बधाई आदरणीय आनन्द कुमार सिंह जी।
आपकी लेखनी बहुआयामी है। बस थोड़ा सा समय के पंख पर बैठने का प्रयास करना चाहिए।
दरअसल कविता,गीत, ग़ज़ल लगभग दस -पन्द्रह साल में विषय वस्तु बदलती हैं।
आज वैश्विक परिदृश्य में मत -पंथ के हस्तक्षेप, बढ़े हैं।
बेरोजगारी युवाओं को माडरेट गिरिमिटिया बनना उनकी नियति बनती जा रही है।
हमारे अतीत में गांव बसा है, क्योंकि हम अस्सी के दशक के पहले से जुड़े हैं।
हमारे अतीत में गांव, नदी, तालाब, जंगल, पहाड़,खेत -खलिहान,बाग -बगीचे, दो बैलों की जोड़ी, गोबर, कच्चे खपड़ैल मकान, गोबर से लीपा आंगन बसा है।
पगडंडियों में गाय,भैंस,बकरी, बोझा सर पर लादे आशावादी श्रमिक सभी एक साथ आते जाते थे। इसीलिए कभी -कभी नदी के कच्चे लकड़ी के पुल पर दो बकरियां आमने-सामने खड़ी मिल जाती थीं।
भोर में पशुओं की घंटियां, घर के आंगन -ओसार के चूल्हों से उठता धुआं, धान कुटती महिलाओं के गीत। अनाज पीसती गोतनी, यह अब सब गांव के लिए भी अतीत बन चुके हैं।
मुडेंर पर बैठी गौरया, बबूल के पेड़ का कौवा, आम के कोंदर में पलते पंछियों के अंडे, कांव -कांव कर मेहमानों के आने का संदेश देता कौवा, कैसे विस्मृत में जा सकते हैं।
बनियान-गमछा , सादी सी फलालैन की धोती, खादी की कुर्ती , चर्र चूं करता जूता अब कहां देखने को मिलेंगे,इस आई टी के विद्यार्थियों को।
अनेक ऐसे हृदय,मन -मस्तिष्क में बसे दृश्य पीढ़ी- दर- पीढ़ी भविष्य को बताना साहित्य का ही तो काम है।
वस्तुत: इतिहास तो तारीख है किन्तु साहित्य उस तारीख को बेध कर अतीत में जीने की कला।
इसलिए साहित्य में - कविता में, कहानी और उपन्यासों में बचा कर रखना अतीत के आइने का काम करेगा।
नब्बे के दशक के बाद की पीढ़ी या तो गांव से शहर आ गई या गांव उनके लिए अतीत का गौरव या पुरखों की पहचान बन चुकी है।
एक बड़ी गांवों की संतानों की संतानें जो शहर में जन्मीं,शहर में पलीं और गांव से शहर,शहर से बड़े शहर फिर निकल पड़ीं बड़े शहर से समुंदर पार की यात्रा में। उनकी याद में सुरती बिसुरती मां अकेले में भिंगा लेती है वह आंचल जिस पर कभी वह खेलता था। किसी का आहट पाते ही बंद हो जाती हैं सिसकियां, हिचकियों का बहाना ले पड़ोसन से मुस्करा कर बैठने को बोल उठती है।
फिर भी उनके लिए भारत अभी भी गांवों का देश है। गांव की पगडंडी केवल शहर को नहीं जाती,वह अरण्य की यात्रा करती पर्वतारोही भी बनाती है।
वह छोटे बड़े अरण्यों से हिमालय की कंदराओं तक ले जाती है।यह वही पगडंडी है जो शंकराचार्य को चार धाम स्थापित करने के लिए ले जाती है।
यही पगडंडी गांव के, वन के, पहाड़ों के षडचक्रों को पार करती सुषुम्ना बन ब्रह्म रंध में पहुंच सत्य और ऋत का दर्शन कराती है। चारों पुरुषार्थ को प्राप्त कराती है।
यह गांव शहर बन रहा है। शहर विश्व बन रहा है। हम वैश्विक तो बन रहे हैं पर गांव की पगडंडी से कट कर।
साहित्य और साहित्यकार ही वह पगडंडी है जो सड़क को, पुल को, रेल की पटरियों को, हवाई मार्गों से लेकर जल यात्रा तक गंगोत्री की डुबकी लगवा सकती है।
संस्कृति, संस्कार, रोजगार और व्यवहार को बचाने आखिर राष्ट्र धर्म तो निभाना ही होगा। साहित्यकार के नाते, नागरिक के नाते।
शुभम् 12/02/26
No comments:
Post a Comment