हिंदी को हिन्दी की हिंदी में शुभकामनाएं
हिन्दी को लेकर शुभकामनाएं आ रही हैं। आना भी चाहिए। हिंदी भाषियों के लिए तो गौरव की बात है।
देश-विदेश के उन सभी हिंदी प्रेमियों का जिनका हिन्दी भाषा और उसके बोलियों से सम्बन्ध है, इनको भी शुभकामनाएं ,जो इसके गौरव को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।
सृष्टि के रचयिता ने प्रत्येक राष्ट्र को अपनी भावना व्यक्त करने को भाषा दी है। किसी भी राष्ट्र के सृजन, अभ्युदय, पतन, पुनरूत्थान और उसके जीवनोद्देश्य की अभिव्यक्ति भाषा से ही होती है।
आज सविधान सभा के उन माननीय सदस्यों के स्मरण का भी दिन है, जिन्होंने सहमति-असहमति के बीच हिंदी को राजभाषा का स्थान दिलाया।
गौरव बोध और सम्मान उन महनीयों के लिए भी जिन्होंने हिंदी को हिंदुई, हिंदुस्तानी, उर्दू के गंगा जमुनी संस्कृति से , भागीरथ प्रयत्न कर ( संस्कृत, क्षेत्रीय बोलियों और भाषा की भारतीय परंपरा से परिष्कृत कर) हिन्दी को त्रिवेणी बनाकर हमें दिया।
त्रिवेणी इसलिए कि इस हिन्दी में हमारा स्वर्णिम अतीत, हमारा उद्वेलित वर्तमान और विश्व के कल्याण की हमारी कामना को सजोये भविष्य है, जो संसृति को अवगाह्न करने का आमंत्रण देता है।
अतीत का स्मरण इसलिए भी की उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम तक से विश्व के सभी निवासियों को, भारत के सभी भाषा- भाषियों को राम, कृष्ण और शिव के जीवन का कालजयी उज्जवल चरित हमारे सामने आईने की तरह रखता है, जिसमें हमें अपना चेहरा देखने का बार-बार अवसर मिलता है ।
किसी भी राष्ट्र की भाषा केवल विचार अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती। वह केवल वर्ण-वर्तनी, छंद और व्याकरण नहीं होती । वह राष्ट्र में निवास करने वालों का वर्तमान-अस्तित्व बोध भी होती है ।
भाषा और उसके वर्ण मिलकर विद्या के सभी अंगों (व्याकरण ,कल्प, ज्योतिष,निरुक्त, छंद और शिक्षा) की
अवधारणा को स्पष्ट करते हैं।
राष्ट्र और उसकी संस्कृति को स्वर देते हैं। भाषा राष्ट्र की विश्व में पहचान स्थापित कराती है। भाषा राष्ट्र की निजता, उसका गुणधर्म, उसकी पहचान, उसकी आकृति, उसके अस्मिता और उसके भूगोल का परिचय कराती है ।
भाषा किसी भी राष्ट्र का एक जीवन्त, जाग्रत भविष्य का स्वर होती है।
यदि भारत की बात करें तो भाषा राष्ट्र की तरह स्वयंभू है। भारतवर्ष के सम्बन्ध में यजुर्वेद में ‘हम राष्ट्र के पुरोहित हैं’ कौन कहता है ? भाषा।
केनोपनिषद में ‘तेनत्यक्तेन भुन्झिता’ के आचरण की बात कौन करती है? भाषा।
‘विश्व के सभी प्राणी सुखी हों’, भारत राष्ट्र की कामना को कौन अभिव्यक्ति देती है? भाषा।
भारतीय संस्कृति के समस्त संस्कारों, परम्पराओं, सभ्यताओं के विभिन्न तत्त्वों, लौकिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताओं में वैश्विक शुभकामनाएं कौन समाविष्ट करती है? भाषा ।
‘सा प्रथमा संस्कृति विश्वधारा’ भाषा ही तो बताती है!
‘मनुर्भवः’, अर्थात् मनुष्य बनो। किसका आह्वान है? भाषा का ही न !
