों को आस-पास की परिस्थिति की  सम्पूर्णता अवलोकन करने की दृष्टि एवं उसका नियमन करने की सम्यक बुद्धि भी स्वाभाविक तौर पर क्रमश: प्राप्त होती गयी। और केशव के मन में भी यह विचार घर बनाता गया कि राष्ट्रोत्थान के लिए अपने प्रयात्नों की पराकष्ठा करनी चाहिए।

माता-पिता की अकाल मृत्यु पश्चात केशव का घर से सम्बन्ध टूटने लगा। उन्होंने कष्टों के साथ आगे का जीवन निर्वाह करने के संकल्प के साथ अपनी पढ़ाई और देशभक्ति का कार्य जारी रखा। इसमें डॉ. मुंजे का उन्हें भारी सहारा मिला। उनके सोलह वर्ष की उम्र में उनके दिए गये सभाओं में भाषाणों का प्रभाव हो रहा था और इससे प्रभावित होकर डॉ. पाण्डुरंगराव खानखोज के क्रान्तिकारी गुट स्वदेश बान्धवसे भी उनको प्रोत्साहन मिलना प्रारम्भ हो गया। डॉ. खानखोजे केसरीकी अपनी लेखमाला  में कहते हैं, व्याख्यान-माला तथा स्वेदशी-प्रचार के काम में गणू जोशी,  मोरु अभ्यंकर, खरे, बाबूराव सुतार, केशवरावे हेडगेवार बगैरह अनेक तरुण लोग आगे आये। डॉ. खानखोजे ने स्वदेश बान्धवसंगठन की ओर से स्वेदशी वस्तुओं का प्रचार करने के हेतु महाल के रास्तेपर आर्य बान्धव वीथिकाकी स्थापना की गयी थी। ध्यान रहे स्वदेशी आन्दोलन का यह वह समय था जब गाँधी के स्वदेशी आन्दोलन का कहीं अता –पता भी नहीं था ।

केशव के एक बाल मित्र श्री बलवन्तराव मण्डलेकर की स्मृति के अनुसार १९०५-०६ के आस-पास डॉ. मुंजे के यहाँ विभिन्न विद्यालयों के कुछ चुने हुए छात्रों की एक गुप्त बैठक हुई थी। उसमें बमबनाने का तरीका बताया गया था। तथा महाराष्ट्र और बंगाल की परिस्थिति का वर्णन भी किया गया था। इस बैठक में केशवराम हेडगेवार, मण्डलेकर आदि तरुण उपस्थित थे। इसका बड़ा कारण यह भी था कि बंगाल में मुसलमानों को निकट लाने की दृष्टि से अंग्रेज सरकार ने सन् १९०५ ई. की २९ सितम्बर को बंगाल के दो टुकड़े करने का निर्णय किया। यह बात किसी भी देशभक्त को नहीं भा सकती थी। १९ अक्तूबर १९०५ का दिन दुख:-दिवसके रूप में सम्पूर्ण बंगाल में मनाया गया तथा उसमें लाखों व्यक्तियों ने सभा, जुलुस, प्रदर्शन एवं प्रस्ताव के द्वारा सरकार के इस कृत्य का तीव्र विरोध किया। अनेक लोगों ने अनशन व्रत रखा था। यह कार्य युवाओं को नकाफी लगा और परिणामत: तरुणों ने कलकत्ता, ढाँका आदि स्थानों पर सशस्त्र क्रांतिकारी दल का गुप्तरूप से संघटन प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार से जनता का सरकार विरोधी क्षोभ प्रकट होने लगा तथा उसकी प्रखरता दिनोदिन बढ़ती ही गयी। थोड़े ही दिनों में बंग -भंग केवल पूर्व के प्रदेश का ही नहीं, सम्पूर्ण भारत के लिए एक महत्त्व का प्रश्र बन गया। सभी प्रान्तों को एक सूत्र में गूँथने वाली देशभक्ति की सुप्त भावना बंगाल पर अंग्रेजों के इस प्रत्यक्ष आघात से जाग्रत हो गयी तथा उस भावना की दिव्यता को प्रकट करने वाला वन्देमातरम्का मंत्र सम्पूर्ण देश में गूँजने लगा। उस काल में वन्देमातरम् के मंत्र ने जन-मन में कितना परिवर्तन किया था इसका वर्णन करते समय अरविन्द घोष लिखते हैं,  कि वन्देमातरम्यह मंत्र दिया गया तथा एक ही दिन में सम्पूर्ण जनता की देशभक्ति की दीक्षा मिल गयी।

