Wednesday, 26 November 2025

जाति गाली देने का अधिकार नहीं देती

मित्र आप किन पुतलों/मुखौटों से अपेक्षा कर रहे हैं कि वे किसी की बेटी -बहू- मां पर अवांछित, अनपेक्षित टिप्पणी/व्यवहार करने वाले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे?

जो जाति की राजनीति करते हों!

जो जाति के आधार पर सरपंच से लेकर सांसद, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति चुनते हों!

कौम के नाम पर जिहाद करते हो!

 सेवा के नाम पर मतांतरण और राष्ट्रान्तरण की नींव रखते हों!

 उनसे अपेक्षा कि मुंह खोलेंगे?

दरअसल यह जाति में जन्म लेने का दोष नहीं, जीवन का मूल्य न समझने का हस्र है।

राष्ट्र से अधिक समाज और समाज से अधिक जाति और जाति से अधिक स्वयं की महत्वाकांक्षा का परिणाम है।

यह एक सामाजिक सरोकार का विषय है कि आप आर्थिक रूप से कमजोर घर में पैदा हुए तो दलित हो गये??

आप तथाकथित जाति में पैदा हो गये तो ऊंच,नीच हो गये?

हम भूल जाते हैं कि जन्म,मरण अपने हाथ में नहीं है!

सूर,कबीर, तुलसी, तिरुवल्लुवर, महावीर, मीरा, कवष यलूष, बाल्मीकि सब की तो जातियां थी।

आखिर उन्हें तो कोई जातिगत आरक्षण नहीं था!!

कर्म के आधार पर ही वे सब पूज्य हैं।

फिर पुरखों ने पुरखों को प्रताड़ित किया इसलिए उनकी संतानें किसी भी मानवीय मूल्यों को रौंदने के अधिकारी हो गये?

भाई! पुरखों को पुरखों से निपटने दो न! वे जहां होंगे निपट लेंगे। उनके नाम पर जो लाभ लेना है लो। पर कुतर्क कर अपने -अपने पुरखों का अपमान न करें।

कहने को हम सबसे आधुनिक युग में जी रहे हैं। और गाली देने को बड़ी उपाधि लेकर अज्ञानी का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं?

कहने को तो यह भी है कि हम अध्यात्म- प्राण राष्ट्र के वैश्विक नागरिक हैं!!

क्या क्षम्य/अक्षम्य के निर्णय के लिए समाज, जाति, देश और राष्ट्र सामर्थ्यवान हो चुका है?

राजनीतिक दृष्टिकोण से मत सोचियेगा।
जीवन मूल्यों का विषय है। जातीय अस्मिता का विषय है। राष्ट्र के 'स्व' का विषय है।
🙏
27/11/25
भोपाल 

Saturday, 22 November 2025

तंत्र की धुन में मंत्र भूले

दरअसल तंत्र की धुन में हम मंत्र भूल गये।
भूल गये की मंत्र के बिना तंत्र चल नहीं सकता।

सरकार मंत्र विहीन तंत्र पर चल रही है।
मंत्र के अधिष्ठाता मंत्री तो हैं, पर वे संत्री पर निर्भर हो गये हैं।

इसका परिणाम -

 शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाने का अर्थ जीवन की कला से वंचित करना है।

शिक्षा मनुष्य की चेतना को जागृत करती है।

अर्थाधारित शिक्षा पशु (सुविधा भोगी मनुष्य) बनाती है।

ऐसा क्यों हो रहा है?
कारण -

कुटुम्ब बिखर गये। 
संवाद बंद हो गये।
प्रवोधन शून्य हो गये।
प्रलोभन साकार हो गये।
इसीलिए रोजगार आधारित शिक्षा से विद्यार्थी बेकार हो गये।

शिक्षा जब आत्मसुखाय, लोकहितार्थ थी तब रोजगार अनुपस्थिति था।

मस्तिष्क ज्ञान के उत्तुंग शिखर को तलाश करता था।

आज मस्तिष्क रोजगार की चिंता में स्किल डेवलपमेंट प्रोग्रामिंग पर है।

निदान -

कुटुम्ब प्रबोधन इसका उपाय है।

नौनिहालों के माता -पिता माने न माने बाप- दादाओं को कान में-
 संतोष,तप, त्याग, परोपकार का मंत्र फूंक देना चाहिए।

अवसर आने पर ऋतु (पराशक्ति) उसे पल्लवित करेगी। 

रोजगार भी बढे़गा
कुटुम्ब भी बचेगा 
स्वाभिमान भी जगेगा
नर नारायण की यात्रा करेगा 
भारत +  वर्ष के साथ बढ़ेगा 
शिक्षा सौभाग्य का आधार गढ़ेगा 
अखिल विश्व का हाहाकार हरेगा।

