गुरु से राष्ट्र निर्माता तक
गुरु की गुरुत्त्व
अपने जीवन के निर्माण और गठन में जो सहायक हुए, जिनका योगदान रहा उनके प्रति कृतज्ञता , श्रद्धा भाव अपने अंत:कारण में
धारण करने की परम्परा अति प्राचीन काल से
चली आ रही है। अपनी जीवन वृत्ति के लिए भौतिक कलाओं का एवं
विद्याओं का दान गुरुजन अपने को देते हैं ।
व्यास पूजा इसी परम्परा की देन है । यही संस्कार अतीत में अपने अंत:करण में किया
जाता रहा है ।
गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता भारत की प्रकृति है । परम्परा
में गुरु हमें आध्यात्मिकता और परमपद का मार्ग दिखाते हैं । इसीलिए गुरु को
भारतभूमि में साक्षात परमब्रह्म कहा गया है –
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु
गुरुर्देवो महेश्वर: । गुरु; साक्षात्परमं ब्रह्म
तस्मै श्री गुरुवे नम: ।।
यह विशिष्टता भारत की अपनी है । दुनिया में देखें तो
इतिहास बताता है, यहूदी पंथ के अनुयायियों में बहुत कलह होते थे । ईसा मसीह के अनुयायी भी यह
भावना धारण करते हैं कि ईसा मसीह द्वार निर्धिष्ट मार्ग पर चलने वालों को ही
मुक्ति मिलेगी, अन्यों को नहीं । यह असहिष्णुता है । इसी
भावना के कारण ईसाइयों ने यहूदियों पर अत्याचार किये । इतना ही नहीं तो पुरातन
मान्यताओं के विरुद्ध चलने वाले प्रोटेस्टेंट पर भी उन्होंने अत्याचार किये ।
मोहम्मद
पैगंबर द्वारा प्रणीत इस्लाम
सम्प्रदाय तो स्वपंथान्धता के कारण असहिष्णुता एवं उन्माद का संसार भर में हाहाकार
मचाया ।
किन्तु भारत में
प्राचीन काल से गुरुओं की ऐसी परम्परा रही जिन्होंने कहा, “ एकं सद विप्रा: बहुधा वदन्ति ।”
इसके कारण भारत दुनिया को शांति और सद्भावना का सन्देश देता आ रहा है ।
किन्तु धर्म को अन्धश्रद्धा मानने वालों ने आज के वैज्ञानिक युग में द्वेष भावना के कारण एक मानसिकता ने समूहवाद (communism) को जन्म दिया । आज जो अपने गुरुजनों के प्रति अनादर की, आन्दोलन करने कि प्रवृत्ति बढ़ी है,
वह इन्हीं ईसाइयों , इस्लाम और कम्युनिस्टों से आई हुई सामाजिक समझौते
(Theory of social contract) की विकृति कुकल्पना की देन है ।
इसलिए गुरु की परम्परागत
अवधारणा के साथ आधुनिक सन्दर्भ में हमारी गुरु के रूप में राष्ट्र निर्माण में
क्या भूमिका है विचार करना समीचीन होगा ।
गुरु की मौलिक भूमिका- (i)
सूचना नहीं, दृष्टि प्रदान करता है – गुरु केवल जानकारी देनेवाला नहीं, बल्कि सोचने की क्षमता देता
है। (ii) आत्मा की जागृति – शिष्य के भीतर निहित सामर्थ्य को पहचानकर विकसित करता है। (iii)
चरित्र निर्माता – किताबी ज्ञान से परे, जीवंत पाठ के माध्यम से सिखाता है। (iv) स्वतंत्र
विवेक का विकास –
शिष्य को नकल नहीं, अपनी स्वतंत्र प्रतिभा विकसित
करने के लिए प्रेरित करता है।
पारंपरिक भारतीय गुरु परंपरा (धर्मपाल के अनुसार): (i)
व्यापक साक्षरता - 18वीं-19वीं सदी में मद्रास में12,500+ स्कूल थे। (ii)
समावेशी शिक्षा- सभी वर्गों, यहाँ तक कि दलित समुदायों के बच्चे शामिल थे। (iii) स्वावलंबी संस्थाएं – समाज द्वारा पोषित, सरकार पर निर्भर नहीं। (iv) निःशुल्क शिक्षा - भोजन,
आवास, अध्ययन सभी समाज के दान से। (v)
मौखिक और प्रायोगिक शिक्षण – श्रुति परंपरा और प्रत्यक्ष अभ्यास पर जोर।
आधुनिक संदर्भ में गुरु का रूपांतरण: प्राथमिक से उच्च शिक्षा
तक- (i) प्राथमिक स्तर – शिक्षक नींव का आर्किटेक्ट (भविष्य नागरिकों की रीढ़ मजबूत करता है।) (ii)
उच्च शिक्षा – शोध निर्देशक नीति-निर्माण
में योगदान देते हैं। (iii) शोध संस्थान – आत्मनिर्भर भारत का 'थिंकटैंक'
तैयार करना।
सैद्धांतिक से व्यावहारिक आयाम: (i)
सामाजिक उत्तरदायित्व – शिक्षा को समाज की समस्याओं
से जोड़ना। (ii) मूल्य-आधारित शिक्षा - वसुधैवकुटुंबकम्,
कर्तव्यबोध, पर्यावरण संरक्षण।(iii)
आलोचनात्मक चिंतन – रट्टू तोता संस्कृति से बाहर
निकलना। (iv) नवाचार को प्रोत्साहन - मौलिक अनुसंधान का जन्म।
महान विचारकों का दृष्टिकोण
श्री रामस्वरूप जी- (i)
मनुष्य को आध्यात्मिक प्राणी माने, भौतिक इकाई नहीं। (ii) बौद्धिक परतंत्रता का भंजन – पश्चिमी विचारों की नकल से मुक्ति हो ।(iii) कर्तव्य-बोध - अधिकारों
से ऊपर उठकर दायित्व सिखाना चाहिए ।
महर्षि दयानंद सरस्वती (आर्यसमाज) : (i)
स्वराज्य, स्वदेशी, स्वभाषा -आत्मनिर्भरता की भावना।(ii) तर्क और वेद – अंधविश्वास का विरोध,
सत्य की खोज। (iii) बालिकाओं
और दलितों की शिक्षा- समग्र समाज का सशक्तिकरण।
रवींद्रनाथ टैगोर (विश्व भारती) : (i) मन की स्वतंत्रता । राजनीतिक से पहले वैचारिक
मुक्ति। (ii) प्रकृति के सान्निध्य में शिक्षा- संपूर्ण मानव विकास। (iii) विश्व-मानव बनना - संकीर्ण
राष्ट्रवाद से परे।
पंडित मदनमोहन मालवीय (BHU) : (i) चरित्र निर्माण- राष्ट्र निर्माण - उच्च
नैतिक मूल्य। (ii) पूर्व-पश्चिम समन्वय -आधुनिकता + भारतीय जड़ें। (iii) निःस्वार्थ सेवा- समाज
के लिए पूर्ण समर्पण।
महर्षि अरविंद: (i) आध्यात्मिक
राष्ट्र
-भारत दैवी आत्मा है। (ii) राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली - वेद + आधुनिक विज्ञान।(iii)
वैश्विक मानव चेतना – भारत पूरी मानवता का मार्गदर्शक।
संगठनों का योगदान
विद्या भारती : (i) संस्कार
+ विज्ञान
– नैतिक मूल्यों के साथ आधुनिक ज्ञान (ii) ग्रामीण
और वंचितों तक पहुंच - सर्वांगीण
समावेशिता (iii) पंचपदी शिक्षण - बौद्धिक,
शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक
विकास।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) : (i) भगवा
ध्वज को गुरु मानना -व्यक्ति पूजा
से परे। (ii) सांस्कृतिक राष्ट्रीयत्त्व-समग्र समाज की चेतना जागृत करना।(iii) अनुशासित कार्यकर्ता
तंत्र
– आपदा और सेवाकार्य में निष्ठा।
रामकृष्ण मिशन: (i) आत्मोमोक्षार्थं
जगत्हिताय-
स्वयं की मुक्ति+ समाज कल्याण।(ii)
मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा- आत्म निर्भर, चरित्रवान नागरिक।(iii) सामाजिक समरसता - जाति-पंथ से परे सेवा।
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आचार्य के गुण और दायित्व
आचार्य : (i) आचार्य-
प्राथमिक चरण में शिक्षक –प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उपदेश
से पहले आचरण। (ii) आदर्श व्यक्ति- विद्यार्थी
स्वतःअनुकरण करे,
बाध्य न हो।
आवश्यक गुण- (i)
विद्वत्ता -विषय का पूर्णज्ञान