यह मंत्र नागपुर में भी गूँजा। १९०६ में दिसम्बर में स्वदेशी आन्दोल की प्रभावी पृष्ठभूमि में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन हुआ। वहाँ से स्वराज्य, स्वदेशी का नारा गूँजा और बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के सक्रिय आन्दोलन की चतु:सूत्री लेकर लोग अपने अपने प्रांतों में गये। लोकमान्य तिलक लौटते समय नागपुर में रुके। उनके ओजस्वी भाषण का प्रभाव हेडगेवार जैसे तरुणों पर पड़ा। १९०७-०८ आते-आते विजयादशमी की एक घटना केशवराव की उस समय की मन:स्थिति पर अच्छा प्रकाश डालती है। स्वेदशी के प्रचार तथा वन्देमातरम् के प्रसार में उनका मन पूरी तरह  रम गया था। क्रांतिकारक दल के विचारों के कारण उनकी वृत्ति में निर्भयता और वाणी में ओजस्विता भी आना स्वाभाविक ही था। सीमोलंधन का जुलूस निकला। वन्देमातरम्का घोष हुआ, राष्ट्रगीत गाया।

१ दिसम्बर,१९०९ तक उनके परीक्षा परिणाम आ जाने से दि नेशनल कौन्सिल ऑफ ऐजुकेशन (बंगाल) के अघ्यक्ष डॉ. रसबिहारी घोष के हस्ताक्षर युक्त प्रमाण-पत्र मिल चुका था और वे अब अपने सांसारिक जीवन के लिए पर्याप्त शैक्षणिक प्रमाण पत्र भी पा चुके थे। किन्तु नागपुर से सात सौ मील दूर कलकत्ता हेतु वे डॉ. मुंजे का दिया परिचय-पत्र लेकर शिक्षण के साथ विशेषत: क्रांतिकार्य हेतु रवाना हो गये। 
केशव जब कलकत्ता आये तब तक स्वदेशी आन्दोलनबाह्यत: मंद पड़ गया था। १९०८ की अप्रैल में खुदीराम बोस द्वारा बम फेंकने के बाद कुछ दिनों तोबंगाल का वातावरण बहुत गरम हो गया था। स्वातंत्र्यवीर सावरक के शब्दों में, ‘‘उस बम के विस्फोट के साथ ही हिन्दुस्थान की पुरानी राजनीति में स्फोट होरक सशस्त्र क्रांतिगामी नया रक्तरंजित युग उदित हुआ।

केशव राव को कलकत्ता में अनुशीलन समितिमें प्रवेश मिला। आनुशीलन समिति के कार्य को जो जानते हैं उन्हें यहाँ कुछ बताने की आवश्यकता नहीं और जो नहीं जानते उन्हें डॉ हेडगेवार की बृहद जीवनी पढनी चाहिए ।  १२ दिसम्बर, १९१४ को दीक्षान्त समारोह हुआ । उसके बाद एक वर्ष के लिए नियम के अनुसार चिकित्सालय में वे तज्ञ डॉक्टरों के मार्गदर्शन में रोग-निदान, चिकित्सा आदि कि व्यवहारिक शिक्षा के लिए रहे। जिसे आज की भाषा में इन्टर्नशिप कहते हैं। अन्तत: ९ जुलाई १९१५ को उनका यह शिक्षाक्रम पूरा हुआ। इस तरह डॉ. हेडगेवार पाँच वर्ष की पढ़ाई पूरी कर १९१६ के आरंभ में  कलकत्ता से वे नागपुर वापस आये। डॉ. हेडगेवार की मानसिकता को ठीक से समझने के लिए श्री अरविन्द का यह कथन स्मरण रखना होगा, जब अपने ऊपर लगाये गये अभियोग के कारण राष्ट्रीय विद्यापीठ के प्राचार्य पद से त्याग-पत्र देते समय उन्होंने कहा था, ‘‘आपको कुछ पुस्तकीय ज्ञान देकर पेट भरने के लिए कोई व्यवसाय करने का मार्ग खुल जाये इस हेतु से हम लोग इस कार्य में उद्यत नहीं हुए। अपितु आप में से मातृभूमि के लिए काम करने वाले तथा कष्ट झेलने वाले सुपुत्र खड़े हों यही हमारी अपेक्षा है।
 १९२० के सामूहिक आन्दोलन के बाद वन्देमातरम् की घोषणा एक सरल बात हो गयी थी। हेडगेवार पर राजद्रोह मुकदमा चलाने का प्रयास हुआ उसके लिए आर्मस्ट्रांग रामपायली आया। उन्हें विद्यालय से निकाला गया। अन्तत: वन्देमातरम्गायन के विरुद्ध रिस्ले सरकुलर निकाला गया। इस सरकुलर के विरुद्ध जगह-जगह प्रदर्शन हुए।