संस्कृत हमें वेदों के कर्मकाण्ड, मीमांसा और उपनिषद की परम्परा से लेकर ब्रह्मसूत्र तक ले जाती है। हिमालय के कल्हण (राज तरंगिणी) से लेकर कालड़ी के शंकर तक का स्मरण कराती है।
भारतवर्ष की भाषाएँ चाहे वह संस्कृत हो, तमिल हो, बंगाली हो, गुजराती हो या हिंदी हो सभी अपने अंदर भारतीय संस्कृति और सभ्यता को समाहित किये हुए हैं।
यदि हिंदी पर विचार करे तो वह उर्दू, फ़ारसी, अरबी का हिन्दुस्तानी रूप नहीं है। वह संस्कृत की धरोहर को लिए निर्मल गंगधारा है।
इस धारा में लगभग सभी भारतीय भाषाओं के तात्विक शब्द समाहित हैं। इसी के साथ अरबी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, फ्रेच आदि के शब्द भी इसकी गोद में आनंद के साथ खेलते हैं। हिंदी ने इन अभारतीय भाषाओं को लिंग, वर्ण, शब्द और अर्थ की पहचान भी दी है।
अपनी उदारता के कारण हिंदी वैश्विक संस्कृति और सभ्यताओं के लोक कल्याणकारी तत्वों को भी ग्राह्य किये हुए है। उसकी लिपि जितनी सरल है, उतना ही उसका अनुवाद भी। उसमें तमाम आंचलिक शब्दों की धरोहर है, तो भारत की राष्ट्रीयता और संस्कृति के सम्बर्धन और संरक्षण की क्षमता है।
हिंदी अपने जन्म काल से ही भारत के हजारों वर्ष पूर्व की धरोहर को समेट कर चल रही है।
हिंदी भाषा ने अपने साहित्य के माध्यम से ही राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता में अन्यतम योगदान दिया है।
भारतीय परम्परा का ज्ञान हिंदी ने अपने विपुल साहित्य से दुनिया को करवाया। बाल्मीक और वेदव्यास के सन्देश को विश्व में पहुँचाने का कार्य हिंदी भाषा और उसका साहित्य ही कर रहा है ।
अभय और अमरता के संदेश तथा ज्ञान, इच्छा और क्रिया के समन्वय को हमारे संतों, कवियों ने हिंदी भाषा और उसकी बोलियों के माध्यम से विश्व को समझाया।
भारत की तमाम भाषाओं के स्वरों से ध्वनियों को ग्राह्य कर हिंदी ने वेद, उपनिषद, स्मृति, पुराण, रामायण, महाभारत, आयुर्वेद इत्यादि के तत्वों एवं स्वत्वों को समेट कर दुनिया को पहुँचाने का कार्य कर रही है।
कालिदास,भवभूति, माघ और अश्वघोष के साहित्य को लोकप्रिय बनाने में हिंदी ने अप्रतिम योगदान दिया है ।
काश्मीर की राजतरंगिणी हो या प्रत्यभिज्ञा दर्शन इनके ज्ञान प्रकाश को हिंदी ने ही अपने पाठकों तक पहुंचाया है ।
यदि हिंदी और उसकी क्षेत्रीय बोलियां न होती तो क्या हम इस राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के संतों, कवियों, महात्माओं को जान या समझ पाते।
आइये समझें हिंदी हमारा परिचय किनसे कराती है?* क्यों उसे भारतीय संस्कृति की संवाहक, समन्वय और संपर्क की भाषा कहा जाता है ?
हिंदी विज्ञान -प्रोद्योगिकी की भाषा है, कम्प्यूटर की, सोशल मीडिया की, पत्रकारिता की, धारावाहिक की, फिल्म की, रोजगार की, पंडिताई की, पुरोहितों की, सेना की, वोट की, नोट की,रोटी -बेटी की भाषा है।
हिन्दी योग, नियोग, छप्पन व्यंजनों की भाषा है। वह आरत की पुकार, अर्थार्थी की कामना, जिज्ञासु की समाधान और ज्ञानी के विज्ञान की भाषा है। हिंदी पुरुषार्थ चतुष्टय की भाषा है।
हिंदी मां,मामा- मामी, ताऊ, ताई, चाचा, चाची, काका,काकी,नाना, नानी, मौसी, मौसा, भतीजा , भतीजी, नाती , नातिन, परदादा, ताऊ के पृथक-पृथक सम्बन्धों के पहचान की भाषा है।
देश में समन्वय की, विदेश में प्रवासी-अप्रवासियों के पहचान और अस्तित्व बचाने की भाषा है।
तात्पर्य यह कि हिंदी भाषा ही नहीं भारत के धरोहर की वाहिका है। हिंदी विभिन्न प्रान्तों की भाषाओं से संवाद कराती है। हिंदी जनों से संपर्क करती है। साहित्य के माध्यम से उत्सवों, पर्वों का समन्वय कराती है।
वह कुछ की मातृभाषा है, तो कुछ की क्षेत्रीय भाषा है, तो कई राज्यों की राज्य भाषा है, देश के लोक-जन की संपर्क भाषा है, तो संविधान की राजभाषा है। देवता, मनुष्य, राक्षस और यक्षों की राष्ट्र भाषा है।
भारत के भाल की बिंदी! हे भारती! हे वाग्देवी!