और निरंतर अद्यतन जानकारी। (ii) शिक्षण-कौशल-जटिल विषयों को सरल, आकर्षक तरीके से समझाना। (iii)
प्रभावशाली व्यक्तित्त्व - संयम, धैर्य,
निर्भय स्वभाव। (iv) निःस्वार्थ
समर्पण
-
आर्थिक लालसा से परे, समाज सेवा।
राष्ट्र-निर्माण में भूमिका: (i)
वैचारिक मार्गदर्शक – समाज को सही दिशा प्रदान करता
है । (ii) चरित्र-गढ़न – भविष्य के नागरिक तैयार करता है। (iii) सांस्कृतिक
संरक्षक
– राष्ट्र की जड़ें मजबूत करता है।
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वर्तमान चुनौतियाँ और समाधान
समस्याएँ: (i) भौतिकवादी
दृष्टिकोण
– मनुष्य को आर्थिक संसाधन माना जा रहा है।(ii) शिक्षक
का सम्मान पतन -
सरकारी तंत्र में निम्न स्थिति।(iii)
आंदोलन-प्रवृत्ति- अनुशासन में कमी, महत्वपूर्ण क्षेत्र में हड़तालें।(iv) तकनीकी
ज्ञान की प्रधानता – आध्यात्मिक और नैतिक मूल्य
गौण।
समाधान: (i)
शिक्षक को "व्यक्ति" नहीं "पद" मानना – संस्थागत सम्मान। (ii) NEP -2020, भारतीय
ज्ञान प्रणाली को प्राथमिकता। (iii) समग्र विकास पर जोर - बुद्धि + चरित्र + आध्यात्मिकता। (iv) समाज-गुरु
संबंध
-दोनों में अहंकार का त्याग आवश्यक है ।
निष्कर्ष: भविष्य का दृष्टिकोण:
2047 का भारत- (i) आत्मनिर्भर और सशक्त – अपनी संस्कृति पर गर्वान्वित। (ii) विकेंद्रीकृत
शिक्षा
– स्थानीय स्तर पर समाज की भागीदारी।(iii) वैश्विक
नेतृत्व
– भारतीय ज्ञान परंपरा से विश्व को दिशा।
मुख्यसंदेश: (i) "गुरु से राष्ट्र निर्माता तक
की यह यात्रा केवल पद-परिवर्तन नहीं है, बल्कि भारतीय चेतना के महायज्ञ
का विस्तार है। जब तक प्रत्येक शिक्षक' राष्ट्र का निर्माता' बनने के मिशन से जुड़ा नहीं होगा, तब तक भारत का सर्वांगीण विकास
असंभव है।" (ii) "शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं
होता, अपितु सदा राष्ट्र के लिए प्रेरणा-दीप बना रहता है।"
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भाग दो
प्रस्तावना -आध्यात्मिक भूमिका: गुरु
की परिभाषा – पाँच गुरुओं की परंपरा। आध्यात्मिक गुरुओं
का संदेश – सभी श्लोक पूरे। शिक्षक का महत्त्व और आचार्य
– विस्तृत व्याख्या। गुरु से राष्ट्र निर्माता –
सिद्धांत व व्यावहारिकता। पुरातन से अधुनातन – हजार साल का इतिहास।श्री रामस्वरूप जी – पूरा
दृष्टिकोण।महर्षि दयानंद सरस्वती – स्वराज्य से राष्ट्र
तक।धर्मपाल जी का ऐतिहासिक अध्ययन – संपूर्ण आंकड़े।रामकृष्ण
परमहंस एवं विवेकानंद - "आत्मोमोक्षार्थं..."
सहित। रवींद्रनाथ टैगोर – गीतांजलि से भारत तक। पंडित
मदनमोहन मालवीय - BHU की कहानी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
एवं श्रीगुरुजी – भगवाध्वज। विद्या भारती –
व्यावहारिक संस्कार शिक्षा। आचार्य का पद – गहन विश्लेषण + निष्कर्ष।
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आंकड़े
व ऐतिहासिक प्रमाण: (i)18वींसदीमें12,500 स्कूल।
(ii)1 लाखगाँव-विद्यालयबंगाल-बिहार में। (iii)जापान का उदाहरण। (iv) संत गहिरा गुरु की धरोहर । (v) दातार जी का बगीचा (250 अधिकारी)।
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गुरु से राष्ट्र निर्माता तक
(संपूर्ण
व्यवस्थित व्याख्यान - तीन आधार पर संरचित)
प्रस्तावना: "तस्मै श्री गुरुवे नम: । ॐ गुरदेवाय
नम:।" राष्ट्र निर्माण की यात्रा शुरू होती है,ज्ञान
के एक सामान्य वाहक शिक्षक से, जो धीरे-धीरे आचरण के माध्यम
से आचार्य बनता है, और अंततःगुरु के रूप में पूरे समाज और
राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान करता है।
प्रथम खंड: तीन आधारों का परिचय: तीन आधार - एक सोपान क्रम- भारतीय शैक्षिक परंपरा में
शिक्षा के क्षेत्र में तीन महत्त्वपूर्ण पद हैं: (i) शिक्षक
- ज्ञान का प्रदाता । (ii) आचार्य - आचरण से शिक्षक (गुरु-शिष्य परंपरा)। (iii) गुरु
- राष्ट्र निर्माता (समाज का मार्गदर्शक) । ये केवल पद नहीं हैं,
बल्किदायित्व का सोपान क्रम है।
द्वितीय खंड: शिक्षक - लक्षण और कार्य: शिक्षक = शि + क्ष + क । शि
- शिखर तक ले जाने वाला। क्ष - क्षमा की भावना
रखने वाला। क - कमजोरी दूर करने वाला। शिक्षक वह है, जो विषय ज्ञान प्रदान करता है और तार्किक चिंतन का आधार तैयार करता है।
शिक्षक के आवश्यक लक्षण: (एक) विषय में पारंगतता - शिक्षक को: (i) अपने विषय का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। (ii) नवीनतम
तकनीकें और विकास से परिचित होना चाहिए। (iii) अद्यतन ज्ञान से
लैस होना चाहिए।
समस्या: (एक) छिछले ज्ञान वाला शिक्षक : (i) विद्यार्थियों में भ्रामक सिद्धांत बोता है। (ii) जो
स्थायी रूप से विचारों को विकृत कर देता है । (दो) शिक्षण कौशल: शिक्षक को होना चाहिए- (i) विषय को सरल
तरीके से प्रस्तुत करने में दक्ष। (ii) अपनी कक्षा को आकर्षक
और जीवंत बनाने में सक्षम। (iii) विद्यार्थियों को प्रश्न
पूछने के लिए प्रोत्साहित करने वाला। (तीन) संगठन क्षमता । शिक्षक को: (i) सहपाठ्य गतिविधियों
को संचालित करने में निपुणहोना चाहिए। (ii) विद्यार्थियों
में रुचि और उत्साह जगाने वाला होना चाहिए। (चार) धैर्य और सहानुभूति: शिक्षक को- (i) विद्यार्थियों
के भय, संदेह और चिंताओं को समझना चाहिए। (ii) व्यक्तिगत ध्यान देने में सक्षम होना चाहिए।
शिक्षक के कार्य:
(एक) ज्ञान का
हस्तांतरण- शिक्षक का मुख्य कार्य: (i) पाठ्यक्रम के अनुसार
ज्ञान प्रदान करना। (ii) विषय की गहराई समझाना।(iii) परीक्षा के लिए तैयारी कराना। (दो) बौद्धिक विकास: शिक्षक - (i) आलोचनात्मक चिंतन को
प्रोत्साहित करता है। (ii) विद्यार्थियों को प्रश्न पूछना सिखाता
है।(iii) तार्किकता और विश्लेषण का विकास करता है। (दो) कौशल विकास : शिक्षक- (i) व्यावहारिक
कौशल सिखाता है। (ii) समस्या समाधान की क्षमता विकसित करता
है। (iii) प्रायोगिक ज्ञान प्रदान करता है। (तीन) अनुशासन बनाए रखना: शिक्षक- (i) कक्षा में नियंत्रण रखता है। (ii) समय का पालन सिखाता
है। (ii) व्यवस्था बनाए रखता है। (चार)
शिक्षक की सीमा: (i)
बौद्धिक स्तर पर केंद्रित है । (ii) चरित्र
निर्माण तक पूरी तरह नहीं पहुंचता। (iii) आध्यात्मिक जागरण नहीं
करता। (iv) शिक्षक ज्ञान देता है, पर दीक्षा
नहीं देता।
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आचार्य - लक्षण और कार्य
आचार्य की परिभाषा: आचार्य