 स्वतंत्रता सेनानीहेडगेवार आर.एस.एस की स्थापना से पहले कांग्रेस के सदस्य हुआ करते थे। ख़िलाफ़त आंदोलन (1919-24) में उनकी भूमिका के कारण उन्हें गिरफ़्तार किया गया और उन्हें एक साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी। किन्तु उसके बाद वे प्रत्यक्ष राजनीति से बाहर आ गये। आज़ादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष रूप से यह उनकी आखिरी भागीदारी थी।

‘डॉ. हेडगेवार चरित्र’ में ना हा. पालकर लिखते है, ‘‘वाल्यकाल से विविध राजनीतिक गतिविधियों में संलग्र, विदेशी राज्य के नाम मात्र से ही जो क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाये इस प्रकार अतीव संवेदनशील एवं उत्कट भावनापूर्ण व्यक्ति डॉ हेडगेवार को प्रचलित राजनीतिक कार्यों से अपना हाथ खींचे बिना मन को हटा लेना तथा सब प्रकार से बुद्धि को जंचनेवाले कार्य के अनुकूल ही अपने मनोभाव को बनाना कितना कठिन हुआ होगा। और इस प्राकर का परिवर्तन अपने अन्दर लाने वाले की विवेकशक्ति कितनी परा कोटि की और सामर्थ्यवान रही होगी, तथा अपने निष्कर्षों एवं तदनुरूप कार्य पर उनकी निष्ठा कितनी अटल होगी इसकी कल्पना करना भी कठिन है। इस प्रकार का कालातीत शक्ति सम्पन्न विवेक एवं कार्यनिष्ठा उनके पवित्र निस्वार्थ एवं राष्ट्रसमर्पित जीवन के कारण ही सम्भव था। यह उनके जीवन का अत्यन्त भव्य एवं अनाकलनीय चमत्कार है।’’
खिलाफत आन्दोलन के रिहाई के ठीक बाद, सनातन परम्परा और संस्कृति के मूल तत्वों और समर्थ रामदास एवं शिवाजी के विचार, कृतित्व और चरित्र से प्रभावित होकर हेडगेवार ने सितंबर, 1925 में आर.एस.एस की स्थापना की। 
इस बात को समझे बिना आज कांग्रेस और वामपंथियों द्वारा यह प्रचारित किया जाना कि अपनी स्थापना के बाद ब्रिटिश शासन के पूरे दौर में यह संगठन न शिर्फ़ उपनिवेशी ताक़तों का आज्ञाकारी बना रहा, बल्कि इसने भारत की आज़ादी के वास्ते किए जाने वाले जन-संघर्षों का हर दौर में विरोध किया’, न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि एक लम्बे वितांडावाद का परिणाम भी है।

Sunday, 23 February 2020

आखिर मुर्दों का भी तो तर्पण होता है

किसी आलेख की प्रतिक्रिया -

 ठीक है, पर विचारणीय यह है कि माता-पिता जब तक बच्चों पर अपनी कुंठित इच्छा थोपते रहेंगे तब तक इस भयावह स्थिति से निपटना कठिन है।