सादर
22/11/25

Friday, 21 November 2025

उच्च शिक्षा और नैक की नैतिकता

उच्च शिक्षा के नैक और कुलगुरुओं को लेकर भास्कर के स्टेट एडीटर की तीखी टिप्पणी विचारणीय है। किंतु परिदृश्य कुछ और ही संकेत करते हैं।

* नैक की कार्यपद्धति मध्यप्रदेश में ही नहीं पूरे देश में चिंता का विषय है।

* सरकार उच्च शिक्षा के लिए विश्व बैंक से लोन लेती है। उसे बांटना है। कुछ मापदंड तो तय होने ही चाहिए।

* नैक मूल्यांकन की एक संस्था है,वह अकादमिक से लेकर आधारभूत संरचना, शिक्षक -विद्यार्थियों, शोध, छात्र कल्याण हेतु गठित समितियों, छात्रावास आदि आदि को लेकर जानकारी चाहती है।

* महाविद्यालय, विश्वविद्यालय जानकारी देते हैं। उस पर मूल्यांकन कर अनुदान दिया जाता है। आटोनामी मिलती है, डीम्ड का दर्जा भी।

* इस पर मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा विभाग ने विगत दस वर्षों में बहुत गम्भीरता से काम किया है।

* इसके लिए शिक्षा में प्रदेश स्तर पर नैक प्रकोष्ठ बने हैं। फिर भी प्रश्न उठ रहे हैं तो विचार तो होना ही चाहिए।

.......

दूसरा बिंदु राजीव गांधी विश्वविद्यालय के कुल गुरुओं के स्तीफे का है। 

पता नहीं कौन-सा तकनीकी कारण है कि तकनीकी विश्वविद्यालय के ऊपर शनि की ढैया, फिर साढ़े साती, फिर राहु की काली छाया (कारागार और हथकड़ी) ले कर पीछे पड़ी है । 

नाम बदलकर देखना चाहिए? वैसे व्यापम नाम बदलकर भी प्रयोग असफल ही है। फिर भी..

.....

तीसरा पक्ष पर्दे के पीछे से उच्च शिक्षा चलाने वालों पर है। कुलगुरुओं की नियुक्ति का है। 

* धुएं के पीछे देवों की आहुतियों की कुछ धुंध तो है। कुछ तपिश भी है। कुछ रह- रह कर दिखती आग भी।

* हो भी क्यों न, लक्ष्य रामराज्य की स्थापना नहीं, रावण के (वाम के, यूरो सेंट्रिक सोच को) आतंक मिटाने का है।
...........

दरअसल चिंता जायज है, क्योंकि स्थिति गंम्भीर है।

किंतु कुछ प्रश्न हैं -

* कुलगुरुओं की सर्च कमेटी कौन बनाता है? उत्तर -राजभवन।

* नाम देने का भी एक नियम है। तीन जगह से नाम आते हैं।

.......

योजना पर निगरानी यहीं से होनी चाहिए -
* चयन समिति में जो नाम आते हैं, क्या वे पैनल तैयार करने में दबाव मुक्त होते हैं? उत्तर -अनुभव बताता है नहीं।

(एक कुलपति उस समय यही शब्द था, मैंने कहा, वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति का चयन कैसे हुआ ?)

* (शब्द पर ध्यान दें) मैंने भाई साहब से पूछा, क्या करना है? भाई साहब ने जो कहा, उसे बनना ही था। भाई साहब कौन है,ऊपर वाला जाने?
...............

* अब यहां से पर्दे के पीछे का खेल समझना होगा। आखिर पर्दे के पीछे के खेल का कारण -

* मंशा बहुत साफ है, प्रामाणिक लोगों के हाथ में कुलपति का भार सौपना।

इस प्रामाणिकता के चयन में -
* शैक्षणिक योग्यता पीछे छूटती है। 
* प्रशासनिक दक्षता पीछे छूटती है।

 तब क्या होता है -
* जातिगत संतुलन।
* भाषा -भाषी प्रेम।
* जातिगत समीकरण।
* संत्ता संतुलन के फैक्टर।
* कुछ-कुछ और भी।

........

फिर आप अपेक्षा करेंगे कि -
* गुणवत्ता युक्त शिक्षा संस्थान हों।
* चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास हो।
*राष्ट्र सर्वोपरि की दृष्टि हो।
.......