= आचरण से शिक्षक । आचार्य का शाब्दिक अर्थ: आचार (आचरण/व्यवहार)
+ आय (जो आता है/जो होता है)। आचार्य
वह है जिसका आचरण ही उसका सबसे बड़ा संदेश है। श्री रामकृष्ण परमहंस के शब्दों
में: "ज्ञान नहीं, आचरण
महत्त्वपूर्ण है।"
शिक्षक और आचार्य में अंतर: (एक) शिक्षक-(i) मूल आधार:
ज्ञान । (ii) शिक्षण विधि:
पुस्तकें और भाषण। (iii) प्रभाव:
बुद्धि पर। (iv) लक्ष्य:
अंक/डिग्री। (v) संबंध:
व्यावसायिक। (दो) आचार्य: (i) मूल आधार:
आचरण। (ii) शिक्षण विधि:
स्वयं का जीवन उदाहरण। (iii) प्रभाव:
आत्मा पर। (iv) लक्ष्य:
व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास। (v) संबंध: पारिवारिक/आध्यात्मिक।
आचार्य के आवश्यक लक्षण: (एक)
आचरण की शुद्धता :
आचार्य को: (i) विषय ज्ञान से अधिक चरित्र की महत्ता होनी चाहिए। (ii) संयम और नैतिकता में रहना चाहिए। (iii) व्यक्तिगत जीवन सरल और पवित्र होना चाहिए।
भारतीय मान्यता: "गुरु
(आचार्य) अपने आचरण से स्वयं एक ज्ञान का ग्रंथ है।"
समग्र विद्वत्ता : आचार्य
को- (i) केवल एक विषय का विशेषज्ञ नहीं, बल्कि जीवन
का ज्ञाता होना चाहिए। (ii) संस्कृति, दर्शन और सामाजिक मूल्यों की समझ होनी
चाहिए।
शिष्य के साथ आत्मीय संबंध: आचार्य-
(i) शिष्य को केवल अंक देने वाला नहीं है, बल्कि
उसके जीवन का मार्गदर्शक है।(ii) शिष्य की व्यक्तिगत कमजोरियों को समझता है। (iii) उसे पारिवारिक सहज्जता से सिखाता है।
निःस्वार्थ
भाव :आचार्य- (i) धन या सम्मान के लिए काम नहीं करता है । (ii) शिष्य के विकास को ही अपना लक्ष्य मानता है। (iii) आर्थिक लालसा से परे होता है। कबीर का उदाहरण: "साधु ऐसा चाहिए जैसे सूप सुभाष, सार-सार को गहि रहे
थोथा देई उड़ाय।"
प्रेम और करुणा : आचार्य को- (i) शिष्य से परिवार जैसा प्रेम होना चाहिए। (ii) कठोर होते हुए भी दया से काम लेना चाहिए। (iii) कमजोर छात्र के लिए विशेष ध्यान देना चाहिए।
आचार्य के मुख्य कार्य: चरित्र
निर्माण- (i) शिष्य के व्यक्तित्व का विकासकरना।(ii) सत्य, ईमानदारी, साहसजैसे
गुण विकसित करना। (iii) आंतरिक शक्ति को जागृत करना।
महत्वपूर्ण सूत्र: "शिष्य गुरु के आचरण का अनुसरण करते हैं, न कि उसके
शब्दों का।"
जीवन के मूल्यों की शिक्षा: आचार्य सिखाता है- (i) जीवन कैसे जिएं
- न कि केवल पुस्तकें कैसे पढ़ें। (ii) समस्याओं का सामना कैसे करें ।(iii) नैतिक मुद्दों पर निर्णय कैसे लें।
आत्मविश्वास
का संचार: आचार्य- (i) शिष्य में आत्मबल जगाता है। (ii) उसे अपनी क्षमता पर विश्वास दिलाता है। (iii) असफलता से सीखने का साहस देता है।
सामाजिक जिम्मेदारी: आचार्य- (i) शिष्य को समाज के प्रति दायित्व सिखाता है। (ii) दूसरों की सेवा करने की भावना जगाता है। (iii) सामाजिक सरोकार पैदा करता है।
आध्यात्मिक मार्गदर्शन: आचार्य- (i) जीवन के उच्चतर उद्देश्य की ओर इंगित करता है। (ii) आंतरिक शांति की खोज में सहायता करता है। (iii) अर्थव्यवस्था से परे मूल्यों की समझ कराता है।
आचार्य की विशेष विशेषता: 'भृंग-कीट-न्याय'।
भारतीय दर्शन में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है - 'भृंग-कीट-न्याय' कथा: जैसे भंवरा एक विशेष प्रकार के
कीट को लाकर मिट्टी के घरौंदे में बंद कर देता है, फिर उसका
चक्कर काटता रहता है। कुछ दिन के बाद वह कीट भी भंवरा ही बन जाता है।
शिक्षा का संदर्भ: जब
शिष्य आचार्य के सान्निध्य में रहता है और उसके आचरण को अवलोकन करता रहता है,
तो: (i) वह धीरे-धीरे आचार्य जैसा ही बन जाता है। (ii) यह नकल नहीं है, बल्कि अभ्यास द्वारा प्रभाव है।
भगवान श्रीकृष्ण की गीता
में:
"यद्यदाचरतिश्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः।
स यत्प्रमाणंकुरुतेलोकस्तदनुवर्तते।।"
अर्थात् - "श्रेष्ठ जन (बड़े लोग) जिस प्रकार का
व्यवहार करते हैं, उसी को प्रमाण मानकर अन्य लोग भी वैसा ही
करने लगते हैं।"
आचार्य की एक और परिभाषा: आचार्य
केवल कक्षा तक सीमित नहीं है। आचार्य: (i) विद्यालय में प्रधानाध्यापक। (ii) परिवार में माता-पिता। (iii) समाज में प्रभावशाली व्यक्ति। (iv) राष्ट्र में महान विचारक। कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसका आचरण दूसरों को प्रभावित
करता है, वह आचार्य है।
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गुरु-लक्षण और कार्य
गुरु की परिभाषा: गु
+ रु । गु = अंधकार/अज्ञान। रु = दूर करने वाला। गुरु = अज्ञान को दूर करने वाला परंतु यह केवल सामान्य
अज्ञान नहीं है। गुरु: (i) आध्यात्मिक अज्ञान को दूर करता है। (ii) जीवन के परम उद्देश्य को दिखाता है। (iii) राष्ट्र और समाज के लिए दृष्टि प्रदान करता है
भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान: गुरु की महिम (भारतीय संस्कृति में): गुरु को परमेश्वर के समकक्ष माना गया है।
अनेक विचारकों का कथन: "गुरु परमेश्वर से भी बड़े हैं, क्योंकि गुरु ही
परमेश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं।"
तीन परमेश्वर - तीन गुरु: भारतीय दर्शन में गुरु का
स्थान: गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु
ही महेश है। (i) सृष्टि और अज्ञान का नाश: जिस प्रकार ब्रह्मा
सृष्टि के रचयिता हैं,
उसी प्रकार गुरु शिष्य के जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार का
नाश कर उसमें नई समझ और ज्ञान का सृजन करते हैं।(ii) संरक्षण और ज्ञान का संचार: जिस प्रकार विष्णु
इस संसार के पालक और संरक्षक हैं, उसी प्रकार गुरु शिष्य के भीतर अच्छे
संस्कारों और ज्ञान का संचार कर उसकी रक्षा करते हैं। (iii) संहार और अहंकार का विनाश: जिस प्रकार महेश (शिव)
संहारक हैं, उसी प्रकार गुरु शिष्य के
भीतर छिपे दुर्गुणों और अहंकार का विनाश करते हैं, जिससे
एक नए और बेहतर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इस प्रकार, एक सच्चे गुरु में ये तीनों शक्तियां समाहित होती हैं, जो मनुष्य को उसके जीवन के सही मार्ग पर आगे बढ़ाने का कार्य करती हैं। गुरु
का कार्य ये तीनों गुणों को पूरा करना है।
गुरु के आवश्यक लक्षण: (सर्वांगीण
ज्ञान) गुरु को: (i) एक विषय का विशेषज्ञ नहीं। (ii) बल्कि समग्र ज्ञान का वाहक होना चाहिए। (iii) जीवन के सभी क्षेत्रों में दक्ष होना चाहिए।
महत्वपूर्ण अंतर: (i) शिक्षक = किताब का विषय ।(ii) आचार्य = कई किताबें। (iii) गुरु = जीवन स्वयं एक पुस्तक है।
