उच्च शिक्षा के नैक और कुलगुरुओं को लेकर भास्कर के स्टेट एडीटर की तीखी टिप्पणी विचारणीय है। किंतु परिदृश्य कुछ और ही संकेत करते हैं।
* नैक की कार्यपद्धति मध्यप्रदेश में ही नहीं पूरे देश में चिंता का विषय है।
* सरकार उच्च शिक्षा के लिए विश्व बैंक से लोन लेती है। उसे बांटना है। कुछ मापदंड तो तय होने ही चाहिए।
* नैक मूल्यांकन की एक संस्था है,वह अकादमिक से लेकर आधारभूत संरचना, शिक्षक -विद्यार्थियों, शोध, छात्र कल्याण हेतु गठित समितियों, छात्रावास आदि आदि को लेकर जानकारी चाहती है।
* महाविद्यालय, विश्वविद्यालय जानकारी देते हैं। उस पर मूल्यांकन कर अनुदान दिया जाता है। आटोनामी मिलती है, डीम्ड का दर्जा भी।
* इस पर मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा विभाग ने विगत दस वर्षों में बहुत गम्भीरता से काम किया है।
* इसके लिए शिक्षा में प्रदेश स्तर पर नैक प्रकोष्ठ बने हैं। फिर भी प्रश्न उठ रहे हैं तो विचार तो होना ही चाहिए।
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दूसरा बिंदु राजीव गांधी विश्वविद्यालय के कुल गुरुओं के स्तीफे का है।
पता नहीं कौन-सा तकनीकी कारण है कि तकनीकी विश्वविद्यालय के ऊपर शनि की ढैया, फिर साढ़े साती, फिर राहु की काली छाया (कारागार और हथकड़ी) ले कर पीछे पड़ी है ।
नाम बदलकर देखना चाहिए? वैसे व्यापम नाम बदलकर भी प्रयोग असफल ही है। फिर भी..
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तीसरा पक्ष पर्दे के पीछे से उच्च शिक्षा चलाने वालों पर है। कुलगुरुओं की नियुक्ति का है।
* धुएं के पीछे देवों की आहुतियों की कुछ धुंध तो है। कुछ तपिश भी है। कुछ रह- रह कर दिखती आग भी।
* हो भी क्यों न, लक्ष्य रामराज्य की स्थापना नहीं, रावण के (वाम के, यूरो सेंट्रिक सोच को) आतंक मिटाने का है।
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दरअसल चिंता जायज है, क्योंकि स्थिति गंम्भीर है।
किंतु कुछ प्रश्न हैं -
* कुलगुरुओं की सर्च कमेटी कौन बनाता है? उत्तर -राजभवन।
* नाम देने का भी एक नियम है। तीन जगह से नाम आते हैं।
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योजना पर निगरानी यहीं से होनी चाहिए -
* चयन समिति में जो नाम आते हैं, क्या वे पैनल तैयार करने में दबाव मुक्त होते हैं? उत्तर -अनुभव बताता है नहीं।
(एक कुलपति उस समय यही शब्द था, मैंने कहा, वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति का चयन कैसे हुआ ?)
* (शब्द पर ध्यान दें) मैंने भाई साहब से पूछा, क्या करना है? भाई साहब ने जो कहा, उसे बनना ही था। भाई साहब कौन है,ऊपर वाला जाने?
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* अब यहां से पर्दे के पीछे का खेल समझना होगा। आखिर पर्दे के पीछे के खेल का कारण -
* मंशा बहुत साफ है, प्रामाणिक लोगों के हाथ में कुलपति का भार सौपना।
इस प्रामाणिकता के चयन में -
* शैक्षणिक योग्यता पीछे छूटती है।
* प्रशासनिक दक्षता पीछे छूटती है।
तब क्या होता है -
* जातिगत संतुलन।
* भाषा -भाषी प्रेम।
* जातिगत समीकरण।
* संत्ता संतुलन के फैक्टर।
* कुछ-कुछ और भी।
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फिर आप अपेक्षा करेंगे कि -
* गुणवत्ता युक्त शिक्षा संस्थान हों।
* चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास हो।
*राष्ट्र सर्वोपरि की दृष्टि हो।
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होता क्यों नहीं?