कान्वेंट शिक्षा, तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा का लोभ, क्षमता न रखने वाले छात्रों का प्रवेश, ट्यूशन का विज्ञापन ,प्रवेश से पदोन्नति तक आरक्षण , मुफ्तखोरी की सुरसा मुखी आदत अनेक ऐसे कारण हैं जो समाज को डिप्रेशन की ओर ले जाते हैं।

आप जरा इस ओर भी ध्यान दें कि आज माता-पिता कुछ नैसर्गिक क्षमतावान बच्चों की नकल कर अपने सामान्य बालक को भी कैसे बाजारवादी प्रतियोगिता में उतार रहे हैं। क्या यह मानसिक दबाव शिशु झेल पा रहा है ?

शारीरिक विकास का अवसर नहीं। मानसिक विकास हुआ नहीं और उसे हमने सीधे बौद्धिक प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया। भला हो माता-पिता को आध्यात्मिक शिक्षा से कुछ यश,धन,मान नहीं दिख रहा अन्यथा वे उसे सीधे वानप्रस्थाश्रम में भेज देते।

उच्च शिक्षा का अर्थ मात्र रोजगार की शिक्षा रह गया है। पूरी उच्च शिक्षा जो पहला काम करती है वह है , मातृभाषा से पृथक कर देना। चिकित्सक अंग्रेजी में दबाई का पर्चा लिखता है तो हम आज मांग कर रहे हैं कि हिंदी या उसकी मातृभाषा में पर्चा लिखें जायें। अंग्रेजी की ड्राइंग और कानूनी निर्णय भी गैर-अंग्रेजी में हों मांग है। 

वैसे भी जिस देश में शिक्षा समाज के सहयोग से चलती थी वहां अब विश्व बैंक से ऋण लेकर घी पीने की आदत जो पड़ चुकी है। 

समझेगा कौन?हमारा कान्वेंट का बेटा, मेडिकल स्टोरवाला, सब इंजीनियर,कमीशन के ठेकेदार ? ब्यूरोक्रेट्स,  जिनके मानस में अंग्रेजी के अलावा सभी हीनता-ग्रंथि पैदा करते हैं। क्या देशभर के इंजीनियरिंग, और चिकित्सा शिक्षा में मातृभाषा भी पाठ्यक्रम की सामग्री है ? 

सुधार की कोशिश होनी चाहिए पर कहां से? घर से ? दुकान से?मिल- फैक्ट्री के सी ई ओ से? ब्यूरोक्रेट्स से ?

अभी कुछ दिन पहले सेकेट्रिएट में बैठा था। एक कुर्ताधारी सज्जन मुख्यमंत्री जी का हवाला देकर अधिकारी को अपना विषय हिंदी में रख रहे थे,तो अधिकारी दनादन अंग्रेजी में।

साफ था कुर्ताधारी का चेहरा जेठालाल (तारक मेहता..) की याद दिला रहा था और अधिकारी उसे नानसेंस समझ गर्व का अनुभव कर रहे थे।

जब सज्जन चले गये तो मैंने पूरे वार्ता के दृश्य पर अधिकारी महोदय की प्रतिक्रिया चाही । उत्तर अपेक्षित था ,गंवारों से रोज पाला पड़ता है, इन्हें चार अक्षर अंग्रेजी नहीं आती ? कौन पूछेगा कि, अंग्रेज के पुछल्ले तुम तो उस भले मानुष से उसकी भाषा में बात रख कर पशुता का परिचय देते । पशु और खग समूह और व्यक्तिगत स्तर पर भी एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं। किंतु हम जो सभ्य ठहरे?? 

किंतु गला काट सफलता के इस दौर में चरितार्थता की बात ही कौन सुनता ? गांधी जी हर  चौराहे, शिक्षा के प्रांगण में, कार्यालयों में बैठ कर अस्तेय का अभ्यास देख रहे हैं , तो सरदार देश की सबसे ऊंची जगह से बिखंडन पर तुले टुकड़े-टुकड़े गैंग को । अन्य महान आत्माओं ने तो शक्ति का रूप धारण कर  सत्य का रास्ता छोड़ असत्य की सड़क ही बना ली ??