आध्यात्मिक उन्नति : गुरु- (i) केवल बौद्धिक नहीं, आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है। (ii) आंतरिक शांति और ज्ञानसे प्रकाशित होता है।(iii) विश्व-चेतना से जुड़ा होता है।
परोपकारी दृष्टि : गुरु: (i) व्यक्तिगत लाभ नहीं चाहता । (ii) समाज और राष्ट्र के कल्याण को प्राथमिकता देता है। (iii) निःस्वार्थता का प्रतीक होता है।
दिव्य शक्ति :
गुरु के पास- (i) सामान्य शक्ति नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति है । (ii) वह हृदय परिवर्तन कर सकता है । (iii) वह जीवन की दिशा बदल सकता है।
स्वामी विवेकानंद: "गुरु केवल व्यक्ति नहीं, एक शक्ति है।" सर्वव्यापी
उपस्थिति : गुरु- (i) एक स्थान तक सीमित नहीं। (ii) विचारों और दर्शन के माध्यम से सर्वत्र मौजूद है। (iii) काल की सीमा को पार करता है।
स्वामी युक्तेश्वर गिरि: "एक सच्चा गुरु कभी अपने शिष्य को अकेला नहीं छोड़ता। दूरी केवल शरीर की
होती है, चेतना की नहीं।"
गुरु के मुख्य कार्य: संपूर्ण मानव निर्माण- (i) शारीरिक विकास ।(ii) मानसिक विकास ।(iii) बौद्धिक विकास ।(iv) आध्यात्मिक विकास ।(v) सामाजिक विकास ।
सभी आयामों में शिष्य का विकास करना: (दृष्टि प्रदान करना ) गुरु: (i) शिष्य को सूचना नहीं, दृष्टि देता है । (ii) उसे जीवन का उद्देश्य समझाता है । (iii) भविष्य का पथ दिखाता है।
महत्वपूर्ण: "सूचना
का ज्ञान समाप्त हो जाता है, पर दृष्टि सारा जीवन रोशनी देती
है।"
आंतरिक शक्ति का जागरण: गुरु-(i) शिष्य के भीतर सोई हुई शक्तियों को जागृत करता है। (ii) उसे अपनी असीम संभावनाओं से परिचित कराता है । (iii) आत्मविश्वास और साहस जगाता है।
रामकृष्ण परमहंस: "मनुष्य के भीतर पड़ी शक्ति को जागृत करना, वही गुरु
का कार्य है।"
स्वतंत्र विचार की क्षमता: गुरु:
(i) शिष्य को अंधानुकरण से बाहर निकालता है (ii) उसे प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देता है। (iii) तार्किक विश्लेषण सिखाता है। (iv) अपने विवेक का स्वामी बनाता है।
बहुत महत्वपूर्ण: "गुरु शिष्य को अपने उत्तरों का अनुयायी नहीं, अपने
विवेक का स्वामी बनाता है।"
राष्ट्र निर्माण : यह
गुरु का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। गुरु: (i) व्यक्ति का निर्माण कर राष्ट्र का निर्माण करता है। (ii) एक-एक शिष्य से एक-एक नागरिक बनाता है। (iii) सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित रखता है। (iv) भविष्य की पीढ़ी को तैयार करता है।
पाँच गुरु परंपरा: भारतीय परंपरा में पाँच गुरुओं का उल्लेख मिलता है: (i) प्रथम गुरु - माता । जिसने हमें जन्म दिया, जीवन की
पहली पाठशाला। (ii) द्वितीय गुरु - धरती माता ।
जिस पर हम पले, जिसने हमें पोषण दिया। (iii) तृतीय गुरु - पिता । जिसकी उंगली थामी और चलना सीखा,
जिसने साहस सिखाया। (iv) चतुर्थ गुरु - शिक्षक , जिसने सूचना के साथ ज्ञान की दिशा दी। (v) पंचम गुरु - आध्यात्मिकता । जिसकी कृपा से भाव जागरण हुआ,
जो परम लक्ष्य दिखाती है।
महत्व: ये पाँचों गुरु मिलकर एक संपूर्ण मानव बनाते हैं।
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तीनों का तुलनात्मक विश्लेषण
तीनों के कार्य क्षेत्र: (सोपानक्रम
-शिक्षक । आचार्य । गुरु ।) इन सभी पहलुओं को निरंतरता (संवर्धन और प्रवाह) में पिरोते हुए निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है: (i) मुख्य क्षेत्र की निरंतरता: शिक्षक का दायरा
मुख्य रूप से
कक्षा तक सीमित होता है, जो आगे बढ़कर आचार्य के साथ विद्यालय और समाज तक विस्तृत होता है,
और अंततः गुरु के रूप में समग्र समाज और राष्ट्र तक अपनी वैश्विक व्यापकता
बनाए रखता है।
(ii) विषय वस्तु की निरंतरता: शिक्षण की शुरुआत पाठ्यक्रम
से होती है, जो आचार्य के मार्गदर्शन
में
जीवन मूल्य बनते हैं और गुरु के
सान्निध्य में पहुँचकर राष्ट्र मूल्य के रूप में निरंतरता प्राप्त करते हैं। (iii) शिक्षण विधि की निरंतरता: ज्ञान देने की
प्रक्रिया
व्याख्यान और पुस्तकों से
शुरू होकर आचार्य के माध्यम से आचरण और उदाहरण बनती है,
तथा गुरु के स्तर पर पहुँचकर दर्शन और अनुभव का रूप लेकर निरंतर प्रवाहित होती रहती
है।
(iv) शिष्य के रिश्ते की निरंतरता: यह
संबंध
छात्र-शिक्षक के औपचारिक रिश्ते से शुरू होकर आचार्य के साथ परिवार जैसा बनता है, और
गुरु के साथ जुड़कर यह आध्यात्मिक स्तर पर शाश्वत हो जाता है। (v) परीक्षा की निरंतरता: ज्ञान की परख परीक्षा हॉल से निकलकर आचार्य के साथ जीवन की परिस्थितियों में बदलती है, और गुरु के मार्ग पर यह अनंत काल तक निरंतर चलती रहती है। (vi) अवधि की निरंतरता: सीखने-सिखाने का यह सफर सीमित (10-15 साल) समय से आगे बढ़कर आचार्य के साथ दीर्घकालीन होता है,
और गुरु के साथ यह आजीवन
और अनंत
हो जाता है। (vii) पुरस्कार की निरंतरता: इसका परिणाम डिग्री और नौकरी से शुरू होकर आचार्य के साथ सम्मान और विश्वास में बदलता है, और गुरु के आशीर्वाद से यह राष्ट्र की सेवा के रूप में निरंतरता प्राप्त करता है। यह निरंतरता शिक्षक
से लेकर आचार्य और अंततः पूर्ण गुरु तक की यात्रा का एक जीवंत प्रवाह है।
महत्वपूर्ण: हर शिष्य- (i) पहले शिक्षक की कक्षा में ज्ञान प्राप्त करता है।(ii) फिर आचार्य के सान्निध्य में चरित्र गढ़ता है।(iii) अंतिम रूप से गुरु से दिव्य दृष्टि पाता है।
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गुरु का समग्र योगदान - राष्ट्र निर्माण में
गुरु
से राष्ट्र निर्माता तक की यात्रा: बुनियादी सूत्र- "गुरु से राष्ट्र निर्माता तक की यह
यात्रा मात्र एक पद परिवर्तन नहीं है, बल्कि भारतीय चेतना के
उस महायज्ञ का विस्तार है, जहाँ एक व्यक्ति ज्ञान के दीप से
संपूर्ण समाज और राष्ट्र के मानस को आलोकित करता है।"
गुरु
का दायित्व और लक्ष्य: प्राथमिक
लक्ष्य: व्यक्तित्व निर्माण -(i) एक श्रेष्ठ व्यक्ति का निर्माण करना। (ii) उसमें चरित्र, साहस, ज्ञान और
संस्कार डालना । (iii) आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास विकसित करना।
परम लक्ष्य: राष्ट्र निर्माण: व्यक्तित्व
निर्माण के माध्यम से-(i) एक-एक नागरिक को तैयार करना ये नागरिक राष्ट्र की रीढ़ बनते
हैं।(ii) एक सशक्त, सुसंस्कृत और आत्मनिर्भर राष्ट्र का
निर्माण।