भारतीयों को वैश्विक कल्याण के लिए सदैव तत्पर रखें।
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* उत्तरप्रदेश, पंचनद, हरियाणा के संत और भक्त: महात्मा बुद्ध, स्वामी रामानन्द, संत कबीर, बल्लभाचार्य, भक्त कुंभनदास, भक्त सूरदास, संत तुलसीदास, मलूकदास, मधुसूदन सरस्वती, संत आपा साहब, संत शिवनारायण। संत नामदेव, संत बेनी, साईं झूलेलाल, संत शादाराम साहेब,श्री गुरु नानकदेव श्री गुरु अर्जुनदेव, श्री गुरु हरि गोविन्द जी, श्री गुरु तेग बहादुर जी, श्री गुरु गोविन्द सिंह जी, संत रोहल, स्वामी श्रद्धानन्द जी। संत गरीबदास, भक्त जैतराम जी, संत चरणदास, संत घीसादास, राधास्वामी, स्वामी नितानंद, संत परमानन्द, संत मंगतराय को बिना हिंदी को जान पाते?
राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र के संत: संत पीपा जी महाराज, बाबा रामदेव, संत धन्ना, संत जम्भनाथ, संत हरिदास, मीराबाई, संत सोढीनाथी, सहजोबाई, संत दबाबाई, संत फूलीबाई, संत दादूदयाल, संत सुन्दरदास, संत दरिया साहब, संत हरिराय दास, संत रायदास, महर्षि नवल महाराज। भक्तिन लीरलबाई, भगत नरसी मेहता, संत पद्म नाथ, संत माण्डण, संत अखा, कच्छी संत मेकरण दास, स्वामी सहजानंद, स्वामी मुक्ता नंद, संतमूलदास, महर्षि दयानन्द सरस्वती। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, भक्त सावलामाली, भक्त गोरा कुंभार, संत मुक्ताबाई, संत जनाबाई, संत त्रिलोचन, संत चोखा मेला, संत एकनाथ, भक्तिन कान्होपात्रा, संत तुकाराम, समर्थ रामदास, संत तुकडो जी महाराज।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और झारखंड के संत: संत सींगाजी, संत सेन, स्वामी प्राणनाथ, संत घासीदास, गहिरागुरु।
बंगभूमि, प्राग्ज्योतिष क्षेत्र, उड़ीसा के संत: महावीर स्वामी, संत धरनी दास, संत दरिया साहब, महर्षि मेहदी दास परमहंस , चैतन्य महाप्रभु, बाउल संत जगबंधु सुन्दर दास, श्रीराम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी प्रणवानन्द ।माधव कंदली, श्रीमंत शंकरदेव, श्री माधव देव, रानी रापुईलियानी, रानी माँ गाइडिल्यू, श्री तालीम रुकबो, संत जयदेव, भक्त दासिया बाहरी शुद्रमुलि, सरलादास, भक्त बलरामदास, अच्युतानन्ददास, जगनाथ दास, यशोवन्त दास, भक्त शिश आनन्ददास, संत भीमा भाई के दर्शन कर पाते ?
आन्ध्र , तमिल , कर्नाटक, केरल, पाण्डुचेरी के संत: साधु रामानुजाचार्य, कवियित्री मोला, भक्त श्री अन्नमाचार्यलु, संत बेमना, पोतुलुरी बीर ब्रह्मेन्द्र स्वामी, श्री कोंडयाचार्य स्वामी, काव्यकंठ वसिष्ठ गणपति मुनि, सद्गुरु श्री मलयाल स्वामी, अल्लूरी सीताराम राजू , कुन्दकुरु वीरेशलिंगम पन्तुल। नायम्मार संत, भक्त तिरुमूलर, भक्त कारिकाल अम्मैयार, भक्त कण्णपर, संत नन्दनार, भक्त तिरुज्ञानसंबन्धर, भक्त अप्पर, भक्त पन्नकिरिवार, भक्त पोयगौ अलावार, भक्त भूतल आलवार, भक्त पेयालवार, भक्त तिरुमलिसाई आलवार, भक्त नम्मालवार, भक्त मधुरकवि, भक्त कुल शेखरालवार, भक्त पेरियालवार, भक्तिन आण्डाल, भक्त तिरुप्पाण आलवार, भक्त तिरुमंगै आलवार, भक्तिन ओवैयार, भक्त तिरुवल्लुवर, संत कम्बन, भक्तिन अव्वैयार, संत त्यागराज, संत रामलिंगस्वामीगल, महर्षि रमण। श्री अल्लुम प्रभु, भक्ति भण्डरी बसवेश्वर, वैराग्य निधि अक्क महादेवी, श्री मध्वाचार्य, श्री विद्यारण्य स्वामी, दासकूट, संत पुरन्दरदास, संत कनक दास, श्रीमद् शंकराचार्य, निरणम् कवि, चेरुशेरी नंबूतिरि, आचार्य तुंजतु, रामानुजम, एजुतच्छन, कवि कुंचन नंव्यार, श्री नारायण गुरु, श्री चट्टाम्बि स्वमीगल, महात्मा अय्यन्कालि, महाकवि करुप्पन,श्री अरविन्द घोष, श्री माँ को देश कैसे पहचानता? यदि हिन्दी न होती।