होता क्यों नहीं?
* कुलपति विश्वविद्यालय का अकादमिक प्रमुख होता है, किंतु वह अकादमिक काउंसिल, बोर्ड आफ स्ट्डीज, सामान्य परिषद्, कुलाधिपति कार्यालय , उच्च शिक्षा संचालनालय और मंत्रालय के चाबुक से नाचता है।

* फिर भाई साहब भी मानस में विरंचि जैसे स्मरण रहते हैं।

* कुलपति बने रहने और आगे का भविष्य भी मंथरा की तरह बुद्धि को भ्रमित करता है।

* बेचारी चेतना चेतावनी की शिकार बन जाती है। देवताओं का कारज पूरा करने सरस्वती मजबूर है।
........

*आधार भूत संरचना में ठेकेदार, कुलसचिव, नीचे का तपका,आडिट शाखा, अनुदान देने वाली संस्था सभी मलाई चाहते हैं। फिर सुचिता को चाहने वाला कुलगुरु क्या करेगा?

* शिक्षकों की नियुक्ति में कुलगुर को चयन किये जाने वालों की सूची पहले ही दे दी जाती है। फिर कुलपति को यह भी सलाह दी जाती है कि इंटरव्यू में किसे बुलाना है। ऐसे में कुल गुरु से सुचिता की अपेक्षा?
..........

अकादमिक कार्य में-
*पाठ्यक्रम निर्माण के लिए जो व्यक्ति नामित किए जाते हैं, उसके लिए वरिष्ठता देखी जाती है। कुछ व्यक्ति नामित होते हैं। किंतु वे वह करने में सक्षम सिद्ध नहीं होते।

* शोध विषय के चयन में भी यही होता है।
.....

कुल मिलाकर खेल पर्दे के पीछे से इतना ही होता है कि रा शि नीति को ठीक से लागू करा सकने वाला कुलगुरु आये।
......

* किंतु परिदृश्य यह कहता है कि अभी प्रयोग सफल नहीं हो रहा है। फिर चिंता भी नहीं , नीति 2047 तक जायेगी।

* हां,यह अवश्य है कि तब तक गंगा मैली हो न हो यमुना और गंगा का संगम सरस्वती की सुचिता बचा पाता है या सरस्वती दूरबीन से देखने लायक ही बचेगी!!
.......

एक बात और है जो सुधार को गति नहीं दे पा रही है, पिछले अक्षम कुलपतियों से सीख न लेना।

* पांच साल बहुत होते हैं! फिर अपेक्षित परिणाम न मिलने पर भी ताजपोशी क्यों? 

* क्या यह सम्बंधों की मजबूरी, जातीय समीकरणों के दबाव या और कुछ भी। यह विचार करना चाहिए।
.......…

सरकार अठारह साल के पार बालिग है। 

* कुलपति की नियुक्ति ही नहीं, फीस नियामक आयोग , निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग , अकादमियां , संस्थान , रूसा -विश्वबैंक , विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन योजना , इन सब में नियुक्त में सजगता और वर्ष- दर -वर्ष से जमें महानुभावों के कार्यों की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए। सब खराब नहीं हैं। जो अपेक्षाकृत परिणाम दे रहे हैं उन्हें अवसर दिया ही जाना चाहिए।

.........

 व्यक्ति मोह से लेकर सम्बंधों का मोह ही तो महाभारत है।( इसे रक्त सम्बन्ध नहीं कहेंगे। )
......

आप तो ! यह ही कहेंगे- लिखते रहिए, बुराई लीजिए, होना जाना कुछ नहीं। 'नक्कारखाने में तूती' ही सिद्ध होना है।

किंतु मित्रों! 'पुरुष सिंह नहिं होत है,समय होत बलवान।' 

..........
स्पष्टीकरण -

भास्कर के एडीटर की टिप्पणी पर सहज प्रतिक्रिया है, किसी व्यक्ति विशेष से कोई लेना-देना नहीं।

* जिनको बात अप्रिय लगे वे आने वाले समय में अपने आप को सिद्ध करें ताकि समाचार पत्रों को सम्पादकीय लिखने अवसर न मिले।

* और राष्ट्र हित मे पर्दे का खेल जारी रहे। वे असुविधा महसूस न करें ।

22/11/25

Thursday, 13 November 2025

दोहे फेसबुक पर प्रतिक्रिया में

दोहे -

मन लागो मोर अमीरी में।
उलझा मन लगा तमीरी में ।।

डाल डाल में पात पात में 
खुरचन अटका घात घात में।।

परम्परा भाषा भूषा गुलदस्ते में 
राजभाषा सिकुड़ गई है बस्ते में।।