शिक्षा का मूल सूत्र: "मेन मेकिंग से नेशन बिल्डिंग"। अर्थात्: "श्रेष्ठ
व्यक्तित्व निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण"।
गुरु की तीन स्तरीय प्रक्रिया: (i) प्रथम स्तर: प्राथमिक शिक्षक से शुरुआत। (ii) गाँव के पाठशाला शिक्षक राष्ट्र की नींव के आर्किटेक्ट हैं। (iii) वह बच्चों में जिज्ञासा, सत्यनिष्ठा, सामाजिक समरसता डालता है। (iv) वह भविष्य के नागरिकों की रीढ़ मजबूत करता है।
जापान का उदाहरण: द्वितीय
विश्व युद्ध के बाद जापान ने सबसे पहले शिक्षकों का सम्मान बहाल किया,
क्योंकि वे जानते थे कि राष्ट्र को मलबे से उठाने की जिम्मेदारी
शिक्षकों की ही है।
द्वितीय स्तर: माध्यमिक
और उच्च शिक्षा: (i) आचार्य विद्यार्थियों में गहरी चेतना जागृत करता है। (ii) राष्ट्र के भविष्य नेताओं को तैयार करता है। (iii) नैतिक मूल्यों और सामाजिक दायित्व की समझ देता है।
तृतीय स्तर: शोध और नवाचार: (i) शोधार्थी मौलिक समस्याओं का समाधान खोजते हैं। (ii) शोध निर्देशक (गुरु) उन्हें राष्ट्रीय नीति निर्माण में योगदान देने के लिए
प्रशिक्षित करते हैं। (iii) नवाचार और विकास के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत का सपना
साकार होता है।
सैद्धांतिक से व्यावहारिक आयाम: वास्तविकता का सामना- सिद्धांतों की बात करना आसान है, पर उन्हें धरातल पर
उतारना ही राष्ट्र निर्माण की असली परीक्षा है।
गुरु के व्यावहारिक कार्य: (एक) सामाजिक उत्तरदायित्व : गुरु को: (i) अपने
आश्रम, संस्थान और कक्षा को समाज से जोड़ना चाहिए (ii) शिष्यों को स्थानीय समस्याओं को हल करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए,उदाहरण: भू-जल स्तर, ग्रामीण शिक्षा, स्वास्थ्य आदि। (दो) मूल्य-आधारित शिक्षा : गुरु को- (i) वसुधैवकुटुंबकम् (विश्व एक परिवार है) सिखाना चाहिए। (ii) पर्यावरण संरक्षण की भावना डालनी चाहिए। (iii) कर्तव्य और अधिकार का संतुलन समझाना चाहिए। (तीन) आलोचनात्मक चिंतन : गुरु को- (i) 'रट्टू तोता' पद्धति से परे जाना चाहिए। (ii) शिष्यों को प्रश्न पूछने के लिए उत्साहित करना चाहिए। (iii) तार्किक विश्लेषण की क्षमता विकसित करनी चाहिए। (चार) आत्मनिर्भरता की भावना: गुरु को शिष्य में आत्मविश्वास जगाना चाहिए। (ii) बाहरी सहायता पर निर्भरता नहीं, बल्कि अपनी
क्षमता पर निर्भरता सिखानी चाहिए। गुरु के बिना राष्ट्र अधूरा है।
महत्त्वपूर्ण सिद्धांत: गुरु
का ज्ञान, मार्गदर्शन और संस्कार - ये सभी राष्ट्र के
उज्ज्वल भविष्य का आधार हैं। बिना गुरु के: (i) व्यक्ति केवल ज्ञानी हो सकता है, ज्ञानशील नहीं।
(ii) समाज पढ़ा-लिखा हो सकता है, संस्कृत नहीं। (iii) राष्ट्र समृद्ध हो सकता है, सुसंस्कृत और सशक्त नहीं।
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महान गुरु और विचारकों का योगदान
अब हम उन महान गुरुओं,
विचारकों और संस्थाओं की बात करेंगे, जिन्होंने
राष्ट्र निर्माण में गुरु की भूमिका को जीवंत किया है। (एक)
श्री रामस्वरूप जी - बौद्धिक परतंत्रता से मुक्ति- प्रसिद्ध
प्रखर विचारक और दार्शनिक। भारतीय संस्कृति और ज्ञान प्रणाली के रक्षक। उनकी
प्रसिद्ध कृति: "द हिंदू व्यू ऑफ एजुकेशन" ।
रामस्वरूप जी का मौलिक दृष्टि कोण: (i) आधुनिक वैचारिक प्रपंच से बिल्कुल अलग और गहरा भारतीय चेतना पर आधारित है । राष्ट्र-केंद्रित
और मूल्य-संरक्षक । मानव की परिभाषा। अत्यंत महत्वपूर्ण विचार: "शिक्षा का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि हम मनुष्य को क्या मानते
हैं।"
गलत दृष्टि : यदि मनुष्य को केवल एक 'भौतिक इकाई' या बाजार का उपभोक्ता माना जाता
है, तो शिक्षा: (i) केवल तकनीकी कौशल देने वाली हो जाती है। (ii) केवल रोजगार का साधन बन जाती है। (iii) चरित्र निर्माण से परे हो जाती है। सही दृष्टि : यदि मनुष्य को एक
आध्यात्मिक प्राणी माना जाता है,तो शिक्षा का उद्देश्य:
(i) उसकी संकीर्ण अहंपूर्ण वृत्तियों को मिटाना। (ii) उसकी चेतना का विस्तार करना। (iii) उसे समग्रता का बोध कराना।
निष्कर्ष: "आधुनिक
शिक्षा प्रणाली मनुष्य को केवल शरीर और मशीन मानकर चल रही है। यही संकट की जड़
है।"
रामस्वरूप जी का
आलोचनात्मक विचार: अधिकार बनाम कर्तव्य। समस्या की पहचान।
आधुनिक शिक्षण संस्थान: (i) युवाओं को केवल 'अधिकारों'
के लिए लड़ना सिखा रहे हैं। (ii) परिसरों को
अशांत करने वाले आंदोलनों का अखाड़ा बन गए हैं।
समाधान: एक स्वस्थ राष्ट्र का
निर्माण तब होता है जब शिक्षा नागरिकों में जगाती है- (i) उनके 'कर्तव्यों' के प्रति
गहरी समझ। (ii) राष्ट्रीय चेतना के प्रति अडिग निष्ठा। (iii) सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना।
गुरु की भूमिका : (i) केवल सूचना देना नहीं, बल्कि छात्र को उसकी सभ्यतागत
जड़ों से जोड़ना। (ii) आत्म-खोज की प्रक्रिया में ले जाना और
आंतरिक शक्ति जागृत करना। (iii) बौद्धिक परतंत्रता का भंजन।
(iv) सबसे क्रांतिकारी विचार: "भारत
की आधुनिक शिक्षा प्रणाली अभी भी मानसिक रूप से औपनिवेशिक बंधनों से मुक्त नहीं हो
पाई है।"
समस्या की गहराई: जब
तक भारत के शिक्षक और शोधार्थी: (i) अपनी मौलिक
वैचारिक दृष्टि को छोड़ देते हैं,पश्चिमी या बाहरी
विचारधाराओं के चश्मे से अपने समाज को देखते हैं। तब तक: सच्चा शोध संभव नहीं है। मजबूत
राष्ट्र निर्माता तैयार नहीं हो सकते। गुरु की यह भूमिका: विद्यार्थी को वैचारिक
परतंत्रता से मुक्तकर स्वतंत्र और निर्भय बौद्धिक योद्धा बना दे। सर्वोच्च
आदर्श: "एक गुरु वह है जो शिष्य को अपने विचारों का
गुलाम नहीं, बल्कि अपने विवेक का स्वामी बनाता है।"
योगदान का सार: (i) शिक्षा को केवल पेशे से ऊपर उठाया। (ii) भारतीय
दर्शन को आधुनिकता से जोड़ा। (iii) गुरु की भूमिका को पुनः
परिभाषित किया। (iv) राष्ट्र-निर्माण के लिए सांस्कृतिक आधार
तैयार किया।
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महर्षि दयानंद सरस्वती
महर्षि दयानंद सरस्वती - आर्य समाज का संस्थापक।19वीं सदी के महान समाज
सुधारक। आर्य समाज के संस्थापक (1875)। स्वदेशी और
आत्मनिर्भरता के पहले प्रवक्ता। स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक पिता।
राष्ट्रीयता का आह्वान : 'स्वराज्य, स्वदेशी, स्वभाषा,
स्वधर्म'। महर्षि दयानंद पहले ऐसे संत और