* कुलपति विश्वविद्यालय का अकादमिक प्रमुख होता है, किंतु वह अकादमिक काउंसिल, बोर्ड आफ स्ट्डीज, सामान्य परिषद्, कुलाधिपति कार्यालय , उच्च शिक्षा संचालनालय और मंत्रालय के चाबुक से नाचता है।
* फिर भाई साहब भी मानस में विरंचि जैसे स्मरण रहते हैं।
* कुलपति बने रहने और आगे का भविष्य भी मंथरा की तरह बुद्धि को भ्रमित करता है।
* बेचारी चेतना चेतावनी की शिकार बन जाती है। देवताओं का कारज पूरा करने सरस्वती मजबूर है।
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*आधार भूत संरचना में ठेकेदार, कुलसचिव, नीचे का तपका,आडिट शाखा, अनुदान देने वाली संस्था सभी मलाई चाहते हैं। फिर सुचिता को चाहने वाला कुलगुरु क्या करेगा?
* शिक्षकों की नियुक्ति में कुलगुर को चयन किये जाने वालों की सूची पहले ही दे दी जाती है। फिर कुलपति को यह भी सलाह दी जाती है कि इंटरव्यू में किसे बुलाना है। ऐसे में कुल गुरु से सुचिता की अपेक्षा?
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अकादमिक कार्य में-
*पाठ्यक्रम निर्माण के लिए जो व्यक्ति नामित किए जाते हैं, उसके लिए वरिष्ठता देखी जाती है। कुछ व्यक्ति नामित होते हैं। किंतु वे वह करने में सक्षम सिद्ध नहीं होते।
* शोध विषय के चयन में भी यही होता है।
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कुल मिलाकर खेल पर्दे के पीछे से इतना ही होता है कि रा शि नीति को ठीक से लागू करा सकने वाला कुलगुरु आये।
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* किंतु परिदृश्य यह कहता है कि अभी प्रयोग सफल नहीं हो रहा है। फिर चिंता भी नहीं , नीति 2047 तक जायेगी।
* हां,यह अवश्य है कि तब तक गंगा मैली हो न हो यमुना और गंगा का संगम सरस्वती की सुचिता बचा पाता है या सरस्वती दूरबीन से देखने लायक ही बचेगी!!
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एक बात और है जो सुधार को गति नहीं दे पा रही है, पिछले अक्षम कुलपतियों से सीख न लेना।
* पांच साल बहुत होते हैं! फिर अपेक्षित परिणाम न मिलने पर भी ताजपोशी क्यों?
* क्या यह सम्बंधों की मजबूरी, जातीय समीकरणों के दबाव या और कुछ भी। यह विचार करना चाहिए।
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सरकार अठारह साल के पार बालिग है।
* कुलपति की नियुक्ति ही नहीं, फीस नियामक आयोग , निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग , अकादमियां , संस्थान , रूसा -विश्वबैंक , विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन योजना , इन सब में नियुक्त में सजगता और वर्ष- दर -वर्ष से जमें महानुभावों के कार्यों की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए। सब खराब नहीं हैं। जो अपेक्षाकृत परिणाम दे रहे हैं उन्हें अवसर दिया ही जाना चाहिए।
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व्यक्ति मोह से लेकर सम्बंधों का मोह ही तो महाभारत है।( इसे रक्त सम्बन्ध नहीं कहेंगे। )
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आप तो ! यह ही कहेंगे- लिखते रहिए, बुराई लीजिए, होना जाना कुछ नहीं। 'नक्कारखाने में तूती' ही सिद्ध होना है।
किंतु मित्रों! 'पुरुष सिंह नहिं होत है,समय होत बलवान।'
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स्पष्टीकरण -
भास्कर के एडीटर की टिप्पणी पर सहज प्रतिक्रिया है, किसी व्यक्ति विशेष से कोई लेना-देना नहीं।
* जिनको बात अप्रिय लगे वे आने वाले समय में अपने आप को सिद्ध करें ताकि समाचार पत्रों को सम्पादकीय लिखने अवसर न मिले।
* और राष्ट्र हित मे पर्दे का खेल जारी रहे। वे असुविधा महसूस न करें ।
22/11/25