मुझे कलाम साहब का 2020 स्मरण हो आया। कभी देश में पंचवर्षीय योजना विकास का आधार थी। बाद में अब 30 से 50 वर्ष आगे की योजना बन रही है। कमीशन में शाग-भाजी की उपज चाहिए , परिणाम में इमली का फल!!

दुश्यंत कुमार की ग़ज़ल सुनकर अच्छा लगता है ,पर संग्रहालय ?? देश में भावनात्मक नारे अच्छे लगते हैं ,पर व्यवहार में !! हमारा अल्लाह,ईसा, महावीर, बुद्धा, रावण,रहीम। अच्छा होता यह सब मिलकर देश को एक रख सकते? 

कल एक चैनल पर बहस चल रही थी। एक पक्ष कह रहा था ,हिन्द से भारत में सब हिन्दू तो दूसरा कह रहा था हम हिन्दू नहीं कट्टर मुसलमान हैं। जब पूछा गया कि आपकी सांतवीं पीढ़ी कौन थी ? तो बहस छोड़कर चले गए।

उदारता एक पक्ष से नहीं चलती । दोनों पक्ष समभावी चाहिए। प्रश्न है ,यह वातावरण कौन तैयार करेगा ? विद्यालयीन सरकारी रोजगारी शिक्षा, कान्वेंट शिक्षा, मदरसे की शिक्षा ,जुम्में की नवाज, रविवार की प्रार्थना या यज्ञ परम्परा !!

चलो अपने से बाहर सोचने की फुर्सत मिलेगी तो इस पर भी गौर करेंगे।

 वैसे देश चलाने वाले ठेकेदार हैं,ब्यूरोक्रेट्स हैं, उद्योगपति हैं, दलाल हैं तो फिर आम जन की आवश्यकता क्या है ? फिर भी बीच-बीच में 'हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा', का नारा लगाने में कोई हर्ज नहीं। 'निरर्थक बहस भी तो' बिना फल की इच्छा का महत कार्य है। आखिर साहित्यकार कर ही क्या सकता है !! और करे भी क्यों जब घर बैठे पुरस्कार और राशि प्राप्त हो जाये?? फिर हम पुरस्कार वापस भी तो नहीं कर सकते । न जाने कौन नाराज हो जाये। आखिर हमें समय के साथ जो चलना है। क्योंकि मुर्दों का भी तो यहां तर्पण होता है।

Wednesday, 19 February 2020

कबीर और गांधी

आज फेसबुक में एक किताब देखी । "उत्तर कबीर नंगा फकीर"।

मेरा मानना है कि न तो कबीर उत्तर थे न ही गांधी नंगा थे। 
कबीर तो चौराहे पर खड़े सब की खैर मांग रहे थे और गांधी सब को कपडे़ की अहमियत बता रहे थे !!
 अपरिग्रह और सहानुभूति ही गांधी की लंगोटी है ,नंगा नहीं।

वैसे भी फगीर नंगा नहीं होता ।वह दुनिया को अपने मुठ्ठी में रखता है। जब-जब मुठ्ठी खोलता है कबीर की खैरात बटती है।

नंगा होने का गीता का निहतार्थ है कि "यह शरीर ही आत्मा का वस्त्र है जिसे अनासक्त भाव से पहना है ,जो जलेगा किन्तु उस कपड़े को पहननेवाला नहीं जलेगा।

कबीर तो उस चादर को 'जस की तस रख देने की बात करता है।' वह चतुर्दिग सजग है। वह काल और दिशा बोध को समझता भी है और उससे परे चौराहे पर खड़ा हो कर हर आने जानेवाले को सजग करता है 'हम न मरिहैं मरिहैं संसारा।' कबीर की नजर में यसी कपड़ा है।

 विचार करें कबीर को आप काल के खंड और दिशा में कैसे बांध सकते है ?

जहां तक गांधी की बात है गांधी तो विचारों के ही राजा थे।वे ऐसे धनी फकीर थे जिनकी पूंजी को भारत और उसकी आती जाती सत्ताएं तो खा ही रहे हैं दुनिया भी उसे प्रसाद के रूप में प्राप्त करने लालायित है।