विचारक थे जिन्होंने सबसे पहले दिया: (i) स्वराज्य - अपनी शासन व्यवस्था। (ii) स्वदेशी - अपने देश की वस्तुएं। (iii) स्वभाषा - हिंदी/आर्य भाषा। (iv) स्वधर्म - अपने धार्मिक मूल्य।
ऐतिहासिक प्रभाव: इस
विचार ने आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को अत्यधिक प्रेरित किया: लोकमान्य
तिलक। लाला लाजपत राय (जिन्होंने कहा: "आर्य समाज ही मेरा
वास्तविक घर है")।
राजनीति में धर्म और नैतिकता: मूल
सिद्धांत- "राष्ट्र तभी
सशक्त हो सकता है जब उसके नागरिक चरित्रवान, सत्यनिष्ठ और
कर्तव्य परायण हों।"
'सत्यार्थ प्रकाश' में
आदर्श शासन: उन्होंने आदर्श शासन व्यवस्था (राज्य
धर्म) का विस्तृत खाका खींचा। यहाँ राजा का मुख्य कर्तव्य: (i) प्रजा की रक्षा करना।(ii) न्याय करना। (iii) सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करना।
गुरु-शिष्य परंपरा में
दयानंद का योगदान:
(i) पश्चिमी शिक्षा प्रणाली का विरोध किया।(ii) प्राचीन भारतीय गुरुकुल परंपरा का पुनर्जीवन किया। (iii) आचार्य पद की गरिमा बहाल की।
गुरु का स्थान: (i) माता-पिता से भी ऊंचा होता है। क्यों? माता-पिता
=शरीर देते हैं। गुरु =व्यक्ति को ज्ञान, चरित्र और संस्कार
देकर। । 'दूसरा जन्म' (दिव्य जन्म)
देता है।
सत्य की खोज और तार्किकता: महर्षि
दयानंद के अनुसार गुरु वह नहीं है जो: आंख मूंदकर मानने को कहे। गुरु वह है जो: (i) शिष्य को सत्य और असत्य का विवेक दे। (ii) तर्क,
प्रमाण और वेदों के ज्ञानको सर्वोपरि रखे।(iii)
किसी भी पाखंड या गुरुडम का खुलकर विरोध करे।
शिक्षा
और राष्ट्र निर्माण: महर्षि ने स्पष्ट कर दिया: "ईश्वर सभी सत्यों
का मूल है, इसलिए मनुष्य को अविद्या का नाश और विद्या की
वृद्धि करनी चाहिए।" विशेष जोर: (i)
बालिकाओं की शिक्षा एवं अछूतोद्धार पर। कारण: "जब तक समाज का हर वर्ग शिक्षित और सशक्त नहीं होगा, तब
तक एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है।"
आर्य समाज: (i) राष्ट्र निर्माण के
लिए एक सामूहिक प्रयास था। (ii) गुरु-शिष्य की परंपरा को जनांदोलन में रूपांतरित किया। व्यावहारिक
कार्य: आर्य समाज के माध्यम से: (i) विद्यालयों की
स्थापना (दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज) ।(ii) समाज सुधारकार्यक्रम। (iii) राष्ट्रीय चेतनाका
प्रसार।
महर्षि
दयानंद का योगदान: (i) गुरु को राष्ट्र-संघर्षी बनाया । (ii)
आध्यात्मिकता को राजनीतिक चेतना से जोड़ा। (iii) शिक्षा को आंदोलन का माध्यम बनाया। (iv) भारतीय
ज्ञान परंपरा का पुनरुद्धार किया।
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रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद
(गुरु-शिष्य
का परम उदाहरण)
रामकृष्ण परमहंस (1836-1886): (i) बंगाल के महान संत और आध्यात्मिक गुरु ।(ii)
देवी काली के सिद्ध साधक। (iii) सर्वधर्म
समरसता के प्रतीक।
स्वामी विवेकानंद (1863-1902) - नरेंद्र: (i) भारत के महान युवा आध्यात्मिक नेता ।(ii)
रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य। (iii) भारतीय
पुनर्जागरण के अग्रदूत।
रामकृष्ण मिशन की स्थापना: उद्देश्य-
रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं पर आधारित मिशन की स्थापना: (i)
आध्यात्मिक उत्थान के साथ। (ii) राष्ट्र का
सर्वांगीण निर्माण।
महत्वपूर्ण: गुरु-शिष्य का संबंध: (i)
केवल व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं था। (ii) राष्ट्र और समाज के पुनरुत्थान का एक महान माध्यम बना। (iii) परम मंत्र-"आत्मोमोक्षार्थंजगत्हिताय च"। अर्थात्: स्वयं की मुक्ति और संसार का
कल्याण। जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य: केवल अपनी आध्यात्मिक मुक्ति पाना नहीं है,
बल्कि: समाज के दुखी, पीड़ित और वंचित वर्ग की
सेवा करना ही सबसे बड़ी ईश्वर-पूजा है।
ऐतिहासिक प्रभाव: गुरु
द्वारा दिए गए इसी विचार ने: (i) रामकृष्ण मिशन को संन्यासी
संगठन से आगे ले जाया। (ii) राष्ट्र सेवा का एक जीवंत माध्यम
बना दिया।
स्वामी विवेकानंद की भूमिका: मनुष्य-निर्माणकारी
शिक्षा । "सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को
आत्मनिर्भर, चरित्रवान और सशक्त बनाए।"
रामकृष्ण मिशन ने
देश भर में स्थापित किए: (i) विद्यालय। (ii)
महाविद्यालय। (iii) तकनीकी संस्थान। (iv)
विश्वविद्यालय। विशेषता: आधुनिक विज्ञान और तकनीकी के साथ नैतिक
और आध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय।
उद्देश्य: ऐसे युवाओं को
तैयार करना जो: (i) राष्ट्र की रीढ़ बन सकें। (ii) समाज के संपूर्ण विकास में योगदान दें। (iii) सामाजिक
समरसता और जनसेवा, "ईश्वर सर्वत्र
है" - व्यावहारिक रूप।
रामकृष्ण मिशन ने: (i) जाति,
पंथ और वर्ग के भेदों से ऊपर उठकर हर मनुष्य में ईश्वर के अंश (शिव
रूप में जीव)देखने का संदेश दिया। (ii) सेवा कार्य: मिशन द्वारा संचालित- (i) अस्पताल। (ii) औषधालय। (iii) आपदा राहत कार्य। (iv) ग्रामीण विकास परियोजनाएं। महत्व: "ये
सभी इस बात का प्रमाण हैं कि गुरु से प्राप्त प्रेरणा किस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से
राष्ट्र के कमजोर वर्ग को संबल प्रदान करती है।"
भारतीय संस्कृति और आत्मसम्मान का पुनर्जागरण: जब: (i) देशवासियों का आत्मबल टूट चुका था। (ii)
पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान भूल रहे थे।
(iii) तब स्वामी विवेकानंद: गुरु
के आशीर्वाद और ज्ञान से पूरी दुनिया में भारतीय दर्शन का डंका बजाया। (iv)
परिणाम: इससे- (i) देश के युवाओं में
राष्ट्रीय स्वाभिमान जागा । (ii) गर्व की भावना विकसित हुई। (iii)
स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक भूमि तैयार हुई। (v) योगदान का सार: रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का
योगदान- (i) आध्यात्मिकता को राष्ट्रवाद से जोड़ा। (ii)
व्यक्तिगत मुक्ति को सामाजिक सेवा से संबद्ध किया। (iii) गुरु-शिष्य परंपरा का सबसे जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया । (iv) पूरे समाज को गुरु की भूमिका में स्थापित किया ।
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डॉ.सर हरीसिंह गौर (1870-1949): शिक्षा और संविधान निर्माता: (i)
भारतीय शिक्षा जगत के महान विद्वान। (ii) विख्यात
न्यायशास्त्री (Jurist)। (iii) भारतीय
संविधान सभा के प्रमुख सदस्य (iv) साधारण परिवार से केंब्रिज
तक की यात्रा। (v) शिक्षा को राष्ट्र की प्रगति का मुख्य
हथियार माना।
डॉ. गौर अद्वितीय शिक्षाविद रहे : (i)
दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्थापक प्रथम कुलपति (1922-1926)। (ii) नागपुर विश्वविद्यालय के कुलपति (दो बार)। (iii)
18 जुलाई, 1946 को सागर विश्वविद्यालय की
स्थापना - महान दान वीरता। (iv) यह ब्रिटिश काल के अंत और
स्वतंत्र भारत के ठीक पहले स्थापित हुआ: किसी सरकारी अनुदान से नहीं, डॉ. गौर की गाढ़ी कमाई से नकद: 20 लाख रुपये और 2
करोड़ रुपये (लगभग) की संपत्ति। दृष्टि: डॉ. गौर का सपना: इस
संस्थान को 'ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज' के
समकक्ष बनाना।
डॉ. हरीसिंह गौर: (i) भारतीय
संविधान सभा के महत्वपूर्ण सदस्य। (ii) विधायी और प्रशासनिक
ढांचे को आकार देने में योगदान । (iii) केंद्रीय विधान सभा
के उप-प्रेसीडेंट।
महत्व: उनकी कानूनी विशेषज्ञता ने:
(i) राष्ट्र के कानूनी ढांचे को मजबूत किया। (ii)
भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। (iii)
अग्रणी विधिवेत्ता और लेखक। कानून के क्षेत्र में डॉ. गौर का योगदान
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। महत्त्वपूर्ण कृतियाँ- (i) "द पेनल लॉ ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया" । (ii) "हिंदू
लॉ"।
सामाजिक सुधार: महिलाओं का सशक्तिकरण। डॉ. गौर ने: महिलाओं को वकालत के पेशे में लाने में अहम
भूमिका निभाई। कड़े कानून- उन्होंने सामाजिक सुधार के लिए कड़े कानून बनवाने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साहित्यिक और दार्शनिक चेतना: डॉ.
गौर: उत्कृष्ट साहित्यकार भी थे। कवि के रूप में भी प्रसिद्ध थे। दार्शनिक चेतना से
संपन्न। बौद्ध दर्शन पर कृति: "द
स्पिरिट ऑफ बुद्धिज्म" (The Spirit of Buddhism)। इस
पुस्तक को विश्व स्तर परभारी ख्याति मिली।
डॉ. हरीसिंह गौर
ने साबित किया: "एक सच्चा 'गुरु'
और 'राष्ट्र निर्माता' वह
है जो व्यक्तिगत सुखों से ऊपर उठकर आने वाली पीढ़ियों के बौद्धिक और नैतिक विकास
के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दे।"
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और श्रीगुरुजी
द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर
(1906-1973) - 'श्रीगुरुजी': (i) गुरु और राष्ट्र निर्माण के अद्वितीय विचारक। (ii)
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रवर्तक। (ii) गुरु
की अनोखी संकल्पना। व्यक्ति पूजा का निषेध। (iii) श्रीगुरुजी
की एक अनोखी परंपरा: वे कभी किसी संस्था या संगठन का 'सर्वोच्च
गुरु' नहीं बने। (iv) भगवा ध्वज को
गुरु माना: "भगवा ध्वज" ही संगठन का परम गुरु है। (v)
ध्वज का प्रतीकार्थ: (i) त्याग का प्रतीक। (ii)
बलिदान का प्रतीक।(iii) ज्ञानका प्रतीक ।(iv)
पवित्रता का प्रतीक। महत्व: यह व्यक्ति से परे, सिद्धांत की ओर इंगित करता है। राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना: "मानव का समग्रता में विकास"। राष्ट्र की चिति की पहचान ।
श्रीगुरुजी के विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में हैं: (i)
"वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड"
(We, or Our Nationhood Defined)। (ii) "बंच
ऑफ थॉट्स" (विचार नवनीत)।
राष्ट्र की सांस्कृतिक परिभाषा: श्रीगुरुजी का मानना- (i) राष्ट्र कोई राजनीतिक नक्शा नहीं है।
बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक इकाई है। (ii) भारत एक प्राचीन
राष्ट्र है, जिसकी अपनी एक शाश्वत जीवन-दृष्टि है (हिंदू
राष्ट्रत्व)। यह दृष्टि ही इसकी असली ताकत है।
श्रीगुरुजी
का दृढ़ मानना: "जब तक समाज अंदर से संगठित, अनुशासित और स्वदेशी भाव से ओत-प्रोत नहीं होगा, तब
तक कोई भी राष्ट्र सुरक्षित नहीं रह सकता।"
व्यावहारिक प्रयास: श्री गुरुजी ने आजीवन प्रयास किया: (i) खंड-खंड
में बंटे समाज को जाति, पंथ और वर्ग के भेदों से ऊपर उठाकर
एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया । शिक्षा और चरित्र निर्माण।
श्रीगुरुजी का दृढ़ मत: "राष्ट्र निर्माण की ईंटें
कंक्रीट-पत्थर से नहीं, उच्च चरित्र वाले नागरिकों से बनती
हैं।"
शिक्षा का लक्ष्य: शिक्षा
ऐसी होनी चाहिए जो (i) व्यक्ति के भीतर राष्ट्र के प्रति
कर्तव्य बोध पैदा करे। (ii) कर्तव्य निष्ठा और अनुशासन जगाए।
स्वयंसेवकों के माध्यम से राष्ट्र-यज्ञ: शाखा व्यवस्था- श्रीगुरुजी ने देश भर में शाखाओं के माध्यम से: एक अनुशासित
कार्यकर्ता तंत्र खड़ा किया। आपदा प्रबंधन और समाज सेवा।
इस तंत्र ने: (i) आपदाओं के समय (बाढ़, युद्ध, भूकंप)।(ii) सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ। (iii)
राष्ट्र सेवा की अनूठी मिसाल पेश की।
साधना की भावना: श्रीगुरुजी के लिए राष्ट्र निर्माण: (i) कोई भाषण नहीं ।(ii) कोई राजनीतिक नारा नहीं ।(iii) बल्कि एक सतत 'साधना' और 'यज्ञ' था।
श्रीगुरुजी का
योगदान: (i) राष्ट्र को सांस्कृतिक इकाई के रूप में
परिभाषित किया। (ii) व्यक्ति पूजा से परे, सिद्धांत को प्रमुख बनाया। (iii) गुरु की भूमिका को
संगठनात्मक रूप दिया। (iv) स्वयंसेवा को राष्ट्र निर्माण का
मुख्य माध्यम बनाया।
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विद्या भारती - संगठनात्मक रूप से राष्ट्र
निर्माण
स्थापना और उद्देश्य: विद्या
भारती (विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान)-
(i) राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित शिक्षा का प्रयास। (ii) मूल्य-आधारित शिक्षा का जीवंत उदाहरण। (iii) भारतीय
संस्कृति को आधुनिकता के साथ जोड़ने का कार्य। (iv) शिक्षा
का नया दर्शन: केवल किताबी ज्ञान नहीं।
विद्या भारती की मान्यता: शिक्षा
का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि
विद्यार्थियों में डालना है- (i) भारतीय संस्कृति। (ii) नैतिक मूल्य। (iii) अनुशासन। (iv) राष्ट्रभाव (देशभक्ति)।
व्यावहारिक कार्य: इसके
लिए विद्यालयों में: (i) दैनिक प्रार्थना। (ii) योग। (iii) संस्कृत शिक्षा। (iv) भारतीय उत्सवोंके माध्यम से संस्कार दिए जाते हैं।
सर्वांगीण विकास : चार
आयाम- विद्या भारती बौद्धिक, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास पर समान बलदेता है। उद्देश्य: ताकि
छात्र भविष्य में - जिम्मेदार, सक्षम नागरिक बन सकें।
भौगोलिक विस्तार: विद्या भारती ने- (i) केवल शहरी इलाकों तक अपने आप को सीमित
नहीं रखा । (ii) देश के दूर-दराज के ग्रामीण, वनांचल और जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार किया। (iii) वंचित और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच- जैसे: झारखंड,छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के राज्य।
संस्थाओं का नेटवर्क: विद्या
भारती के माध्यम से: (i) 'शिशु वाटिका'। (ii) 'सरस्वती शिशु मंदिर'। (iii) 'संस्कार केंद्र'। (iv) 'एकल विद्यालय'।
महत्व: यह संस्था समाज के अंतिम
पायदान पर खड़े बच्चों तक शिक्षा पहुँचा रही है।
राष्ट्र- केंद्रित और भारतीय दृष्टि: विद्या भारती की शिक्षा प्रणाली में तीन स्तंभ हैं : (i) भारतीयकरण - भारतीय इतिहास, दर्शन
और महापुरुषों का ज्ञान। (ii) राष्ट्रीयकरण - राष्ट्र की चिति चेतना के प्रति समझदारी। (iii)
आध्यात्मिकरण - आध्यात्मिक मूल्यों का विकास।
उद्देश्य: ताकि युवाओं में- (i) अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान जागे। (ii) राष्ट्र
के प्रति समर्पण विकसित हो।
विद्या भारती की पूरी यात्रा में: (i) समर्पणशील गुरुओं की भूमिका- रीढ़ की
हड्डी। (ii) गुरुओं या आचार्यों की भूमिका। (iii) केंद्रीय पद की गरिमा - यहाँ शिक्षकों
को केवल वेतनभोगी कर्मचारी नहीं माना जाता है । (iv) यहाँ
शिक्षकों को 'राष्ट्र निर्माता' के रूप
में देखा जाता है। (v) यहाँ शिक्षक उच्च आदर्शों और सेवाभाव के
साथ छात्रों का मार्गदर्शन करते हैं।
विद्या भारती का योगदान: (i) शिक्षा को एक सामाजिक और राष्ट्रीय मिशन बनाया।
(ii) व्यावहारिक स्तर पर राष्ट्र निर्माण का कार्य किया। (iii) लाखों शिक्षार्थियों को संस्कारवान नागरिक बनाया। (iv) गुरु की भूमिका को जीवंत रखा।
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संत गहिरा गुरु
छत्तीसगढ़ के महान संत,
तपस्वी और समाज सुधारक संत गहिरा गुरु की राष्ट्र निर्माण की
परिकल्पना- (i) सांस्कृतिक
पुनरुत्थान। (ii) नैतिक शुचिता । (iii)
वनवासी समाज का सशक्तिकरण।
व्यावहारिक कार्य: ग्रामीण स्तर पर अनूठी पहल: (i) 'धान मेला' जैसी व्यवस्था - ग्रामीणों को अन्न और आर्थिक सहायता।
(ii) विद्यालयों की स्थापना - दुर्गम
वनांचल में संस्कृत शिक्षापर विशेष जोर।
राष्ट्रप्रेम का परिचय:
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान- (i) तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर। (ii) अपने हजारों वनवासी शिष्यों के साथ देश की रक्षा के लिए सीमा पर जाने की
पेशकश, यह राष्ट्रप्रेम की परम पराकाष्ठा थी।
संत
गहिरा गुरु का सार्थक संदेश: "राष्ट्र
का सच्चा निर्माण महलों या कागजी योजनाओं से नहीं, बल्कि
गांवों की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को शिक्षित, संस्कारी,
स्वावलंबी और राष्ट्र-समर्पित बनाने से होता है।"
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आदर्श
गुरु डॉ. लज्जा राम तोमर: विद्या भारती के विस्तारक
पंचपदी शिक्षण पद्धति के
प्रवर्तक: योगदान- (i) विद्या भारती को देशव्यापी बनाने में महत्वपूर्ण
भूमिका। (ii) पंचपदी शिक्षण पद्धतिका विकास और प्रयोग। (iii) सरस्वती शिशु मंदिर योजना में सक्रिय भूमिका।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रासंगिकता: आज
राष्ट्रीय शिक्षा नीति NEP-2020 में जिस पंचपदी और पंचकोशआधारित
शिक्षण की बात हो रही है- उसके उत्कृष्ट प्रयोग डॉ. लज्जा राम तोमर ने पहले ही किए
थे।
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) माधव गोविंद
दातार- SSB
तैयारी और युवा सशक्तिकरण: अनोखी पहल। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद
(2009 में ) : (i) युवाओं को SSB
की तैयारी कराने का कार्य शुरू (ii) कभी फीस
नहीं मांगी,पूरी तरह निःस्वार्थ सेवा ।
परिणाम: 17 वर्षों
में- लगभग 250 युवा भारतीय सेना में अधिकारी बने और कई महत्वपूर्ण सैन्य दायित्वों तक पहुंचे।
गुरु-शिष्य संबंध: सबसे
सुंदर बात- (i) पहले: शिष्य मिठाई लाते थे। (ii) फिर दातार जी ने परंपरा बदली - एक पौधा लगवाते थे। (iii) आज उनके बगीचे में हर पौधा एक सफल शिष्य की याद है।
महत्व: "हर
पेड़ के पीछे एक सपना है, और हर सपना उस गुरु के योगदान की
याद दिलाता है।"
प्रो राजेन्द्र सिंह रज्जू
भैया –
पद्मश्री मोहन नागर -
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वर्तमान में गुरुओं का भारत का सपना- 2047
आत्मनिर्भर और सशक्त भारत के लिए 2047
में भारत को: (i) आत्मनिर्भर बनाना है। (ii) सशक्त और विकसित बनाना
है। (iii) विश्व को नेतृत्व देने वाला बनाना है। इसके लिए
आवश्यक है: (i) शिक्षक, आचार्य और
गुरु - तीनों स्तरों पर योग्य व्यक्तित्व। (ii) समाज की सक्रिय भागीदारी। (iii) संस्कृति और
आधुनिकता का संतुलन।
प्रत्येक शिक्षक,
आचार्य और गुरु का आह्वान: तीन स्तरों में से
कम से कम- (एक) हर शिक्षक को अपनी भूमिका को समझना चाहिए- (i) कम से कम एक आदर्श 'शिक्षक' तो
बने। (ii) अपने विषय में पारंगत, उत्साही
और प्रभावी। (दो ) अगर संभव हो तो 'आचार्य' बने- (i) अपने आचरण से सिखाए। (ii) चरित्र का निर्माण करे। (तीन) एक दिन 'गुरु' भी बन सकता है- (i ) समाज
का मार्गदर्शक। (ii ) राष्ट्र का निर्माता।
अंतिम संदेश- तस्मै श्री गुरुवे
नम: | ॐ गुरदेवाय नम:। "गुरु से राष्ट्र निर्माता तक की यह यात्रा - केवल एक व्यक्तिगत यात्रा
नहीं है। यह एक सामूहिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रयास
है।"
निष्कर्ष और संदेश: गुरु की शक्ति का सार- गुरु केवल व्यक्ति नहीं है
– गुरु एक शक्ति है। यह शक्ति- (i) विचारों के
माध्यम से कार्य करती है। (ii) आचरण के माध्यम से प्रकट होती
है। (iii) समाज को परिवर्तित करती है। (iv) राष्ट्र का निर्माण करती है।
जब प्रत्येक शिक्षक अपने
दायित्व को समझ लेता है, जब प्रत्येक आचार्य अपने आचरण से सिखाता है,
जब प्रत्येक गुरु समाज का मार्गदर्शक बन जाता है, तभी सच में राष्ट्र का निर्माण होता है।
इसीलिए कहा गया है
कि , "शिक्षक कभी
सेवानिवृत्त नहीं होता। वह बच्चों के लिए हमेशा सम्मान का पात्र शिक्षक ही रहता
है।"
"भारत की नियति, भारत के गुरुओं की गुणवत्ता पर
निर्भर करती है।"
धन्यवाद।